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ब्राह्मण नहीं, श्रमण थे आयुर्वेद के प्रतिपादक (पहला भाग)

श्रमणों की तरह, चिकित्सक भी ज्ञान के साधक थे। वे घूमते-फिरते, रोग का कारण तथा उसके लिए नई औषधि, उपचार और चिकित्सा ज्ञान प्राप्त करने में निरंतर लगे रहते थे। इसके लिए वे उन अन्य श्रमणों के साथ घुल-मिल जाते थे, जो निर्वाण की कामना के साथ यायावरी करते रहते थे। पढ़ें, ओमप्रकाश कश्यप के इस आलेख का पहला भाग

भारतीय चिकित्साशास्त्र के विकास का श्रेय पूरी तरह से श्रमणों को जाता है। यह भारतीय संस्कृति तथा यहां की श्रमण परंपरा जितना ही प्राचीन है। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो सभ्यता के जलकुंडों तथा जल-निकास की उन्नत व्यवस्था को देखकर सैंधव जनों की स्वास्थ्य तथा साज-सफाई के प्रति जागरूकता का अनुमान लगाया जा सकता है। कैनिथ जी. जिस्क के अनुसार– “मिस्र और मेसोपोटामिया की सुविकसित सभ्यताओं की चिकित्सा पद्धति की भांति, हड़प्पा संस्कृति की चिकित्सा प्रणाली भी संस्कृति भी अतिन्द्रिय विश्वासों तथा प्रथाओं से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई थी।” लेकिन उपचार-कर्म केवल अतीन्द्रिय विश्वासों पर टिका हो, ऐसा नहीं है। उसके लिये वन-वनस्पति जैसे प्राकृतिक उपादानों की भी मदद ली जाती थी। जिस्क के अनुसार– “उपचार कर्म के लिए, वहां के चिकित्सक, अन्य वस्तुओं के अलावा, विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों (जिनके उपचारात्मक प्रभाव को सुनिश्चित करने के लिए पूजा की जाती थी) के अलावा अनुष्ठानिक नृत्यों तथा अन्य गतिविधियों की मदद भी लेते थे, ताकि उन रोगों का निदान भी किया जा सके, जिनके कारण उस समय तक अज्ञात थे।[1]

दूसरी ओर ब्राह्मण संस्कृति में चिकित्सा-कर्म को हेय माना जाता था। ऋग्वेद के एक मंत्र में विभिन्न प्रकार के पेशों के साथ-साथ ‘भैषज्य’ को भी शामिल किया गया है। मंत्र में कहा गया है–हमारे कर्म विविध हैं, मनुष्यों के व्यवसाय विविध हैं; बढ़ई लकड़ी की इच्छा रखता है, वैद्य रोग की, ब्राह्मण सोम प्रवाहित (का सेवन) करने वाला है …[2]

यहां वैद्य, पुरोहित तथा बढ़ई आदि शिल्पकारों को एक साथ रखा गया है। इसका आशय यह नहीं कि वैदिक समाज में इन सभी को समान दर्जा प्राप्त था। शिल्पकार तो कमतर माने ही जाते थे, चिकित्सकों को भी पुरोहित वर्ग से निचले स्थान पर रखा गया था। देवताओं के चिकित्सक कहे जाने वाले अश्विन बंधुओं को भी, देवताओं की श्रेणी से अपमानित कर, पदावनत तथा देव-भाग से अलग कर दिया गया था, क्योंकि वे देवताओं के अलावा मनुष्यादि को भी चिकित्सा लाभ कराते थे।[3] इसमें ब्राह्मणों के लिए चिकित्सा-कर्म को निषिद्ध माना गया है। तैत्तिरीय संहिता के अलावा शतपथ ब्राह्मण, कश्यप संहिता आदि ग्रंथों में भी व्यवस्था गई है। इससे चिकित्सा शास्त्र के दार्शनिक अभिविन्यास (दर्शन तथा आयुर्वेद के गहन सम्बन्धों) की पुष्टि होती है। इसकी सफलता समस्त वस्तुजगत, जिसमें मनुष्य सहित संपूर्ण प्राणि समुदाय शामिल है– के प्रति भौतिकवादी (प्रकृतिवादी) दृष्टिकोण के बिना असंभव थी। तदनुसार मनुष्य के बारे में जानने के लिए प्रकृति तथा प्रकृति को जानने के मानव प्रजाति का गहन ज्ञान आवश्यक था।

भारतीय चिकित्सा के आरंभिक सिद्धांतकार प्रकृति से सीधे जुड़े थे। मनुष्य तथा प्रकृति को समझने के लिए उन्होंने प्रत्यक्ष अवलोकन पर अत्यधिक जोर दिया है। उनका विश्वास था कि मनुष्य के स्वास्थ्य, निरोगी जीवन तथा शेष समाज के प्रति उसकी सकारात्मक दृष्टि का गहन संबंध होता है। मनुष्य खुद को सुखी तथा चिंता-मुक्त करने के साथ-साथ शेष समाज को भी सुखी एवं चिंतामुक्त करने का प्रयास करता रहे, तभी वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। सामान्य नैतिकता का यह सिद्धांत चिकित्सा-शास्त्रियों तथा श्रमण चिंतकों के करीबी संबंध का सुफल था। चरकसंहिता जो असल में श्रमण ग्रंथ है, में कहा गया है–

हितकारी आहार और विहार का सेवन करने वाला, विचारपूर्वक काम करने वाला, काम-क्रोधादि विषयों में आसक्त न रहने वाला, दान देने वाला, सम अर्थात सभी प्राणियों के प्रति बराबर समतुल्य दृष्टि रखने वाला, सत्य बोलने को तत्पर, सहनशील तथा आप्त पुरुषों की सेवा करने वाला मनुष्य अरोग रहता है। और ऐसे व्यक्ति जिसके पास सुख देने वाली मति, सुखकारक वचन, सुखकारक कर्म, अपने अधीन मन, शुद्ध, निष्पाप बुद्धि जिनके पास है, और जो दान प्राप्त करने, तपस्या करने तथा योग सिद्ध करने में तत्पर रहते हैं, उन्हें शारीरिक एवं मानसिक रोग नहीं होते हैं।[4]

अनीश्वरवादी/प्रकृतिवादी चिंतकों ने चिकित्साशास्त्र को सामाजिक और दार्शनिक अभिविन्यास प्रदान किया थे। इनमें उस समय के आजीवक, जैन, बौद्ध सहित विभिन्न मतों-संप्रदायों से जुड़े श्रमण सम्मिलित थे। श्रमणों की तरह, चिकित्सक भी ज्ञान के साधक थे। वे घूमते-फिरते, रोग का कारण तथा उसके लिए नई औषधि, उपचार और चिकित्सा ज्ञान प्राप्त करने में निरंतर लगे रहते थे। इसके लिए वे उन अन्य श्रमणों के साथ घुल-मिल जाते थे, जो निर्वाण की कामना के साथ यायावरी करते रहते थे। श्रमणों के सान्निध्य में रहकर चिकित्सकों ने चिकित्सा संबंधी ज्ञान का विशाल भंडार अर्जित किया, जिसने भारतीय चिकित्सा परंपरा को आयुर्वेद के उपदेशों और अभ्यासों से सुसज्जित किया।[5] आयुर्वेद का सबसे प्रतिष्ठित ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ श्रमण परंपरा का ही ग्रंथ है। इसके रचियता अग्निवैश्यायन हैं। इसका दूसरा नाम ‘अग्निवेशतंत्र’ है।

गांधार कला शैली की एक प्रतिमा जिसमें बुद्ध अपने शिष्यों के साथ अन्न ग्रहण करते दिखाए गए हैं (तस्वीर : म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट, कोर्फू, ग्रीस)

‘चर’ धातु का मुख्य अर्थ है– चलना, विचरण करना या आगे बढ़ना। यह क्रियाओं को दर्शाती है जो गति या परिवर्तन का संकेत देती हैं। जाहिर है इसमें उन यायावर श्रमणों के ज्ञानानुभव समाहित हैं, जो लोकहित की वांछा के साथ निरंतर यहां से वहां विचरण करते रहते थे। चरक तथा सुश्रुत संहिताओं में आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपांग माना है।[6] चारों वेदों में यह सबसे नया और संभवत: गुप्तकालीन रचना है। इन्ही दिनों ‘चरकसंहिता’ को संस्कृत में लिपिबद्ध किया गया था। यही वह समय था जब जनसमाज से अपनी दूरी कम करने के लिए ब्राह्मण श्रमण परंपरा से सामान्य नैतिकता, संन्यास, अहिंसा जैसे जीवनमूल्य उधार ले रहे थे। जिस्क के शब्दों में कहें तो “चिकित्सा संबंधी ज्ञान को संग्रहित, व्यवस्थित, प्रसारित तथा लोकधर्मी बनाने का काम अनीश्वरवादी श्रमण बुद्धिजीवियों ने किया। बाद में ब्राह्मणों ने उसे आत्मसात और संसाधित किया गया ताकि उसे एक रूढ़िवादी विश्वदृष्टि में फिट किया जा सके।”[7]

निशीथ चूर्णि में अन्यतीर्थक श्रमणों एवं श्रमणियों के कुल तीस नाम गिनाए गए हैं। उनमें आजीवक के अलावा चरक तथा चरिका भी शामिल हैं। वे आजीवक, जैन तथा बौद्ध कोई भी हो सकते हैं। जैनागमों तथा उनकी टीकाओं में चरक तथा परिव्राजक का निरंतर उल्लेख मिलता है। दशवैकालिक निर्युक्ति में बताए गए बीस प्रकार के श्रमणों में चरक का भी उल्लेख है। ओवाइंय में नौ प्रकार के परिव्राजकों बताये गए हैं– सांख्य, योगी, कापिल, भार्गव, हंस, परमहंस, बहुदक, कुटिव्रत तथा कृष्ण परिव्राजक। वाराहमिहिर की लघुजातक में सात प्रकार के श्रमणों का उल्लेख है, उनमें आजीवक, वृद्धश्रावक, तापस, निर्ग्रंथ, बौद्ध आदि के साथ चरकों को भी शामिल किया गया है।[8]

वाराहमिहिर कृत लघुजातक का मंंत्र, जिसमें चरक को भिक्षु बताया गया है

विआहपण्णत्ती में तापस, कांदपिक, चरक परिव्राजक, आजीविक तथा जैन मुनि, ये नौ प्रकार के तापस बताये गए हैं।[9] इसकी टीका भगवतीवृत्ति में चरक को निरंतर परिभ्रमण करने वाला तथा भिक्षा पर जीवन बिताने वाला दंडी श्रमण बताया गया है।[10] त्रिलोकसार के टीकाकार माधवचंद्र त्रिविद्यदेव ने चरकों को ‘नग्न है अंड जिनका ऐसे चरक परिव्राजक’ (चरया य नग्नांड), लिखकर उन्हें आजीवकों जैसे लक्षणवाला घोषित किया गया है। त्रिलोकसार (गाथा 547) के अनुसार चरक भिक्षु मृत्यु के बाद ब्रह्मकल्प तक जाते है, वहीं आजीवक श्रमण उससे ऊपर अच्युत कल्प तक जाते हैं। इस तरह आजीवकों को चरक से श्रेष्ठतर माना गया है। मेगास्थनीज की ‘इंडिका’ में चंद्रगुप्त के समकालीन श्रमणों की दो श्रेणियों का उल्लेख है। उनमें हॉयलोबी (नग्न श्रमण) श्रेष्ठतम माने गए हैं, दूसरे स्तर पर चिकित्सकों को रखा गया है, जिन्हें मानवतावादी दार्शनिक का दर्जा दिया गया है।[11] ये अपना जीवन लोगों के रोगोपचार में लगा देते थे।

आजीवक यूं तो कठिन तपश्चर्य, अपरिग्रह आदि पर विश्वास करते थे, लेकिन उनकी पैठ शिल्पकारों, किसानों आदि के बीच थी, जो किसी न किसी न किसी प्रकार की आजीविका द्वारा जीवनयापन करते थे। चरक संहिता के ग्यारहवें अध्याय में आत्रेय मुनि अग्निवेशायन, पराशर, जतुकर्ण आदि अपने छह शिष्यों को समझाते हुए कहते हैं– “जीवन में आजीविकोपार्जन तथा धन प्राप्ति का प्रयास न करने से बड़ा कोई पाप नहीं है।” उनके छह विद्यार्थियों में अग्निवेश (अग्निवेशायन) सर्वाधिक प्रतिभाशाली थे। ‘चरकसंहिता’ की रचना का श्रेय उन्हीं को जाता है। चरक नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें श्रमणों (चरकों) के आयुर्वेद संबंधी ज्ञान को संग्रहित किया गया था। जीवनेच्छा के साथ-साथ आजीविका की अपरिहार्यता पर जोर देते हुए आत्रेय ने कहा था–

उस मनुष्य से बड़ा कोई पापी नहीं है जिसकी आयु लंबी, लेकिन आजीविका का कोई साधन न हो। इसलिए आजीविका की खोज के लिए संघर्ष करना चाहिए। इसके कुछ प्रचलित उपाय हैं– कृषि, पशुपालन, व्यापार अथवा नौकरी वगैरह। इनके अलावा अन्य सभी कर्म जो समाज द्बारा मान्य हों, वे भी करने चाहिए। इन रास्तों को अपनाकर मनुष्य सफल और दीर्घ जीवन को प्राप्त कर लेता है।[12]

विआहपण्णत्ती के अनुसार गोसालक के समक्ष अष्ठविध महानिमित्त की विवेचना करने पहुंचे छह दिशाचरों में अग्निवेश्यायन (अग्निवेश) भी शामिल थे।[13] दिशाचरों का सम्मेलन सम्भवतः श्रावस्ती में हुआ था, उसी में आजीवक[14] संघ के सिद्धांतोंको सूत्रबद्ध किया गया था। यदि दिशाचर अग्निवेश्यायन को ‘चरकसंहिता’ के अग्निवेशायन से जोड़कर देखा जाए तो पता चलता है कि गोसालक को अष्टमहानिमित्त का ज्ञान देने या परखने आये छह दिशाचरों में, कम से कम एक को आयुर्वेद संबंधी जानकारी थी। ‘चरकसंहिता’ के आरंभ में ही यह साफ हो जाता है कि अग्निवेशायन उन छह ऋषियों में से थे जिन्होंने पुनर्वसु आत्रेय से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था।[15] ‘चरक संहिता’ के अनुसार छह ऋषियों में अग्निवेश की बुद्धि सबसे प्रखर थी। सबसे पहले उन्होंने ही अपना ग्रंथ (चरक संहिता) तैयार किया था। ‘छह कायचिकित्सकों’ का अनाम उल्लेख सुश्रुत संहिता में भी आया है। उन्हें महान ऋषि बताया गया है। इसके हिंदी टीकाकार अंबिकादत्तशास्त्री ने उनके वही नाम (अग्निवेश, भेड, जातूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि) दिये हैं, जो चरक संहिता में हैं।[16] सुश्रुत संहिता की टीका आयुर्वेदत्त्वसंदीपिका के अनुसार आयुर्वेद अथर्ववेद का उपांग है, इसके आठ भाग हैं। लेकिन सामग्री का आठ भागों में विभाजन ब्रह्मा द्वारा न होकर, अग्निवेशायन द्वारा किया गया था, ऐसा माना जाता है।[17] लेकिन आजीवकों तथा आयुर्वेद का संबंध मात्र अग्निवेश तथा उनकी ‘चरक संहिता’ तक सीमित नहीं है।

विआहपण्णत्ती से इसकी पूर्वपीठिका की जानकारी मिल जाती है। गोसालक से मिलने पहुंचे छह दिशाचरों ने उनके समक्ष अष्टमहानिमित का दसवें पुब्ब से अपने-अपने मत के अनुसार निर्यूहण (विवेचन) किया था। पुब्ब (पूर्वगत) दृष्टिवाद का हिस्सा हैं। जैन परंपरा के अनुसार बारहवें अंग दृष्टिवाद के चौदह पुब्बों में से बारहवें का नाम प्राणावाय या प्राणवाद था। जैन आगम साहित्य में चिकित्सा विज्ञान को ही प्राणावाय कहते हैं। प्राणावाय में अष्टांग आयुर्वेद की विवेचना मिलती है। तदनुसार उसे परिभाषित करते हुए कहा गया है कि जिस शास्त्र में काय, तद्गत दोष तथा उनका निदान, अष्ठांग आयुर्वेद आदि पञ्च महाभूतों के कर्म, विषैले जीव-जंतुओं के विष का प्रभाव तथा उसकी चिकित्सा, प्राण-अपान वायु का विभाग सविस्तार वर्णित हो, वह प्राणावाय कहलाता है।[18]

आठवीं शताब्दी के दिगम्बर आचार्य अकलंकदेव कृत तत्त्वार्थवात्तिक(1.20) में प्राणावाय को इन शब्दों में परिभाषित किया गया है– “वह शास्त्र, जिसमें कायचिकित्सा आदि आठ अंगों के रूप में संपूर्ण आयुर्वेद, भूतशांति के उपाय, विषचिकित्सा (जांगुलिप्रक्रम) और प्राण-अपान आदि वायुओं के शरीरधारण करने की दृष्टि से प्रतिपादन किया गया है, उसे प्राणावाय कहते हैं।” पुनश्चः गोम्मटसार ‘जीवकंड’ की गाथा 366 की कर्नाटवृत्ति में प्राणावाय को स्पष्ट करते हुए लिखा है– “प्राणों का आवाद-कथन (पूरक कथन) जिस में है वह प्राणावाय नाम बारहवां पूर्व है। वह कायचिकित्सा आदि अष्टांग आयुर्वेद – जननकर्म, जांगुलिप्रक्रम, ईड़ा-पिंगला-सुषुम्ना आदि अनेक प्रकार के प्राण-अपान, श्वासोच्छ्वास के विभाग का तथा दस प्राणों के उपकारक-अपकारक द्रव्यों का, गति आदि के अनुसार वर्णन करता है।”[19]

प्राणावाय जैन शास्त्र का पुराना ग्रंथ बताया जाता है। आयुर्वेद में ‘चरकसंहिता’ की जैसी मान्यता रही है, उससे यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि इस ग्रंथ का लिप्प्यकरण चाहे जिसने किया हो, इतना तय है कि इस समूची श्रमण परंपरा के आयुर्वेद संबंधी ज्ञान का प्रतिनिधि संचयन रहा होगा। दिशाचरों द्वारा गोसालक के समक्ष प्राणावाय के प्रस्तुतीकरण का आशय था गोसालक को संघ का अधिपति मनोनीत करने से पहले उनके आयुर्वेदिक ज्ञान की परीक्षा लेना अथवा तत्संबंधी ज्ञान को परिपक्व बनाना। संघ के सदस्य अपने मामूली से मामूली मसले पर निर्णय के लिए अपने शास्ता पर निर्भर रहते थे, उसमें संघ की भैषज्य संबंधी नीति भी शामिल है। संघ के सदस्यों के लिए क्या पथ्य है, क्या कुपथ्य, कब और कितना भोजन करना चाहिए, संघ-संचालक को उसका ज्ञान होना अनिवार्य था। इसकी पुष्टि के लिए ‘विनय पिटक’ को देखा जा सकता है। एक बार बुद्ध श्रावस्ती के जेतवन थे। वहां भिक्षुओं को सर्दी-बुखार ने जकड़ लिया। थोड़ा भी खा-पी लें तो वमन हो जाता था। इससे वे पीले तथा कमजोर हो चुके थे। भिक्षुओं की हालत देख बुद्ध ने पांच भैषज्य घी, मक्खन, तैल, खांड तथा मधु के सेवन की अनुमति देते हुए कहा– “मैं इन पांचों अपराह्न में लेने तथा सेवन करने की अनुमति देता हूं।”[20] शराब औषध का काम करती है। उन दिनों तेल में शराब मिलाकर दवा बनाई जाती थी, लेकिन संघ के नियमानुसार मद्य का सेवन निषिद्ध था। बात बुद्ध तक पहुंची। उन्होंने चिकित्सा हेतु तेलपाक में मद्य मिलाने की अनुमति दे दी। आगे चलकर कुछ भिक्षु शास्ता से मिली छूट का दुरुपयोग करने लगे। वे तेलपाक में बहुत ज्यादा अनुपात में शराब मिलाकर सेवन करने लगे। इससे आहत होकर उन्होंने ज्यादा शराब मिलकार तेलपाक बनाना प्रतिबंधित कर दिया।

क्रमश: जारी

संदर्भ :

[1]           कैनिथ जी. जिस्क, एसिटिशिज्म एण्ड हीलिंग इन एन्शीएंट इंडिया : मेडिसिन इन बुद्धिस्ट मोनेस्ट्री [1991 : 13]

[2]           नानानं वा उ नो धियो वि व्रतानि जनानाम् । तक्षा रिष्टं रुतं भिषग्ब्रह्मा सुन्वन्तमिच्छतीन्द्रायेन्दो परि स्रव॥ ऋग्वेद [9.112.1]

[3]           यदाश्विनो गृह्यते यज्ञस्य निष्कृत्यै तौ देवा अब्रुवन्नपूतौ वा इमौ मनुष्यचरौ। भिषजाविति तस्माद्बाह्मणेन भेषजं न कार्यंमपूतो ह्येषोमेध्यो यो भिषक्तौ बहिष्पवमानेन। तैत्तिरीय संहिता [1897 : 6.4.37]

[4]           नरो हिताहारविहारसेवी समीक्ष्यकारी विषयेष्वसक्तः

दाता समः सत्यपरः क्षमावानाप्नोपसेवी च भवत्यरोगः।

मतिर्वचः कर्म सुखानुबन्धं सत्त्वं विधेयं विशदा च बुद्धिः

ज्ञानं तपस्तत्परता च योगे यस्यास्ति तं नानुपतन्ति रोगः। चरकसंहिता [ 4.2.46-47]

[5]           कैनिथ जी. जिस्क, एसिटिशिज्म एण्ड हीलिंग इन एन्शीएंट इंडिया [1991 : 37]

[6]           इह खलु आयुर्वेदो नाम यदुपाङ्गमथर्ववेदस्यानुत्पाद्यैव। सुश्रुत संहिता [1954, 1.6]

[7]           एसिटिशिज्म एण्ड हीलिंग इन एन्शीएंट इंडिया [1991 : 4]

[8]           तापसवृद्धश्रावकरक्तपटाजीविकभिक्षुचरकाणाम्।

निर्ग्रन्थानां चार्कात् पराजितैः प्रच्युतिर्बलिभिः॥ लघुजातक [1882, 12.12]

[9].          विआहपण्णत्ती [1994,1.2.113]

[10]         चरगपरिव्वायगाणंति चरकपरिव्राजका—धाटिभैक्ष्योपजीविनस्त्रिदण्डिनः। भगवतीवृत्ति [1994,1.2.113]

[11]         स्ट्रेबो, दि ज्योग्राफी, भाग 7 [15.1.60]

[12]         न ह्यतः पापात् पापीयोऽस्ति यदनुपकरणस्य दीर्घमायुः, तस्मादुपकरणानि पर्येष्टुं यतेत। तत्रोपकरणोपायाननुव्याख्यास्यामः; तद्यथा कृषिपाशुपाल्यवाणिज्यराजोपसेवादीनि, यानि चान्यान्यपि सतामविगर्हितानि कर्माणि वृत्तिपुष्टिकराणि विद्यात्तान्यारभेत कर्तुं; तथा कुर्वन् दीर्घजीवितं जीवत्यनवमतः पुरुषो भवतीति। चरकसंहिता[1963, 11.5]

[13].        विआहपण्णत्ती [2007, 15. 77]

[14]         बॉशम, डॉक्ट्रीन ऑफ आजीविक्स [1951 : 58]

[15].        अथ मैत्रीपरःपुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः। शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्य सर्वभूतानुकम्पया॥

अग्निवेशश्च भेडश्च, जतूकर्णः पराशरः। चरकसंहिता [1963 : 1.29-30]

[16].        षट्सु कायचिकित्सासु ये चोक्ता परमर्षिभि। सुश्रुत संहिता, उत्तरतंत्रम् [1939 : 1.1.6]       

[17]         आयुर्वेद श्लोकलक्षेण पूर्व ब्राह्मस्तवासीदग्निवेशादयस्तु। चरकसंहिता सूत्रस्थानम् टीका[1954 : 3]

[18]         कायचिकित्साद्यष्टांग आयुर्वेदः भूतकर्मः जांगुलिप्रक्रमः।

प्राणायानविभागोपि यत्र विस्तरेण वर्णितत्स्त्तप्राणायाम। डॉ राजेन्द्रप्रकाश भटनागर द्वारा उद्धृत, जैन आयुर्वेद का इतिहास [1984 : 12]

[19]         प्राणानामावादः प्ररूपणमस्मिन्निति प्राणावादं द्वादशं पूव्वं मदु। कायचिकित्साद्यष्टांगमायुर्वेदं भूतिकर्मज जांगुलिप्रक्रमं ईला-पिंगला सुषुम्नांदिंबहुप्रकार प्राणापानविभागमं दशप्राणगलुपकारकापकारकद्रव्यं गलुमं गत्याद्यनुसारदिवणि। डॉ राजेन्द्रप्रकाश भटनागर द्वारा उद्धृत, जैन आयुर्वेद का इतिहास [1984 : 13]

[20]         राहुल सांकृत्यायन, विनय पिटक [1934, भैषज्य स्कंधक 6.1.1]

(संपादन : नवल/अनिल)

 

 

लेखक के बारे में

ओमप्रकाश कश्यप

साहित्यकार एवं विचारक ओमप्रकाश कश्यप की विविध विधाओं की तैतीस पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। बाल साहित्य के भी सशक्त रचनाकार ओमप्रकाश कश्यप को 2002 में हिन्दी अकादमी दिल्ली के द्वारा और 2015 में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के द्वारा समानित किया जा चुका है। विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में नियमित लेखन

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