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हिंदुत्व की वैचारिक जड़ों को चुनौती देती किताब

यह पुस्तक लेखक के पूर्व आरएसएस सदस्य होने के कारण अंदरूनी और अधिक प्रामाणिक है। यह शैक्षणिक से ज्यादा आंदोलनकारी-शोधपरक साहित्य है, जो बहुजन साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और हिंदुत्व की वैचारिक जड़ों को चुनौती देता है। पढ़ें, तारा राम की यह समीक्षा

‘आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद (परत-दर-परत पड़ताल)’ जनवरी, 2026 में फॉरवर्ड प्रेस से प्रकाशित हुई एक नई शोध-आधारित किताब है। यह लेखक की पिछली प्रसिद्ध आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ के बाद की एक महत्वपूर्ण कृति है, जिसमें वे आरएसएस के भीतर अपने अनुभवों को आधार बनाकर आरएसएस के संगठन के वैचारिक ढांचे की गहरी पड़ताल करते हैं। यह समकालीन सामाजिक चिंतन और राजनीति की विसात का खुलासा करती है।

यह सर्वविदित है कि वर्तमान में भारतीय राजनीति के पक्ष और विपक्ष में ‘हिंदुत्व’ सत्ता प्राप्ति का एक सर्वसुलभ साधन बन चुका है। ऐसे में हिंदुत्व की राजनीति को अंजाम तक पहुंचाने के लिए सतत प्रयासरत आरएसएस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में झांकना बहुत ही प्रासंगिक हो जाता है। भंवर मेघवंशी की यह पुस्तक उसी विमर्श से उपजी एक कृति है। आरएसएस का राष्ट्र और राष्ट्रवाद भौगोलिक सीमा में बंधा वह राष्ट्र नहीं है, जिसे आजकल देश कहा जाता है या राष्ट्र राज्य कहा जाता है। आरएसएस का ‘राष्ट्र’ एक कौम है, हिंदू कौम (जो अपरिभाषित है), जिसका सामाजिक ढांचा असमानता और ऊंच-नीच पर आधारित है। उसका ताना-बाना या दर्शन या जिसे हिंदुत्व कहा गया है, वह ही आरएसएस का राष्ट्रवाद है। वह आधुनिक राष्ट्र राज्य को नहीं मानता है। आरएसएस के राष्ट्रवाद को ‘हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद’ कहा जा सकता है, जो स्वभावत: जातियों में बंटा क़बीलाई और मध्यकालीन विसंगतियों से परिपूर्ण है। उसके लिए शास्त्र प्रमाण है, संविधान या विवेक गौण है। इससे परंपरागत मूल्यों और उभरते नए मूल्यों में संघर्ष होना स्वाभाविक है, जिसकी अनुभूति लेखक ने इस कृति में बयान की है। यह एक तीव्र और गहरा संघर्ष या टकराव है, जिसे वर्तमान भारतीय समाज झेल रहा है। लेखक ने आंबेडकर के विचार दर्शन से इसकी टोह लेने का प्रयत्न किया है। इसे हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी कहा गया है।

हमें पुस्तक के शीर्षक से ज्ञात होता है कि ‘द्विज राष्ट्रवाद’ पुस्तक का केंद्रीय विषय है, जो आगे विस्तार से आता है, लेकिन पुस्तक की भूमिका में ‘द्विज राष्ट्रवाद’ शब्द कहीं भी सीधे प्रयुक्त नहीं हुआ है। ‘द्विज राष्ट्रवाद’ का भूमिका में परिभाषित नहीं होना, जो शीर्षक का मुख्य शब्द है, पाठक को थोड़ा असमंजस में डाल सकता है (अगर पहले से अवधारणा ज्ञात नहीं हो तो)। हालांकि भूमिका में यह अप्रत्यक्ष रूप से इंगित है कि आरएसएस का राष्ट्रवाद वर्ण-आधारित असमानता और द्विज वर्चस्व को बनाए रखने वाला है। जैसे– जाति-व्यवस्था को वैध ठहराना, असमानता को हिंदू धर्म की आत्मा बताना आदि। पुस्तक की विस्तृत भूमिका पूरी तरह आरएसएस के ‘हिंदू राष्ट्र’ या ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ बनाम आंबेडकर के ‘संविधान-आधारित समानता वाले राष्ट्र’ के बीच फर्क पर केंद्रित है। लेखक के मुताबिक, आरएसएस का राष्ट्र ‘धर्म और धर्म संस्कृति’ पर आधारित हिंदू समुदाय वाला राष्ट्र हैं, जबकि आंबेडकर का राष्ट्र नागरिक समाज है, जो समानता, संविधान और लोकतंत्र पर आधारित है अर्थात आंबेडकर का राष्ट्र संविधान और समानता पर आधारित नागरिक समाज है।

भूमिका शीर्षक के दो मुख्य हिस्सों को जोड़ती है– एक, ‘आंबेडकरवाद की रोशनी में’ यानी पूरी भूमिका आंबेडकर के विचारों (समानता, संविधान, जाति उन्मूलन, मनुस्मृति-विरोध) को चश्मा (लेंस) बनाकर आरएसएस की विचारधारा की पड़ताल करने की बात करती है। उदाहरण के तौर पर आंबेडकर के उद्धरण जैसे “जाति और वर्ण ऐसे दो मामले हैं, जिनकी चर्चा वेदों और शास्त्रों में की गई है…” और मनुस्मृति को चुनौती देने की बात आदि। दूसरा, ‘आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद’ को भूमिका में आरएसएस के राष्ट्र को धर्म-संस्कृति आधारित बताकर इसे आंबेडकर के समतामूलक राष्ट्र से विपरीत स्थापित किया गया है। यह द्विज (ब्राह्मण-क्षत्रिय) वर्चस्व वाली असमानता को इंगित करती है, जैसे असमानता को ‘हिंदू धर्म की आत्मा’ बताना।

अंत में लेखक स्पष्ट कहते हैं– “बाबा साहेब को आरएसएस के आवरण में लपेटने की हर कोशिश नाकाम रहेगी, क्योंकि दोनों विचारधारा के तल पर दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े हैं।” यह शीर्षक का सार है यानि आंबेडकरवाद से देखने पर आरएसएस का राष्ट्रवाद ‘द्विज-केंद्रित’ लगता है।

भूमिका आरएसएस के 100 वर्षों के सफर, उसके आंबेडकर के प्रति बदलते रवैये, संविधान-आरक्षण पर आपत्तियां, उसके मनुस्मृति-प्रेरित विचार और वर्णव्यवस्था को बनाए रखने की मंशा को उजागर करना प्रस्तावित करती है। भूमिका में प्रस्तावित बिंदुओं को निम्न भागों में बांट सकते है– आरएसएस ने आंबेडकर को लेकर शुरुआत में क्या विचार रखे (विरोधी/आलोचनात्मक) और बाद में क्यों ‘अपनाने’ की कोशिश की। आरएसएस के दावों (जैसे आंबेडकर हिंदू राष्ट्र समर्थक थे) की तथ्य-आधारित पड़ताल। हिंदुत्व की राजनीति में जाति कैसे बनी रहती है, जबकि आंबेडकर इसे उखाड़ फेंकना चाहते थे। वर्तमान में आरएसएस के ‘हिंदू एकता’ के नाम पर दलित-बहुजन को कैसे शामिल करने का दिखावा, लेकिन मूल में असमानता बनाए रखना।

समीक्षित पुस्तक ‘आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद (परत-दर-परत पड़ताल)’ का मुख पृष्ठ

भूमिका में मुख्य बात यह कही गई है कि डॉ. भीमराव आंबेडकर और आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के बीच वैचारिक स्तर पर गहरा टकराव है। दोनों ही 20वीं सदी के भारत के वैचारिक प्रवाहों का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन उनके राष्ट्र की कल्पना पूरी तरह विपरीत है। आंबेडकर का राष्ट्र संविधान, समानता, नागरिक समाज और लोकतंत्र पर आधारित है, जबकि आरएसएस का राष्ट्र धर्म, संस्कृति और हिंदू समुदाय पर आधारित है। लेखक इस फर्क को उजागर करते हुए आरएसएस के ‘हिंदू राष्ट्र’ को आंबेडकरवादी लेंस से जांचने का आधार तैयार करते हैं।

इस पुस्तक का प्रतिपाद्य विषय दो भागों में विभक्त है– पहला भाग विचार और कृत्य से जुड़ा है तो दूसरे भाग में आरएसएस के सौ साल के नेतृत्व का सिंहावलोकन है। परिशिष्ट रूप में समाविष्ट अंतिम भाग तथ्यान्वेषण है, जो विगत कई दशकों से आरएसएस द्वारा जन मानस में फैलाए गए है। पुस्तक के प्रतिपाद्य विषय का तीन-चौथाई से ज्यादा हिस्सा पहले भाग में है, जो यह साबित करता है कि पुस्तक का मूल विषय यही है। आरएसएस के द्विज राष्ट्रवाद को परखने के लिए लेखक ने तीन कसौटिया चुनी है– भारतीय संविधान (अध्याय 1), आरक्षण (अध्याय 3) और जाति (अध्याय 4)। इनको आंबेडकर की वैचारिकी से प्रतिपादित करते हुए विरोधाभाषी बताया गया है (अध्याय 2)। ये ही टकराव के महत्वपूर्ण बिंदु है, जिसका पुस्तक में विस्तार है।

चूंकि डॉ. आंबेडकर भारतीय संविधान के प्रमुख पैरोकार थे और जाति के विध्वंसक तथा आरक्षण के हिमायती थे। इसलिए आरएसएस और डॉ. आंबेडकर के आपसी संबंधों की खोज भी इसी भाग में समाहित की गई है। पुस्तक को पढ़ने के बाद यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि यह आरएसएस के हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद का आंबेडकरवादी दृष्टिकोण से तीखा आलोचनात्मक अध्ययन है। यह पुस्तक संघ के ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को द्विजों (उच्च जातियों) के वर्चस्व को कायम रखने का साधन बताती है। पुस्तक संघ की राजनीति का ‘परत-दर-परत’ कच्चा चिट्ठा खोलती है। लेखक ने स्थापित किया है कि संघ के सौ वर्षों के सफर में दलितों को केवल मोहरा बनाया गया है।

लेखक तथ्यों के साथ यह स्थापित करते हैं कि आरएसएस और आंबेडकर की विचारधाराएं भारतीय राजनीति के दो विपरीत ध्रुव हैं। एक ओर डॉ. आंबेडकर जाति के विनाश, लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना और सामाजिक न्याय की ओर कदम बढ़ाने के पैरोकार थे, वहीं आरएसएस यथास्थिति बनाए रखने और पूर्व-आधुनिक काल के ऊंच-नीच पर आधारित मूल्यों के पुनरुत्थान का पैरोकार है। यह टकराव का मूल बिंदु है। लेकिन विचारधारा के स्तर पर आंबेडकर के धुर विरोधी होते हुए भी आरएसएस के नेता यह दिखाते नहीं थकते हैं कि वे डॉ. आंबेडकर का कितना सम्मान करते हैं। वे आंबेडकर का जन्मदिन मनाते हैं और उनकी पुण्यतिथि पर भी आयोजन करते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि अपने वार्षिक विजयादशमी प्रबोधन (अक्टूबर 24, 2023) में आरएसएस मुखिया मोहन भागवत ने अपने अनुयायियों का आह्वान किया कि वे आंबेडकर के भाषण पढ़ें, विशेषकर संविधान सभा में दिए गए उनके अंतिम दो भाषण। यही नहीं, भागवत ने आंबेडकर की तुलना संघ के संस्थापक और उसके प्रथम सरसंघचालक डॉ. के.बी. हेडगेवार से कर डाली। आरएसएस समर्थक ‘हमारे गौरवशाली अतीत’ के नाम पर आंबेडकर के संघर्ष और उनके प्रयासों का विचारधारात्मक स्तर पर विरोध करते रहे हैं।

संविधान सभा ने संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया। इन प्रावधानों को मुंहजुबानी प्रचार के ज़रिए बदनाम किया गया, जिसके नतीजे में 1980-81 में और फिर 1985 में गुजरात में दलित-विरोधी हिंसा हुई। इसी तरह, मंडल आयोग की सिफारिशों का अपरोक्ष रूप से विरोध करने के लिए राममंदिर रथयात्रा शुरू की गई और पार्टी के वरिष्ठ नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने कहा कि “वे मंडल लाए तो हम कमंडल लाए”। यह भी दिलचस्प है कि संघ परिवार ने बाबरी मस्जिद को गिराने के लिए 6 दिसंबर का दिन चुना गया, जो कि आंबेडकर की पुण्यतिथि है। यह इस दिन, जो लोकतांत्रिक मूल्यों के महत्व को रेखांकित करता है, की महत्ता को कम करने का एक रणनीतिक प्रयास था।

आंबेडकर के लिए सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा था। वे जाति के उन्मूलन के पैरोकार थे। इसके विपरीत, आरएसएस ने ‘सामाजिक समरसता मंचों’ की स्थापना की है। संघ की दृष्टि में जातियां हिंदू धर्म का अभिन्न भाग हैं और वे हिंदू धर्म को मजबूती देती हैं। यही इन दोनों विचारधारात्मक धाराओं में मूल विरोधाभास है। हिंदू बहुसंख्यकवादी राजनीति, जातिगत पदक्रम को नए-नए नामों से बचाए रखना चाहती है। वह भारतीय संविधान में केवल शाब्दिक आस्था रखती है। संघ के चिंतक कहते हैं कि भारत एक ‘सभ्यतागत राज्य’ (मनुस्मृति जैसी पवित्र पुस्तकों में निरुपित जातिगत और लैंगिक मूल्यों के प्रतीक) है, जिसके लिए संविधान उतना महत्वपूर्ण नहीं है।

भंवर मेघवंशी की पुस्तक आरएसएस के वर्तमान दावों की शुरुआत से ही पड़ताल करती है– “संघ दावा करता है कि उसने सदैव संविधान का सम्मान किया, अब इसे ‘पवित्र ग्रंथ’ और ‘सामवेद’ मानता है।” लेखक सवाल उठाते हैं कि “यह बदलाव कब और क्यों हुआ? क्या संघ ने कभी संविधान का विरोध नहीं किया? क्या यह असंवैधानिक गतिविधियों में शामिल नहीं रहा?”

लेखक ने आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार काल (1925-1940) की स्थिति का उल्लेख करते हुए बताया है कि डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (संस्थापक) ने संविधान निर्माण (1930 के दशक) के दौरान किसी भी राजनीतिक हलचल में भाग नहीं लिया। वे ब्रिटिश अधिनियमों (जैसे 1935 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट), दलितों-अल्पसंख्यकों को अलग निर्वाचन क्षेत्र देने, गोलमेज सम्मेलन आदि के कट्टर विरोधी थे। हेडगेवार ने दलितों को अलग वोट देने का विरोध किया।

पुस्तक में आरएसएस के प्रमुख विचारकों के उद्धरण और विरोध समाहित किए गए हैं। इनमें एम.एस. गोलवलकर, रामबहादुर राय, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, मोहन भागवत आदि के लेखन/भाषणों के उद्धरण शामिल हैं। आरएसएस ने संविधान को ‘विदेशी’ (अमेरिकी/यूरोपीय मॉडल) बताया और मनुस्मृति जैसी व्यवस्था को बेहतर माना। उन्होंने संविधान सभा को ‘अंग्रेजों द्वारा थोपा गया’ कहा। गांधी, नेहरू, आंबेडकर आदि को संविधान निर्माण में शामिल होने पर आलोचना की गई। रामबहादुर राय की किताबों से उदाहरण देते हुए आरएसएस द्वारा संविधान की आलोचना के पक्ष को उजागर किया गया है। यह बताया गया है कि कोई भी आरएसएस सदस्य/समर्थक संविधान सभा में नहीं था। संघ ने संविधान निर्माण प्रक्रिया को अनदेखा किया या विरोध किया।

संघ की वैचारिकी में हो रहे वर्तमान बदलाव की व्याख्या करते हुए यह उद्घाटित किया गया है कि सन् 1990 के बाद (विशेषकर भाजपा के सत्ता में आने पर) आरएसएस ने संविधान को ‘अपना’ बताना शुरू किया। लेखक इसे बहुजन/दलित वोट बैंक, आंबेडकर की लोकप्रियता, और संविधान की सर्वमान्यता के कारण राजनीतिक मजबूरी बताते हैं। अब हालत यह है कि वे ‘संविधान दिवस’ मनाते हैं, लेकिन मूल में मनुस्मृति/वर्णव्यवस्था को प्राथमिकता देते हैं। लेखक इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयानों का हवाला देते हैं, जिसमें वे संविधान को ‘राम’ या ‘सीता’ से जोड़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन असल में उनकी मंशा संविधान में बदलाव की है।

इस प्रकार से आरएसएस का संविधान ‘प्रेम’ सतही और मजबूरी के कारण है। उनके अंतर्निहित ध्येय में संविधान बदलने की इच्छा बनी रहती है। संविधान के लिए यह जय-जयकार सिर्फ दिखावा है, मूल विचारधारा नहीं बदली है। 

पुस्तक के विवरण में ऐतिहासिक क्रमबद्धता देखी जा सकती है। सन् 1925 से 2020 तक का सफर स्पष्ट रूप से दिखाया गया है, जो आरएसएस के बदलाव को राजनीतिक अवसरवाद बताता है। यह रचना संविधान को आंबेडकर की समता-लोकतंत्र की देन बताकर आरएसएस की वर्ण-आधारित सोच से टकराव स्थापित करता है तथा बहुजन/दलित पाठकों के लिए आरएसएस के ‘आंबेडकर-प्रेम’ के पीछे की सच्चाई उजागर करता है।

मसलन, पुस्तक का तीसरा अध्याय (‘आरक्षण के मुद्दे पर दोमुंहापन’) आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के आरक्षण के प्रति दोमुंहे रवैये (दोमुंहापन) की गहन पड़ताल करता है। पुस्तक में आरएसएस के आरक्षण नीति के आरंभिक विरोध से वर्तमान दिखावटी समर्थन तक की परत-दर-परत पड़ताल की गई हैं। आरक्षण को आंबेडकर की सामाजिक न्याय की लड़ाई का परिणाम बताते हुए आरएसएस की मूल विचारधारा (वर्णव्यवस्था/मनुस्मृति आधारित असमानता) को आरक्षण-विरोधी सिद्ध करता है। वर्तमान ‘समर्थन’ को राजनीतिक मजबूरी (बहुजन वोट, आंबेडकर लोकप्रियता) से जोड़ते हैं।

आरएसएस का वर्तमान ‘आरक्षण समर्थन’ का दावा झूठा/राजनीतिक मजबूरी के कारण है, जबकि ऐतिहासिक रूप से संघ ने आरक्षण का विरोध किया या इसे सीमित/अस्थायी माना। अध्याय आरक्षण के इतिहास को संक्षेप में बताते हुए आरएसएस की विरोधी स्थिति, उसके बाद के दिखावे, और वर्तमान में समर्थन के दावों की खंडन करता है।

इसी तरह चौथे अध्याय ‘जाति-पोषक संघ’ में लेखक भंवर मेघवंशी का मुख्य तर्क है कि संघ का ‘समरसता’, ‘सामाजिक सद्भाव’ और ‘हिंदू एकता’ का नारा केवल सतही है। असल में यह संगठन ब्राह्मणवादी वर्ण-व्यवस्था को पोषित और मजबूत करने का काम करता है। यह अध्याय 15-17 मार्च, 2024 की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा (नागपुर) से शुरू होता है, जहां ‘समाज में पांच परिवर्तन’ का लक्ष्य रखा गया। लेखक इसे मुखौटा बताते हैं– “आरएसएस समरसता के नाम पर दलित-बहुजन को वर्ण-व्यवस्था में समाहित कर रहा है, न कि जाति को समाप्त कर रहा है।”

आरएसएस की जड़ें हेडगेवार और गोलवलकर काल से हैं, जिसमें मनुस्मृति आधारित असमानता को ईश्वर-निर्मित माना गया। गोलवलकर के उद्धरण (“वर्ण-व्यवस्था ईश्वर-निर्मित है”) और राकेश सिन्हा की किताबों से प्रमाण दिए गए हैं कि संघ में ब्राह्मण-क्षत्रिय वर्चस्व प्रमुख रहा है। 1983 में बने ‘समरसता मंच’ को लेखक जाति-पोषक रणनीति का हथियार बताते हैं– “दलितों को ‘समरस’ दिखाकर वास्तव में ऊंची जातियों के अधीन रखना है। आंबेडकर और फुले-शाहूजी की जाति-विरोधी परंपरा को संघ ने कभी अपनाया नहीं; उल्टे, आंबेडकर को ‘हिंदू’ दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन उनकी असमानता-विरोधी बातों को छिपाया गया।”

लेखक का निष्कर्ष है कि आरएसएस का समरसता का नारा जाति उन्मूलन नहीं, बल्कि जाति को पोषित करने का नया रूप है। 2024 की बैठक में ‘समाज में परिवर्तन’ का लक्ष्य भी इसी दिशा में है– हिंदू एकता के नाम पर दलित-बहुजन को वर्ण-व्यवस्था में बांधना। अध्याय ऐतिहासिक उद्धरणों और समकालीन घटनाओं (2024 नागपुर बैठक) से यह सिद्ध करता है कि संघ की मूल विचारधारा आज भी जाति-पोषक है।

पुस्तक का दूसरा भाग (अध्याय 5-10) छह सरसंघचालकों के कालखंडों में आंबेडकर के प्रति संघ की यात्रा को क्रमबद्ध रूप से खोलता है। हेडगेवार काल (अध्याय 5) उपेक्षा और चुप्पी का दौर था। गोलवलकर काल (अध्याय 6) में खुला विरोध– मनुस्मृति को आदर्श माना, आंबेडकर को हिंदू-विरोधी कहा। देवरस काल (अध्याय 7) में समरसता मंच से दिखावटी स्वीकारोक्ति शुरू हुई। रज्जू भैया काल (अध्याय 8) में राजनीतिक दबाव बढ़ा। सुदर्शन काल (अध्याय 9) में संविधान समीक्षा और आरक्षण विरोध खुला। भागवत काल (अध्याय 10) में ‘समरसता’ और ‘आरक्षण जरूरत’ तक का नारा आया, लेकिन लेखक इसे आरएसएस की मजबूरी साबित करते हैं।

पुस्तक की भाषा सरल, स्पष्ट, भावुक और आंदोलनकारी है। इस कारण यह बहुजन पाठकों तक आसानी से समझ में आने वाली है। शब्द जैसे “दोमुंहापन”, “मुखौटा”, “जाति-पोषक”, “सीनाजोरी” तीखे हैं, जो आरएसएस समर्थकों को पक्षपातपूर्ण लग सकते हैं, लेकिन उद्धरणों की भरमार (गोलवलकर, भागवत, राकेश सिन्हा आदि से) इसे तथ्य-आधारित बनाती है। वर्तमान चिंतन में यह अत्यंत प्रासंगिक है। भागवत के ‘समरसता’ और ‘आरक्षण के जारी रहने’ जैसे बयान, भाजपा की सत्ता, दलित-बहुजन आंदोलन की बहस और जाति-आरक्षण पर जारी विवाद में यह पुस्तक चुनौती बनती है।

यह पुस्तक लेखक के पूर्व आरएसएस सदस्य होने के कारण अंदरूनी और अधिक प्रामाणिक है। यह शैक्षणिक से ज्यादा आंदोलनकारी-शोधपरक साहित्य है, जो बहुजन साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और हिंदुत्व की वैचारिक जड़ों को चुनौती देता है। कुल मिलाकर यह पुस्तक बहुजन चेतना का एक मजबूत हथियार है, जो आरएसएस के ‘समावेशी’ चेहरे के पीछे का द्विज राष्ट्रवाद उजागर करती है। 

समीक्षित पुस्तक : आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद (परत-दर-परत पड़ताल)
लेखक : भंवर मेघवंशी
प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली
मूल्य : 300 रुपए

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

तारा राम

तारा राम (जन्म : 15 अक्टूबर, 1959) राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता, स्वतंत्र लेखक व बहुजन विचारक हैं। इनकी कुल 27 पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनमें ‘धम्मपद : गाथा और कथा’ (पालि, हिंदी और अंग्रेजी), ‘अभिधर्म कोश’ (संस्कृत, हिंदी व अंग्रेजी), ‘श्रम कल्याण, श्रम सुरक्षा और भारत रत्न डॉ. आंबेडकर’ (दो खंड), ‘चिंतन के स्वर डॉ. आंबेडकर’, ‘राजस्थान की अनुसूचित जातियां’, ‘मेघवंश: इतिहास और संस्कृति’ (तीन खंड) आदि शामिल हैं। संप्रति वे बौद्ध अध्ययन एवं अनुसंधान केंद्र, जोधपुर के मानद निदेशक हैं।

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