भंवर मेघवंशी की पुस्तक ‘आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद’ एक ऐसे दौर में आई है जब आंबेडकर बिना शक भारत की सबसे विवादास्पद राजनीतिक शख्शियत बन चुके हैं। दोनों मुख्य विचारधाराओं के मानने वाले उनका हवाला दे रहे हैं, उन्हें उद्धृत कर रहे हैं और उनके विचारों की पुनर्व्याख्या कर रहे हैं – और इन सब से आंबेडकर की क्रांतिकारी सोच की धार भोथरी हो रही है। मेघवंशी इस द्वंद्व में खुल कर कूद पड़े हैं। उनका कहना बहुत स्पष्ट है – और वे उससे पीछे हटने को तैयार नहीं हैं – और वह यह कि आंबेडकर और आरएसएस की सोच और विचारधारा में कोई मेल संभव ही नहीं है।
इस विषय को लेकर लेखक का अध्ययन न तो निष्पक्ष है, और न ही निरपेक्ष। पुस्तक संघ से जुड़ाव से लेकर आंबेडकरवाद के वरण तक लेखक की जीवनयात्रा का वर्णन करती है। विविध संदर्भों के साथ-साथ संवैधानिक सिद्धांतों, जाति, अतीत के आचरण-व्यवहार और आधुनिक राजनीति आदि की समीक्षा और व्याख्या के ज़रिए यह पुस्तक मेघवंशी की वैचारिक यात्रा का औचित्य सिद्ध करती है। और इससे यह पुस्तक केवल एक राय व्यक्त करने वाली कृति से कहीं अधिक बन जाती है। यह पुस्तक न केवल अपने निष्कर्ष के कारण, बल्कि अपनी अध्ययन पद्धति और दृष्टिकोण के कारण भी अनूठी है। मेघवंशी आरएसएस को समझने के लिए उसके खुद के साहित्य, उसके नेताओं के भाषणों और उसके इतिहास का उपयोग करते हैं और फिर वे उसकी तुलना आंबेडकर के लेखन से करते हैं। कुल मिलाकर मेघवंशी केवल यह कहते नहीं हैं कि संघ और आंबेडकर के विचार असंगत हैं, बल्कि वे इसे साबित भी करते हैं। उनके तर्क दोनों के वैचारिक विरोधाभासों पर आधारित हैं, जिन्हें वे खुलकर पाठकों के समक्ष रखते हैं।
आरएसएस की कहानी उसकी जुबानी
पुस्तक अपनी बात जिस तरह से रखती है, वह अपने आप में महत्वपूर्ण है। मेघवंशी आरएसएस और उससे जुड़े प्रकाशन संस्थानों द्वारा प्रकाशित साहित्य के अध्ययन और व्याख्या पर ज़ोर देते हैं। वे आरएसएस के बाहर के व्यक्तियों की संघ की आलोचना पर निर्भर नहीं हैं। संघ के प्रकाशनों और उसकी घोषित विचारधारा का वे ध्यानपूर्वक अध्ययन-मनन करते हैं और फिर उनकी तुलना आंबेडकर के लेखन और भाषणों से करते हैं।
यह पद्धति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके चलते हम आरएसएस की आलोचना उसके स्वयं के साहित्य के आधार पर कर सकते हैं। संघ के साहित्य और आंबेडकरवादी दर्शन को एक-दूसरे के बरअक्स रख मेघवंशी यह दिखाना चाहते हैं कि दोनों के बीच विरोधाभास सतही न होकर गहरा है और उनमें कोई मेल संभव नहीं है।

आंबेडकर को अपना बताने के लिए उनके लेखन के चुनिंदा हिस्सों का इस्तेमाल करने की बढ़ती प्रवृत्ति से मुकाबला करने के लिए पुस्तक आंबेडकर के संपूर्ण साहित्य – जिसमें उनकी कृतियों और भाषण शामिल हैं – के साथ-साथ उनके सामाजिक आंदोलनों को भी संज्ञान में लेती है। नतीजा यह कि यह प्रचार कि आंबेडकर हिंदुत्व के ढांचे में बिल्कुल फिट हैं, सिरे से नकारने के काबिल नजर आने लगता है। पुस्तक बार-बार, लगातार हमें बताती है कि आंबेडकर जाति के उन्मूलन और संविधान तथा समतावाद पर आधारित सामाजिक व्यवस्था की स्थापना के पक्षधर थे। इसलिए उनका उस विचारधारा से कोई मेल हो ही नहीं सकता जो सांस्कृतिक एकता को सर्वाधिक प्राथमिकता देती है।
जाति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की सीमाएं
पुस्तक का तर्क है कि जाति वैचारिक टकराव का गौण नहीं, बल्कि मुख्य स्रोत है। यह बात पुस्तक के सभी अध्यायों में कही गई है, विशेषकर उनमें जो जाति और सामाजिक पदक्रम के बारे में हैं। मेघवंशी का कहना है कि हिंदुओं की एकता पर आरएसएस के फोकस के चलते वह अक्सर जाति को या तो नजरअंदाज करता है या उसे एक गौण मुद्दे के रूप में प्रस्तुत करता है। जबकि सच यह है कि जाति ही असमानता का संरचनात्मक आधार और कारण है। मेघवंशी आंबेडकर को उद्धृत करते हुए कहते हैं कि जाति एक ऐसी व्यवस्था है जो सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं व व्यवहार का अभिन्न हिस्सा बन गई है। इससे आरएसएस के इस तर्क का खंडन होता है कि जाति हिंदुओं की एकता में बाधक नहीं है। जैसा कि पुस्तक में भी बताया गया है, आरएसएस हिंदुओं की एकता पर जोर देता है और मानता है कि यह एकता असमानता को अपने में जज़्ब कर लेगी। इसके विपरीत, आंबेडकर असमानता से शुरू करते हैं और उसके उन्मूलन की बात करते हैं। यह अंतर केवल एक परिकल्पना या कोई सैद्धांतिक मसला नहीं है क्योंकि यही अंतर ही यह तय करता है कि ये दोनों विचारधाराएं लोकतंत्र, नागरिकता और न्याय जैसे विषयों के बारे में क्या सोचती हैं। मेघवंशी का कहना है कि ऊंच-नीच को समाप्त किए बगैर एकता स्थापित करने की कोई भी पहल असमानता को चिरायु ही बनाएगी।
आंबेडकर के सहयोजन की राजनीति
आंबेडकर को हिंदुत्व के विमर्श का हिस्सा बनाने के जो प्रयास पिछले कुछ समय से चल रहे हैं, यह पुस्तक उन्हें लगातार उजागर करती है। मेघवंशी इस कवायद को विचारधाराओं के संगम की बजाए एक राजनीतिक रणनीति बताते हैं। आंबेडकर और आरएसएस के परस्पर रिश्तों के संबंध में अध्याय में आरएसएस के अतीत से संबंधित कई प्रश्न उठाए गए हैं। जैसे, संघ ने जाति-विरोधी संघर्षों में क्या भूमिका अपनाई, हिंदू सामाजिक व्यवस्था और धर्मग्रंथों की आंबेडकर की आलोचना पर उसकी क्या प्रतिक्रिया थी, आदि। इन प्रश्नों के उत्तर उस नैरेटिव का खंडन करते हैं जो आरएसएस को आंबेडकर का सहयोगी बताता है।
पुस्तक यह तर्क देती है कि इन दिनों आंबेडकर के लेखन के चुनिंदा हिस्सों का इस्तेमाल कर उनकी छवि को एक नया रूप देने का प्रयास किया जा रहा है। इस प्रयास में उनके राष्ट्रवाद पर ज़ोर दिया जाता है मगर जाति और ब्राह्मणवाद की उनकी आलोचना को तवज्जो नहीं दी जाती। मेघवंशी आंबेडकर के स्वयं के लेखन को आधार बनाकर जाति और ब्राह्मणवाद की आंबेडकर की कटु आलोचना को सबसे आगे रखते हैं।
आरक्षण, संविधान और वैचारिक तनाव
आरक्षण और संविधान से संबंधित पुस्तक के हिस्सों से इन दोनों वैचारिक धाराओं के बीच का विरोधाभास एकदम स्पष्ट हो जाता है। आरक्षण पर केंद्रित अध्याय में मेघवंशी कहते हैं कि आरक्षण के मामले में हमेशा से एक दुविधा या असमंजस की स्थिति बनी रही है। आरक्षण को राजनीतिक यथार्थ मानकर स्वीकार तो कर लिया जाता है परंतु कोई यह नहीं मानता कि आरक्षण, दरअसल, अतीत में हुए अन्याय से जनित नैतिक ज़िम्मेदारी को पूरा करने की कवायद है। इसी तरह, संविधान पर केंद्रित अध्याय में यह तर्क दिया गया है कि आरएसएस के लिए संविधान और उसके सिद्धांत एक साधन, एक औजार हैं ना कि एक आधारभूत विचार। आंबेडकर के अनुसार राष्ट्र का नैतिक और राजनीतिक आधार संविधान में निहित होता है। मेघवंशी का कहना है कि आरएसएस को सभ्यता के व्यापक ढांचे के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। विभिन्न अध्यायों में पुस्तक के इस मुख्य तर्क की विस्तार से व्याख्या की गई है कि आंबेडकरवाद और हिंदुत्व की सोच में अंतर केवल अवधारणाओं और संकल्पनाओं तक सीमित नहीं हैं बल्कि वे उनके राजनीतिक रुख से भी जाहिर हैं।
आरएसएस के सौ साल : बदलाव हुए, लेकिन कुछ नहीं बदला
पुस्तक के सबसे बड़े खंड ‘आरएसएस के सौ साल’ में मेघवंशी संघ के गठन से लेकर उसके आज तक के शीर्ष नेताओं की चर्चा करते हैं। इनमें शामिल हैं– के.बी. हेडगेवार (1925-1940), एम.एस. गोलवलकर (1940-1973), बालासाहेब देवरस (1973-1994), रज्जू भैया (1994-2000, के. एस. सुदर्शन (2000-2009) एवं मोहन भागवत (2009-वर्तमान)। इस खंड में जोर संबंधित संघ प्रमुखों के जीवन के वर्णन से अधिक उनके नेतृत्व में आरएसएस में विचारधारात्मक बदलाव पर है। मेघवंशी बताते हैं कि कैसे समय के साथ, संघ की रणनीति बदलती रही है, विशेषकर दलितों, आदिवासियों और आंबेडकर के संदर्भ में। मगर उनका यह भी तर्क है कि भले के संघ की भाषा और जिन समुदायों से वह जुड़ाव बढ़ाना चाहता है, वे बदलते रहे हों, मगर संघ की मूल सोच में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
जहां तक हाशियाग्रस्त समुदायों से संपर्क-संबंध बढ़ाने और आंबेडकर और उनके विचारों को पुनर्परिभाषित करते का प्रश्न है, रणनीति में केवल यह परिवर्तन हुआ है कि इन सबसे सुरक्षित दूरी बनाए रखने का स्थान, उन्हें अपने में समायोजित करने की कवायद ने ले लिया है। रज्जू भैया संघ के पहले गैर-ब्राह्मण मुखिया बने। मगर यह केवल एक प्रतीकात्मक परिवर्तन था और इससे संघ के मूल ढांचे में कोई बदलाव नहीं आया। यह खंड बताता है कि किस प्रकार संघ ने बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाला, मगर उसके विचार वही बने रहे। मेघवंशी का कहना है कि आरएसएस ने यह साबित किया कि रणनीतिक अनुकूलन करते हुए भी कोई संगठन किस तरह अपने मूलभूत वैचारिक आधार पर कायम रह सकता है।
परिशिष्ट : दावे और प्रति-दावे
पुस्तक का अंतिम खंड – परिशिष्ट – उसके मूल संदेश को प्रतिपादित करने के प्रयास का एक प्रमुख हिस्सा है। इसमें मेघवंशी आरएसएस के कई दावों पर व्यवस्थित और क्रमबद्ध चर्चा करते हैं। यह खंड मुख्यतः आरएसएस के दावों का खंडन करता है। वह प्रश्न पूछता है, संघ के कथनों का विश्लेषण करता है और फिर तर्कों और तथ्यों से यह साबित करता है कि वे गलत हैं। यह खंड इस पुस्तक की प्राथमिक रणनीति को साफ़ करता है। पुस्तक तर्कों को मात्र ख़ारिज नहीं करती, बल्कि उनका सामना करती है। एक तरह से परिशिष्ट पुस्तक के समापन तर्क हैं। वह पुस्तक के मुख्य विषयों – जाति, राष्ट्रवाद, इतिहास और विचारधारा – से संबंधित मुद्दों को संयोजित करती है और उनकी पैनी पड़ताल करती है।
निष्कर्ष : क्या किया जाना चाहिए और कैसे
पुस्तक के अंत में मेघवंशी आंबेडकर की राजनीतिक और बौद्धिक विरासत का बचाव और आरएसएस की समालोचना करते हैं। वे कहते हैं कि आंबेडकर की जाति और सामाजिक उंच-नीच की आलोचना को केवल प्रतीकात्मक नहीं माना जाना चाहिए। इस तरह, यह पुस्तक उस विमर्श को स्पष्टता देती है जो राजनीतिक स्वार्थों और चुनिंदा पठन-पाठन के कुहासे से घिरा हुआ है। आरएसएस के खुद के दस्तावेजों के आधार पर उसकी सोच की व्याख्या कर, उसकी तुलना आंबेडकर के विचारों से करना इस पुस्तक की मुख्य विशेषता है। इससे पुस्तक में प्रस्तावित तर्कों को आतंरिक बल मिलता है और वे केवल विरोध करने पर नहीं बल्कि ज़मीनी और तुलनात्मक अध्ययन पर केंद्रित लगते हैं।
मगर अपनी बात मजबूती से कहने के प्रयास में यह पुस्तक कहीं-न-कहीं बारीकी और गहराई को दरकिनार करती दिखती है। इसमें आरएसएस को विचारधारा की दृष्टि से एकसार बताया है और संघ में आतंरिक मतभेदों और विरोधाभासी दृष्टिकोणों को नज़रअंदाज़ किया गया है। इसके अलावा, कई स्थानों पर बेहतर दस्तावेजीकरण की दरकार साफ़ नज़र आती है। जैसे बीबीसी द्वारा के.एस. सुदर्शन के साक्षात्कार (पृष्ठ 39-41) में संपूर्ण संदर्भ नहीं दिए गए हैं और उसके विवरण में नामों की विसंगतियां हैं। इससे पुस्तक की प्रमाणिकता कमज़ोर होती है।
मगर इन कमियों से पुस्तक का महत्व कम नहीं होता, बल्कि इनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि इस मुद्दे की अधिक गहरी पड़ताल ज़रूरी है। मेघवंशी अपने पाठकों के समक्ष एक कठिन मगर ज़रूरी प्रश्न उपस्थित करते हैं और वह यह कि क्या सांस्कृतिक एकता की राजनीति का उस विचारधारा के साथ सहअस्तित्व संभव है जो उंच-नीच और असमानता के उन्मूलन की पैरोकार है? मेघवंशी का उत्तर तो स्पष्ट है। मगर यह पुस्तक पाठकों को इस प्रश्न पर विचार करने पर मजबूर करती है, चाहे उनका उत्तर हां हो या ना।
समीक्षित पुस्तक : आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद (परत-दर-परत पड़ताल)
लेखक : भंवर मेघवंशी
प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2026
मूल्य : 300 रुपए
(यह आलेख पूर्व में वेब पत्रिका ‘द वायर’ द्वारा अंग्रेजी में प्रकाशित है। यहां इसका अनुवाद हम लेखक की सहमति से प्रकाशित कर रहे हैं।
(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया)