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आरएसएस की कथनी और करनी का भेद बताती किताब

संघ भले ही अपने प्रातः काल के एकात्मता मंत्र – सुभाषः प्रणवानंदः क्रांतिवीरो विनायकः ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः – में डॉ. आंबेडकर, फुले और नारायण गुरु का नाम जोड़ दे, लेकिन यह सब उसने अपने फायदे के लिए किया और सत्ता पर कब्ज़ा बरकरार रखने के लिए किया। पढ़ें, जितेंद्र मेघवाल की यह समीक्षा

चर्चित आत्मकथा ‘मैं एक कारसेवक था’ के लेखक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व कार्यकर्ता, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी की नई किताब एक साथ कई खुलासे करती है। किताब का नाम है– ‘आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद : परत-दर-परत पड़ताल’। यथा नाम इस किताब में भंवर मेघवंशी बताते हैं कि कैसे शुरुआत से डॉ. आंबेडकर के प्रति उपेक्षा, चुप्पी और फुसफुसाहट के दौर में रहने वाला आरएसएस 1990 के दशक तक आते-आते उन्हें राष्ट्रवादी-एकतावादी प्रतीक के रूप में गढ़ना शुरू कर देता है। यह किताब आरएसएस-भाजपा के उस विमर्श की व्याख्या प्रस्तुत करती है जो सांप्रदायिकता, जाति-आधारित असमानता और ब्राह्मणवाद के खिलाफ आंबेडकरवादी आलोचना को धुंधला करती है।

संघ बार-बार अपने आपको डॉ. आंबेडकर से जोड़ने का प्रयास करता रहता है, ताकि कम शिक्षित दलित समुदायों के बीच एक झूठा ‘कॉमन सेंस’ फैलाया जाए। आरएसएस और डॉ. आंबेडकर बीच गहरा टकराव था, इसका सविस्तार वर्णन इस किताब में है। भंवर मेघवंशी बताते हैं कि “डॉ. आंबेडकर और आरएसएस के बीच सबसे गहरा टकराव सामाजिक दृष्टि का था। बाबासाहब के लिए समाज का अर्थ था– न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित समुदाय। जबकि आरएसएस के लिए समाज था और है– धर्म और संस्कृति की एकता से उपजा हिंदू समाज।”

डॉ. आंबेडकर और आरएसएस के मध्य यह अंतर हमें यह बताता है कि भारत में राष्ट्र की अवधारणा का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। डॉ. आंबेडकर का भारत संविधान पर टिका है। वहीं संघ का भारत शास्त्रों और संस्कृति पर। एक समावेशी और दूसरा एकरूपी।

इस किताब के लेखक भंवर मेघवंशी भी एक समय आरएसएस के कार्यकर्ता थे। संघ के सदस्य रहते हुए संघ के अन्य सदस्यों के द्वारा अपने साथ जातिगत भेदभाव की एक घटना के बाद उन्होंने संघ से अपना नाता तोड़ लिया। संघ भले ही आज सामाजिक समरसता की बात करें, आंबेडकर की बात करें या अपने प्रातः काल के एकात्मता मंत्र – सुभाषः प्रणवानंदः क्रांतिवीरो विनायकः ठक्करो भीमरावश्च फुले नारायणो गुरुः – में डॉ. आंबेडकर, फुले और नारायण गुरु का नाम जोड़ दे लेकिन यह सब उसने अपने फायदे के लिए किया और सत्ता पर कब्ज़ा बरकरार रखने के लिए किया। किताब में भंवर मेघवंशी बताते हैं कि एक समय संघ डॉ. आंबेडकर द्वारा लिखित संविधान को औपनिवेशिक पृष्ठभूमि का बताता था। संविधान की प्रस्तावना का विरोध करने वाले संघ ने संविधान के बनने पर उसका बहिष्कार किया और जब संविधान बनकर लागू हो गया तबसे परिष्कार (समीक्षा) का राग अलापता रहा है। हालांकि ऐसी मानसिकता वाला संघ राजनीतिक नफा-नुकसान देखकर उसकी जय-जयकार करने पर उतर आया है। यही बात बाबासाहेब के संबंध में उसकी अवधारणा पर भी लागू होती है।

हिंदुत्ववादी आख्यान में डॉ. आंबेडकर को आधुनिक मनु की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि आंबेडकर ने देश की संहिता अर्थात राष्ट्र के संविधान की रचना की थी। उसी तरह मनु ने मनु-संहिता के रूप में समाज के लिए आचार संहिता की रचना की थी। इसका प्रमाण संघ के प्रचारकों द्वारा वितरित मुद्रित सामग्री में देखा जा सकता है। इसमें डॉ. आंबेडकर के प्रतीक को मनु के साथ जोड़ने के पीछे मनु की वैधता को स्थापित करने के साथ-साथ आंबेडकर का हिंदूकरण करने का प्रयास दिखाई देता है। चूंकि दलित वेदव्यास और वाल्मीकि को अपना नायक मानते हैं, इसलिए आंबेडकर को भी हिंदुत्व और वैदिक संस्कृति के प्रमुख विचारक के रूप में चित्रित करके भाजपा को सामाजिक समरसता पर अपनी परिचर्चाओं में दलितों को प्रतिनिधित्व देने का अवसर मिल जाता है। वेदव्यास को कथित तौर पर शूद्र और वाल्मीकि को दलित साबित करना भी उनके अपने हिंदुत्ववादी आख्यान का हिस्सा है, जिसका श्रेय आरएसएस को ही जाता है।

भंवर मेघवंशी पड़ताल करते हैं कि एक समय संविधान को अभारतीय, अहिंदू और आयातित कहकर संघ उसका बहिष्कार करता है और अपने मुखपत्रों ‘ऑर्गेनाइजर’, ‘पाञ्चजन्य’ और ‘राष्ट्रधर्म’ में संविधान के विरोध में प्रचुर सामग्रियां प्रकाशित करता है। आज वही संविधानवाद की बात करता है। लेकिन वास्तव में यह सब संघ की सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा है।

संघ के एक सरसंघचालक रहे के.सी. सुदर्शन ने बीबीसी टीवी को दिए एक साक्षात्कार में साफतौर पर यहां तक कहा था कि वे संविधान को उसके वर्तमान स्वरूप में नहीं स्वीकार करते हैं। 

आरएसएस के अब तक के प्रमुख व समीक्षित पुस्तक का आवरण पृष्ठ

आरएसएस दावा करता है कि बाबासाहेब 1939 में संघ शिक्षा वर्ग में डॉ. हेडगेवार से मिलने आए थे और बाबासाहेब ने वहां ‘भारत की दलित समस्या और दलित उद्धार ‘विषय पर बौद्धिक भाषण दिया। संघ ने उन्हें ‘राष्ट्रऋषि’, ‘आधुनिक मनु’ जैसी उपाधियां दी। संघ ने यह सब बाबासाहेब की आरएसएस से निकटता को दर्शाने के लिए किया। लेकिन वास्तविकता यह है कि सन् 1925 में अपनी स्थापना से लेकर 1975 में आपातकाल लगने तक संघ को 50 साल में कभी भी बाबासाहेब की याद नहीं आई, लेकिन चूंकि उसी समय में दलित चेतना एक नया विस्तार ले रही थी, एक उग्र स्वाभिमानी दलित चेतना का उभार आरएसएस के लिए निश्चय ही चिंता का विषय था। ऐसे में उसने बाबासाहेब और जोतीराव फुले के प्रति श्रद्धा जताने का नया पैंतरा चलाना शुरू कर दिया था।

भंवर मेघवंशी रमेश पतंगे के हवाले से लिखते हैं– “आपातकाल के बाद में संघ में भी डॉ. आंबेडकर और महात्मा जोतीराव फुले के जीवन चरित्र का प्रस्तुतीकरण किया जाने लगा। संघ शिक्षा वर्गों की बौद्धिक अभ्यास क्रम में डॉ. आंबेडकर, महात्मा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज के जीवन चरित्र पर भी संघ के बौद्धिक वर्ग होने लगे।” आरएसएस ने सामाजिक समरसता के लिए मंच भले ही बना लिया और बाबासाहेब तथा जोतीराव फुले का नाम लेना भी शुरू कर दिया, लेकिन आरएसएस के कैडर ने उसे स्वीकार नहीं किया। वास्तव में संघ के भीतरखाने में डॉ. आंबेडकर की स्वीकार्यता बढ़ाने का संघर्ष रमेश पतंगे और सुखदेव नवले तथा भीकू इदाते जैसे दलित पिछड़े और घुमंतू समाजों से आने वाले स्वयंसेवकों को करना पड़ रहा था। संघ के आम कार्यकर्ताओं में तो अस्वीकार का ही भाव था। यहां तक कि उपरोक्त तीनों के मन में समता की जगह समरसता शब्द का आरएसएस द्वारा प्रयोग किये जाने को लेकर भी असहजता दिखलाई पड़ती है, क्योंकि वे जानते हैं कि समरसता का शब्द प्रयोग आंबेडकरवादी लोग कभी स्वीकार नहीं करेंगे। इसको लेकर इन्होंने दत्तोपंत ठेंगड़ी के समक्ष प्रश्न भी उठाए।

आरएसएस का उद्भव उन दिनों हुआ जब महाराष्ट्र सामाजिक परिवर्तन के आंदोलनों की कर्मभूमि बन रहा था। फुले दंपति (जोतीराव फुले और सावित्रीबाई फुले), छत्रपति शाहूजी महाराज के कृतित्व और विचार समाज में अपनी जगह बना रहे थे और डॉ. आंबेडकर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो चुके थे। वैदिक ब्राह्मणवादियों की वर्ण व जाति-व्यवस्था को डॉ. आंबेडकर से मजबूत चुनौती मिल रही थी। आजादी का आंदोलन भी उभार पर था और उसमें भी छुआछूत, भेदभाव और जातिगत शोषण के विरुद्ध स्वर तेज हो रहे थे। ऐसा लगने लगा था कि अगर भारत आजाद हुआ तो उसमें मनुस्मृति आधारित राज व सामाजिक व्यवस्था के लिए जगह नहीं होगी। ऐसे समय में मुस्लिम द्वेष की आड़ लेकर नागपुर के मोहिते के बाड़े नामक स्थान पर केशव बलिराम हेडगेवार ने एक उच्च जाति वर्ण के हिंदुओं का संगठन स्थापित किया, जिसके सभी संस्थापक सदस्य ब्राह्मण समुदाय से थे। प्रारंभ में इसका नाम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी नहीं था, न कोई प्रार्थना थी और न ही कोई प्रतिज्ञा। न विधान, न मिशन और न कोई दृष्टिकोण। सिर्फ कुश्ती दल की तरह स्थापित किया गया। हालांकि यह पूरी तरह से सोच-विचार करके बनाया हुआ समूह था, जिसने बाद में राष्ट्रवाद के चोले में ब्राह्मणवाद को स्थापित करने का अपना सुविचारित काम शुरू कर दिया। जिस प्रकार आज संघ डॉ. आंबेडकर को अपने नजदीक लाकर दलित समुदायों को आकर्षित करना चाहता है, उसी प्रकार उसका पीठ पीछे यह काम भी है कि वह डॉ. आंबेडकर को अपने नज़रिए से पेश करें ताकि सत्ता को प्रभावी बनाएं रखने के लिए दलित उनका साथ ना छोड़े।

भंवर मेघवंशी गहरी पड़ताल कर लिखते हैं कि आरएसएस का 100 वर्षों का इतिहास बताता है कि उसने कभी भी ‘जाति के विनाश’ के मुद्दे पर आंदोलन करना तो बहुत दूर की बात है, सीधे तौर पर जाति-व्यवस्था के विरुद्ध कभी कोई टिप्पणी नहीं की। उसके लिए जाति प्रथा का उन्मूलन कभी मुद्दा रहा ही नहीं। जब जाति-प्रथा और अस्पृश्यता के विरुद्ध देश में डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी तथा समाजवादी विचारधारा के लोग खुलकर बोल रहे थे, तब भी संघ ने जाति और वर्ण की व्यवस्था के प्रति अपना रवैया नरम रखा और कुछ भी कहना जरूरी नहीं समझा। यह भी याद रखा जाना चाहिए कि 27 सितंबर, 1925 को अपने गठन के उपरांत जिस महाराष्ट्र की धरती पर आरएसएस पल्लवित व पुष्पित हो रहा था, लगभग उसी कालखंड में डॉ. आंबेडकर महाड़ के चावदार तालाब से पानी के लिए जल सत्याग्रह (20 मार्च, 1927) कर रहे थे। वे नासिक में कालाराम मंदिर में प्रवेश हेतु आंदोलन (2 मार्च, 1930) छेड़े हुए थे। उस दौर में गांधी और आंबेडकर के मध्य पूना करार (24 सितंबर, 1932) हुआ और बाद में येवला कांफ्रेंस (1935) के जरिए बाबा साहब द्वारा हिंदू के रूप में नहीं मरने की घोषणा हो रही थी। बाबा साहब की बहुचर्चित किताब ‘जाति का विनाश’ (1936) आ चुकी थी। राष्ट्रीय आंदोलन में अस्पृश्यता उन्मूलन एक महत्वपूर्ण गतिविधि बन रही थी, मगर आरएसएस और उसके संस्थापक इन सब सामाजिक सुधार के आंदोलनों से दूरी बनाए हुए थे और इन विचारों पर मौन रहकर अपना ब्राह्मणवादी संगठन मजबूत करने में लगे हुए थे।

डॉ. आंबेडकर ने अपने संपूर्ण लेखन और भाषणों में तथा बाबा साहब के जीवनी-लेखकों में से किसी ने भी बाबा साहब की डॉ. हेडगेवार से घनिष्ठता का कोई जिक्र नहीं किया है। न ही उनके मध्य वार्तालाप और आत्मीय संबंधों का कहीं कोई प्रसंग मिलता है। बावजूद इसके बहुत बाद में आरएसएस ने जरूरत के मुताबिक डॉ. आंबेडकर से दोस्ती के किस्से गढ़े और अपने प्रचार-तंत्र के जरिए इस असत्य को सत्य बनाने के प्रयास जारी रखे। आंबेडकर-हेडगेवार मित्रता महज राजनीतिक फायदा लेने के लिए बनाया गया प्रोपेगेंडा है, जिसका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं है।

भंवर मेघवंशी ऐसी ही लंबी और खोजी व्याख्याओं से इस पुस्तक में आरएसएस के खोखले दावों का पर्दाफाश करते हैं और उसकी वास्तविकता को उजागर करते हैं। कहा जा सकता है कि आरएसएस कार्यकर्ता (स्वयंसेवक) के रूप में रहते हुए उन्हें संघ की बहुत सारी जानकारियां मिल चुकी थी जो किताब लिखते वक्त उनके लिए एक ‘प्रैक्टिकल’ के तौर पर काम आई। अपने स्वयं के अनुभवों से भी बहुत कुछ उन्होंने सीखा जिसने इस किताब को जीवंत बनाया। भंवर मेघवंशी ‘हिंदुत्व की राजनीति और डॉ. आंबेडकर की वैचारिकी’, ‘भारतीय संविधान संघ की मजबूरी और सीनाजोरी’, ‘डॉ. आंबेडकर और संघ : मुखौटे के पीछे’, ‘आरक्षण के मुद्दे पर दोमुंहेपन’, ‘मंडल कमीशन और आरएसएस’, ‘जाति-पोषक संघ’, ‘डॉ. आंबेडकर और हिंदुत्व’, ‘आंबेडकर का सांस्कृतिक अपहरण’, ‘अस्वीकार की राजनीति’ आदि जैसे दर्जनों मुद्दों की गहरी पड़ताल करते हैं जो पुस्तक के शीर्षक को भी सार्थक बनाता है। यह किताब आंबेडकर और आरएसएस के मध्य के सभी संबंधों पर चर्चा करती हैं, जो कि एक संग्रहणीय दस्तावेज है।

समीक्षित पुस्तक : आंबेडकरवाद की रोशनी में आरएसएस का द्विज राष्ट्रवाद : परत-दर-परत पड़ताल

लेखक : भंवर मेघवंशी 

प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस, नई दिल्ली 

मूल्य : 300 रुपए (पेपरबैक)


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लेखक के बारे में

जितेंद्र मेघवाल

लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के जाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज में स्नातक के छात्र तथा अपने कॉलेज के छात्रसंघ के संयुक्त सचिव हैं।

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