लालू प्रसाद यादव को सजा : वैचारिक जुगाली के लिए चारा

1995-96 में मुख्यमंत्री रहते हुए लालू प्रसाद ही इस घोटाले के उद्घाटक बने थे और उन्हीं के आदेश से इस घोटाले की जांच हुई थी। आज वे जेल में हैं

वर्ष 1990 में मंडल आयोग के बाद के सामाजिक न्याय की शक्तियों के सेनापति अब जेल में हैं। मुख्यधारा की मीडिया, जो अपने द्विज वर्चस्व के लिए बदनाम रही है, ने अपनी प्रसन्नता को बगैर छुपाए उनके राजनीतिक जीवन के अंत की घोषणा कर दी है, जैसे कि फुकोयामा ने इतिहास के अंत की घोषणा कभी की थी।

फारवर्ड प्रेस, सामाजिक न्याय के संघर्ष का हिमायती रहा है और फलस्वरूप, इन सारी घटनाओं से हमारा क्षुब्ध होना स्वाभाविक है। हम यह नहीं कहते कि भ्रष्टाचरण के मामले में हम कोई समझौता चाहते हैं या भ्रष्टाचारियों के प्रति किसी प्रकार के रहम के हामी हैं। हमारी चिंता का कारण यह है कि इससे उत्तर भारत में सामाजिक न्याय के आंदोलन के कमजोर होने की संभावना बनेगी, क्योंकि लालू प्रसाद का कोई सशक्त विकल्प नहीं बना है। बिहार और प्रदेश में सामाजिक न्याय के राजनीतिक दुर्ग का ध्वस्त होना एक बडा राजनीजिक अर्थ रखता है। उत्तर प्रदेश कांशीराम का आभाव पहले से ही महसूस कर रहा है, अब लालू के बिना बिहार की राजनीति कैसी होगी, किसकी होगी?

हम न तो न्यायविद् हैं और ना ही अदालती फैसलों पर कोई टिप्पणी करना चाहते हैं लेकिन इस संदर्भ में उठ रहे कई तरह के सवालों में से कुछ से पाठकों को रूबरू कराना जरूर चाहेंगे।

जिस मामले में लालू प्रसाद को सजा हुई है, वह चारा घोटाले के नाम से जाना जाता है। इस घोटाले की संक्षिप्त कथा जानना आवश्यक है। सन् 1974-75 की शुरुआत में ही जब इस घोटाले की शुरुआत हुई, तब बिहार में कांग्रेस का शासन था और डॉ. जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री हुआ करते थे। अबाध गति से पूरे दो दशक यह घोटाला चलता रहा। 1990 में जब लालू प्रसाद मुख्यमंत्री बने, तब भी यह रुका नहीं क्योंकि यह सेंधमारी के अंदाज का घोटाला था। ऐसा प्रतीत होता है कि हुक्मरानों को इस घोटाले की कमोबेश जानकारी थी लेकिन किसी एक ही दल के राजनेता इसमें शामिल नहीं थे। दरअसल, यह सर्वदलीय घोटाला था। इस हमाम में सब नंगे थे। जो सत्ता में थे, उनका हिस्सा ज्यादा रहा होगा, जो सत्ता से बाहर थे, उनका हिस्सा कम, लेकिन भागीदार सब थे, वे चाहे पक्ष के नेता हों या विपक्ष के या फिर नौकरशाह या व्यवसायी।

अभी हाल में, मिथिलेश कुमार नामक एक व्यक्ति ने झारखंड हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की है जिसे अदालत ने विचारार्थ स्वीकार कर लिया है। याचिका के अनुसार, बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनके दो दुलारे-प्यारे सहयोगी शिवानंद तिवारी और ललन सिंह भी घोटाले में संलिप्त थे। इससे बिहार के सत्ताधारी दल में सनसनी व्याप गई है। यह स्मरणीय है कि शिवानंद तिवारी और ललन सिंह, 1996 में इस घोटाले की जांच करने के लिए दायर की गई याचिका के मुख्य कर्ता-धर्ता थे। तो क्या इतिहास खुद को दुहरा रहा है? 1995-96 में मुख्यमंत्री रहते हुए लालू प्रसाद ने ही इस घोटाले को उजागर किया और उन्हीं के आदेश से इस घोटाले की जांच हुई थी। आज वे जेल में हैं। बहुत संभव है कि उस समय जांच की मांग करने वाले शिवानंद तिवारी और ललन सिंह, अपने आका नीतीश कुमार के साथ, जांच के घेरे में आ जाएं। फिलहाल, यह 22 नवंबर, 2013 को पता चल सकेगा जब सीबीआई, मिथिलेश कुमार द्वारा दायर उपरोक्त याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट में अपनी बात रखेगी।

अदालतों को अपना काम करने दें। हम इस घटनाक्रम के सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ की समीक्षा करना चाहेंगे। दलित, पिछड़े तबकों से बार-बार यह बात उठ रही है कि न्यायालयों में उनकी बात न सुनी जा रही है, न समझी जा रही है। इससे जुड़ा प्रश्न यह भी है कि भारतीय न्यायपालिका में द्विजों का वर्चस्व है और दलित-पिछड़े तबकों से उठने वाली हर आवाज को वे कुचलना चाहते हैं। लालू प्रसाद ने कुछ समय पहले यह आशंका व्यक्त की थी कि सीबीआई के जिस कोर्ट में मामले की सुनवाई हो रही है, उसका न्यायाधीश नीतीश कुमार मंत्रिमंडल के एक भूमिहार कैबिनेट मंत्री का सगा रिश्तेदार है और इससे पूरा मामला प्रभावित हो सकता है। उनकी आशंका शायद सही साबित हुई।

यहां हम हिंदी कथाकार मनमथनाथ गुप्त की एक कहानी ‘न्याय प्रसंग’ को उद्धृत करना चाहेंगे। इस कहानी से पता चलता है कि न्याय हमेशा अंधा नहीं होता। न्याय करने वाला, उसे प्रभावित करता है। कहानी एक ग्रामीण किसान पर केंद्रित है। एक दिन किसान घर आता है और पाता है कि उसकी पत्नी किसी दूसरे पुरुष के साथ आपत्तिजनक अवस्था में है। वह उस पुरुष को पकड़ता है और उसके सिर पर कुदाल से वार करता है, जिससे उसकी मौत हो जाती है। मामला न्यायालय में जाता है, जहां उसकी सुनवाई करने वाला न्यायाधीश, स्वयं किसी दूसरे की स्त्री से दैहिक संबंध रखता है। वह दलील देता है कि कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है। यदि किसान ने अपनी पत्नी को ऐसी स्थिति में देखा था तो उसे दोषी को कानून के हवाले करना चाहिए था। हत्या का अधिकार कोई सभ्य समाज किसी को नहीं देता। यह हत्या का अपराधी है, अतएव इसे फांसी की सजा दी जाती है। आरोपी ऊपरी अदालत में अपील करता है। वहां का जो न्यायाधीश इस मामले को सुनता है उसकी पत्नी स्वयं किसी पुरुष से दैहिक संबंध रखती है और न्यायाधीश को इसकी जानकारी है। वह उक्त किसान को इस दलील के साथ ससम्मान बरी कर देता है कि ऐसी स्थिति में कोई भी हत्या कर सकता है। हत्या बिल्कुल स्वाभाविक प्रतिक्रिया के तहत की गई थी और यह कहीं से भी अपराध नहीं है! यह कहानी हमारी न्याय प्रक्रिया पर प्रश्न उठाती है और यह बतलाती है कि न्यायाधीश देवदूत नहीं होते।

लेकिन इससे भी बड़ा सवाल राजनीतिक है। वह यह कि क्या लालू प्रसाद के पास 20 सांसद होते तो उन्हें सजा होती? इससे जुड़ा सवाल यह भी है कि क्या मुलायम सिंह या मायावती के पास तीन-चार सांसद ही होते तो सीबीआई जांच से उनकी मुक्ति संभव हो पाती? क्या नरेंद्र मोदी और दूसरे भाजपा नेताओं के इस आरोप में कुछ सच्चाई नहीं है कि कांग्रेस, सीबीआई का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है?

सवाल उठते रहेंगे। लेकिन फिलहाल तो यह सोचना ही पड़ेगा कि बिहार की राजनीति, इस फैसले से कितनी प्रभावित होगी? कांग्रेस खुश हो सकती है कि भाजपा के विकल्प के रूप में बिहार में अंतत: उसे स्वीकार कर लिया जाएगा। बिहार की सवर्ण राजनीतिक लॉबी यह मानकर चल रही है कि लालू प्रसाद के बाद अंतत: नीतीश कुमार को भी वह उसी मुकाम पर अवश्य पहुंचा देगी। भाजपा के भूमिहार नेता और नीतीश सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे गिरिराज सिंह के बयानों से तो यही प्रतिध्वनित होता है। नीतीश कुमार का ‘शिकार’ भी संभव है।

बहरहाल, जैसा कि मैंने पहले कहा, लालू प्रसाद, घोटाले से अधिक गलत सोहबत के दोषी हैं और इस गलत सोहबत (बॉक्स देखें) की ही सजा भुगत रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि चारा घोटाला व अलकतरा घोटाले के आरोपी और मुजरिम आज भी उनके इर्द-गिर्द बने हुए हैं। यह न केवल लालू प्रसाद के लिए बल्कि अन्य राजनेताओं के लिए भी संकेत है कि वे गलत लोगों को राजनीतिक संरक्षण देने से बाज आएं। नेताजी, संभलकर रहिए। आपकी संगति के आधार पर आपको परखा जाएगा।

(फारवर्ड प्रेस के नवंबर 2013 अंक में प्रकाशित)


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