पहले जातियों में बंटे बहुजन और अब पार्टियों में

डॉ. आम्बेडकर के बाद की दलित और ओबीसी राजनीति भारत के राजनीतिक इतिहास में अपना कोई वैशिष्ट्य स्थापित नहीं कर पाई है। इसका सबसे बड़ा कारण नेताओं और राजनीति का सामाजिक आंदोलनों और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया से दूरी है

बहुजन पहले जातियों में बंटे हुए थे, अब पार्टियों में बंटे हुए हैं। बहुजन हितों की असली पैरोकारी का दावा करने वाले सभी प्रमुख दलों में विचारधारा के स्तर पर कोई विशेष अंतर नहीं है। उन्होंने अपने ‘सुप्रीमो’ के अहं अथवा राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के कारण खुद का अलग कुनबा बनाया हुआ है। क्या इस विभाजन के कारण देश में बहुजन राजनीति कमजोर हुई है? इस राजनीतिक परिदृश्य पर बहुजन बुद्धिजीवियों से फारवर्ड प्रेस के छपरा संवाददाता अमलेश प्रसाद ने बातचीत की है। प्रस्तुत है उसके मुख्य अंश…

अरुण कुमार

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, बहुजन मुक्ति पार्टी

जहां तक मैं समझता हूं, पूर्व में बहुजन जातियां बंटी हुई थीं, लेकिन वर्तमान में वे एकजुट हो रही हैं। उनमें अपनी अलग पहचान और स्वाभिमान का भाव पनप रहा है। हां, राजनीतिक पार्टियों में महत्वाकांक्षाएं हैं। यह अच्छी बात है। जहां तक ‘सुप्रीमो’ का सवाल है, तो यह बहुजन मुक्ति पार्टी में नहीं है। अन्य पार्टियों में कहीं कुनबा दिखाई देता है, तो कहीं वंशवाद। कहीं नौकरशाही हावी है, तो कहीं फासीवादी ताकतें। अलग-अलग तरीके से लोग आगे बढऩे की कोशिश कर रहे हैं। इससे बहुजन राजनीति कमजोर नहीं हुई है। विभिन्न पार्टियों, विभिन्न मंचों के माध्यम से बहुजन आंदोलन होना चाहिए। हां, बहुजन पार्टियों में एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। इससे बहुजन राजनीति में गुणवत्ता और सुदृढ़ता आएगी। बहुजन राजनीति में अभी एक भटकाव है। कुछ पार्टियों का नाम बहुजन है, लेकिन वो वास्तव में ‘मिश्रा’ छाप हैं। नतीजा यह कि बहुजन अपनी पार्टियों को वोट नहीं देते। वे भाजपा/कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं। हममें शिक्षा की कमी है। जैसे-जैसे शिक्षा आएगी, वैसे-वैसे हम आगे बढ़ेंगे। संकीर्ण विचारधारा वाले ठहर जाएंगे। जिनकी विचारधारा बहुजन की विचारधारा होगी, वही आगे राज करेंगे। बहुजन मुक्ति पार्टी विशुद्ध रूप से बहुजन की राजनीति कर रही है। हमारे प्रतिनिधि वास्तविक हैं, नामित नहीं। हमारी पार्टी का उद्देश्य सामाजिक चेतना को जगाना और स्वाभिमान को बढ़ाना भी है।

बुद्ध शरण हंस

आम्बेडकर मिशन, पटना 

समाज केवल सोचने और चर्चा करने से नहीं बदलता है। समाज उंगली पकड़कर चलने और चलाने से बदलता है। सवर्णों को समाज बदलना नहीं, यथावत रखना है। इसलिए उन लोगों ने बहुत ही धूर्तता से समस्याओं की केवल चर्चा करके बहुजन को भरमाया है। बहुजन बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों ने उनसेे केवल सोचना और चर्चा करना सीखा। अपने मार्गदर्शक गौतम बुद्ध, जोतिबा फुले, साहू जी महाराज, रामासामी नायकर पेरियार, बाबासाहेब आम्बेडकर, जगदेव प्रसाद और ललई सिंह यादव के मिशनरी कार्यों को न तो जाना, न सीखा, न उंगली पकड़कर चले, न समाज को चलाया। यही कारण है कि बहुजन बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ विचारधारा के स्तर पर बिखरे हुए हैं। विचारधारा से एक होने के लिए सबको मिशनरी बनना होगा। बिना मिशनरी बने राजनीतिज्ञ परचून के दुकानदार से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं और बुद्धिजीवी उस परचून की दुकान के ग्राहक से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं। किसी बुद्धिजीवी या राजनीतिज्ञ ने अपने मार्गदर्शकों के मिशनरी कार्यों को पूरा करने के लिए कार्यक्रम नहीं बनाया। रैली और रैला का आहवान कर लाखों लोगों को जुटाकर केवल चिल्लाने से ज्याादा बेहतर काम आज के राजनीतिज्ञों को आता ही नहीं है। जब जाति और जमात की बैठक और रैली होगी, तब बहुजन आपस में बंटेंगे ही, कमजोर होंगे ही। यह दायित्व बुद्धिजीवियों का है कि वे अपने मार्गदर्शकों के द्वारा चलाए गए मिशन पर खुद एकजुट हों और लोगों को समझा-बुझाकर एकजुट करें।

डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह

आलोचक

देश में बहुजन राजनीति तभी मजबूत होगी, जब बहुजन समाज का मस्तिष्क उन्नत होगा। मस्तिष्क के उन्नत होने से मतलब है कि आप चीजों को मीडिया की नजरों से मत देखिए। मीडिया उतनी ही चीजों को देखने की सुविधा बहुजन को देती है, जितना उसके विरोधी उसे दिखाना चाहते हैं।

सुभाषचंद्र कुशवाहा

कहानीकार

भारतीय समाज की जाति व्यवस्था की संरचना इतनी जटिल, दुराग्रही और कुटिलतावादी है कि यहां प्रगतिशील विचार और समाज भी उसके प्रकोप से बच न सके। सनातनी धर्म के साथ नाभि-नाल बनी जाति व्यवस्था ने तमाम प्रगतिशील धर्मों को भी अवतारवाद और कर्मकांड में उलझाया, विचारधारा का संकट खड़ा किया और समाज के रूपांतरण की पूरी प्रक्रिया को भोथरा बना दिया। यहां की विकट सामाजिक, आर्थिक संरचना के बावजूद, सामाजिक बदलाव को ऊर्जा नहीं मिल पाई। इस बीच कुछ दलितों और पिछड़ों की रहनुमाई करनेवाले दलों का जो उदय हुआ, वह सनातनी पाखंडों और जातिदंश की ऊर्जा के कारण तो था, मगर उसे भी बिना किसी ठोस वैचारिकी के व्यक्तिवाद और कुलीनतावाद से मुक्ति न मिल पाई। ऐसे में व्यक्तिवाद और कुलीनतावाद से ग्रसित दलों में बहुजन का बंटना, अनहोनी परिघटना नहीं है। जब तक यहां के सनातन धर्म, उसके विभिन्न कारकों यथा जाति व्यवस्था का निषेध, शासक और शासित, कुलीन और जन सामान्य की विचारधारा से नहीं किया जा सकता, तब तक समग्र एकता संभव नहीं और न कोई न्यायपरक हल संभव होगा। बहुजन का शोषक ब्राह्मणवादी बहुजन भी हो सकता है। इसे स्वीकार करना होगा। अन्यथा आंख मूंदकर समर्थन करने पर गड्ढ़े में गिरने की संभावना बनी रहेगी।

डॉ. गंगा सहाय मीणा

लेखक

इन दिनों देश में बहुजन राजनीति के स्वरूप और सीमाओं पर बात हो रही है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि सही मायने में देश में बहुजन राजनीति का विकास भी हुआ है या नहीं? गहरी छानबीन करने के बाद इसके नकारात्मक निष्कर्ष ही ज्यादा सामने आते हैं। डॉ. आम्बेडकर के बाद की दलित और ओबीसी राजनीति भारत के राजनीतिक इतिहास में अपना कोई वैशिष्ट्य स्थापित नहीं कर पाई है। इसका सबसे बड़ा कारण नेताओं और राजनीति का सामाजिक आंदोलनों और सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया से दूरी है। समता की राजनीति करने का दावा करने वाले बहुजन नेताओं ने कभी भारतीय राजनीति में से धनबल और बाहुबल को बेदखल करने की पहल नहीं की। राजनीति में मौलिकता के अभाव में बहुजन राजनीति अपने लक्ष्य से कोसों दूर नजर आ रही है। समतामूलक समाज की स्थापना के लिए बहुजन राजनीति को सामाजिक जागृति और बहुजन एकता पर बल देना होगा। नई पैदा हुई राजनीतिक परिस्थितियों ने वैकल्पिक राजनीति के लिए एक स्पेस बनाया है। बहुजन राजनीति को अपने हित में इसका सार्थक उपयोग करना चाहिए।

 

(फारवर्ड प्रेस के मार्च, 2014 अंक में प्रकाशित)


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