मोदी की राजनीतिक रणनीति : जाति और हिन्दुत्व

जाति के प्रश्न पर संघ परिवार की दो समानांतर रणनीतियां हैं। एक ओर वह मोदी की ओबीसी पहचान का पर्याप्त प्रचार करना चाहता है ताकि उन्हें उनकी जाति के आधार पर ज्यादा से ज्यादा मत मिल सकें। परंतु इस जातिगत पहचान को जीवित रखते हुए भी उसके ऊपर एक पहचान का निर्माण करना चाहता है, परन्तु जातिगत पिरामिड को जस का तस रखते हुए

नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की घोषणा के कुछ ही समय पहले एक दूसरे मोदी, सुशील मोदी ने पहली बार नमो के ओबीसी होने की चर्चा सार्वजनिक रूप से की। दिल्ली में जनवरी में एक सार्वजनिक सभा में नरेंद्र मोदी ने अपनी जाति का जिक्र किया।

यह आश्चर्यजनक है कि मोदी अपनी जाति पर इतना जोर दे रहे हैं क्योंकि आरएसएस आज भी जिसके वे प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं एकाश्म हिन्दू पहचान का निर्माण करना चाहता है और हिन्दू धर्म में जातिगत भेदभाव और ऊंच-नीच के अस्तित्व को नकारना चाहता है। आरएसएस की राजनीति दरअसल जाति के पिरामिड पर आधारित विचारधारा है जिसमें हर जाति के लिए स्थान नियत है। जातिप्रथा के मूल में है दलित-बहुजन जातियों का दमन। हिन्दुत्व की राजनीति का लक्ष्य यह है कि ये दमित जातियां अर्थात् दलित और ओबीसी अपनी जातिगत पहचान को भुलाकर केवल हिन्दू के रूप में अपनी पहचान को याद रखें।

हिन्दुत्व की राजनीति को समय-समय पर जाति व्यवस्था से चुनौती मिलती रही है। आरएसएस की शुरुआत ही समाज में दलित और पिछड़ी जातियों के आगे बढऩे के प्रतिक्रियास्वरूप हुई थी। सन् 1920 में दलितों ने जमींदार-ब्राह्मण गठबंधन से मुकाबला करने के लिए ब्राह्मण विरोधी आंदोलन शुरू किया। इसकी प्रतिक्रिया में ऊंची जातियों ने एक मंच पर आकर आरएसएस की नींव रखी। इस गठबंधन का लक्ष्य था हिन्दू राष्ट्र का निर्माण। इसके ठीक विपरीत था आम्बेडकर का एजेंडा, जो जाति के उन्मूलन की बात करता था और जो सामाजिक न्याय की अवधारणा को भारतीय राष्ट्रवाद के उभरते हुए ढांचे में उसका उचित स्थान दिलवाने के प्रति प्रतिबद्ध था। संघ राष्ट्रीय आंदोलन के भी विरुद्ध था क्योंकि इस आंदोलन की यह मान्यता थी कि जातिगत पदानुक्रम को समाप्त कर समानता की ओर अग्रसर होना स्वाधीनता हासिल करने के लिए आवश्यक है। इस दौरान हिन्दुत्व के झंडाबरदार जिनमें गोलवलकर शामिल थे, उन हिन्दू धर्मग्रन्थों की शान में कसीदे काढ़ रहे थे जिनमें जाति भेद को औचित्यपूर्ण और दैवीय ठहराया गया था। हिन्दुत्ववादी चिंतकों को जातिप्रथा की क्रूरता से कोई लेना-देना नहीं था। वे तो जातिप्रथा का महिमामंडन करते थे और यह मानते थे कि जातिप्रथा हिन्दू समाज का आधार और उसकी ताकत है।

स्वाधीनता के बाद भारतीय संविधान ने दलितों की समानता की ओर की यात्रा को सुगम बनाया। संविधान में कई ऐसे सकारात्मक प्रावधान किए गए जिनसे दलितों को कुछ हद तक अवसरों की समानता हासिल हो सकी।

सन् 1980 का दशक आते-आते तक सामाजिक वातावरण बदल चुका था। ऊंची जातियों को ऐसा लगने लगा था कि शिक्षा और नौकरियों के मामले में सरकार दलितों को उनकी योग्यता और जरूरत के मान से बहुत अधिक दे रही है। वे यह कहते थे कि दलित सरकारी दामाद बन गए हैं। उनकी यह मान्यता थी कि उनके योग्य बच्चों को शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में उचित हिस्सेदारी नहीं मिल रही है। इसी तरह की भावना के चलते सन् 1980 के दशक में अहमदाबाद में दलित विरोधी हिंसा हुई। सन् 1980 के मध्य में अन्य पिछड़े वर्गों को पदोन्नति में आरक्षण देने के मुद्दे पर ओबीसी के खिलाफ  हिंसा हुई। सन् 1990 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिशों को अमल में लाया गया। ऊंची जातियों में इस आयोग की रपट लागू होने के विरुद्ध जो गुस्सा था उसे संघ परिवार के सदस्यों ने स्वर दिया। चुनावी गणित के कारण संघ और उसके विभिन्न संगठनों ने यद्यपि औपचारिक रूप से मंडल आयोग का विरोध नहीं किया परंतु राम मंदिर का मुद्दा उठाकर समाज का ध्यान दूसरी ओर खींचने की पर्याप्त कोशिश की।

इस बीच आरएसएस ने सोशल इंजीनियरिंग की एक योजना बनाई जिसके तहत दलितों को हिन्दुत्व की राजनीति में सहयोजित किया जाना था। उन्हें बाबरी ध्वंस और गुजरात की मुस्लिम विरोधी हिंसा में बढ़-चढकर भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा करने से धार्मिक पहचान मजबूत होती है। दलितों के मामले में साम्प्रदायिक हिंसा के कारण उनकी हिन्दू पहचान महत्वपूर्ण बन गई और जातिगत पहचान नेपथ्य में चली गई। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध हिंसा में भाग लेने वाले दलितों की हिन्दू पहचान मजबूत होती चली गई। हाल के मुजफ्फ रनगर दंगे इस रणनीति की सफ लता का अच्छा उदाहरण है। यहां जाटों और मुसलमानों के बीच पीढिय़ों से चले आ रहे नजदीकी संबंधों को तोडऩे के लिए जाट पहचान के स्थान पर हिन्दू पहचान की स्थापना कर दी गई। इसके लिए मुसलमानों का दानवीकरण किया गया। इसी तरह की सोशल इंजीनियरिंग के जरिए दलित व पिछड़े नेताओं जैसे उमा भारती, कल्याण सिंह और विनय कटियार को आरएसएस अपनी राजनीति की अग्रिम पंक्ति में ले आया और उनके जरिए बाबरी मस्जिद का ध्वंस और अपने अन्य सांप्रदायिक एजेंडे लागू किए। इस सोशल इंजीनियरिंग के चलते दलितों का एक हिस्सा विभाजनकारी राजनीति की ओर आकर्षित हो रहा है।

दूसरे स्तर पर ‘सामाजिक समरसता मंच’ जैसे संगठन गठित किए जा रहे हैं जो विभिन्न जातियों के बीच सौहार्द की बात तो करते हैं परंतु जातिप्रथा के उन्मूलन या जातिगत भेदभाव की समाप्ति की नहीं। यह आम्बेडकर की सोच के धुर विपरीत है, जिनकी दृष्टि में जाति का उन्मूलन ही दलित राजनीति का केन्द्रीय एजेंडा था। जहां आम्बेडकर ने दलितों की बदहाली की ओर देश और दुनिया का ध्यान आकर्षित किया और उनको न्याय दिलवाने के लिए संघर्ष किया वहीं आरएसएस ने दबे-छुपे ढंग से दलितों की भलाई के लिए उठाए जाने वाले सकारात्मक कदमों का विरोध किया। संघ ने कभी दलितों पर होने वाली ज्यादतियों के खिलाफ अपनी आवाज नहीं उठाई। इस तरह सांप्रदायिक राजनीति के खिलाडिय़ों ने एक चतुर रणनीति बनाई है। एक ओर वे दमित जातियों की बेहतरी के लिए उठाए जाने वाले सकारात्मक कदमों का विरोध करते हैं तो दूसरी ओर वे उन्हें हिन्दुत्व में सहयोजित भी कर रहे हैं। इसके साथ ही वे विभिन्न जातियों के बीच सौहार्द की बात भी करते हैं।

जाति के प्रश्न पर संघ परिवार की दो समानांतर रणनीतियां हैं। एक ओर वह मोदी की ओबीसी पहचान का पर्याप्त प्रचार करना चाहता है ताकि उन्हें उनकी जाति के आधार पर ज्यादा से ज्यादा मत मिल सकें। परंतु इस जातिगत पहचान को जीवित रखते हुए भी उसके ऊपर एक पहचान का निर्माण करना चाहता है, परन्तु जातिगत पिरामिड को जस का तस रखते हुए। इस हिन्दू पहचान के निर्माण के लिए सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके साथ ही दूसरे के प्रति भय का भाव भी उत्पन्न किया जा रहा है, हम हिन्दुओं को मुसलमानों और ईसाईयों से खतरा है। विचारधारा के स्तर पर संघ दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवतावाद का प्रचार करता है। एकात्म मानवतावाद के सिद्धांत की मूल अवधारणा यह है कि विभिन्न वर्ण विराट पुरुष के विभिन्न अगों से उपजे। उसके मुख से ब्राह्मण बने, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैश्य व पैरों से शूद्र। कुल मिलाकर इसका अर्थ यह है कि ये सभी वर्ण और जातियां एक दूसरे की पूरक हैं।

मोदी इस अवधारणा को आध्यात्मिक स्तर तक ले गए। गुजरात के सूचना विभाग ने उनकी एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है ‘कर्मयोग’। इस पुस्तक में मोदी कहते हैं, वाल्मीकि जाति के लिए सफाई करना एक आध्यात्मिक अनुभव रहा होगा। किसी समय किसी को यह ज्ञान प्राप्त हुआ होगा कि पूरे समाज और ईश्वर की प्रसन्नता की खातिर यह काम करना उनका, वाल्मीकि का कर्तव्य है व यह कि ईश्वर द्वारा सौंपी गई इस जिम्मेदारी को उन्हें निभाना है व यह कि उन्हें सफाई के इस काम को एक आध्यात्मिक कार्य मानकर सदियों तक करना है। यह काम वे पीढ़ी दर पीढ़ी करते आ रहे हैं। यह विश्वास करना असंभव है कि उनके पूर्वज कोई और काम या व्यवसाय शुरू नहीं कर सकते थे। ध्यान रहे कि यह आध्यात्मिक अनुभव केवल वाल्मीकि जो कि दलितों की एक उपजाति है के लिए आरक्षित है। यह जाति सदियों से सफाई का काम करने के लिए मजबूर रही है। इस जाति के कार्य को कई बाबा महिमामंडित करते आए हैं। इस राजनीति और उसकी रणनीतियों के बीच कोई सीधा रिश्ता नहीं है। हिन्दुत्व की राजनीति जातिगत पदानुक्रम को बनाए रखना चाहती है और इसके लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करती है। निस्संदेह इस राजनीति की सबसे बड़ी सफ लता यही होगी कि विचारधारा की घुट्टी पिला-पिलाकर किसी गैर-उच्च जाति के हिन्दू को इस राजनीति का नायक बना दिया जाए। मोदी हिन्दुत्व नायक हैं और साथ ही ओबीसी भी। यह हिन्दुत्ववादी एजेंडे को लागू करने की दिशा में बड़ी सफलता है क्योंकि ऐसा करके जाति व्यवस्था का पोषण करते हुए भी चुनावी मैदान में जीत हासिल की जा सकती है।

(फारवर्ड प्रेस के मार्च, 2014 अंक में प्रकाशित )


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