क्या केवल बहुजन को भेदभाव पर लिखना चाहिए?

निश्चय ही दलितों को वह सब लिखना चाहिए और वह सब करना चाहिए जिससे उनका भला हो। परंतु उन्हें अपने दरवाजे और खिड़कियां अपने उन मित्रों के लिए खोलकर रखनी चाहिए जो बिना अपनी किसी गलती के दलित नहीं हैं। नि:संदेह इनमे से कई मित्र दलित लेखकों की रचनात्मक आलोचना भी करेंगे परंतु दलितों को याद रखना चाहिए कि कबीर ने कहा था,’निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय, बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय’

डॉ. बीआर आंबेडकर की बहुपठित, विद्वतापूर्ण पुस्तक ‘एनीहिलिएशन ऑफ कास्ट’ (जाति का विनाश) के सद्य-प्रकाशित, पुनर्मुदित संस्करण, जिसमें पुस्तक पर टीका भी शामिल है, की भूमिका जानी-मानी लेखिका अरुंधती रॉय ने लिखी है। यह भूमिका काफी लंबी है। इसे लेकर एक विवाद खड़ा हो गया है। विवाद यह है कि दमित वर्गों का वास्तविक बुद्धिजीवी कौन हो सकता है या होना चाहिए? इस मुद्दे पर दो परस्पर विरोधी विचार सामने आए हैं और अरुंधती रॉय ने भी इस संबंध में अपनी सोच को अत्यंत तर्कसंगत स्वरूप में प्रस्तुत किया है।

एक विचार, जिसे मुख्यत: रॉय के दलित-बहुजन आलोचकों ने अभिव्यक्ति दी है, वह यह है कि केवल दमित वर्ग के लोग ही उनसे संबंधित मुद्दों पर लिख सकते हैं और केवल उन्हें ही लिखना चाहिए भी, जिन्होंने दमन भोगा नहीं है, वे उसका वर्णन नहीं कर सकते। चूंकि गैर दलित-बहुजन, शोषण और दमन के अनुभव से नहीं गुजरते- और ना ही गुजर सकते हैं-अत: वे दमितों की भावनाओं को न तो अभिव्यक्त कर सकते हैं और ना ही उनका प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। इस सोच वाले शायद सहानुभूति या संवेदना जैसे शब्दों से वाकिफ नहीं हैं।

सूक्ष्मता से विचार करने पर यह जाहिर हो जाएगा कि यह सोच, राजनीति को आत्मनिष्ठ नजरिए से देखने का नतीजा है। इससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व संबंधी महत्वपूर्ण प्रश्न भी उपजते हैं। यह सोच ऐतिहासिक दृष्टि से सही और राजनीतिक दृष्टि से बेहतर हो, यह आवश्यक नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐतिहासिक तथ्यों की कसौटी पर कसने पर यह आत्मनिष्ठ विचार गलत सिद्ध हो जाएगा। बल्कि, भारतीय जाति व्यवस्था की बहुस्तरीय प्रकृति और इसके आंतरिक विभाजनों के चलते, राजनीतिक प्रतिनिधित्व का यह आत्मनिष्ठ नजरिया दलित-बहुजन के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है।

आइए, हम एकबारगी यह मान लें कि केवल दलित ही उनसे संबंधित मुद्दों पर लिख सकते हैं। अगर ऐसा है तो प्रश्न यह उठता है कि क्या एक दलित विमर्श, विभिन्न दलित जातियों के अलग-अलग विचारों और अनुभवों को प्रकट करने के लिए पर्याप्त है? जाति आत्मनिष्ठता से जो समस्या उपजती है वह यह है कि एक जाति हमेशा यह दावा कर सकती है कि उसका प्रतिनिधित्व किसी अन्य जाति के लोग नहीं कर सकते क्योंकि जातिगत पदानुक्रम में उनकी जाति, प्रतिनिधित्व करने वालों की जाति से ऊपर या नीचे है। दलितों में एक छोटे से मध्यम वर्ग के उभरने और दलित हितों की रक्षा के प्रति समर्पित ढेर सारे एनजीओ के अस्तित्व में आने के कारण यह समस्या और जटिल हो जाती है। यह कहा जा सकता है कि जो दलित, व्यवस्था का हिस्सा बन चुके हैं, उनके जीवन के अनुभव, उन दलितों से बहुत अलग होंगे जो बहुत गरीब और हर प्रकार से वंचित हैं। तो क्या इसका अर्थ यह है कि पढ़े-लिखे दलितों को गरीब दलितों का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार नहीं है ? और अगर वे ऐसा करते हैं तो क्या वे दलित श्रेष्ठी वर्ग की खातिर दलित हितों की कुर्बानी दे देंगे? जिस जातिगत एकता की बात दलित नेता करते हैं वह इसलिए कायम नहीं हो सकती क्योंकि दलित-बहुजन के बीच भी वर्गीय अंतर हैं। फिर, अंतर्जातीय विवाह करने वाले दंपत्तियों की संतानों को किन पर लिखना चाहिए? क्या उन्हें अपने माता व पिता दोनों की जातियों के संबंध में लिखने का हक होगा या उनमें से किसी एक की जाति पर या फि र किसी पर भी नहीं? अगर हम फि ल्मी दुनिया पर निगाह डालें तो यह गुत्थी और जटिल हो जाती है। क्या केवल दलित कलाकारों को दलित पात्रों का अभिनय करना चाहिए? शबाना आजमी दलित नहीं हैं और ना ही ओमपुरी आदिवासी हैं परंतु इन दोनों ने दमित वर्गों के पात्रों का शानदार अभिनय किया है। बलराज साहनी मुसलमान नहीं थे परंतु ‘गर्म हवा’ में उनके द्वारा अभिनीत मुस्लिम पात्र में जरा-सी भी अवास्तविकता नहीं है। फिर, कला का क्या? क्या केवल दलित चित्रकार और मूर्तिकार ही जातिगत दमन की थीम पर कृतियां बना सकते हैं? यह बहस अंतहीन है। यद्यपि बौद्धिक ‘रिडनिज्म’ (दर्शन का एक सिद्धांत, जिसके अनुसार कोई भी जटिल व्यवस्था या समूह, उसके अलग-अलग हिस्सों का समुच्चय मात्र होती है और उसके घटकों के अनुभवों के आधार पर उसके समग्र अनुभव परिभाषित किए जा सकते हैं) आकर्षक प्रतीत होता है परंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आबेडकर जाति का विनाश चाहते थे न कि जाति-आधारित साहित्यिक या राजनीतिक गुटों का गठन।

दूसरा मत, जिससे प्रगतिशील वैज्ञानिक व तार्किक सोच रखने वाले और प्रबुद्ध आंबेडकर भी संभवत: सहमत होते, वह यह है कि किसी व्यक्ति का वर्ग, नस्ल, लिंग या जाति, किसी सामाजिक हित का प्रतिनिधित्व करने की उसकी क्षमता को परिभाषित या सीमित नहीं करते। यह मत इस बात पर जोर देता है कि किसी बुद्धिजीवी के मंतव्य और उसके कार्य का उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि से कोई संबंध नहीं होता।

वर्गीय हितों के प्रतिनिधित्व के मसले पर डॉ. आंबेडकर इतालवी सायवादी एन्टोनियो ग्रासी द्वारा विकसित इस अवधारणा से सहमत थे कि पारंपरिक व वास्तविक बुद्धिजीवी के बीच अंतर, उनके मंतव्यों पर आधारित होता है ना कि उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि पर। मार्क्सवाद व दलित-बहुजन परंपरा, दोनों में दमितों के प्रतिनिधि के रूप में शिक्षित, प्रबुद्ध बुद्धिजीवी की भूमिका पर जोर दिया गया है। यह सही है कि कोई व्यक्ति अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि नहीं बदल सकता परंतु यह भी सच है कि कोई व्यक्ति किसी धर्म, नस्ल या जाति में जन्म लेने के लिए स्वयं जिम्मेदार नहीं होता। परंतु वह अपनी शिक्षा का इस्तेमाल, राजनीतिक सुधार या क्रांति लाने के लिए कर सकता है। भारत में किसी व्यक्ति की जाति कभी नहीं बदलती परंतु क्या इसका अर्थ यह है कि वह हमेशा अपनी जाति के प्रति वफादार रहता है? ऐसा विश्वास करने के पर्याप्त कारण हैं कि कोई व्यक्ति अपने वर्ग, जाति या लिंग से विश्वासघात कर, किसी दूसरे वर्ग, जाति या लिंग के पक्ष में बात कर सकता है और करता भी है। कुछ अवसरवादी मुसलमान और दलित भाजपा जैसी सम्प्रदायिक पार्टियों में शामिल हो गए हैं। साथ ही, यह भी सही है कि कई गैरमुसलमान और गैर-दलित, इन वर्गों के हितार्थ काम करते हैं। उदाहरणार्थ, भाजपा का कोई दलित सदस्य अपने समुदाय के संबंध में मनुवादी दृष्टिकोण से बात कर सकता है और साथ ही अपनी बात को मात्र इसलिए स्वीकार करने योग्य बता सकता है क्योंकि वह दलित है! इतिहासकार जानते हैं कि सर्वहारा वर्ग का सदस्य फांसीवादी, जातिवादी, नस्लवादी, अंधराष्ट्रवादी या पितृसत्तात्मकता में विश्वास रखने वाला हो सकता है। उसी तरह, जिस तरह कोई बुर्जुआ, समाजवादी, साम्यवादी या अराजकतावादी हो सकता है। कई तानाशाह और फांसीवादी बहुत सामान्य सामाजिक पृष्ठभूमि से थे। दूसरी ओर, कई प्रसिद्ध साम्यवादी और समाजवादी, मध्यमवर्ग से उभरे थे। यह तथ्य राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे को दिलचस्प बनाता है। अगर केवल श्रमिकों को श्रमिक वर्ग पर लिखने की नैतिक व सामाजिक अनुमति होती तो हम वह सब नहीं जान पाते जो कार्ल माक्र्स और फ्रेडरिक एंजिल्स ने लिखा क्योंकि ये दोनों सामाजिक हैसियत और पारिवारिक पृष्ठभूमि की दृष्टि से सर्वहारा वर्ग के नहीं थे। और ना ही बोल्शेविकों में इतनी बड़ी संख्या में बुर्जुआ होते। लेनिन व ट्रोटस्की सहित उनमें से अधिकांश रईस घरानों से थे व आसानी से यूरोप की किसी भी सरकार में मंत्री बन सकते थे परंतु उन्होंने सर्वहारा वर्ग की क्रांति का पथ चुना। प्रश्न यह है कि क्या मार्क्स, ऐंजिल्स व लेनिन, सामाजिक दृष्टि से सर्वहारा वर्ग से संबंधित न होते हुए भी इस वर्ग के असली बुद्धिजीवी थे ? दूसरी ओर, घोर गरीबी से उभरे एडोल्फ हिटलर नामक आस्ट्रो-जर्मन कारपोरल ने दुनिया के सबसे बड़े प्रतिक्रियावादी जनांदोलन का नेतृत्व किया और यह आंदोलन मार्क्स-जिसका नाम ‘नेशनल सोशलिज्म’ था-श्रमजीवी वर्ग के विरुद्ध था। जार्जिया के स्टालिन की पारिवारिक पृष्ठभूमि भी अत्यंत साधारण थी। उन्होंने अपने पुराने बोल्शेविक साथियों के खिलाफ अफ सरशाही की सहायता से प्रतिक्रान्ति की और सोवियत संघ के जार बन बैठे। सच यह है कि सामाजिक व राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा बहुत जटिल है-कोई भी चमत्कारिक मसीहा, कभी भी अपने अनुयायियों के साथ विश्वासघात कर सकता है। कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि किसी वर्ग, जाति या आदिवासी कबीले के हितों के लिए लडऩे के लिए संबंधित समूह का सदस्य होना आवश्यक शर्त नहीं है। भारत की आदिवासी राजनीति का अनुभव हमें यही सिखाता है। झारखंड व छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों का हालिया राजनीतिक इतिहास इसका गवाह है। सलवा जुडूम के संस्थापक, स्वर्गीय महेन्द्र कर्मा आदिवासी थे परंतु उन्होंने आदिवासियों का भला किया या नहीं, यह बहस का विषय है।

बीआर आंबेडकर आधुनिक भारत के सबसे मेधावी बुद्धिजीवी थे। अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास, विधिशास्त्र व मानवशास्त्र पर उनकी असाधारण पकड़ थी। अपने छात्र जीवन से ही वे बौद्ध धर्म से प्रभावित थे। आगे की पढ़ाई के दौरान, वे पश्चिमी दर्शन से प्रभावित हुए। उनके एक निकट के मित्र व जीवनपर्यंत साथी एक पारसी सज्जन थे, जिनके साथ वे अमेरिका में रहते थे। यूरोप के ज्ञानोदय ने आबेडकर की सोच को गढऩे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और किस तरह वे एक आधुनिकतावादी चिंतक व नेता बने, इसे दोहराने की यहां आवश्यकता नहीं है। उनके लेखन से यह स्पष्ट है कि परंपरावादियों के विपरीत, वे वैज्ञानिकता, तार्किकता, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व व संवैधानिकता के मूल्यों पर विश्वास रखते थे। जब स्वयं के लिए धर्म चुनने का अवसर आया-और धर्म आबेडकर के लिए महत्वपूर्ण थातो उन्होंने बौद्ध धर्म को चुना-जो कि एक तार्किक, परंपराओं को तोडऩे वाला व सार्वभौमिक मानवता में विश्वास रखने वाला ऐसा धर्म था, जिसे एक ज्ञान प्राप्त क्षत्रिय राजकुमार ने विकसित किया था और जो सभी मानवों के लिए प्रासंगिक था। अगर आबेडकर इस मत के होते कि केवल कोई दलित ही दलितों के बारे में लिख सकता है या उनका प्रतिनिधित्व कर सकता है तो वे कभी बुद्ध की शरण में नहीं जाते। वे उन सार्वभौमिक मूल्यों पर भी दृढ़ नहीं रहते जिन्हें उन चिंतकों ने प्रतिपादित किया था जिनमें से अधिकांश श्रेष्ठी वर्ग के थे। आंबेडकर की महानता इसमें थी कि वे इन मूल्यों को व्यावहारिक स्वरूप दे सके-उन नेताओं के विपरीत, जो फ्रांस की राज्यक्रांति के नारों को केवल जुबानी दोहराते रहते हैं। मैं एक भारतीय इतिहासविद् हूं। मेरा झुकाव मार्क्सवाद की ओर है और मैं वैज्ञानिक मूल्यों और तार्किकता का हामी हूं। ये सभी मूल्य आंबेडकर के लेखन में झलकते हैं। मैं आंबेडकर ‘विशेषज्ञ’ नहीं हूं परंतु मुझे याद नहीं पड़ता कि आंबेडकर ने कभी यह कहा हो कि केवल दलित-बहुजनों को इन समुदायों के दमन के बारे में लिखना चाहिए। आंबेडकर अपने शब्द बहुत सावधानी से चुनते थे क्योंकि उनके समक्ष उनके जीवन का लक्ष्य स्पष्ट था। आश्चर्य नहीं कि उनके लेखन में सत्य और तार्किकता के प्रति असाधारण प्रतिबद्धता झलकती है। वे किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने के पहले उनके पास उपलब्ध तथ्यों को तार्किकता व सामान्यीकरण की कड़ी कसौटी पर कसते थे। उनका संपूर्ण लेखन वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित है और यही पद्धति आधुनिक दर्शनशास्त्र और राजनीतिक आचार-विचार का आधार है। गांधी जी द्वारा ‘एनीहिलीएशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा का उनका अत्यंत तार्किक प्रतिउत्तर दो प्रसिद्ध उद्धरणों से शुरू होता है। पहला है ड्रमॉण्ड की प्रसिद्ध पंक्तियां ‘जो तर्क नहीं करता, वह कट्टर है; जो तर्क नहीं कर सकता, वह मूर्ख है और जिसमें तर्क करने की हिम्मत नहीं है वह गुलाम है’ दूसरा उद्धरण बुद्ध का है ‘सत्य को सत्य जानो और असत्य को असत्य।’ आंबेडकर के वे अनुयायी, जिन्होंने उनके प्रतिउत्तर को इंटरनेट पर रखा है, इन दोनों प्रसिद्ध वाक्यों से आंबेडकर के विचार करने के तरीके और उनकी वस्तुनिष्ठता को रेखांकित करने में सफ ल रहे हैं। गौतम बुद्ध ने तार्किकता की बात कही। उन्होंने जातिविहीन समाज की वकालत की। उन्होंने मध्यमार्ग पर चलने की शिक्षा दी और उन्होंने ईसा से छह शताब्दी पूर्व, एक ऐसे संघ की अवधारणा दी, जिसमें असमानता के लिए कोई स्थान नहीं था। बुद्ध दलित नहीं थे। वे राजकुमार थे और ऐश्वर्य से परिपूर्ण राजमहल में रहते थे। उन्होंने अपना राजपाट त्याग दिया और मानव के दु:खों का हल ढूंढने निकल पड़े। जो रास्ता उन्होंने दिखलाया उसे भारत के लाखों दलितों ने अपनाया है। इसलिए, बुद्ध, उनके महान अनुयायी आंबेडकर के साथ, उसी तरह दलितों के हैं, जिस तरह वे सभी लोग हैं जो मानवीयता व समानता पर आधारित न्यायपूर्ण, शिक्षित व वैज्ञानिक समाज की स्थापना के लिए संघर्षरत हैं-फि र चाहे वे किसी भी जाति के क्यों न हों। निश्चय ही दलितों को वह सब लिखना चाहिए और वह सब करना चाहिए जिससे उनका भला हो। परंतु उन्हें अपने दरवाजे और खिड़कियां अपने उन मित्रों के लिए खोलकर रखनी चाहिए जो बिना अपनी किसी गलती के दलित नहीं हैं। नि:संदेह इनमे से कई मित्र दलित लेखकों की रचनात्मक आलोचना भी करेंगे परंतु दलितों को याद रखना चाहिए कि कबीर ने कहा था,’निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय, बिन साबुन पानी बिना, निर्मल करे सुभाय।’

 

(फारवर्ड प्रेस के जून, 2014 अंक में प्रकाशित)


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