मोदी के राज में आजादी

पूरी दुनिया को ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों से भर देने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इरादे का हमें खुले दिल से समर्थन करना चाहिए। परंतु इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि हम भारत को ईमानदार लोगों से भरें। हमें यह सीखना होगा कि हम कैसे ऐसी महिलाओं और पुरुषों का निर्माण करें जो यह जानते हों कि स्वतंत्रता का इस्तेमाल कैसे किया जाए

गत् 15 अगस्त, 2014 को मैं स्वाधीनता दिवस के एक आयोजन में सम्मिलित हुआ। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एक सांसद थे। झंडावंदन के पहले,एक जागरूक नागरिक ने माननीय सांसद से जानना चाहा कि क्या उन्होंने उनके चुनावक्षेत्र की एक विशेष सड़क की हालत देखी है। सांसद महोदय ने इस प्रश्न का सार्वजनिक रूप से उत्तर देते हुए कहा : ”हां! चुनाव के दौरान मैं अपने क्षेत्र में खूब घूमा। मैंने वह सड़क ही नहीं बल्कि अन्य कई बदहाल सड़कें देखीं। जिस सड़क की आप बात कर रहे हैं, उसके ठेके में छह साल-या शायद चार साल-तक सड़क की मरम्मत और देखभाल शामिल थी। समस्या यह है कि किसी को यह नहीं मालूम कि ठेके की शर्तें कैसे लागू करवाई जाएं।”

”हमारी सड़कें और हमारे गांव इतनी बुरी स्थिति में इसलिए हैं क्योंकि पिछले दशकों में हमारे देश में प्राधिकारियों की बहुलता रही है-केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, जिला प्रशासन, प्रखंड विकास कार्यालय, ग्राम पंचायत इत्यादि। सत्ता के इस (प्रजातांत्रिक) विकेन्द्रीकरण ने अराजकता फैला दी है। कोई व्यक्ति किसी भी चीज की जिम्मेदारी स्वीकार करने को ही तैयार नहीं है। अब, स्वतंत्रता के 67 साल बाद, आखिरकार, हम असली स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहे हैं। अब सारी सत्ता एक शीर्ष नेता के हाथों में है। अच्छे दिन आने वाले हैं।”

उनके लंबे भाषण में एक बार भी स्वाधीनता संग्राम या महात्मा गांधी का जिक्र नहीं आया। उनकी दृष्टि में पिछले 67 साल बर्बाद हो गए हैं। ”यही कारण है कि दुनिया में हमें ‘मेड इन इंडिया’ लेवल वाली चीजें कम ही दिखती हैं। हम आज भी मुख्यत: आयातक हैं। हमें निर्यातक होना चाहिए।”

सड़क के बारे में प्रश्न इसलिए उठाया गया था क्योंकि मानसून में लगभग सभी सड़कों की हालत ऐसी हो गई थी कि उन पर गाड़ी चलाना लगभग असंभव था। सांसद महोदय ने अपने मतदाताओं को पेश आ रही दिक्कतों की चर्चा तो नहीं की परंतु उन्होंने इस बात पर अवश्य दुख प्रकट किया कि ”मोदी के अतिरिक्त किसी नेता ने कश्मीरी पंडितों की व्यथा का अनुभव नहीं किया, जिन्हें दिल्ली के फु टपाथों पर बैठकर सस्ते दामों वाले कपड़े बेचने पड़ रहे हैं।”

”सच्ची स्वतंत्रता (अर्थात हमारे गैर-जिम्मेदार, भ्रष्ट प्रजातंत्र से स्वतंत्रता) तो अब मिली है”, सांसद ने कहा, ”क्योंकि देश ने एक सर्वो’च नेता चुन लिया है। नए प्रधानमंत्री ने यह शपथ ली है कि वे ‘न तो रिश्वत लेंगे और ना ही किसी और को लेने देंगे।”

श्रोतागण, जिनमें से अधिकांश विश्वविद्यालय के छात्र थे, ने सांसद के भाषण पर खूब तालियां पीटीं। भारत की समस्याओं का जो इलाज सांसद महोदय बता रहे थे, उससे श्रोतागण सहमत थे, यद्यपि वे उसके निहितार्थों से वाकिफ नहीं थे और ना ही उनके पास समस्याओं का कोई वैकल्पिक समाधान उपलब्ध था। उदाहरणार्थ, भाषण के दौरान मेरे बगल में बैठे रतन का परिचय हमारी भ्रष्ट व्यवस्था से हो चुका था। एक दिन पहले, वह अपनी पहचान के एक व्यक्ति राजा के साथ मुझसे मिलने आया था। वह चाहता था कि मैं राजा को नौकरी पर रख लूं।

”राजा के पास एमए की डिग्री है,”रतन ने मुझे बताया, ”परंतु मैं आपसे इसे नौकरी पर रखने के लिए इसलिए नहीं कह रहा हूं क्योंकि यह योग्य है बल्कि इसलिए कह रहा हूं क्योंकि इसे काम की जरूरत है। मैं आपसे झूठ बोलना नहीं चाहता। राजा को कुछ नहीं आता है। आपको उसे सब कुछ सिखाना पड़ेगा। अपनी पूरी शिक्षा के दौरान, अधिकांश अन्य विद्यार्थियों की तरह, राजा ने भी नकल करके और रिश्वत देकर परीक्षाएं पास की हैं। इसी तरह वह यहां तक पहुंचा है।

”मेरे पास भी इंटरमीडिएट (कक्षा 12) का सर्टिफिकेट है। मैंने हाईस्कूल (कक्षा 10) परीक्षा प्रथम श्रेणी में, 65 प्रतिशत अंकों के साथ पास की थी। इंटरमीडिएट में मुझे 55 प्रतिशत अंक और द्वितीय श्रेणी मिली थी। परंतु चूंकि मुझे मेरे पापों पर पछतावा है और मैंने ईसा मसीह को अपना उद्धारक स्वीकार किया है इसलिए मैं कभी किसी से नहीं कहता कि मैं इंटरमीडिएट हूं। मैंने इंटरमीडिएट और हाईस्कूल, दोनों परीक्षाओं में परीक्षकों को पैसे देकर नकल करने की सुविधा हासिल की थी। इसलिए जब भी कोई मुझसे मेरी शिक्षा के बारे में पूछता है तो मैं यही कहता हूं कि मैं आठवीं पास हूं।” रतन के इस इकबालिया बयान ने मुझे पशोपेश में डाल दिया और राजा को काम पर रखना मेरे लिए और मुश्किल बना दिया। क्या मुझे ऐसे आदमी को काम पर रखना चाहिए जो अयोग्य होने के साथ-साथ बेईमान भी हो?

मैंने रतन से एक दूसरा प्रश्न पूछा, ”क्या विद्यार्थियों को परीक्षकों को रिश्वत की पेशकश करने में डर नहीं लगता?”

”बिल्कुल नहीं! क्यों लगेगा?”, रतन ने मेरी नासमझी पर चकित होते हुए कहा, ”गांव के स्कूलों में तो सभी नकल करते हैं और सभी रिश्वत भी देते हैं। हम सब जानते हैं कि इस रिश्वत का एक हिस्सा राजनेताओं और पुलिसवालों तक पहुंचता है। हर एक का हिस्सा तय है।”
सांसद महोदय का भाषण खत्म होने के बाद जब लोग तालियां बजा रहे थे तो मैं यह सोच रहा था कि क्या उनका यह कहना सही है कि हमने स्वतंत्रता के बाद के 67 साल बर्बाद कर दिए हैं?

क्या हमारे लिए स्वतंत्रता का अर्थ यह रहा है कि हम इतने भ्रष्ट हो जाएं कि मानसून से मुकाबला करने के लिए न तो हम मजबूत और सस्ते छाते बना सकें और ना ही हम अपनी सड़कों को ठीक-ठाक हाल में रख पाएं?

क्या भारत की सबसे बड़ी समस्या भारतीय हैं?

क्या सच्ची स्वतंत्रता का अर्थ यह होना चाहिए कि हम एक सर्वो’च नेता के सामने समर्पण कर अपने भ्रष्ट चरित्र से मुक्ति पा लें? स्पष्टत:, भ्रष्टाचार की समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान में फैले भ्रष्टाचार के बारे में टिप्पणी करते हुए पूर्व क्रिकेटर व राजनीतिज्ञ इमरान खान ने कहा कि यदि वे प्रधानमंत्री बने तो वे रिश्वत लेने वालों को सड़क के खम्बों पर फांसी पर लटका देंगे ताकि भ्रष्टाचारियों को सबक मिले। यह संतोष की बात है कि कम से कम प्रधानमंत्री मोदी ऐसी बातें नहीं कर रहे हैं।

रतन और राजा की समस्या यह है : अगर आप रिश्वत लेने वाले अध्यापकों को फांसी पर लटका देंगे तो विद्यार्थियों को डिग्रियां कैसे मिलेंगी? क्या आप किसी को जबरदस्ती उसके काम के प्रति समर्पित और ईमानदार बना सकते हैं? भारत को एक ऐसी कार्यसंस्कृति की जरूरत है जो ठेकेदारों को सड़कों की देखभाल करने, अध्यापकों को पढ़ाने और निर्माताओं को सस्ती व गुणवत्तापूर्ण वस्तुओं का निर्माण करने के लिए प्रेरित कर सके। एक तानाशाह, भ्रष्ट लोगों को मरवा सकता है परंतु वह किसी समाज को नैतिक नहीं बना सकता। नैतिकता का संबंध संस्कृति, मानसिकता और आध्यात्मिकता से होता है। हमारे लोकतंत्र की स्थापना करने वाले नेताओं में भले कितनी ही कमियां रही हों परंतु वे इस तथ्य से भली-भांति वाकिफ थे कि नैतिकता, ईमानदारी और कार्यसंस्कृति थोपी नहीं जा सकती। उदाहरणार्थ, महात्मा गांधी, ऊंची जातियों के अपने समर्थकों से यह अपेक्षा करते थे कि वे चरखा चलाएं और शौचालयों की सफाई करें। यह सेंट पॉल की कार्यसंस्कृति को भारत में लाने का प्रयास था। गांधीजी, मैक्स वेबर के समकालीन थे। वे वेबर की इस उपधारणा से सहमत थे कि प्रोटेस्टेंट राष्ट्रों की आशातीत आर्थिक प्रगति का कारण तानाशाही नहीं वरन् बाईबल की कार्यसंस्कृति थी। जातिप्रथा के बंधनों में जकड़ी और ध्यान और तपस्या पर जोर देने वाली हमारी संस्कृति को, एक ऐसी संस्कृति में बदलने में, जिसमें काम को ही पूजा समझा जाता हो, महात्मा गांधी सफ ल नहीं हुए। उनके इस पवित्र मिशन की असफ लता का एक कारण तो यह था कि वे स्वयं जातिप्रथा में विश्वास रखते थे। परंतु हिन्दू कार्यसंस्कृति को बदलने का उनका तरीका, हिन्दुत्ववादियों के फार्मूले से लाख दर्जे बेहतर था, जो यह मानते हैं कि चीन जैसी एकाधिकारवादी शासन व्यवस्था, हमें उत्पादकों का राष्ट्र बना देगी।

मुझे यह सोचकर आश्चर्य हुआ कि स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में सांसद ने स्वाधीनता संग्राम या हमारे देश को आकार देने वाले शीर्ष नेताओं की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता की चर्चा क्यों नहीं की। संभव है कि :

• सांसद महोदय गांधी को भारत का राष्ट्रपिता नहीं मानते हों।
• अपनी पार्टी के प्रति वफादारी के कारण उन्हें हमारी श्रद्धा के पात्र नेताओं के स्थान पर नए व्यक्तियों और मिथकों को स्थापित करना हो।
• सार्वजनिक जीवन में होने के कारण वे इस तथ्य से वाकिफ हों कि भारत के लोग, भ्रष्टाचार के प्रजातांत्रिक अधिकार के खुल्लम-खुल्ला इस्तेमाल से थक चुके हैं।

कई लोग, विशेषकर ऊंची जातियों के लोग, किसी तानाशाह को स्वीकार करने के लिए भी तैयार हैं या कम से कम चीन की तरह के एक पार्टी के शासन को। कारण कुछ भी रहा हो परंतु उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्रता दिवस पर हम स्वतंत्रता का जश्न मनाते हैं। परंतु शायद श्रोताओं की तालियों ने उन्हें यह विश्वास दिला दिया कि अनेक भारतीय चाहते हैं कि कोई व्यक्ति उन्हें प्रजातांत्रिक राजनीतिक दलों से स्वतंत्रता दिलवाए-और उन नेताओं से भी, जिन्हें वे चुनते आ रहे हैं। यह सही है कि हालिया चुनाव में मायावती की बसपा एक भी सीट नहीं जीत सकी। अनुसूचित व पिछड़ी जातियों को सूत्रबद्ध कर उन्हें एक राजनीतिक शक्ति के रूप में खड़ा करने का बसपा का मिशन बिखर चुका है। मुलायम सिंह, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद जैसे क्षत्रपों को भी कांग्रेस की तरह मुंह की खानी पड़ी है। हम मोदी को मिले भारी जनसमर्थन की कैसे व्याख्या करें? सांसद की व्याख्या स्पष्ट है। वे जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। जनता ने उन्हें, उसकी ओर से, सत्ता का इस्तेमाल करने का अधिकार सौंपा है। उनके भाषण से ऐसा लगा कि वे स्वयं को केवल एक व्यक्ति की सरकार का प्रतिनिधि मानते हैं। वे मोदी के लिए बोल रहे थे, जनता के लिए नहीं।

मोदी ने एक बहुत जबरदस्त चुनाव अभियान चलाया। और केवल शायद इसलिए ही वे उस विजय के हकदार हैं, जो उन्हें मिली। उन्हें स्पष्ट और निर्णायक जनादेश मिला है। क्या यह संभव है कि सांसद, मोदी का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे थे वरन् उनकी चापलूसी कर रहे थे?
मैं यह विश्वास करना चाहूंगा कि सांसद का भाषण, मोदी के एक व्यक्ति या एक पार्टी का शासन स्थापित करने के इरादे को प्रतिबिंबित नहीं करता। परंतु समझदारों के लिए सांसद का संदेश स्पष्ट था : मोदी भारत में आमूल-चूल परिवर्तन ला रहे हैं और सांसद शायद लोगों को इस बात के लिए तैयार कर रहे थे कि वे आर्थिक प्रगति के बदले अपनी स्वतंत्रताओं को समर्पित कर दें। भारत को निर्माताओं और निर्यातकों का देश बनाने के लिए वे एकाधिकारवादी शासन को स्वीकार कर लें।

सांसद ने हमारी समस्या को ठीक पकड़ा। अगर दुनियाभर में छाता बनाने वाली कंपनियां, छाते के हिस्से भारत की जगह चीन से खरीद रही हैं तो इसके लिए हम केवल स्वयं को ही दोषी ठहरा सकते हैं। परंतु क्या हमें अपनी स्वतंत्रता को सिर्फ इसलिए त्याग देना चाहिए क्योंकि हमारे प्रजातंत्र ने हमें इस काबिल नहीं बनाया कि हम पूरी तरह से भारत में बने छाते निर्यात कर सकें? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक राष्ट्र बतौर हमें वह जानने-सीखने की जरूरत है, जो फुले और गांधी जैसे महात्माओं ने जाना-समझा था?

केवल सत्य ही हमें स्वतंत्र बना सकता है

जोतिबा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी और गांधीजी ने अपनी आत्मकथा का शीर्षक ”सत्य से मेरे प्रयोग” रखा था। ऐसा इसलिए क्योंकि फुले और गांधी, दोनों ने ईसा मसीह से यह सीखा था कि केवल सत्य ही हमें स्वतंत्र बना सकता है (जॉन 8:31-32)। ठेकेदार सड़कों की मरम्मत नहीं करते क्योंकि वे लक्ष्मीपूजक हैं। उन्हें इसके लिए कोई सजा नहीं मिलती क्योंकि वे उन अधिकारियों और राजनेताओं को प्रसन्न रखते हैं, जो स्वयं भी लक्ष्मीपूजक हैं। गैरजिम्मेदारी, दरअसल, आंतरिक नैतिक पतन का दूसरा नाम है।

भ्रष्टाचार के कारण साधारण नागरिक, जिनमें छात्र और शिक्षक शामिल हैं, अपराधी बन जाते हैं। हमारा आचरण भ्रष्ट और पापमय है क्योंकि हमारे विचारों और हमारी सोच की जड़ें सत्य में नहीं हैं। हमारे पारंपरिक दर्शनशास्त्र का एक बड़ा हिस्सा यह स्वीकार ही नहीं करता कि सत्य का एक नैतिक आयाम भी होता है। वह हमें सिखाता है कि सत्य, नैतिकता से परे है। बुद्ध, कबीर और डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने हमारे धार्मिक मिथकों और दर्शन को इसलिए खारिज किया क्योंकि वे जानते थे कि हम उन देवताओं की पूजा कर रहे हैं जो काल्पनिक हैं, और यह जानते हुए कर रहे हैं कि वे काल्पनिक हैं। यह विचार हमें एक ऐसे दृष्टिकोण की ओर ले जाता है, जो माननीय संसद सदस्य के दृष्टिकोण से नितांत भिन्न है।

पूरी दुनिया को ‘मेड इन इंडिया’ उत्पादों से भर देने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इरादे का हमें खुले दिल से समर्थन करना चाहिए। परंतु इससे भी ‘यादा जरूरी यह है कि हम भारत को ईमानदार लोगों से भरें। हमें यह सीखना होगा कि हम कैसे ऐसी महिलाओं और पुरुषों का निर्माण करें जो यह जानते हों कि स्वतंत्रता का इस्तेमाल कैसे किया जाए।

सांसद ठीक कह रहे थे : हमें एक ऐसे उद्धारक की जरूरत है जो असत्य से हमारे प्रेम और हमारी पापमय सोच से हमें मुक्ति दिलाए। तभी हम न्याय, प्रेम व नीतिपरायणता पर आधारित शासन व्यवस्था की स्थापना कर सकेंगे।

(फारवर्ड प्रेस के सितम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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