महाराष्ट्र का बहुजन दशरात्र

मराठा सेवा संघ ने दशरात्र उत्सव को मनाने का निर्णय वर्ष 2000 में लिया था। राज्य के उत्तरी पहाड़ी जिले बुल्ढाना के सिन्धखेड़ में 3 से 12 जनवरी तक मनाए जानेवाले इस उत्सव की विशिष्टता यह है कि इसमें इतिहास,और खासकर बहुजन इतिहास, के उन स्त्री शक्ति प्रतीकों का स्मरण किया जाता है, जिन्होंने सामाजिक रूढिय़ों और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा लिया और स्त्रियों में नई चेतना पैदा की

हिंदी-भाषी क्षेत्र के कम ही लेाग जानते हैं कि हिन्दू धर्म के ‘नवरात्र’ उत्सव के बरक्स महाराष्ट्र में हर साल 3 से 12 जनवरी तक ‘दशरात्र’ उत्सव मनाया जाता है।

मराठा सेवा संघ ने दशरात्र उत्सव को मनाने का निर्णय वर्ष 2000 में लिया था। राज्य के उत्तरी पहाड़ी जिले बुल्ढाना के सिन्धखेड़ में 3 से 12 जनवरी तक मनाए जानेवाले इस उत्सव की विशिष्टता यह है कि इसमें इतिहास,और खासकर बहुजन इतिहास, के उन स्त्री शक्ति प्रतीकों का स्मरण किया जाता है, जिन्होंने सामाजिक रूढिय़ों और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा लिया और स्त्रियों में नई चेतना पैदा की।

महाराष्ट्र प्रदेश मराठा सेवा संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी के सदस्य और वर्धा जिला सचिव सुधीर गिरे बताते हैं कि ‘हम लोग पहले से ही 8 मार्च को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की जगह 3 जनवरी (सावित्रीबाई फुले जयंती) को ही महिला दिवस के रूप में मनाते रहे थे। इसी के तहत, मराठा सेवा संघ ने अन्य बहुजन नेत्रियों को भी समाज के सामने एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने का संकल्प लिया और फातिमा बी (1 जनवरी), तानो बाई बिरजे (6 जनवरी), सावित्रिबाई फुले की पहली दलित शिष्या मुक्ता साल्वे और मराठी साहित्य भाषा व लोक संस्कृति की मर्मज्ञ डॉ सरोजनी बाबर (7 जनवरी), शिवाजी की मां जिजा माता (12 जनवरी) व अन्य अनेक बहुजन महिला नेत्रियों के योगदान को 3 से 12 जनवरी के बीच दशरात्र उत्सव के रुप मे विविध कार्यक्रमों के माध्यम से याद किया जाने लगा।

जाहिर है कि यह उत्सव सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक क्रांतिकारी परिघटना है। यह न सिर्फ काल्पनिक स्त्री शक्ति रूपों का वास्तविक स्त्री प्रतीकों से प्रतिस्थापन है बल्कि ‘हत्याओं के जश्न’ का भी निषेध करता है। एक अनुमान के अनुसार, सिन्धखेड में इस अवसर पर 7 से 8 लाख लोग इकठ्ठा होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र के अन्य शहरों में भी यह उत्सव बडे पैमाने पर मनाया जाने लगा है।

 

(फारवर्ड प्रेस के अक्टूबर 2014 अंक में प्रकाशित)


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