तार्किकता पर ब्राह्मणवादी हमला

हमारे देश में जहाँ धार्मिक अंधविश्वास को फ़ैलाने की पूरी छूट है वहीं विज्ञान एवं बुद्धिवाद समर्थित विश्वास के पैरोकारों की राह में कांटे बोये जाते हैं

फारवर्ड प्रेस के बहुजन श्रमण अंक (अक्तूबर 2014) पर भगवा हमला और पुलिस कार्रवाई, बहुजनों की आवाज के दमन का अलोकतांत्रिक प्रयास है। महिषासुर के बहाने, इस अंक में ब्राह्मणवादी मिथकों के पाखण्ड को उजागर किया गया था वामपंथी और बहुजन विद्यार्थियों ने इस हमले का जमकर प्रतिकार किया। सोशल मीडिया में भी जोरदार प्रतिक्रिया हुई। यह हमारा सौभाग्य है कि हम इस विज्ञान आच्छादित कालखंड में पैदा हुए हैं।

एक आधुनिक, वैज्ञानिक चित्त, लोकतान्त्रिक मनुष्य को अधिकार व कर्तव्य चेतन होना चाहिए और सरकार या किसी भी अन्य समूह या संगठन के द्वारा नाजायज दमन के प्रयास का व्यक्तिगत एवं सामूहिक विरोध करना चाहिए। हमें मानवीय शक्ति एवं श्रम पर भरोसा करना चाहिए। कल्पना एवं मिथक-आधारित पारंपरिक व्यवहारों को बिना सोचे-विचारे नहीं मान लेना चाहिए। पढऩे-लिखने का यही महत्व है। दुर्भाग्यवश, हमारे देश में जहाँ धार्मिक अंधविश्वास को फ़ैलाने की पूरी छूट है, वहीं विज्ञान एवं बुद्धिवाद समर्थित विश्वास के पैरोकारों की राह में कांटे बोये जाते हैं।

हमें अपने अतीत से, लोककथाओं, मिथकों व काल्पनिक कथाओं से सकारात्मक, उपयोगी चीजें चुनने की आवश्यकता है। हमें अन्धविश्वास एवं दैवीय चमत्कार आदि को अपने दिमाग से निकाल कर, जनसामान्य को चेतन बनाना है ताकि वे अनुपयोगी देवी-देवताओं एवं प्रतीकों, जो हमारे मन-मस्तिष्क पर सांस्कारिक कब्ज़ा जमाये हुए हैं, को बेदर्दी से त्याग दें।

सामाज को स्वस्थ एवं सहज बनाने के लिए संस्कारों का ब्राह्मणी-सामंती जुआ उतार फेंकने की जरूरत है। बहुजनों को, प्रचलित देवी-देवताओं एवं पारंपरिक मान्यताओं से शक्ति न लेकर यह समझना है कि इनका इस्तेमाल सनातन-ब्राह्मणी-सवर्णी वर्चस्व को बनाये रखने के लिए किया जा रहा है। हमारे देश में नियमित रूप से आ रही प्राकृतिक आपदाओं से यह साफ़ है कि इन देवी-देवताओं से हमारा कोई भला नहीं होने वाला है। भला होगा ज्ञान-विज्ञान, मानवीय व्यवहार, व एक-दूसरे के दु:ख-सुख से संलग्नता अपनाने से।

आसाराम बापू द्वारा सैकड़ों एकड़ जमीन हथियाने की सरकार द्वारा छानबीन पर एक न्यूज चैनल पर आयोजित विमर्श में एक वक्ता ने कहा कि भारत के 80 प्रतिशत मंदिरों में गुंडे बैठे हुए हैं। मंदिर, धर्म एवं जाति पर आधारित अमानवीय भेदभाव एवं अंधविश्वासपरक विकारों की शरणस्थली हैं।

जुलाई 2013 में कोर्ट का एक निर्णय आया जिसमें जातीय रैली करने को अनुचित और अपराध ठहराया गया। यह निर्णय बहुजनों के लोकतान्त्रिक अधिकार को कतरने का प्रयास है। बहुजन जब तक संगठित नहीं होंगे तब तक द्विजों का सदियों से चला आ रहा वर्चस्व जारी रहेगा। आबादी का 100 में से 90 भाग बहुजन हैं, पर 10 प्रतिशत सवर्णों ने देश के अधिकाँश संसाधनों, सत्ता एवं निर्णायक पद-पदवियों पर कब्ज़ा कर रखा है। यह शुद्ध जातिवादी गोलबंदी के चलते संभव हुआ है। जाति-धर्म की खांचाबद्धता में शादी करने, जातीय शादी-विवाह का सार्वजनिक विज्ञापन करने, जातीय भोज-व्यवस्था के समाज में जारी रहने, रमजान में बिना रोज़ा रखे इफ़्तार में अवसरवादी-स्वार्थी राजनेताओं के शामिल होने, सरकारी कार्यालयों में पूजा-पाठ करने, नारियल फोडऩे, शंख बजाने, मंत्रोच्चार करने, नमाज़ पढऩे के चलन हमारे न्यायालयों को क्यों असंवैधानिक, अधर्मनिरपेक्ष व अनुचित नहीं लगते? भारत के न्यायालयों को निहित स्वार्थ एवं भेदपरक तमाम जातिवादी-सम्प्रदायवादी सार्वजानिक अभिव्यक्तियों-क्रियाकलापों पर पहरा लगाना चाहिए न कि भेदभावमूलक और पूर्वाग्रहपूर्ण बातें करनी चाहिए। सुविधा देखकर फैसले नहीं किये जाने चाहिए।

महिषासुर, रावण आदि को अतीत में धरती पर रहने वाला मनुष्य मानने में मिथक को स्वीकारने नहीं बल्कि नकारने का भाव निहित है। जैसे, महिषासुर के मनुष्य रूप को मान्य करने से दुर्गा का देवत्व स्वत: खारिज हो जाता है। हम विश्वास की नई संस्कृति खड़ी करना चाहते हैं जिसमें सारे देवी-देवता ख़ारिज होंगे। ईश्वरत्व की कब्र पर ही भारत में नयी संस्कृति पनप सकती है! नई संस्कृति में देवत्व को वैज्ञानिक कसौटी पर कस कर ख़ारिज करना लाजिमी होगा। महिषासुर के मिथक की विवेचना से साफ़ हो जायेगा कि वे बहुजन लोकनायक थे। वे वंचित वर्गों में से थे, जिन्होंने अपने समय के प्रभु वर्गों की एक प्रतीक दुर्गा से लोहा लिया था। उन्हें छल-बल से मारा गया। मिथकों में शम्बूक और एकलव्य ऐसे ही लोकनायक वीर सपूत साबित होते हैं, जिन्होंने अभिवंचितों को नयी राह दिखाने की कोशिश की, अपना मानवीय अधिकार पाने के लिए खुद रास्ता तैयार किया, अपने श्रम एवं प्रतिभा की दुदुम्भी अभावों में पलकर भी बजवाई।

मिथकों की हमारी नई व्याख्या से परेशान होकर एवं तिलमिला कर, बिना युक्तियुक्त प्रतिउत्तर दिए, हमलावर होने वालों से पूछा जाना चाहिए कि जब पुलिस एवं जजों को आदमी एवं हाथी की मिलावट से बने देव, व बंदर को ईश्वरत्व प्रदान किये जाने से कोई परेशानी नहीं है तो महिषासुर जैसे राक्षस को मनुष्य मानने वालों से क्योंकर परेशानी होनी चाहिए? क्या जीवोत्पत्ति के वैज्ञानिक इतिहास में राक्षस की कोई प्रजाति हुई है? आज आवश्यकता इस बात की है कि भारतीय समाज विज्ञान की रौशनी में तथ्यों को परखे व दमनकारी, अवैज्ञानिक मिथकों के प्रति अपने आकर्षण से मुक्ति पाए।

(फारवर्ड प्रेस के  दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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