विकास पर भारी पड़ी जाति

जाति समीकरण को साधने की कवायद केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं की गयी है। इसके दीर्घगामी लक्ष्य हैं। नये प्रधानमंत्री की ताजपोशी के बाद से ही समाज का उच्चस तबका उत्साह में है और उसके संगठन अति-सक्रिय हो उठे हैं।

राजनीति में छोटी घटनायें भी मायने रखती हैं। महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव के नतीजे की पृष्ठभूमि और उसके के राजनीतिक प्रभाव को समझने के लिए दो ऐसी घटनाओं की चर्चा जरूरी है, जो राष्ट्रीय मीडिया में प्राय: अलक्षित ही रहीं। केन्द्र सरकार ने पिछले दिनों जिन दो दर्जन डूब रहे जिला सहकारी बैंकों को सहायता दी, उनमें महाराष्ट्र के तीन बैंक हैं – नागपुर, बुलढाना और वर्धा के। इन तीनों ही बैंकों का नियंत्रण कुणबी-मराठा नेताओं क्रमश: सुनील केदार, राजेन्द्र शिंगने और सुरेश देशमुख के हाथों में रहा है। इनमें से दो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और एक कांग्रेस में सक्रिय रहे हैं। नागपुर के सुनील केदार तो कांग्रेस की टिकट पर पिछली विधानसभा में चुन कर भी आये थे, जबकि वर्धा के पूर्व विधायक सुरेश देशमुख राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की टिकट पर चुनाव लड़कर हार गये। इन तीनों नेताओं और तीनों बैंकों को दु:स्थिति से निकालने में मुख्य भूमिका रही केन्द्रीय मंत्री और ताकतवर भाजपा नेता नितिन गडकरी की। सनद रहे कि गडकरी खुद ब्राह्मण हैं और उनके साथ जूनियर के तौर पर काम करने वाले दूसरे ब्राह्मण नेता देवेन्द्र फडनवीस, आज राज्य के मुख्यमंत्री हैं।

दूसरी घटना है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में एक दलित परिवार के तीन लोगों की हत्या की। सूबे के विधानसभा चुनाव परिणाम आने के ठीक तीन दिन बाद। इस हत्याकांड को कथित तौर पर ऊंची जाति के दक्षिणपंथी लोगों द्वारा अंजाम दिया गया। दलित पैंथर नेता और वर्तमान में समता सैनिक दल के अध्यक्ष विमलसूर्य चिमणकर कहते हैं कि ‘पेशवाई वापस आ रही है’। ‘पेशवाओं के शासन, जो ब्राह्मणों का सीधा शासन था, में उनके दमन से दलित-पिछडी जनता काफी त्रस्त थी’। महात्मा फुले ने भी समाज पर पेशवाई राज के प्रभाव के खिलाफ संघर्ष किया था। हो सकता है कि लोकतंत्र के इस युग में यह एक अतिरेक भरा कथन हो, लेकिन चिमणकर का यह वक्तव्य नितांत अप्रासंगिक नहीं कहा जा सकता। सवाल यह है कि क्या भारतीय जनता पार्टी और उसके प्रधानमंत्री, जाति की राजनीति का खात्मा करने और विकास की राजनीति का दौर शुरू करने के बाबत सचमुच गंभीर हैं? मध्यजातियों (कुणवी -मराठा) के राजनीतिक वर्चस्व वाले महाराष्ट्र में ब्राह्मण मुख्यमंत्री और जाट बाहुल्य राजनीतिक परिवेश वाले राज्य में गैर-जाट मुख्यमंत्री की ताजपोशी से सन्देश तो वही जा रहा है कि मोदी और उनकी पार्टी, 90 के दशक से चली आ रही राजनीति को बदलना चाह रहे हैं और साफ छवि और विकास के प्रति समर्पित व्यक्तित्व उनकी प्राथमिकताओं में है। लेकिन कभी-कभी सच वह नहीं होता जो दिखाई देता है।

इसके पहले कि हम पहली घटना के राजनीतिक निहितार्थ को समझें या इसका कोई प्रतीकात्मक विश्लेषण करें, यह याद रखना प्रासंगिक होगा कि केंद्र में पांच दर्जन चेहरों के मंत्रिमंडल में एक दर्जन से अधिक ब्राहमण हैं और देश के एक नामचीन पत्रकार (राजदीप सरदेसाई) दो-दो सारस्वत ब्राह्मणों के मंत्री बनाये जाने पर उल्लसित हैं। जरा महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा में भाजपा के उम्मीदवारों की सामाजिक स्थिति और इस हिसाब से पार्टी की राणनीति पर एक नजर डाल ली जाय। महाराष्ट्र में अपने 277 उम्मीदवारो (सूबे में 288 सीटें हैं, जिनमें से 11 सीटें गंठबंधन के सहयोगी दलों को दे दी गई थीं) में से भाजपा ने 106 मराठा उम्मीदवार उतारे और 70 दूसरे ओबीसी उम्मीदवार। तीन प्रतिशत की आबादी वाले ब्राह्मणों को 17 टिकट दिए गए थे। वहीं 90 सदस्यों वाले हरियाणा विधानसभा में पार्टी ने 27 जाट और 17 दूसरे ओबीसी नेताओं को टिकट दिए। टिकट बंटवारे में इन राज्यों में 1990 के बाद से बनी राजनीतिक स्थितियों का बखूबी ध्यान रखा गया, जिसके परिणाम भी पार्टी को उत्साहजनक मिले।

विधानसभा चुनाव में महाराष्ट्र में पार्टी को 38 प्रतिशत ओबीसी वोट मिले, जबकि ऊंची जातियों के 52 प्रतिशत वोट उसे मिले। हरियाणा में भाजपा को 27 प्रतिशत गैर-जाट ओबीसी वोट मिले। चुनाव जीतने के लिए हरियाणा में जाति पंचायतों से लेकर दलित अनुयायियों वाले ‘डेरा सच्चा सौदा’ तक पर डोरे डाले गये। हांलांकि सिरसा स्थित ‘डेरा सच्चा सौदा’ भाजपा को सिरसा जिले की पांच में से एक भी विधानसभा सीट नहीं दिला सका, लेकिन इस समर्थन से राज्य भर में उसे मनोवैज्ञानिक लाभ तो मिला ही।

जाति समीकरण को साधने की कवायद केवल चुनाव जीतने के लिए नहीं की गयी है। इसके दीर्घगामी लक्ष्य हैं। नये प्रधानमंत्री की ताजपोशी के बाद से ही समाज का उच्चस तबका उत्साह में है और उसके संगठन अति-सक्रिय हो उठे हैं। उच्च तबके के वर्चस्व के लिए जिस राजनीतिक चतुराई की जरूरत होती है, उसका प्रतीक है महाराष्ट्र के तीन कुणवी-मराठा वर्चस्व वाले बैंकों का ताराणहार एक ब्राह्मण राजनेता का बनना। जो कार्य मराठा छत्रप और इनके राजनीतिक गुरु शरद पवार नहीं कर पाये, उसे नितिन गड़करी ने कर दिखाया। इस तरह यह एक राजनीतिक सन्देश भी है कि ब्राह्मण नेतृत्व में दूसरों के हित भी सुरक्षित हैं। भाजपा और उसके नागपुर (संघ मुख्यालय) स्थित रणनीतिकार, इस तथ्य को बखूबी समझते हैं कि आज बिना दलित-पिछड़ों के समर्थन के शासन करना नामुमकिन है। चुनावों के दौरान आरपीआई के नेता रामदास आठवले को दिया गया सम्मान जनता के बीच ‘फील गुड’ का सन्देश देने की रणनीति का ही हिस्सा था। बाद में उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया।

जब मौक़ा सत्ता में वास्तविक भागीदारी का आया तो भाजपा ने खानापूर्ती की राजनीति ही की, पहले तो अठावले की सत्ता में 15 प्रतिशत भागीदारी की मांग को खारिज किया गया फिर नये मंत्री मंडल में महज तीन पिछड़े और एक-एक दलित-आदिवासी को जगह दी गई।

चिमणकर शायद बालगंगाधर तिलक की इस टिप्पणी के संदर्भ में बात नहीं कर रहे हैं कि, ‘तेली तम्बोली, कुणभट्टे (कुणबी) विधिमंडलों में जाकर क्या हल चलाएंगे!’ वे कह रहे हैं कि ‘आज इसी दर्शन को मानने वाले देश और राज्य की राजनीति में हावी हो गये हैं’। दरअसल, भाजपा भी यह खूब समझती है कि बिना जातीय अस्मिता को सहलाये वह अपनी दीर्घकालीन राजनीति नहीं साध सकती इसीलिए न तो महाराष्ट्र में और ना ही हरियाणा में जाति-समीकरण को वह चुनावों में छोड़ पाई और न आगे छोडऩे वाली है – इस हद तक कि वह हरियाणा में खाप पंचायतों के आगे दंडवत होकर जाति की नकारात्मक राजनीति से भी बाज नहीं आने वाली।

 

(फारवर्ड प्रेस के  दिसम्बर 2014 अंक में प्रकाशित)


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