जाति-आधारित नीतियों की भूल-भुलैया

बंदोपाध्याय आयोग की अनुशंसायें यदि लागू की जातीं तो उसका सकारात्मक प्रभाव उच्च जाति के गरीबों पर भी पड़ता लेकिन उच्च जातियों के लिए अलग से आयोग का गठन कर क्या नीतीश कुमार ने जाति-समाज को और बांटने का काम नहीं किया ?

नीतीश कुमार ने बिहार के मुख्यमंत्री बतौर अपने दोनों कार्यकालों में एक-एक आयोग का गठन किया. अपने पहले कार्यकाल में, २००६ में, उन्होंने डी. बंदोपाध्याय के नेतृत्व में च्भूमि सुधार आयोगज् का गठन किया, जिसने २००८ में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौप दी. अपने दूसरे कार्यकाल में जनवरी २०११ में उन्होंने ऊंची जातियों के गरीबों की स्थिति जानने के लिए च्उच्च जाति आयोगज् का गठन किया, जिसके अध्यक्ष बनाये गये इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज डीके त्रिवेदी. इस आयोग के कामकाज पर पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने दिसंबर २०१४ में नाराजगी जाहिर की. तीन साल की अपनी समयावधि खत्म होने के बाद, अप्रैल २०१५ में आयोग ने अपनी रिपोर्ट बिहार सरकार को सौप दी.

anant-singh copyनीतीश कुमार इस आयोग की अनुशंसाओं से काफी उत्साहित हैं जबकि बताया जाता है कि बंदोपाध्याय समिति की रिपोर्ट आते ही वे बौखला गये थे और आज उसका नाम लेना भी नहीं चाहते. यह तब जबकि च्भूमि सुधार आयोगज् की कार्यप्रणाली व अनुशंसायें, उच्च जाति आयोग की कार्यप्रणाली और अनुशंसाओं से ज्यादा वैज्ञानिक, विश्वसनीय और परिवर्तनकारी दिखती हैं. उच्‍च जाति आयोग की अनुशंसायें बिहार में मीडिया में सुर्खियों में है. कुछ अखबारों में इसकी अनुशंसाओं और शोध में सामने आये आंकड़ों का नियमित प्रकाशन हो रहा है. रपट में दिए गए शोध आधारित आंकड़े, ऊंची जातियों के सम्बन्ध में स्थापित धारणाओं को तोड़ते हैं. मसलन, आयोग के अनुसार बिहार में मात्र ८.६त्न हिन्दू ऊंची जातियों के परिवारों के पास ५ एकड़ से ज्यादा जमीन है जबकि मुसलमान ऊंची जातियों के १.१त्न लोगों के पास ५ एकड़ जमीन है. ग्रामीण इलाकों में ऊंची जाति के ३५.३त्न हिंदू और २६.५त्न मुसलमान परिवारों पर कर्ज है वहीं शहरी इलाकों में ऐसे हिंदू परिवारों का प्रतिशत २४.९ और मुसलमान परिवारों का २०.३ है. ग्रामीण इलाकों में मात्र ९.९त्न हिन्दू ऊंची जातियों के लोग और ८.४त्न ऊंची जाति के मुसलमान ग्रेजुएट या उच्च शिक्षित हैं जबकि शहरी इलाकों में उच्च जाति के ग्रैजुएट हिन्दू और मुसलमान क्रमशः ३१.७ प्रतिशत  और २५.४ प्रतिशत हैं.

आयोग ने उच्च जाति के गरीबों की बेहतरी के लिए तीन सुझाव दिए हैं : १. लोककल्याणकारी योजनाओं में सवर्ण गरीबों का भी ख़ास ख्याल रखा जाये. २. डेढ़ लाख से कम सालाना आय वाले सवर्ण गरीबों को उन सारी योजनाओं से जोड़ा जाये, जो राज्य गरीबों और पीछे छूट गये लोगों के कल्याण के लिए चलाता है. ३. गरीबों के लिए घर, शौचालय सुविधा और कृषि संबंधी योजनाओं को पुनर्परिभाषित करते हुए सवर्ण गरीबों को भी इनमें शामिल किया जाये. खबर है कि बिहार के मुख्यमंत्री, राज्य में आसन्न चुनाव को देखते हुए इन अनुशंसाओं को लागू करने के लिए बेताब हैं.
सवाल यह है कि इस आयोग ने ऐसे कौन से सुझाव दे दिये, जो बन्दोपाध्याय आयोग की सिफारिशों से ज्यादा प्रभावकारी हैं. इन दोनों ही आयोगों ने नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले अर्थशास्त्री शैबाल गुप्ता के नेतृत्व में संचालित गैर सरकारी संगठन च्आद्रीज् की मदद से सर्वे करवाये. लेकिन बन्दोपाध्याय आयोग ने इस सर्वे के अलावा जनसुनवाई भी की. राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, भूदान आदि भूमि मामलों के जानकारों से उनके विचार आमंत्रित किये. आयोग ने अपनी ४१८ पन्नों की रिपोर्ट में बिहार की आर्थिक स्थिति व लोगों की बदहाली का विश्वसनीय चित्र उपस्थित किया है और फिर सुधार की अनुशंसायें की गई हैं, जिनका असर भी दूरगामी होने वाला है. तीन सालों में ‘उच्च जाति आयोग’ ने ‘आद्री’ द्वारा उच्च जाति के गरीबों की स्थिति जानने के लिए सैंपल सर्वे राज्य के ३८ में से २० जिलों के गाँवों और शहरों में १० हजार लोगों के बीच करवाया. इनमें मुसलमानों और हिन्दुओं की ऊंची जातियां शामिल हैं. तीन साल में ११ करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी इस आयोग के कर्ताधर्ताओं के पास इतनी भी फुर्सत नहीं थी कि वे आंकड़ों का अध्ययन कर अपनी अनुशंसायें दें. अनुशंसाओं करने का उनका काम भी आद्रीज् ने ही कर दिया.

तुलनात्मक तौर पर ज्यादा वैज्ञानिक व ज्यादा जिम्मेवार बंदोपाध्याय आयोग ने बिहार में ग्रामीण और शहरी गरीबी का बेहतर विवरण किया था, जिसमें सभी जातियों के लोग शामिल थे. आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि १९९० के दशक के दौरान भूमिहीनता की दर चिंताजनक हद तक बढ़ी. सन १९९३-९४ में ६७ प्रतिशत ग्रामीण गरीब भूमिहीन या करीब-करीब भूमिहीन थे. यह आंकड़ा १९९९-२००० तक ७५ प्रतिशत हो गया. इस दौरान भूमि संपन्न समूहों में गरीबी घटी जबकि भूमिहीन समूहों की गरीबी ५१ प्रतिशत से बढ़कर ५६ प्रतिशत हो गई.

बिहार में कुल १८ लाख एकड़ अतिरिक्त ज़मीनें हैं. ये ज़मीनें या तो सरकारी नियंत्रण में हैं या भूदान समितियों के नियंत्रण में, जिसे बांटा नहीं जा सका है या सामुदायिक नियंत्रण में या कुछ अन्य लोगों के कब्जे में है. आयोग ने इन ज़मीनों को भूमिहीनों में बांटने की अनुशंसा की है. आयोग की सिफ़ारिश है कि बटाईदारों के हितों की रक्षा के लिए एक अलग बटाईदारी कानून होना चाहिए. किसी भूमि पर मात्र दो श्रेणियों के व्यक्ति का अधिकार हो (क) रैयत जिसे भूमि पर पूर्ण स्वामित्व, अधिकार तथा हित रहेगा (ख) बटाईदार जिसे स्वामित्व का अधिकार नहीं बल्कि भूमि पर लगातार जोत-आबाद का अधिकार रहेगा. हर बटाईदार के पास पर्चा रहे, जिसमें भू-स्वामी का नाम तथा जिस भूखंड पर वह जोत कर रहा है, उसकी संख्या रहे. पर्चे की सत्यापित प्रति भू-स्वामी को दी जाए. बटाईदार का जोत-आबाद का अधिकार अनुवांशिक रहे यानी पीढ़ी दर पीढ़ी वो उस पर खेती कर सके. आयोग के अनुसार, कृषि और गैर-कृषि भूमि के बीच अंतर को समाप्त कर दिया जाना चाहिए. भूमि को उसके सरल अर्थ में परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि किसी ज़मीन को कृषि योग्य और किसी को अन्य प्रकार का बताकर, सीलिंग प्रावधानों से बच निकलने का अवसर किसी को न मिले. सीलिंग के दायरे से बागान, बगीचे, मत्स्य पालन तथा अन्य विशिष्ट श्रेणियों के भूमि उपयोग को दी गई छूट समाप्त कर दी जाए.

च्भूमि सुधार आयोगज् के अनुसार पांच या अधिक सदस्यों वाले परिवार के लिए १५ एकड़ भूमि की सीमा होनी चाहिए. यदि परिवार का कोई प्लान्टेशन, बाग-बगीचा आदि हो तो उसे यह चुनने का अधिकार रहे कि वह १५ एकड़ तक बागान आदि रखे अथवा धान/गेहूँ की ज़मीन रखे. आयोग के अनुसार, १९५० से मौजूद मठों, मंदिर, चर्च आदि धार्मिक संस्थाओं को १५ एकड़ की एक इकाई दी जाए. अनेक देवी देवताओं वाले मंदिर को भी एक धार्मिक इकाई के रूप में सिर्फ एक हदबंदी दी जाए.

बंदोपाध्याय आयोग की अनुशंसायें यदि लागू की जातीं तो उसका सकारात्मक प्रभाव उच्च जाति के गरीबों पर भी होता लेकिन उच्च जातियों के लिए अलग से आयोग का गठन कर क्या नीतीश कुमार ने जाति-समाज को और बांटने का काम नहीं किया? उच्चजाति आयोग के गठन की घोषणा के बाद नीतीश कुमार के मित्र रहे लेखक–विचारक प्रेमकुमार मणि ने विधान परिषद् की अपनी सदस्यता को दांव पर लगते हुए इसका तीखा प्रतिवाद किया था. उन्हें अपनी सदस्यता गंवानी भी पडी थी.

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