किशोर होते बच्चों के अजब-गजब किस्से

हम अपने मीठे व्यवहार से चाहे सारी दुनिया को बेवकूफ बना लें परन्तु हमारे बच्चे अच्छी तरह से जानते हैं कि हम कौन और क्या हैं। आप अपने दैनिक जीवन में जो भी करते हैं, वह उन्हें लम्बे समय तक याद रहता है

jacinta2मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि ‘तीन छोटे लड़कों के अभिवावक बतौर आपके अनुभव क्या हैं?’ मुझे तो हमेशा ऐसा लगता है कि मैं एक ऐसे घूमते लट्टू में बैठी हूँ, जिसमें बुगाटी वेरोन (एक प्रसिद्ध स्पोर्ट्स कार) का इंजन लगा है। समय बिजली की गति से गुजऱ रहा है! दस वर्ष पहले मेरे और मेरे पति के जीवन में जुड़वां पुत्र आये। इसके पांच साल बाद, हमारा तीसरा लड़का अवतरित हुआ और उसके बाद मानों महाभारत शुरू हो गया। अगणित युद्धों, टनों खाने-पीने की चीज़ों, छोटा भीम, स्कूल यूनिफार्म पर इस्त्री, होमवर्क, दाँतों का गिरना, समर कैंप-उफ। परन्तु अंतत: हम अपना परिवार बना सके – आदर्श नहीं परन्तु कामचलाऊ।

क्या मैं एक आदर्श माँ हूँ? कतई नहीं! अभिवावक के तौर पर, मैं हर दिन कम से कम एक दर्जन गलतियाँ तो करती ही हूँ। पर इस सबसे मैं यह सीख रही हूँ कि एक अच्छा अभिभावक बनने के लिए जो चीज़ सबसे जरूरी है वह है ढेर सारा धैर्य। इसलिए मैं आपको कोई सलाह देने की स्थिति में तो नहीं हूँ परन्तु एक ‘प्रशिक्षु’ माँ की ये टिप्स शायद आपके कुछ काम आ सकें

किशोर होते बच्चों को पालने के चार मूल सिद्धांत:

1) कहो नहीं करो

किसी शिशु के लिए उसके माता-पिता सुपर हीरो से कम नहीं होते। अरे वाह, पापा तो मुझे इतने ऊपर उछाल सकते हैं! मालूम है, मेरी मम्मी से अच्छा केक तो कोई बना ही नहीं सकता! अगर आप देवदूत की तरह कहीं भी प्रगट न भी हो सकते हों तो भी उनकी निगाहों में आप कोई गलती कर ही नहीं सकते। परन्तु जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, आपकी अलौकिक शक्तियों में उनका विश्वास कम होता जाता है।

अगर आपके घर में बच्चे हैं तो समझ लीजिये कि एक सीसीटीवी कैमरा आपकी हर गतिविधि को रिकॉर्ड कर रहा है। आप और हम जितना सोचते हैं, बच्चे उससे कहीं अधिक ध्यान से चीज़ों को देखते-सुनते हैं। कुछ दिन पहले मैं हमारे घर के भोजन कक्ष में खड़ी साईकिल से टकरा कर गिरते-गिरते बची। जैसे ही मेरे पैर में साईकिल का कोई हिस्सा चुभा मेरे मुंह से बेसाख्ता एक अशोभनीय शब्द निकल गया। हमेशा की तरह, मेरे दोनों सीसीटीवी कैमरा मेरे हर शब्द की रिकॉर्डिंग कर रहे थे! उन्होंने छूटते ही कहा, ‘मम्मा, जब आप ये बोल सकती हैं तो हम क्यों नहीं?’

कहने का मतलब यह कि हमारे बच्चे हमारी हर हरकत पर नजऱ रखते हैं। जब हम फोन पर बातें कर रहे होते हैं, गाड़ी चला रहे होते हैं, अपने माता-पिता से बातचीत कर रहे होते हैं-वे हमें बहुत ध्यान से देखते और सुनते हैं। हम अपने मीठे व्यवहार से चाहे सारी दुनिया को बेवकूफ बना लें परन्तु हमारे बच्चे अच्छी तरह से जानते हैं कि हम कौन और क्या हैं। आप उन्हें एक घंटे का प्रवचन दें तो ज्यादा से ज्यादा वे उसमें से दो मिनट की बातों को ध्यान से सुनेंगें। परन्तु आप अपने दैनिक जीवन में जो भी करते हैं, वह उन्हें लम्बे समय तक याद रहता है। यह थोड़ा डरावना है न? इसलिए जरूरी है कि हम अपने व्यवहार के प्रति सजग रहें। हमें चाहिए कि हम उनसे जैसा व्यवहार चाहते हैं, हम खुद पहले वैसा व्यवहार करें।

2) परिणामों से वाकिफ कराओ

जब मेरे लड़के नौ बरस के थे तब उनकी एक अजीब-सी आदत थी। शाम को जब मैं उन्हें दूध देती, तो वे एक टांग पर खड़े होकर उसे पीते थे। इससे मुझे चिढ़ होती थी पर मैंने उनसे कुछ कहा नहीं। कुछ दिनों बाद, उन्होंने दूध पीते समय एक टांग पर गोल-गोल घूमना शुरू कर दिया। वे कहते थे कि वे यह दिखाना चाहते हैं कि धरती कैसे गोल घूमती है। परन्तु न तो मुझे और ना ही मेरे पति को रोज-ब-रोज विज्ञान के इस पाठ की आवश्यकता थी। इससे भी बुरी बात यह थी की दूध का गिलास अक्सर धरती पर नजर आता था। एक दिन, जब गुरुत्वाकर्षण बल के वशीभूत, गिलास फर्श पर गिर गया तो मैंने अपने लड़के को कपड़ा और बाल्टी पकड़ा दी और उससे फर्श साफ करने को कहा। वह दिन था और आज का दिन है, हमारे घर में एक बूँद दूध भी जमीन पर नहीं गिरा।

कभी न कभी हमें बच्चों को यह समझाना होता है कि वे जो करते हैं, उसका परिणाम भी उन्हें ही भोगना होगा। मैं तो यही चाहूंगी कि उनका इस सत्य से साक्षात्कार अभी हो जाये ताकि उन्हें किशोरावस्था में यह पाठ न सीखना पड़े। नि:संदेह वे अपने जीवन में ढेर सारी गलतियाँ करेंगे परन्तु उन्हें यह समझ आना चाहिए कि जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा।

3) इस अद्भुत दुनिया से उन्हें परिचित करवाओ

आज हमारे देश में शिक्षा केवल रिपोर्ट कार्डों तक सिमट कर रह गयी है। आश्चर्य नहीं कि बच्चे टेस्टों और प्रतियोगी परीक्षाओं में ही उलझे रहते हैं और तनाव कभी उनका पीछा नहीं छोड़ता। एक आदर्श दुनिया में बच्चे इसलिए पढाई करेंगें क्योंकि उनके आसपास की दुनिया उन्हें रोमांचित करेगी और वे उसके बारे में जानना चाहेंगे। मैं तो चाहूँगीं कि स्कूल, बच्चों में हमारी दुनिया में दिलचस्पी पैदा करें और उन्हें सही दिशा में सोचना सिखाएं। एक दिन, पांचवीं कक्षा में पढऩे वाले मेरे बेटे ने स्कूल से लौटते ही यह घोषणा की कि ‘इतिहास अब मेरा सबसे पसंदीदा विषय है!’। मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि उस दिन उसकी इतिहास की पहली क्लास थी। हुआ यह कि उसके अध्यापक ने सभी विद्यार्थियों से कहा था कि वे एक-एक पुराना सिक्का लेकर आयें और उसके बारे में कुछ लिखें। वो इससे बहुत रोमांचित था और प्राचीन चीज़ों के बारे में बात करना बंद ही नहीं कर रहा था! उसके अध्यापक ने एक घंटे से भी कम समय में, इतिहास में उसकी जबरदस्त रूचि पैदा कर दी थी।

घर में भी हमारी कोशिश यही रहती है कि हम चीजें सीखने की प्रक्रिया को मजेदार और दिलचस्प बनाएं। चाहे हमारे बच्चे ज्वालामुखी का मॉडल बना रहे हों या नेशनल जियोग्राफिक के किसी कार्यक्रम पर चर्चा कर रहे हों, हम उसमें जरूर शामिल होते हैं। बच्चों में अथाह और अनंत जिज्ञासा होती है। माता-पिता के तौर पर हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम इस जिज्ञासा और ज्ञान पिपासा को बुझने न दें। हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि हमारे बच्चे पढ़ाई-लिखाई के प्रति सही दृष्टिकोण रखें ताकि आने वाले कई वर्षों तक पढ़ाई में उनकी रूचि बनी रहे और वे उस पर पर्याप्त ध्यान दे सकें।

4) स्लेट को साफ रखो

क्या एक मां बतौर आपको कभी अपने बच्चे से कही गई किसी बात पर अफसोस हुआ? मेरे साथ कई बार ऐसा हो चुका है। ऐसे कई दिन थे जब सोने के पहले मैं यह सोचने पर मजबूर हो गई कि क्या मैं उस तरह की मां हूं जैसा कि ईश्वर मुझे बनाना चाहता है। मुझे अक्सर लगता है कि मैं वांछित स्तर तक नहीं पहुंच पा रही हूं। कुछ साल पहले मेरी बहन ने मुझे यह सलाह दी थी कि कभी भी बच्चों को गुस्से में या परेशानी की हालत में सोने या स्कूल न जाने दो। मैं रोज ऐसा करने का प्रयास करती हूं। चाहे दिन कितना ही कठिन क्यों न रहा हो, चाहे उन्होंने घर की कितनी ही चीजें तोड़ी हों, मैं दिन की समाप्ति सकारात्मक ढंग से करती हूं। हमारे बच्चों को यह समझ में आना चाहिए कि हम उनसे प्यार करते हैं और चाहे उनका परीक्षा परिणाम कुछ भी हो, चाहे वे कैसा ही व्यवहार करें और चाहे दिन भर में उन्होंने जो कुछ भी किया या कहा हो, हम उनसे प्यार करते रहेंगे। आठ या नौ साल के बच्चे अपनी भावनाओं को व्यक्त करने में हिचकते हैं परंतु आप यह निश्चित मानिए कि उनके दिमाग में संदेहों और भय का बवंडर होता है। जब हम हर रात स्लेट को पूरी तरह साफ कर देते हैं तब एक तरह से हम उनसे यह कह रहे होते हैं, ”कोई बात नहीं, तुम्हारे लिए आदर्श होना जरूरी नहीं है, हमारा तुम्हारे प्रति प्रेम बिना शर्त है, हम तुम्हारे साथ हैं और मुसीबत की हर घड़ी में तुम्हारे साथ रहेंग’। कभी-कभी एक आलिंगन भी यह संदेश पहुंचाने के लिए काफी होता है।

बच्चों के जीवन का हर पड़ाव, उनके माता-पिता के लिए नयी चुनौतियाँ लेकर आता है। परन्तु इन चुनौतियों से निपटने की प्रक्रिया के अवर्णनीय आनंद भी हैं। जैसे-जैसे मेरे जुड़वां बच्चे बड़े हो रहे हैं, मैं हर दिन ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि उसने मुझे उनका पालन-पोषण करने की जिम्मेदारी सौपी। उनकी मासूम बातें, उनके भोले मजाक किसी भी उबाऊ दिन में रंग भर देते हैं। उनकी हंसी की आवाज़- चाहे फिर वे कोई शरारत ही क्यों न कर रहे हों -नीरव घर से कहीं बेहतर है। मैं सैकड़ों बार यह सोचती हूँ कि वे जल्दी से बड़े हो जायें और मैं उनकी शादियाँ देखूं। पर फिर, कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि वे हमेशा इतने छोटे बने रहें। आईये, अभिवावक बतौर हम ईश्वर द्वारा हमें भेंट किये गए इन दिनों को अविस्मरणीय बनाएं और इनकी कीमत को कभी कम करके न आंकें।

यह लेख ‘‘फैमिली मंत्र‘‘ से अनुमति प्राप्त कर प्रकाशित किया जा रहा है। यह पत्रिका शहरी परिवारों की समस्याओं पर केन्द्रित है और इसका उद्देश्य परिवारों को मजबूती देना और उन्हें पुनः एक करना है

फारवर्ड प्रेस के जून, 2015 अंक में प्रकाशित

 

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