आंबेडकर की ओर क्यों देख रही है भाजपा?

बसपा ने अपना जनाधार खो दिया है और बिहार और उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव दूर नहीं हैं। ऐसे में भाजपा को लग रहा है कि बाबासाहेब उसके लिए तुरूप का पत्ता साबित हो सकते हैं

भाजपा युवा किंतु परिपक्व राजनैतिक दल है। देश के एक प्रमुख राजनीतिक दल के रूप में उसने लगभग साढ़े तीन दशक पूरे कर लिए हैं। भाजपा की जड़ें उसके पितृसंगठन आरएसएस में हैं। आरएसएस और भाजपा, दोनों ही बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर से अपनी नजदीकी साबित करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। डॉ. आंबेडकर ने अपना जीवन पिछड़ी जातियों की बेहतरी के लिए समर्पित किया था। वे उन्हें ऊँची जातियों के हिंदुओं के समकक्ष लाना चाहते थे और जातिप्रथा के उन्मूलन के जरिए भारतीय समाज में समानता स्थापित करने के पक्षधर थे।
दुर्भाग्यवश, भाजपा और कांग्रेस सहित कोई भी पार्टी आंबेडकर के परिप्रेक्ष्य और उनकी वैचारिकी को समझ नहीं पाई। उनके लिए आंबेडकर मात्र एक ऐसे नेता हैं, जो पिछड़ी जातियों में लोकप्रिय हैं और जिनके नाम पर उन्हें वोट मिल सकते हैं।

DSC_0192आंबेडकर ने आरएसएस के कई कार्यक्रमों को देखा और यह जानना चाहा कि संगठन में जाति का कितना और क्या प्रभाव है। उन्हें बताया गया कि संघ में जातिगत भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं है। परंतु पिछले लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान आरएसएस, हिंदू धर्म पर कसे जातिवाद के कड़े शिकंजे को यह कहकर खारिज करता रहा कि किसी हिंदू धर्मशास्त्र में यह नहीं कहा गया है कि शूद्र, अछूत हैं और यह भी कि कुछ नीची जातियों का जन्म, मध्यकाल में देश में मुगल शासन के दौरान हुआ था। इसका उद्देश्य था जातिप्रथा के उदय के संबंध में कड़वी सच्चाई को स्वीकार न करना। कड़वी सच्चाई यह है कि जातिप्रथा का जन्म वैदिक व उत्तर-वैदिक काल में हुआ था और इसे हिंदू धर्म की स्वीकृति प्राप्त है। आरएसएस दलितों की बात तो करता है परंतु उसने कभी जातिप्रथा के उन्मूलन के लिए कोई प्रयास नहीं किया। अत: दलितों और बाबासाहेब के संदर्भ में उसके दावों का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। आंबेडकर असाधारण मेधा के धनी बुद्धिजीवी थे, जिन्होंने अनेक गंभीर और जटिल मसलों पर गहराई से विचार किया। आरएसएस ने पाकिस्तान के संबंध में उनके गहन विचारों की गलत व्याख्या कर अपने एजेण्डे को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

सन् 1980 में अपने जन्म के बाद से भाजपा ने कभी आंबेडकर में रूचि नहीं दिखाई। उसने गांधी को प्राथमिकता दी। भाजपा ने अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का एजेण्डा पहले से ही अपना लिया था और वह अपने लिए सामाजिक और वैचारिक जमीन की तलाश में थी। पार्टी के लिए मुख्य चुनौती थी अपने जनाधार, जिसमें मुख्यत: ब्राह्मण और व्यवसायी वर्ग थे, में अपनी सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ाना। परंतु उसने कभी भी पिछड़ों और वंचितों की हालत सुधारने की ओर ध्यान नहीं दिया। इसका एक कारण यह भी था कि इस वर्ग के वोट मुख्यत: कांग्रेस को मिलते थे।
इस स्थिति में बदलाव आया दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस4) के गठन और तत्पश्चात बसपा के उदय के साथ। देश में पहली बार पिछड़ों की एक अलग राजनीतिक पहचान बनी। भाजपा को जल्दी ही यह समझ आ गया कि इस वर्ग के वोट कितने महत्वपूर्ण हैं। परंतु समस्या यह थी कि इस वर्ग के लोगों का ऊँची जातियों और हिंदुत्व की विचारधारा से तालमेल कैसे बिठाया जाए। सन् 1989 में भाजपा ने पहली बार नीची जातियों से सीधा संवाद स्थापित करने की कवायद शुरू की। इसके लिए ‘हेडगेवार सेवान्यास’ की स्थापना की गई। बसपा के निरंतर आगे बढ़ते कदमों से सभी राजनीतिक दल सहम गए और उन्होंने आंबेडकर की ओर दौड़ लगा दी। भाजपा और कांग्रेस दोनों ने उनकी विरासत को वोटों में बदलने की कवायद शुरू कर दी। इसी के चलते, उनकी मृत्यु के तीन दशक बाद, सन् 1990 में, आंबेडकर को भारत रत्न दिया गया।

भाजपा लगातार कोई ऐसी जुगत भिड़ाने की कोशिश में लगी रही, जिससे आंबेडकर और ऊँची जातियों को एक साथ लाया जा सके। सन् 1998 के आमचुनाव, जिसने भाजपा के दिन फेरे, के दौरान आंबेडकर की कोई चर्चा नहीं की गई यद्यपि पार्टी ने गांधी को अपनाने की भरपूर कोशिश की। गांधी को अपनाना अपेक्षाकृत आसान था क्योंकि उनकी ऊँची जातियों में स्वीकार्यता थी और उनकी सोच, रामराज्य की अवधारणा के नजदीक थी। सन् 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों के भाजपा के घोषणापत्रों में सामाजिक न्याय और सामाजिक समरसता की चर्चा तो थी परंतु आंबेडकर एक सिरे से गायब थे।

अब राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है। सन् 2012 के उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा को मुंह की खानी पड़ी और पिछले लोकसभा चुनाव में वह एक भी सीट नहीं जीत सकी। भाजपा को लगा कि यह उसके लिए दलित मतों पर कब्जा करने का एक अच्छा मौका है। भाजपा का यह आंकलन है कि उच्च जातियों के पार्टी के पारंपरिक मतदाता, नरेन्द्र मोदी के व्यक्तित्व से इतने अभिभूत हैं कि दलितों को साथ लेने से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। चूंकि पार्टी का खुद का कोई स्थापित दलित नेता नहीं था इसलिए दलित मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए उसने आंबेडकर को चुना।
इस साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और उसके बाद उत्तरप्रदेश में भी चुनाव होंगे। यही कारण है कि भाजपा, निम्न जातियों के मतदाताओं को अपने साथ लाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। जीतनराम मांझी से पार्टी की वार्ताएं इस ओर संकेत करती हैं। भाजपा अपने आपको दलितों के हितैषी के रूप में प्रस्तुत करना चाहती है। उसे उम्मीद है कि इससे वह दलित समुदायों के कम से कम कुछ मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकेगी। परंतु पार्टी ने अब तक जातिप्रथा के उन्मूलन की दिशा में कोई प्रयास नहीं किए हैं। उसने आंबेडकर और उनकी विचारधारा को नहीं अपनाया है। इसके उलट, उसने आंबेडकर के विचारों को इस तरह से तोड़मरोड़ कर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है जिससे ऐसा भ्रम उत्पन्न होता है कि पाकिस्तान व घरवापसी जैसे मुद्दों पर संघ की सोच, आंबेडकर की वैचारिकी के अनुरूप है। पार्टी ने कभी आंबेडकर के असली विचारों का प्रतिपादन नहीं किया।

संघ, आंबेडकर की विरासत का उत्तराधिकारी बनना चाहता है। यह एक राजनीतिक चाल है। असल में आज जरूरत एक ऐसे आंदोलन की है जो हिंदू समाज व्यवस्था को पूरी तरह से नष्ट कर एक नए, जातिविहीन समाज की रचना करे। आरएसएस, आंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने के निर्णय को यह कहकर प्रचारित कर रही है कि उनका उद्देश्य हिंदुओं को ‘विदेशी’ धर्म अपनाने से रोकना था। तथ्य यह है कि आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को इसलिए चुना था क्योंकि वह सभी को आश्रय देता था। क्या भाजपा आंबेडकर से सीख लेकर अपने जाति-आधारित ढांचे को परिवर्तित करेगी? क्या वह दलितों को उच्च पदों पर बैठाएगी? क्या वह आंबेडकर की असली सोच, उनके वास्तविक दर्शन को अपनाएगी? या वह केवल कांग्रेस की वोट बैंक की राजनीति की नकल कर रही है?

फारवर्ड प्रेस के जुलाई, 2015 अंक में प्रकाशित

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