नरसिंह यादव : एकलव्य या अभिमन्यु !

सबसे अहम सवाल कि भारत सरकार के खेलमंत्री विजय गोयल की दिल्ली की राजनीति में अपने हित के कारण सतपाल-सुशील से जगजाहिर सहानुभूति के चलते जाँच में कोताही या मनाही तो नहीं की जा रही है? लेकिन इस पूरे मामले में किसकी इज्जत, प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है?

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नरसिंह यादव

क्या नरसिंह यादव रेसलिंग (कुश्ती) के खेल में मौजूद तगड़ी स्पोर्ट्स लॉबी और खेल संगठनों में मौजूद राजनीति का शिकार हुआ है? कहीं यह कुश्ती के मठाधीश गुरू सतपाल की लॉबी और भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह के बीच की प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष खेल संगठन में राजनीति का गंदा खामियाजा तो नहीं? अगर ऐसा है तो दुर्भाग्यपूर्ण है! किसी का कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन नरसिंह यादव के लिये ओलंपिक जैसे खेल में पदक जीतने का एक मौका चुकने वाली बात है, और साथ ही संभव है कि एक खिलाड़ी के तौर पर उसकी जिंदगी बर्बाद हो गयी।

नरसिंह (जिसे रियो जाना है) के साथ उसके रूम पार्टनर संदीप (जिसे रियो जाना भी नहीं है) का भी एक ही तरह के प्रतिबंधित दवा के प्रयोग में पकड़ा जाना आश्चर्यजनक है। फिर जो ड्रग सब्सटांस इन दोनों खिलाड़ियों के शरीर से मिला है, वह आमतौर पर बॉडी बिल्डर मसल्स बनाने के लिए लेते हैं, जो पहलवानों के किसी काम के नहीं। जिस ड्रग के सेवन का आरोप नरसिंह पर लगा है, उसका रेसलिंग में कोई लाभ नहीं है और डॉक्टरों के अनुसार ओलंपिक स्तर के पहलवान के लिये तो कतई ही नहीं है। डोप में फंसना आश्चर्यजनक है, उस पहलवान के लिए, जो 35-40 बार डोप टेस्ट में कभी भी फेल नहीं हुआ और जिसका पिछले कमोबेश महीने भर में ही 3 बार डोप टेस्ट हुआ हो तथा उसमें कहीं भी कुछ नहीं पाया गया।

नरसिंह के डोपिंग में पोजिटिव पाए जाने के बाद उसके टीम के सभी सदस्यों ने साजिश होने की बात कही है। नरसिंह के सभी सपोर्ट स्टाफ, कोच जगमाल सिंह और डॉक्टरों ने भी एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी के खिलाफ साजिश की संभावना जताई है। सवाल यह उठता है कि ठीक ओलम्पिक से पहले डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाया जाना कैसे संभव है, जिसे ओलम्पिक में जाने के लिए इतनी जद्दोजहद करनी पड़ी हो, विश्व चैंपियनशिप में कांस्य जीतकर ओलंपिक कोटा पाने के बाद भी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी हो। नरसिंह ने ओलंपिक का रास्ता एक दशक से ज्यादा की अपनी लगन और मेहनत के बूते निकाला था, वह भी विश्व स्तर की प्रतियोगिता में तीसरा स्थान प्राप्त कर। ऐसा पहलवान, जिसकी दावेदारी बरकरार थी, वह ठीक रियो के लिये रवाना होने से पहले ड्रग क्यों लेगा और वह भी ऐसा ड्रग जिसका उसके खेल में मेडिकली- लॉजिकली लाभ भी नहीं मिल रहा हो!

नरसिंह- सुशील विवाद के चलते आईबी- सीआईडी की खुफिया सूचना थी कि नरसिंह पर हरियाणा में हमला हो सकता है और जान को खतरा है, जिसकी रिपोर्ट आईजी- सीआईडी, चंडीगढ़ को भी भेज दी गई थी। नरसिंह पर खतरे को देखते हुए नेशनल कैम्प को कहीं और शिफ्ट करने की भी सिफारिश की गई थी। इस बारे में नरसिंह को भी जानकारी दी गई थी और उन्हें कहीं और प्रैक्टिस करने का भी सुझाव दिया गया था। लेकिन खुद महाराष्ट्र पुलिस में कार्यरत नरसिंह ने ओलंपिक को देखते हुये गुरू सतपाल के लोकल प्रभाव क्षेत्र सोनीपत के कैंप को रिस्क लेकर करने का इरादा किया। वैसे इस तरह की घटिया साजिश का शक किसी को नहीं था, जो निश्चित तौर पर भारत के खेल इतिहास में एक काले धब्बे की तरह अंकित हो जायगा।

यह भी कहा जा रहा है कि रसोइये ने पूछताछ में कुबूल कर लिया है कि वह खाने में ड्रग मिलाता था। वैसे इस प्रकार का शक साई कैम्प की एक महिला पर भी जताया जा रहा है। लेकिन यह जानना जरूरी है कि किसके कहने पर वह ऐसा किया करता था। फिर ओलंपिक स्तर के कैंप में खिलाड़ियों को इस तरह कैसे रखा गया था, जहाँ उन्हें किसी तरह का एक्सपोजर या साजिश का शिकार होना पड़ा। यह भी चर्चा है कि इस मामले में कई बड़े नामों के होने के कारण इसे गुप्त रखा जा रहा है या दबाया जा रहा है। इस पूरे वाकये से यह भी साबित होता है कि भारत में खेलों का संचालन कैसे होता है और अंतररार्ष्ट्रीय खेलों में भागीदारी की तैयारी भी कितने असुरक्षित व गैर- जिम्मेदाराना तरीके से होती है। कहीं- न- कहीं खेल संस्थाओं में बड़े पैमाने पर मौजूद भ्रष्टाचार को भी यह घटना उजागर करती है।

एक बड़ा सवाल है कि अगर नरसिंह इस पर सीबीआई जाँच की माँग कर रहा है तो कौन है जो जाँच नहीं होने देना चाहता है ताकि यह भी पता चले कि कालांतर में और अभी कौन-कौन खिलाड़ी इसके शिकार हुये हैं। सच तो सामने आना ही चाहिये ताकि दागदार होने का अपयश कम से कम बेकसूर पर से धुल जाये। कुछ लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि नरसिंह के कमोबेश एक महीने में तीसरी बार डोपिंग टेस्ट लेने के पीछे क्या कारण था! क्या इस ड्रग की साजिश में कुछ खिलाड़ियों को ढकेलने की कोशिश चल रही थी। कहीं ड्रग सैम्पल भी तो नहीं बदले गये जैसा कि रूस में एक बड़ा स्कैंडल सामने आया है।

सबसे अहम सवाल कि भारत सरकार के खेलमंत्री विजय गोयल की दिल्ली की राजनीति में अपने हित के कारण सतपाल- सुशील से जगजाहिर सहानुभूति के चलते जाँच में कोताही या मनाही तो नहीं की जा रही है? लेकिन इस पूरे मामले में किसकी इज्जत, प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है?

Screen Shot 2016-07-31 at 12.41.52 amपिछले दो- तीन महीने से कुश्ती गुरू सतपाल और सुशील को जानने वाले बताते हैं कि वे कितने तल्खी/तकलीफ/बेचैनी के साथ वक्त गुजार रहे थे। नरसिंह के डोपिंग में पकड़े जाने के बाद सतपाल- सुशील की 24-25 जुलाई की प्रतिक्रिया पढ़ें:- ….

24 जुलाई का @WrestlerSushil का ट्वीट: “Respect is to be earned not demanded. सम्मान उनके लिए होता है जो इसे कमाते हैं उनके लिए नहीं जो इसे मांगते हैं l Jai Hind!!”

सुशील के इस ट्वीट पर Shaurya Bajpai (@DrShaurya) का जवाबी ट्वीट है: “@WrestlerSushil Even if this unfortunate incident is true. you should not have taken this cheap shot. Narsingh Yadav was representing India.” (अनुवाद: अगर यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना सच है तो भी आपको इस तरह निम्न स्तर का कमेंट नहीं करना चाहिये था। आखिर नरसिंह यादव भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा था)

24 जुलाई को गुरू सतपाल का बयान आता है- “खेल मंत्रालय और कुश्ती महासंघ को रिप्लेसमेंट के बारे में तय करना है। सुशील तैयार है।”

25 जुलाई का @WrestlerSushil का ट्वीट: “very unfortunate 2 see the Wrestling go through this. I hv given my life to it & wl always support fellow wrestlers.” (अनुवाद: बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है पहलवानों के साथ यह सब। मैने अपनी जिंदगी कुश्ती को दी है और हमेशा अपने साथी पहलवानों का समर्थन करूँगा।)

लेकिन 25 जुलाई की इसी ट्वीट के साथ सुशील कुमार का एक विडियो बयान भी अटैच है, जिसका ट्रांसक्रिप्शन इस प्रकार है: “दो मेडल लाने के बाद मन था कि तीसरा मेडल देश के लिये लाऊँ। पिछले एक महीने से ओलम्पिक की तैयारियों से दूर हूँ और अब अपने साथी पहलवानों को सपोर्ट करता हूँ और उम्मीद करता हूँ कि वो ओलम्पिक में देश के लिये मेडल लायें।”

खेलजगत के गलियारे में यह भी चर्चा है कि नरसिंह के डोपिंग में पकड़े जाने की घटना के बाद सतपाल ने ऐसा कहा बताते हैं कि- यह सब तो होना ही था जैसे उन्हें ये सबकुछ पहले से पता था। खेलजगत के लिये इस शॉकिंग घटना पर सतपाल- सुशील की प्रतिक्रिया समाजशास्त्र और भाषाशास्त्र के लिहाज से असंवेदनशील तो है ही, साथ ही एक कटाक्ष, छ्द्म भाव, विद्रूपता और उपहास संस्कृति का परिचायक भी है।

Satpal Singh, Sushil Kumar

सतपाल और सुशील कुमार

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुशील अपनी सफलता की सिढि़याँ चढ़ता हुआ इगो और ऑबसेशन का शिकार हो गया। यही नहीं कुश्ती के मठाधीश इस ससुर-दामाम जोड़ी ने तल्ख तेवर, छोटी मानसिकता और काईंयाँ टाइप दिल- जज्बात का शिकार एक गरीब-मेहनतकश परिवार के बेटे नरसिंह को बना लिया। भारत के मिथकीय इतिहास में जैसे एकलव्य का अंगूठा काट लिया गया था या फिर अभिमन्यु जिसे युद्ध के मैदान में घेरकर मार दिया गया था, ठीक उसी प्रकार गाँव-घर से निकलकर संघर्ष की बुनियाद पर कुश्ती के खेल में एक उँचाई को छूने की कोशिश कर रहे नरसिंह को नव शहरी-सामंती-संभ्रांत लोगों ने अपनी साजिश का शिकार बना लिया, जिसकी भरपाई वे मरते दम तक शायद ही कर पाये। यह भी कम दिलचस्प बात नहीं कि पूर्व के तमाम विवादों और हो रही साजिश से अनजान सोनीपत के साई सेंटर में साफ दिलवाला, सहज व भावुक नरसिंह अपने आईकॉन सुशील और योगेश्वर की फोटो के नीचे शिद्दत से प्रैक्टिस करता रहा। जाहिर है कि सुशील-योगेश्वर उनके हीरो अबतक भी थे।

इस पूरी घटना के संदर्भ और दायरे में सिर्फ खेल नहीं है, भारत का जाति आधारित समाज है, वैश्वीकरण के बाजारवादी अर्थव्यवस्था में विभिन्न विधाओं- क्षेत्रों के ब्रांड बनते आइकॉन और राजनीति का गिरता स्तर है- जाहिर है कि इन तीनों से कोई भी अछूता नहीं है। 2016 में रियो ओलंपिक के ठीक पहले पिछड़ी जाति के बेटे नरसिंह के साथ साजिश हो जाती है तो 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में कुश्ती में कांस्य पदक जीतने वाले दलित समाज के बेटे के.डी.जाधव, जिसे भारत के लिये ओलंपिक में पहला व्यक्तिगत पदक जीतने का श्रेय है, को विस्मृत कर दिया गया और आजतक भी उचित सम्मान तक नहीं दिया गया है। इस बीच रियो के लिए नरसिंह यादव की जगह प्रवीण राणा (जाति राजपूत) को भेजे जाने का निर्णय लिया गया है। क्या यह खेलों का जाति शास्त्र है?

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