शिक्षा की साजिशन हत्या कर रहे नरेंद्र मोदी : मुचकुंद दूबे

समान शिक्षा के महत्व, शिक्षा के अधिकार क़ानून की खामियों और वर्तमान केंद्र सरकार की शिक्षा नीति की विनाशकारी योजनाओं बता रहे हैं शिक्षाविद मुचकुंद दुबे : नवल किशोर कुमार की बातचीत

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मुचकुंद दूबे

मुचकुंद दूबे आईएफ़एस यानी भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी पद पर रहने के बावजूद देश में शिक्षा को लेकर सबसे सजग माने जाते हैं। इनके ही प्रयास के कारण मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में समान स्कूली शिक्षा कैसे लागू हो, इसके लिए एक आयोग का गठन किया था और इसकी जिम्मेवारी मुचकुंद दूबे को सौंप दी थी। आमतौर पर लेटलतीफ़ी के लिए मशहूर अन्य आयोगों के विपरीत श्री दूबे ने तय समय सीमा के अंदर अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री को सौंप दी। लेकिन सरकार ने पूरी रिपोर्ट को ठंढे बस्ते में डाल दिया। परंतु श्री दूबे की मेहनत पूरी तरह बेकार नहीं गयी। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने उनके द्वारा बताये गये राह पर चलते हुए शिक्षा का अधिकार कानून बनाया। लिहाजा श्री दूबे को इस बात का श्रेय जाना ही चाहिए। यह बात अलग है कि वे स्वयं इस तथाकथित अधिकार के नाम पर दलितों और पिछड़ों के बच्चों के साथ हो रही हकमारी से व्यथित हैं। वे सुप्रीम कोर्ट में सरकार को चुनौती देने की योजना भी बना रहे हैं।

आज पूरे विश्व में शिक्षा एक बड़ा सवाल है। इसमें व्यापक बदलाव आये हैं। आईएफ़एस अधिकारी के रुप में आपने कई देशों में काम किया है। विश्व स्तर पर शिक्षा में आये बदलाव को आप कैसे महसूस करते हैं?

बात तो आपने सही कही है। वैश्वीकरण के बाद पूरे विश्व की शिक्षा में बदलाव आया है। इसकी कई सीमायें हैं। लेकिन भारत के संदर्भ में मैं यह अवश्य कहूँगा कि यहां शिक्षा के नाम पर वंचितों के साथ हकमारी की जा रही है। पूरे विश्व में एजुकेशन का यूनिवर्सलाइजेशन किया जा रहा है। यूनिवर्सलाइजेशन मतलब शिक्षा का समानीकरण। विकास के मामले में भारत से अपेक्षाकृत कम विकासशील देशों में भी समान स्कूली शिक्षा को महत्व दिया जा रहा है। लेकिन अपने भारत में इसके प्रति कोई गंभीर नहीं है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक बदलाव यह भी आया है शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर। इसके मानक बदले हैं और नये लक्ष्य भी निर्धारित किये गये हैं। कई देशों में तो प्राइवेट सेक्टर को भी शिक्षा की गुणवत्ता बढाने की जिम्मेवारी दी जा रही है। यह परिवर्तन सचमुच में उल्लेखनीय है।

शिक्षा के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर की घुसपैठ से वहीं खतरे सामने नहीं आयेंगे जो आज अपने देश में आ रहे हैं। मसलन शिक्षा का महंगा होना और बहुसंख्यकों का गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से दूर होना आदि।

नहीं, असल में जिन देशों में यह बदलाव लाया गया है, वहां पहले से ही समान स्कूली शिक्षा लागू है। इसलिए वहां अब यदि इस क्षेत्र में निजी निवेश किया जा रहा है तो इसका मूल स्वरुप समान स्कूली शिक्षा से अलग बिल्कुल भी नहीं है। वहां की सरकारों ने ऐसा इंतजाम कर रखा है कि स्कूल चाहे सरकारी हों या प्राइवेट, सभी बच्चों को पढाया जाएगा। फ़िर चाहे वे गरीब हों या अमीर। एक बात और शिक्षा के मामले में इसका समानीकरण सबसे महत्वपूर्ण शर्त है। ऐसा नहीं हो सकता कि आप शिक्षा को समान किये बगैर गुणवत्ता में सुधार कर सकें। खासकर निजी संस्थाओं के बुते तो बिल्कुल भी नहीं। यदि ऐसा हुआ तो यह एक भीषण दुर्घटना के रुप में सामने आयेगा। हमारे देश में यह सामने आ भी रहा है। जिस तरह से समाज में अलग-अलग श्रेणियां हैं, शिक्षा की भी अलग-अलग श्रेणी बन चुकी है। अलग-अलग बोर्ड इसके उदाहरण हैं।

आपकी अध्यक्षता में बने आयोग ने पूरे देश को राह दिखायी और देश में शिक्षा का अधिकार कानून बना। इस बारे में पूरी दास्तां बतायें।

आपने महत्वपूर्ण सवाल छेड़ दिया। बात पटना में ही शुरु हुई थी। मुझे एक संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया था और इसके मूल में शिक्षा थी। श्रोताओं में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं बैठे थे। मैंने अपने संबोधन में समान स्कूली शिक्षा को लेकर बातें कही थी। संगोष्ठी समाप्त हुई और मैं दिल्ली वापस चला आया। करीब एक महीने के बाद मुख्यमंत्री के सचिव का फ़ोन आया। बात हुई तो कहने लगे कि वे भी बिहार में समान स्कूली शिक्षा लागू करना चाहते हैं। यह कैसे हो और इसकी रुप रेखा कैसी हो, इसके लिए एक आयोग का गठन किया जाय। इसकी जिम्मेवारी उन्होंने मुझे दे दी। मैंने तय समयसीमा के अंदर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंप दी। मुझे विश्वास था कि मुख्यमंत्री ने जिस उच्च स्तर की संवेदनशीलता के साथ मुझे महती जिम्मेवारी सौंपी थी, वे उससे अधिक संवेदनशीलता के साथ मेरी अनुशंसाओं को लागू करेंगे। लेकिन मुझे निराशा मिली।

आपको क्या वजह लगती है इसकी?

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह सब एक साजिश के तहत किया जा रहा है। एक ऐसी साजिश, जिसका शिकार देश के मासूम बच्चे हो रहे हैं। हालांकि मुझे अभी भी विश्वास है कि कोई न कोई राह जरुर निकलेगी। मुझे तो लगता है कि शिक्षा का सवाल राजनीतिक सवाल नहीं बन पाया है। जबतक राजनेताओं को यह महसूस नहीं होगा कि इसके जरिए वे सत्ता प्राप्ति कर सकते हैं तब तक कुछ भी होना मुश्किल है।

आपको नहीं लगता कि शिक्षा से वंचितों में बहुसंख्यक दलित-पिछड़े वर्ग के बच्चे हैं और नीतीश कुमार इन्हीं जाति-वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं?

आप सही कह रहे हैं। लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा कि जबतक वंचित वर्गअपना राजनीतिक महत्व नहीं समझेगा तब तक उसके अधिकारों का हनन होता रहेगा। जिन वर्गों व जाति-समुदायों की बात आप कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि समान स्कूली शिक्षा लागू नहीं कर सरकारें उनके साथ कितना अहित कर रही हैं।

आपको तो बहुत खुशी हुई होगी जब बिहार सरकार ने न सही, केंद्र सरकार ने देश में शिक्षा का अधिकार कानून बनाया?

government-schoolखुशी तो नहीं लेकिन इस बात पर इत्नीमिनान जरुर हुआ कि बात कुछ आगे बढी है। असल में पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने इसे चुनावी हथियार के रुप में इस्तेमाल किया। इसमें समान स्कूली शिक्षा वाली बात ही नहीं है। सरकार के कानून में ही पांच-छह तरह के स्कूलों की बात है। इनमें केंद्रीय विद्यालय, सरकार संपोषित विद्यालय, जवाहर नवोदय विद्यालय आदि। इसके अलावा इस कानून में जो सबसे बड़ी खामी थी कि इसके वित्तीय पक्ष को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया गया। जबकि मैंने अपनी रिपोर्ट में पूरी बात कही। इसके
क्रियान्वयन से लेकर इसके वित्त तक। इसमें और भी कई खामियां हैं। सबसे बड़ी खामी तो यह कि इसमें नेबरहूड (इसका हिन्दी शब्द मेरे जेहन में नहीं है अभी) का सिद्धांत नहीं है। एक बार की बात बताऊं कि मेरी प्रतिनियुक्ति लंदन में हुई थी और मैं लंदन के जिस इलाके में रहता था, वहां नशीली दवाओं आदि का कारोबार होता था। मैं चाहता था कि मेरे बच्चे (तब मेरी एक बेटी पांचवीं या छठी कक्षा में थी और पहली या दूसरी में) क्रामवेल के इलाके के स्कूल में पढें। लेकिन स्कूल के प्रिंसिपल ने साफ़ कह दिया कि यहां हर स्कूल का नेबरहूड निर्धारित है। आपके बच्चे इसी स्कूल में पढेंगे। इस मामले में देश के पीएम तक आपकी मदद नहीं कर सकते हैं। जब अपने देश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ तो इसमें इसका अभाव है। इससे समान स्कूली शिक्षा का मूल सिद्धांत समाप्त हो जाता है। जब एक इलाके के सभी बच्चे एक साथ एक ही स्कूल में नहीं पढेंगे तब शिक्षा समान कैसे होगी। लेकिन एक बात जिसको लेकर मेरे मन में उम्मीद जगी वह यह कि इस कानून में समयसीमा का उल्लेख किया गया। मैंने अपनी रिपोर्ट में यही बात कही थी। समय सीमा तय होनी चाहिए। लेकिन यह भी सही है कि समय सीमा निर्धारित किये जाने के बावजूद समय सीमा का अनुपालन नहीं किया गया है। आज देश में समान स्कूली शिक्षा की कोई बात नहीं करता है।

क्या आपको नहीं लगता है कि आरटीई में 25 फ़ीसदी गरीब बच्चों के दाखिले को यदि आर्थिक आधार के बदले सामाजिक आधार बनाया गया होता तो यह अपेक्षाकृत अधिक प्रभावकारी ढंग से लागू हुआ होता?

आपका सवाल अत्यंत ही महत्वपूर्ण है। मैं तो हमेशा से इसके खिलाफ़ हूं। 25 फ़ीसदी ही क्यों, सभी बच्चों को शिक्षा मिले। यह प्रावधान कर सरकार ने तो पूरे समान स्कूली शिक्षा के सिद्धांत को ही तबाह कर डाला। गुणवत्ता युक्त शिक्षा पर सभी बच्चे का अधिकार है। फ़िर चाहे वह गरीब हो या अमीर। चाहे इस वर्ग का हो या उस वर्ग का। बच्चों में यह विभेद गलत है। इसका विरोध किया जाना चाहिए।

शिक्षा का अधिकार कानून को लेकर मौजूदा केंद्र सरकार को आप कितना संवेदनशील मानते हैं?

कांग्रेस की सरकार इसके लिए प्रतिबद्ध नहीं थी। उसने इसे चुनावी हथियार के रुप में इस्तेमाल करने की चेष्टा की। लेकिन यह बात जरुर कहूँगा कि उसने आधारभूत संरचनाओं के विकास को तवज्जो दिया था। इस कारण बहुत सारे स्कूलों में शौचालयों और भवनों आदि का निर्माण हुआ। लेकिन वास्तविक अर्थों में जो होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। वहीं आज की केंद्र सरकार ने तो इसकी हत्या ही कर दी है। शिक्षा के क्षेत्र में कटौती एक बड़ा सवाल तो है ही। साथ ही सबसे बड़ा संकट यह है कि केंद्र सरकार अधिक से अधिक स्कूल खोलने की बजाय स्कूलों को बंद करवा रही है। उनका तर्क है कि जहां बच्चे कम हैं, उन स्कूलों को बंद करके बड़े स्कूलों में विलय कर दिया जाय। इस आधार पर राजस्थान में दो लाख से अधिक स्कूल बंद किये जा चुके हैं।

आखिरी सवाल, क्या आपको विश्वास है कि आपका सपना पूरा होगा?

जबतक जिंदा हूं, सपना तो देखूंगा। अभी हमलोगों ने सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है। हम इस मामले को लेकर न्यायपालिका का ध्यान आकृष्ट करेंगे कि किस तरह बड़ी आबादी को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है। अभी इस क्रम में कई और बैठकें होनी हैं। जल्द ही हम इस दिशा में काम करेंगे।

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