बच्चे नहीं होते किशोर

किशोर आपकी तब ही सुनेंगे, जब आप उनकी सुनेंगे। अगर उन्हें ऐसा लगेगा कि आप उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास नहीं कर रहे हैं तो वे आपकी बात नहीं सुनेंगे। यद्यपि किशोर, वयस्कों की तरह व्यवहार करने का प्रयास करते हैं परंतु वे न तो वयस्क होते हैं और ना ही बच्चे

किशोरों के लिए जि़ंदगी शायद इतनी कठिन कभी न थी, जितनी कि इस दौर में है। सामाजिक दबाव पहले से कहीं ‘यादा और पहले से कहीं अधिक विनाशकारी हैं। अभिभावक अक्सर किशोरवय के अपने बच्चों को यह समझा पाने में स्वयं को असहाय पाते हैं कि वे क्षतिकारक रिश्तों, दृष्टिकोणों और आचरण से कैसे बच सकते हैं। किशोरों का अभिभावकत्व, विशेषकर जब हमारा सामना विद्रोह से हो, सख्ती व दृढ़ता, दोनों की मांग करता है।

familyकिशोर अपने लिए स्वयं सोचना शुरू कर देते हैं, जिससे ऐसा लगता है कि वे अहंकारी हो गए हैं। ऐसा विशेषकर तब होता है जब उन्होंने उसके पहले कभी अपने माता-पिता के निर्णयों पर कोई प्रश्न न उठाए हों। युवा मामलों के विशेषज्ञ टिम सेनफोर्ड का कहना है कि माता-पिता को यह एहसास होना चाहिए कि बच्चे जो भी करते हैं, उसके पीछे कोई न कोई कारण होता है। वे कहते हैं कि अक्सर माता-पिता किशोरों के व्यवहार के पीछे के असली कारण को जानते ही नहीं हैं। वे कहते हैं, ”ईश्वर ने हमें अराजक नहीं बनाया है इसलिए हमारा व्यवहार (विद्रोही व्यवहार भी), किसी न किसी कारण से उपजता है। अत: यह महत्वपूर्ण है कि हम बाह्य व्यवहार या दृष्टिकोण के पीछे के असली कारण को समझें।” चाहे मसला बड़ों का सम्मान करने जैसे आधारभूत सिद्धांत से जुड़ा हो या खतरों से भरे व्यवहार जैसे जटिल मसलों से, माता-पिता अक्सर युवाओं की स्वायत्तता की चाहत को विद्रोह के रूप में देखने लगते हैं। जो विद्रोह प्रतीत होता है, वह, दरअसल, केवल अधिक स्वतंत्रता पाने की इच्छा का प्रगटीकरण होता है।
बच्चों को अपने ढंग से अपना काम करने का मौका चाहिए होता है। उन्हें अपने उभरते हुए अनूठे व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करने का माध्यम चाहिए होता है। अपने बच्चे की इस आवश्यकता को पहचानिए। आपको उससे संवाद का एक नया तरीका ढूंढना होगा जिससे उसकी स्वतंत्रता और आपके अधिकारों के बीच संतुलन रहे।

किशोरों संबंधी सुनहरे नियम

1. अपने बच्चे से संवाद करें

जब बच्चे स्वतंत्र रूप से सोचना शुरू करें तब उन्हें दोस्ताना और प्रेमपूर्ण ढंग से अपनी बात समझाने के लिए समय निकालिए। अगर आप अपने अधिकार का इस्तेमाल कर उन्हें आपकी बात सुनने पर मजबूर करेंगे तो वे शायद इससे बचने की कोशिश करें। यह महत्वपूर्ण है कि उनसे बातचीत के दौरान आप अपने दिमाग को शांत बनाए रखें। बच्चे के दृष्टिकोण को सम्मान से सुनें। जब आपको उनका दृष्टिकोण गलत लगे, तब उसे गलत बताएं परंतु सौम्यता से। कोई समस्या उत्पन्न होने से पहले, बातचीत करें न कि संकट के समय। आपका ज़ोर आपके अपने बच्चों के साथ परस्पर विश्वास के रिश्ते बनाने पर होना चाहिए। विश्वास का यह रिश्ता तब तक कायम नहीं हो सकता जब तक कि अभिभावक हमेशा अपने आप को सही मानना बंद न कर दें। जो अभिभावक हमेशा जीतना चाहते हैं, वे अंतत: रिश्ते को ही खो बैठते हैं।

2. अपनी भावनाओं को ईमानदारी से व्यक्त करें

आपका बच्चा आपको समझे, इसके लिए उसे इस बात का एहसास करायें कि जब वह आपकी नहीं सुनता तो आपको कितनी व्यथा होती है। उन्हें ईमानदारी से यह बताएं कि किसी मुद्दे पर आप वैसा क्यों सोचते हैं, जैसा आप सोचते हैं। जब उन्हें आपकी निराशा का असली कारण पता चल जाएगा तब उन्हें कुछ समझाना आसान होगा। उनसे कहिए, ”जब तुम मेरी बात नहीं सुनते तो मुझे बहुत निराशा होती है…”।

3. उन्हें सम्मान दीजिए, दबाइए नहीं

ऐसे शब्दों का प्रयोग मत कीजिए जिससे बच्चा अपमानित या छोटा महसूस करे। अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करना अपरोक्ष रूप से यह कहना है कि वे अच्छे नहीं हैं।

4. व्यावहारिक नियम बनाइए
अभिभावकों को यह ध्यान रखना चाहिए कि वे अनौचित्यपूर्ण या अनावश्यक नियम बनाकर अपने बच्चों को न खिजाएं। महत्वपूर्ण मुद्दों पर नियम बनाएं परंतु उन्हें लचीला रखें ताकि बच्चों को उन नियमों के पालन में असफल होने का मौका उपलब्ध रहे। ऐसी अपेक्षा न करें कि वे हमेशा सब कुछ एकदम ठीक करेंगे। अगर आप उनसे अनौचित्यपूर्ण व कठोर अपेक्षाएं रखेंगे तो वे विद्रोह पर उतारू हो जाएंगे। जो नियम आप बनाएं उन्हें प्रेमपूर्वक और मृदुलता से लागू करें। गलतियां होने दें। उन्हें इस बात के लिए प्रोत्साहित करें कि वे अपनी गलतियों से सीखें और आगे बढ़ें। अवज्ञा के परिणामों से उन्हें वाकिफ करवाने में हिचकिचाएं न और जब चेतावनी के बाद भी वे अवज्ञा करें, तब उन्हें उसका परिणाम भुगतने दें

5. उनके साथियों के ज़रिए उन्हें समझें

किशोरों के लिए उनके मित्र बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। उनके ऐसे मित्रों से जान-पहचान रखें, जिनका उनपर गहरा प्रभाव है। वे अपने मित्रों की सलाह को अपने अभिभावकों की सलाह से अधिक गंभीरता से लेते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके अभिभावक, उनकी दुनिया को नहीं समझते। बच्चों को उनके मित्रों के बारे में बातचीत करने और उन्हें आपके घर लाने के लिए प्रोत्साहित करें। अगर आपको लगे कि आपका बच्चा गलत सोहबत में फंस गया है तब भी, तुरंत उसके मित्रों की कटु आलोचना न करें। बिना गुस्सा दिखाए अपने बच्चे को यह समझाएं कि कैसे उसे गलत रास्ते पर ले जाया जा रहा है।

6. उनसे सीखने के लिए तैयार रहें 

किशोर आपकी तब ही सुनेंगे, जब आप उनकी सुनेंगे। अगर उन्हें ऐसा लगेगा कि आप उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास नहीं कर रहे हैं तो वे आपकी बात नहीं सुनेंगे। यद्यपि किशोर, वयस्कों की तरह व्यवहार करने का प्रयास करते हैं परंतु वे न तो वयस्क होते हैं और ना ही बच्चे। अगर आप उनके साथ वयस्कों की तरह व्यवहार कर सकें तो वे आपसे ज्यादा खुलकर बात करेंगे। जहां तक जानकारियों का सवाल है, आजकल के बच्चे अक्सर अपने माता-पिता से ज्यादा जानते हैं। इससे आपको ऐसा लग सकता है कि वे अहंकारी हो गए हैं। अगर आप चाहते हैं कि वे आपसे सीखें तो आप भी उनसे सीखने के लिए तैयार रहें।

सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आप ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको अच्छा अभिभावक बनने की राह दिखलाए। मैं तो चाहूंगा कि आप रोज़ बच्चे के लिए प्रार्थना करें और इसके लिए भी कि आपको अपने बच्चे से व्यवहार करने का सही तरीका मिले। इससे निश्चित तौर पर बच्चे की जिंदगी पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
इस तरह के संवाद से आपके बच्चे को लगेगा कि आप उसके दृष्टिकोण को जानने में दिलचस्पी रखते हैं और उसे समझने का प्रयास कर रहे हैं। स्वतंत्रता और अधिकार का संतुलन कायम करने का यही तरीका है।
यह संकल्प लें कि आप कभी हार न मानेंगे। इसी क्षण यह तय करें कि आप अपने किशोरवय के बच्चे के लिए हमेशा उपलब्ध रहेंगे। चाहे आप कितने ही गुस्से में, तनावग्रस्त, कुंठित, निराश या थके हुए हों, यह कोशिश करें कि आप अच्छे से अच्छा पिता या माता बन सकें। अगर आपका बच्चा किशोरवय का है या होने वाला है तो यह निर्णय करें कि आप अपने लड़के या लड़की का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे।

(फारवर्ड प्रेस के फरवरी, 2016 अंक में प्रकाशित )


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