एक अधिनायकवादी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की ओर

यदि संविधान (123वां संशोधन) विधेयक कानून बन जाता है तो राज्य सरकारें किसी भी वर्ग को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा घोषित करने के अपने संवैधानिक अधिकार से वंचित हो जाएंगी

 मार्च 2017 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में आयोजित मंत्रिमंडल की बैठक में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिए जाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी गई। इस महीने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार ने इस शक्तिशाली आयोग की स्थापना का रास्ता साफ करने के लिए संसद में एक विधेयक पेश किया। इस विधेयक को लोकसभा की स्वीकृति मिल गई परंतु राज्यसभा ने इसे पारित नहीं किया। बिल की उपयोगिता पर न्यायमूर्ति एके राजन का विश्लेषण  – संपादक

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रेम्से मेकडोनल्ड ने 16 अगस्त, 1932 को कम्युनल अवार्ड की घोषणा की, जिसके अंतर्गत भारतीय विधानमंडलों में सीटों को विभिन्न समुदायों के बीच बांट दिया गया। गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1935 के द्वारा इस अवार्ड को लागू किया गया। जातियों की एक सूची बनाई गई और इन जातियों को केन्द्रीय विधानमंडल में आरक्षण दिया गया। इस सूची को 1935 के अधिनियम में अनुसूची के रूप में जोड़ा गया इसलिए ये जातियां अनुसूचित जातियां कहलाईं। यही सूची कुछ नई जातियों के साथ अब भारतीय संविधान का भाग है। अनुसूचित जातियों की पहचान और उनके सदस्यों की गणना लगभग एक सदी पहले कर ली गई थी। यही कारण है कि आज अनुसूचित जातियां आसानी से चिन्हित की जा सकती हैं। सन् 1935 में अनुसूचित जातियों और जनजातियों की पहचान करने का काम समाप्त हो गया था। परंतु ‘पिछड़ी जातियों’ की गिनती या पहचान नहीं की गई। किसी भी राज्य में वहां की सभी पिछड़ी जातियों की संपूर्ण सूची उपलब्ध नहीं है। देश में हजारो पिछड़ी जातियां हैं और हर राज्य में ऐसी जातियों की संख्या सैकड़ों में है। संविधान के अनुच्छेद 15 (4) के अनुसार पिछड़ी जातियां आरक्षण के लिए पात्र नहीं हैं। केवल ‘सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग’ के नागरिक ही इसके लिए पात्र हैं। चूंकि संविधान में ‘सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग’ को परिभाषित नहीं किया गया है और चूंकि इस तरह के समुदायों की पहचान करना एक मुश्किल कार्य है, इसलिए उच्चतम न्यायालय ने मंडल आयोग की सिफारिशों पर अपने निर्णय में भारत सरकार को यह निर्देश दिया कि वह एक स्थायी राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना करे जो भारत सरकारए उसके अधीन और उसके नियंत्रण में अन्य प्राधिकारियों में पदों पर नियुक्ति के लिए सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करे (मंडल निर्णय केवल केन्द्र सरकार के अधीन नियोजन के संबंध में है)।

संघीय ढांचे का तिरस्कार

उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों को यह निर्देश दिया कि वे राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग बनाएं ताकि यह आयोग राज्य सरकार उसके अधीन व उसके नियंत्रण में अन्य प्राधिकारियों में पदों पर नियुक्ति में आरक्षण देने के लिए सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करे। चूंकि सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान एक न्यायिक कार्य है इसलिए उच्चतम न्यायालय ने यह निर्देश भी दिया कि इस तरह के आयोगों का अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय का वर्तमान अथवा पूर्व न्यायाधीश होना चाहिए।

अनुसूची में शामिल किसी जाति का व्यक्ति पूरे देश में अनुसूचित जाति का सदस्य माना जाता है परंतु यदि किसी व्यक्ति की जाति उसके राज्य में सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में शामिल हो तब भी यह आवश्यक नहीं है कि उसकी जाति राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग या अन्य राज्य आयोगों की सूचियों में भी शामिल हो। तमिलनाडु में कई ऐसे सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग हैं जो भारत सरकार की सेवाओ में आरक्षण के पात्र नहीं हैं। कई मामलों में राज्य के अंदर भी किसी जाति को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा वर्ग तभी माना जाता है जब उसके सदस्य किन्हीं विशिष्ट जिलों के रहनेवाले हों। इसलिए किसी जाति को पिछड़े वर्ग की सूची में रखने या न रखने के बारे में सही निर्णय लेने में केवल संबंधित राज्य का पिछड़ा वर्ग आयोग ही सक्षम है। तमिलनाडु में सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में से कुछ को अति पिछड़ा वर्ग का दर्जा दिया गया है। कुछ राज्यों में सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को चार श्रेणियों में बांटा गया है। इससे यह साफ है कि सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश क्यों दिया था कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग केवल भारत सरकार या उसके अधीन  या उसके नियंत्रण में अन्य प्राधिकारियों में नियुक्तियों में आरक्षण के लिए सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान कर सकेगा। दूसरे शब्दों में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग राज्य सरकार या उसके अधीन या उसके नियंत्रण वाले प्राधिकारियों में सृजित पदों पर नियुक्तियों में आरक्षण के लिए सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान नहीं कर सकता।

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग व राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने क्रमशः अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों का कोई उप वर्गीकरण नहीं किया है। यह इस तथ्य के बावजूद कि कुछ अनुसूचित जातियां अन्य ऐसी जातियों से तुलनात्मक रूप से पिछड़ी हैं। तमिलनाडु ने उप वर्गीकरण कर अनुसूचित जातियों के भीतर अरूणथंथियार नामक उपश्रेणी का निर्धारण किया है, जिसके अंतर्गत मडीगाओं लिए तीन प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है। इस निर्णय को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है। यद्यपि मडीगाओं के लिए अलग कोटे की मांग कई राज्यों में अनेक वर्षों से की जा रही है परंतु राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने इसे अब तक स्वीकार नहीं किया है।

भारत सरकार द्वारा मांग की गलत व्याख्या

जब राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की स्थापना के बाद यह सामने आया कि सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की सूची में किसी जाति का नाम जोड़ने या घटाने के अतिरिक्त आयोग के पास कोई अन्य शक्ति नहीं है तभी से यह मांग उठने लगी कि आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया जाए, जैसा कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के मामलों में किया गया है। यह मांग की गई कि संविधान संशोधन कर उसमें अनुच्छेद 338 की तरह का एक नया अनुच्छेद जोड़ा जाए। परंतु भारत सरकार ने इस मांग को ठीक से नहीं समझा और उसकी गलत व्याख्या की।

भारत सरकार ने संविधान (123वां संशोधन) विधेयक संसद में प्रस्तुत कर दिया, जिसके जरिए एक नया अनुच्छेद 338बी संविधान में जोड़ा जाना है। यह अनुच्छेद 338 (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग) व 338ए (राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग) के समान है, सिवाय उपखण्ड (5सी) के। इस उपखण्ड में कहा गया है कि “अनुसूचित जातियों के सामाजिक आर्थिक विकास की योजना बनाने की प्रक्रिया में भाग लेने और सलाह देने हेतु”। परंतु 338बी (राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग) में जो शब्द इस्तेमाल किए गए हैं वे हैं, “सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के सामाजिक-आर्थिक विकास के संबंध में सलाह देने हेतु”। यह एक जानबूझकर किया गया और महत्वपूर्ण अंतर है। इसका नतीजा यह होगा कि प्रस्तावित राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की शक्तियां राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग या राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के समकक्ष नहीं होंगी।

अनुच्छेद 341 राष्ट्रपति को अनुसूचित जातियों को निर्दिष्ट करने का तथा अनुच्छेद 342 अनुसूचित जनजातियों को निर्दिष्ट करने का अधिकार देता है। इसी तरह का प्रावधान एक नए अनुच्छेद 342 ए में प्रस्तावित है, जिसमें राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि वे “उन सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को निर्दिष्ट करेंगे, जो इस संविधान के उद्देश्यों के लिए संबंधित राज्य में सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग माने जाएंगे”। यह प्रावधान बहुत साधारण दिखलाई पड़ता है परंतु यदि यह प्रभावी होता है तो इससे सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों और अन्य पिछड़े वर्गों को बहुत नुकसान होगा।

इसी तरह अनुच्छेद 366 में भी एक संशोधन प्रस्तावित है। इस अनुच्छेद में एक नया उपखण्ड (26 सी) जोड़ा जा रहा है जो यह कहता है कि “सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों से आशय है इस संविधान के अनुच्छेद 342ए में वर्णित पिछड़े वर्ग”। अनुच्छेद 342ए व 366 (26सी) को एक साथ पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाएगा कि 123वें संवैधानिक संशोधन के बाद केवल केन्द्र सरकार को यह तय करने का अधिकार होगा कि कोई जाति सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी है या नहीं। यह भारत के संघीय ढांचे के साथ खिलवाड़ है। इस संशोधन के बाद राज्य सरकारें अपने ही नागरिकों की न्यायपूर्ण मांगों को पूरा नहीं कर पाएंगी।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग से सबक

तमिलनाडु में एक घुमन्तु जनजाति है जिसका नाम है ‘नारि-कुरवा’। इसे तमिल में कुरूविकरन भी कहा जाता है। इस जनजाति का पहला व्यक्ति (एक महिला) सन् 2010 में स्नातक बना। इससे यह स्पष्ट है कि यह जनजाति कितनी पिछड़ी हुई है। तमिलनाडु सरकार लंबे समय तक यह कोशिश करती रही कि इस जनजाति को अनुसूचित जनजातियों की सूची में शामिल कर लिया जाए परंतु वह सफल नहीं हुई। अंततः राज्य सरकार को उसे सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों में शामिल करना पड़ा। इससे यह स्पष्ट है कि किसी राज्य सरकार के लिए किसी वंचित समुदाय के साथ न्याय करना कितना मुश्किल होता है, यदि इस संबंध में सारे अधिकार किसी राष्ट्रीय आयोग (इस मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग) के हाथों में केन्द्रित हों।

प्रस्तावित अनुच्छेद 338बी का खण्ड (2) कहता है, “इस संबंध में संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के प्रावधानों के अधीन आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व तीन अन्य सदस्य होंगे और अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व अन्य सदस्यों की सेवाशर्तें व कार्यकाल वही होगा, जो राष्ट्रपति नियम द्वारा निर्धारित करेंगे”। इस वाक्य के पहले हिस्से से यह स्पष्ट है कि आयोग के ढांचे, जिसमें अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्तियां शामिल हैं, के निर्धारण के लिए संसद को कानून बनाना होगा। ऐसा इसलिए चूंकि अध्यक्षए उपाध्यक्ष व अन्य सदस्यों की नियुक्ति के लिए पात्रताएं अनुच्छेद 338 (बी) में निर्धारित नहीं की गई हैं। इस संबंध में राष्ट्रपति द्वारा बनाए जाने वाले नियम पर्याप्त नहीं होंगे।

ऐसा कानून राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम 1993ए (अधिनियम क्रमांक 27, 1993)- उच्चतम न्यायालय के मंडल निर्णय में दिए गए निर्देशानुसार अधिनियम क्रमांक 70, 2017 के द्वारा निरसित किया जा चुका है। दरअसल इस पूरे अधिनियम के निरसन की आवश्यकता नहीं थी। केवल “अध्याय 3ए आयोग की शक्तियां एवं कृत्य” को ही निरसित किया जाना था। स्पष्टतः भारत सरकार उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को इस आयोग का अध्यक्ष बनाना चाहती है। इस तरह की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय के आदेश की आत्मा का हनन होगा। इसके अतिरिक्त प्रस्तावित अनुच्छेद 342ए राज्य सरकारों को उनके उन अधिकारों से वंचित कर देगा, जिनका उपयोग वे वर्षों से करती आ रही हैं। इस अनुच्छेद के लागू होने के बाद राज्य अपनी ओबीसी की सूची में न तो किसी सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग का नाम जोड़ सकेंगे और न हटा सकेंगे। यह अधिकार केवल केन्द्र सरकार को होगा। इससे राज्य सरकारों की सूचियों में से सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े कई वर्ग हट जाएंगे। इस संशोधन के कानून का रूप लेते ही विभिन्न राज्यों में आरक्षण का लाभ ले रहे कई सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को यह लाभ मिलना बंद हो जाएगा। यह कहना भी मुश्किल है कि अति पिछड़ा वर्ग व पिछड़ा वर्ग जैस उप-वर्गीकरण, जो कि तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश जैसे कई राज्यों में किए गए हैं, बने रहेंगे या नहीं। इस तरह अति पिछड़े वर्ग की श्रेणी ही खतरे में पड़ जाएगी। इससे अकेले तमिलनाडु में 150 अति पिछड़े समुदायों का विकास बाधित होगा। सभी राज्यों को मिलाकर ऐसे समुदायों की संख्या सैंकड़ों में होगी। यह सब इसलिए क्योंकि प्रस्तावित अनुच्छेद 342 (1) कहता है कि राष्ट्रपति उन सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को विनिर्दिष्ट करेंगे जो उस राज्य के संबंध में सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग माने जाएंगे”।

रास्ता है  

इस खतरे या दुष्प्रभाव को दूर करने के लिएए अनुच्छेद 342ए (1) को निम्नानुसार संशोधित किया जाना चाहिएः

राष्ट्रपति किसी राज्य या संघ शासित प्रदेश, और जहां वह राज्य है, वहां के राज्यपाल के अनुरोध पर भारत सरकार,  या भारत सरकार के अधीन अन्य प्राधिकारों, या भारत सरकार के नियंत्रण वाले प्राधिकारों में पदों या केन्द्रीय शैक्षणिक संस्थानों में सीटों में आरक्षण के प्रावधान करने के प्रयोजन से सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को विनिर्दिष्ट कर सकेंगे”।

अनुच्छेद 342ए (2) को निम्नानुसार संशोधित किया जा सकता हैः

“राष्ट्रपति राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह परए सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की केन्द्रीय सूची, जो खंड (1) के अंतर्गत जारी अधिसूचना में निर्दिष्ट की जाएंगी, में से किसी जाति को हटा या उसमें जोड़ सकेगा।

इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 342ए (3) जोड़ा जा सकता है, जो निम्नानुसार होगाः

“किसी राज्य का राज्यपाल, उस राज्य सरकार या राज्य सरकार के अधीन प्राधिकारियों या राज्य सरकार के नियंत्रण वाले प्राधिकारों में पदों व राज्य में स्थित शैक्षणिक संस्थाओं में सीटों में आरक्षण के प्रावधान करने के प्रयोजन से सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा।”

इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 342ए (4) भी जोड़ा जा सकता है जो इस प्रकार होगाः

“राज्यपाल राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह पर खंड (3) के अंतर्गत जारी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की राज्य सूची में किसी वर्ग को जोड़ सकेगा या उसमें से किसी वर्ग को हटा सकेगा।”

केवल इस तरह का संशोधन ही संघवाद की अवधारणा के अनुरूप होगा और सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछडे़ सभी वर्गों के हितों की रक्षा कर सकेगा। यह याद रखा जाना चाहिए कि भारत एकात्मक देश नहीं है बल्कि राज्यों का संघ है। राज्यों की शक्तियों और उनकी भावनाओं का सम्मानए संघीय ढांचे का महत्वपूर्ण तत्व है और इससे ही भारत की एकता और अखंडता बनी रह सकेगी।

अगर संविधान 123वां संशोधन विधेयक बिना उपरोक्त संशोधनों के कानून बन जाता है तो राज्य किसी वर्ग को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ा वर्ग घोषित करने के अपने संवैधानिक अधिकार व शक्ति से वंचित हो जाएंगे। प्रस्तावित संशोधन मंडल निर्णय में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के भी खिलाफ है। अनुच्छेद 342ए अपने वर्तमान स्वरूप में संघवाद की अवधारणा का उल्लंघन करता है। अगर राज्यों ने अपने अधिकारों की रक्षा नहीं की तो वे उन्हें खो बैठेंगे। इसके अतिरिक्त कई राज्यों में सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग भी अपना यह दर्जा खो देंगे।

संसद में पेश हुए बिल यहाँ पे देखे :

विधेयक क्रमांक 17, 2017परिवर्तन के सुझाव

 
338ख, खण्ड 3 :

संविधान के अनुच्छेद 338क के पश्चात निम्नलिखित अनुच्छेद अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थातः- ‘‘338ख (1) सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग नामक एक आयोग होगा। (2) संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अध्यधीन, आयोग में एक अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होंगे तथा इस प्रकार नियुक्त अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा की शर्तें और पदावधि ऐसी होगी जो राष्ट्रपति नियमों द्वारा अवधारित करें। (3) आयोग के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य, राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा नियुक्त किए जाएंगे।”
338ख, खण्ड 3 के उपखण्ड 2 को इस प्रकार परिवर्तित किया जाना चाहिए :

‘‘संसद द्वारा इस निमित्त बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अध्यधीन, आयोग में एक अध्यक्ष, जो कि उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश होगा, एक उपाध्यक्ष और तीन सदस्य, जिनमें से एक समाज विज्ञानी और दो अन्य इस विषय का ज्ञान रखने वाले व्यक्ति होंगे।”

स्पष्टीकरणः

उच्चतम न्यायालय का इंदिरा साहनी प्रकरण में दिया गया निर्णय, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन का आधार है। इस निर्णय में यह कहा गया था कि किसी आयोग या ट्रिब्यूनल की शक्ल में एक स्थायी संस्था होनी चाहिए, जिसके समक्ष अन्य पिछड़ा वर्गों की सूची में किसी समूह, वर्ग या तबके के गलत शामिल किए जाने या शामिल न किए जाने की शिकायत की जा सके। इस संस्था में आधिकारिक व गैर-आधिकारिक विषय विशेषज्ञ होने चाहिए और उसे उचित व प्रभावकारी जांच करने के लिए आवश्यक शक्तियां दी जानीं चाहिए। इसके प्रकाश में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम में यह प्रावधान किया गया है कि इसका अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश होगा ताकि आयोग का दृष्टिकोण और परिप्रेक्ष्य न्यायिक रहे। सदस्य सचिव भारत सरकार का सचिव स्तर का सेवानिवृत्त अधिकारी होना चाहिए एक सदस्य समाजविज्ञानी होना चाहिए और अन्य दो सदस्यों को सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के संबंध में ज्ञान और जानकारी होनी चाहिए। प्रस्तावित विधेयक में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के विपरीत, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को विशेषज्ञों की संस्था का स्वरूप नहीं दिया गया है। इस संस्था का गठन उच्चतम न्यायालय द्वारा यथानिर्देशित विषय विशेषज्ञों की संस्था के रूप में किया जाना चाहिए और उसमें विकास की प्रक्रिया में भूमिका निभाने की क्षमता व विशेषज्ञता होनी चाहिए।

 

 

 

 
338ख, खण्ड 3 उप-खण्ड (ग)

आयोग के निम्नलिखित कर्तव्य होंगेः ‘‘(ग) सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के सामाजिक-आर्थिक विकास के संबंध में सलाह देना तथा संघ और किसी राज्य में उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।

 

 
338ख, खण्ड 3 उप-खण्ड (ग)

को निम्नानुसार परिवर्तित किया जाना चाहिएः

आयोग के निम्नलिखित कर्तव्य होंगेः ‘‘(ग) सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए योजना बनाने की प्रक्रिया में भाग लेना और उसके संबंध में सलाह देना व संघ और किसी राज्य में उनके विकास की प्रगति का मूल्यांकन करना।’’

(यह राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग अधिनियम के अनुच्छेद 338 और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग अधिनियम के अनुच्छेद 338-अ के उपखंड (ग) की तरह है जिनमें यह कहा गया है कि ‘‘अनुसूचित जाति (अनुसूचित जनजाति) के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए योजना बनाने की प्रक्रिया में भाग लेना और उसके संबंध में सलाह देना)
338ख, खण्ड 3, उप-खण्ड 9 : संघ और प्रत्येक राज्य सरकार, सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को प्रभावित करने वाले सभी मुख्य नीति विषयक मामलों पर आयोग से परामर्श करेंगी।338ख, खण्ड 3, उप-खण्ड 9 को विलोपित कर दिया जाना चाहिए और सामाजिक व शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करने का अधिकार राज्य सरकारों के पास रहना चाहिए।
338ख, खण्ड 4 : संविधान के अनुच्छेद 342 के पश्चात निम्नलिखित अनुच्छेद अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थातः-

‘‘342क (1) राष्ट्रपति, किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में और जहां कोई राज्य है, वहां उसके राज्यपाल से परामर्श के पश्चात लोक अधिसूचना द्वारा सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से ऐसे पिछड़े वर्गों को विनिर्दिष्ट करेगा, जो इस संविधान के प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति, उस राज्य या संघ राज्य क्षेत्र के संबंध में सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ा वर्ग होने के रूप में समझे जाएंगे।

 

‘‘342क (2) संसद विधि द्वारा खंड (1) के अधीन जारी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की केन्द्रीय सूची में या उससे किसी सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग को सम्मिलित या अपवर्जित कर सकेगी, परंतु पूर्वाक्त के सिवाए उक्त खंड के अधीन जारी किसी अधिसूचना में किसी पश्चातवर्ती अधिसूचना द्वारा परिवर्तन नहीं किया जाएगा।’’

 

 
338ख, खण्ड 4 : संविधान के अनुच्छेद 342 के पश्चात निम्नलिखित अनुच्छेद अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात :-

 

अनुच्छेद 342क(1) ‘‘राष्ट्रपति, किसी राज्य या संघ शासित प्रदेश, और जहां वह राज्य है, वहां के राज्यपाल के अनुरोध पर, भारत सरकार, या भारत सरकार के अधीन अन्य प्राधिकारियों, या भारत सरकार के नियंत्रण वाले प्राधिकारियों में पदों या केन्द्रीय शैक्षणिक संस्थानों में सीटों में आरक्षण के प्रावधान करने के प्रयोजन से सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को विनिर्दिष्ट कर सकेंगे।”

 

अनुच्छेद 342क(2) को इस प्रकार परिवर्तित किया जा सकता हैः ‘‘राष्ट्रपति, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह पर, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की केन्द्रीय सूची, जो खंड (1) के अंतर्गत जारी अधिसूचना में निर्दिष्ट की जाएंगी, में से किसी जाति को हटा या उसमें जोड़ सकेगा’’

 

 

अनुच्छेद 342क(3) जोड़ा जा सकता है, जो निम्नानुसार होगा : ‘‘किसी राज्य का राज्यपाल, उस राज्य सरकार या राज्य सरकार के अधीन प्राधिकारियों या राज्य सरकार के नियंत्रण वाले प्राधिकारियों में पदों व राज्य में स्थित शैक्षणिक संस्थाओं में सीटों में आरक्षण के प्रावधान करने के प्रयोजन से, सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को विनिर्दिष्ट कर सकेगा’’।

 

 

अनुच्छेद 342क(4) जोड़ा जा सकता है जो इस प्रकार होगाः ‘‘राज्यपाल, राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की सलाह पर, खंड (3) के अंतर्गत जारी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की राज्य सूची में किसी वर्ग को जोड़ सकेगा या उसमें से किसी वर्ग को हटा सकेगा।’’

 

http://www.prsindia.org/uploads/media/Constitution%20123rd%20bill/Constitution%20%28123rd%29%20Bill,%202017-%20Hindi.pdf

 


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