एक पूर्व आईएएस अधिकारी का योगी आदित्यनाथ को खुला पत्र

पूर्व आईएएस अधिकारी पीएस कृष्णन, उत्तरप्रदेश के नवनिुक्त मुख्यमंत्री से यह अनुरोध कर रहे हैं कि वे अनुसूचित जातियों और सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की बेहतरी के प्रति अपनी घोषित प्रतिबद्धता को साबित करें

प्रिय माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी,
मैं सन् 1956 से 1990 तक आईएएस अधिकारी के रूप में और उसके पहले और बाद, लगभग सात दशकों से पूरे देश में अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) व सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) के वैध अधिकारों के लिए काम करता आ रहा हूं। मेरा आपसे यह अनुरोध है कि आप निम्न कदम उठाने पर विचार करें :
  1. पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के राज्य में निजी मेडिकल व दंत चिकित्सा महाविद्यालयों के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में एससी, एसटी व एसईबीसी के लिए की गई आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त करने के आदेश को क्रियान्वित करने के आपकी सरकार के निर्णय को रद्द करें।

यह निर्णय संविधान (93वां संशोधन) अधिनियम 2005 के उद्धेश्यों व आत्मा के विरूद्ध है। इस अधिनियम द्वारा अनुच्छेद 15 में खण्ड (5) जोड़ा गया था, जिसकी शासकीय व अनुदान प्राप्त शैक्षणिक संस्थाओं के मामले में वैधता को उच्चतम न्यायालय ने अशोक कुमार ठाकुर प्रकरण में 2008 में दिए गए अपने निर्णय में सही ठहराया। इसी तरह, इस संशोधन की निजी गैर अनुदान प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों के संदर्भ में वैधता को उच्चतम न्यायालय ने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम भारत संघ व अन्य प्रकरण में दिनांक 12 मई, 2011 और प्रमति एजुकेशनल कल्चरल ट्रस्ट व अन्य बनाम भारत संघ व अन्य प्रकरण में 6 मई 2014 को दिए गए अपने निर्णयों में सही ठहराया।

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ में आरक्षण के मूल प्रणेता आम्बेडकर की प्रतिमा पर उनकी जयंती (14 अप्रैल 2017) के अवसर पर माल्र्यापण करते हुए

आपकी सरकार का यह निर्णय श्री नरेन्द्र मोदीजी की इस घोषणा के खिलाफ है कि एससी, एसटी और एसईबीसी की उन्नति के लिए कदम उठाए जाना आवश्यक है। आपने भी मुख्यमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण करने के बाद यह कहा था कि आपकी सरकार एससी व एसईबीसी के हितों पर विशेष ध्यान देगी।

पूर्ववर्ती सरकार ने यह निर्णय अपने अंतिम दिनों में लिया था और वह एससी-एसटी व एसईबीसी के हितों के खिलाफ है। संभवतः आपकी सरकार के सत्ता में आने के बाद आपको इस निर्णय का अध्ययन करने का समय नहीं मिला और सरकारी तंत्र ने यांत्रिक ढंग से इस निर्णय को क्रियान्वित कर दिया। कृपया इस निर्णय का ध्यानपूर्वक अध्ययन करें और उसे रद्द करें।

  1. बड़ी संख्या में राज्य के विभिन्न विभागों में कार्यरत एससी व एसटी अधिकारियों को पदावनत करने के पिछली सरकार के निर्णय को रद्द करें। यह निर्णय, उच्चतम न्यायालय के सन् 2012 के फैसले के परिपालन में लिया गया था, जिसमें न्यायालय ने उत्तरप्रदेश सार्वजनिक सेवा (अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों व अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम 1994 की धारा 3(7) को रद्द कर दिया था और इस कारण राज्य सरकार के इन वर्गों के कर्मचारियों को उत्तरप्रदेश लोकसेवक नियमों के नियम 8 के तहत मिली वरिष्ठता समाप्त हो गई थी।

अगर उच्चतम न्यायालय में ठीक ढंग से पैरवी की जाती तो शायद पहले से आरक्षण के आधार पर पदोन्नत कर दिए गए अधिकारियों को इस निर्णय की परिधि से बाहर रखा जा सकता था। अब भी इस सामूहिक पदावनति को पलटने के लिए कानूनी उपाय उपलब्ध हैं। अगर आप सिद्धांततः यह निर्णय लें और अगर राज्य के प्रशासनिक तंत्र को इसे कानूनी जामा पहनाने में कठिनाई का अनुभव हो तो मैं इस संबंध में सलाह देने के लिए उपलब्ध हूं।

  1. राज्य में एससी व एसटी को पदोन्नति में आरक्षण संबंधी प्रावधान को पुनः लागू करें। इसके लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा एन नागराज प्रकरण में 2006 में जारी की गई मार्गदर्शिका के अनुरूप आंकड़ों को एकत्रित व अद्यतन करना होगा।

उच्चतम न्यायालय ने एससी व एसटी के लिए पदोन्नति में आरक्षण को रद्द नहीं किया है। यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 16 के खण्ड 4(ए) के तहत वैध है। संविधान में यह खण्ड 77वें संविधान संशोधन अधिनियम 1995 के द्वारा जोड़ा गया था। इस संशोधन और एससी व एसटी के लिए आरक्षण संबंधी तीन अन्य संशोधनों (जिन्हें वाजपेयी सरकार ने संसद से पारित करवाया था) की संवैधानिक वैधता को उच्चतम न्यायालय ने नागराज प्रकरण में 2006 में दिए गए अपने निर्णय में सही ठहराया है।

भाजपा अध्यक्ष उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार के दौरान राज्य में एक दलित के घर पर भोजन करते हुए

उत्तरप्रदेश के मामले में उच्चतम न्यायालय ने उत्तरप्रदेश सार्वजनिक सेवा (अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों व अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण) अधिनियम 1994 की धारा 3(7) और  उत्तरप्रदेश लोकसेवक नियमों के नियम 8 के तहत मिली वरिष्ठता को इसलिए रद्द किया था क्योकि तत्कालीन सरकार ने उच्चतम न्यायालय के नागराज प्रकरण में निर्णय के अनुरूप अद्यतन आंकड़े उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए थे। इस कमी को दूर कर उक्त प्रावधान पुनः लागू किए जा सकते हैं।

  1. पूर्ववर्ती सरकार द्वारा पारित उत्तरप्रदेश राजस्व संहिता (संशोधन) विधेयक 2016 को रद्द करें। यह संशोधन प्रदेश के दलितों को बिना प्रशासनिक अनुमति के अपनी भूमि गैर-दलितों को विक्रय करने का अधिकार देता है भले ही ऐसे विक्रय के बाद दलितों के पास बची भूमि 3.5 एकड़ से कम हो।

इस सुरक्षात्मक प्रावधान को समाप्त कर देने से पहले से ही भूमिहीन दलितों की स्थिति और खराब हो जाएगी। दलितों को अपनी जमीन अक्सर आर्थिक संकट के कारण बेचनी पड़ती है। यह आर्थिक संकट शिक्षा और बीमारी पर खर्च के कारण होता है।

शिक्षा पर खर्च के कारण होने वाली आर्थिक परेशानी को दूर करने के लिए अनुसूचित जातियों के बच्चों के शैक्षणिक विकास संबंधी कार्यक्रमों को ठीक से क्रियान्वित किया जाना चाहिए। इसके लिए जो कदम उठाए जा सकते हैं  उनमें शामिल हैं:

  1. वजीफों का समय से जारी किया जाना।
  2. वजीफों की राशि में समुचित वृद्धि।
  3. एससी बच्चों के लिए उच्च गुणवत्ता के रहवासी स्कूलों की स्थापना (जिनमें 25 प्रतिशत सीटें अन्य समुदायों के लिए आरक्षित हों)।

इलाज पर अधिक खर्च से होने वाले आर्थिक संकट को समाप्त करने के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढानी होगी और स्वास्थ्य बीमा ज्यादा से ज्यादा लोगों को उपलब्ध करवाना होगा।

अगर इस सबके बाद भी असाधारण परिस्थितियों में कोई दलित अपनी भूमि को बेचने के लिए मजबूर हो जाए तब ऐसी जमीनों को लैंड बैंकों द्वारा खरीदा जाना चाहिए। इन लैंड बैंकों की स्थापना सरकार को करनी होगी और ये बैंक उनके पास उपलब्ध जमीन को पात्र दलित कृषकों या कृषि श्रमिकों में बांट सकेंगी।

आपका

पीएस कृष्णन


 फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

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