उत्तर प्रदेश में भाजपा की साजिश का अनसुलझा रहस्य

आरएसएस का इतिहास जिस तरह से दूरगामी साजिशें करने का कोशिश रहा है, उसे देखते हुए अभी उसकी पूरी रणनीति का अनुमान लगा पाना कुछ कठिन है। फिलहाल, ऐसा लग रहा है कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को पूरी तरह से यह अहसास कराना चाहती है कि अब उनकी ही सरकार है, और अपने-अपने स्तर पर वो अपने विरोधियों से हर तरह से निपटकर उन्हें खत्म करें, नेस्तनाबूद करें, और ऐसा माहौल पैदा करें कि समाज भाजपा नेताओं से डरकर उनके आगे समर्पण कर दे और पूरी तरह से उनकी अधीनता स्वीकार कर ले। पढ़ें महेंद्र नारायण सिंह यादव का विश्लेषण :

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार जाने के बाद वो सब हो रहा है जिसकी उम्मीद नहीं थी। फुटकर अपराधों में तो बढ़ोतरी हुई ही है, साथ ही सुनियोजित ढंग से थानों पर हमले, पुलिस वालों की पिटाई और हत्याएँ और भगवा ब्रिगेड की समानांतर पुलिस, ये साबित करने के लिए काफी हैं कि उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था बुरी तरह से ध्वस्त हो रही है।

सहारनपुर की ताजा घटना और आम्बेडकर शोभायात्रा के दौरान हुई घटना ने ऊपर बताए मामलों के अलावा, एक और खतरनाक प्रवृत्ति की ओर इशारा किया है। आशंका ऐसी हो रही है कि भाजपा और आरएसएस खुद ही किसी दीर्घकालीन योजना के तहत हिंसा को भड़का रहा है। हालाँकि केंद्र और राज्य, दोनों जगह उसकी ही सरकार है, और कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ना उसकी क्षमता पर सवाल लगाता है, लेकिन सरकार एक अलग तरह की ही चुप्पी और निष्क्रियता ओढ़े हुए है।

आरएसएस का इतिहास जिस तरह से दूरगामी साजिशें करने का कोशिश रहा है, उसे देखते हुए अभी उसकी पूरी रणनीति का अनुमान लगा पाना कुछ कठिन है। फिलहाल, ऐसा लग रहा है कि भाजपा अपने कार्यकर्ताओं को पूरी तरह से यह अहसास कराना चाहती है कि अब उनकी ही सरकार है, और अपने-अपने स्तर पर वो अपने विरोधियों से हर तरह से निपटकर उन्हें खत्म करें, नेस्तनाबूद करें, और ऐसा माहौल पैदा करें कि समाज भाजपा नेताओं से डरकर उनके आगे समर्पण कर दे और पूरी तरह से उनकी अधीनता स्वीकार कर ले।

भाजपा को यह तो फायदा है कि अन्य भाजपा-शासित राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी कितने भी अपराध क्यों न बन जाएँ, वो मीडिया में चर्चा का विषय कभी नहीं बन पाते। थोड़ी-बहुत चर्चा होती भी है तो भी उसके मुख्यमंत्री को उस तरह से हर मामले में नहीं खींचा जाता जिस तरह से अखिलेश यादव, मायावती या लालू प्रसाद यादव को खींचा जाता है।

मीडिया के इस तरह के सहयोग से भाजपा को यह उम्मीद लगती है कि वह राज्य में खून-खराबा भी करवा लेगी और उसकी प्रशासन न संभालने की क्षमता भी कभी मुद्दा नहीं बन पाएगी।

गुजरात को जिस तरह से भाजपा ने हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनाया था, और पूरे राज्य को दंगों की आग में जलाया था, उससे भाजपा को जो लाभ हुआ, उसे देखते हुए वह उत्तर प्रदेश में भी इस तरह का प्रयोग करने की इच्छुक दिखती है। उत्तर प्रदेश गुजरात की तुलना में बहुत बड़ा प्रदेश है, ऐसे में भाजपा का साजिशों का प्रयोग अगर इस प्रदेश में सफल होता है तो वह लंबे समय तक सत्तासुख भोगने की अपेक्षा कर सकती है।

कार्यकर्ताओं को खुली छूट देने के अलावा, भाजपा का एक मकसद, ब्राह्मणों को सीधे संघर्ष से बचाते हुए, ठाकुर जैसी दबंग जाति को बढ़ावा देकर सबसे पहले दलितों के मनोबल को पूरी तरह से तोड़ना भी लगता है। इसके लिए उन पर बार-बार हमले करने की नीति भाजपा कार्यकर्ता अपना ही चुके हैं।

भाजपा का ऐसा मानना लगता है कि एक तरफ दलितों की पिटाई की जाए, कुछ ज्यादा आगे बढ़ रहे दलितों की हत्याएं की जाएँ, और पुलिस-थाने में उनकी कोई सुनवाई न हो, न ही मीडिया में कोई खबर न बने, तो कुछ दिनों में दलित टूटकर सवर्णों की गुलामी स्वीकार करने को तैयार हो जाएंगे। दलितों पर हमलों के मामले में बहुजन समाज पार्टी की जिस तरह की निष्क्रियता रहती है, उसे देखते हुए भी भाजपा को उम्मीद है कि दलित जल्द ही सरेंडर कर देंगे। इसके अलावा, दलितों की कई जातियाँ, कई पिछड़ी जातियों की तरह भाजपा के खेमे में आ ही चुकी हैं। ऐसे में बाकी दलितों को एक राह भी दिखाई जा चुकी है।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि सब कुछ भाजपा की इच्छानुसार ही होता रहेगा। दाँव कुछ उल्टा भी पड़ सकता है, और यही चिंता सबसे ज्यादा है। नब्बे के दशक के बाद अलग-अलग तरह से पिछड़ी जातियों के साथ-साथ दलितों को भी सत्ता में भागीदारी मिली है। उनमें जागरूकता भी बढ़ी है, इसलिए दलितों का सरेंडर कर देना इतना आसान भी नहीं है।

भीम आर्मी के रूप में दलितों का जो संगठन आक्रामक हो रहा है, उससे आशंका ऐसी लगती है कि अगर वंचित तबके के लिए न्याय की कोई उम्मीद न रही तो वह हिंसक संगठन भी बनाने पर मजबूर हो सकता है। ऐसा अगर हुआ तो उत्तर प्रदेश में भी बिहार की तरह निजी सेनाओं का दौर शुरू होने की प्रबल आशंका हो सकती है।

एक शक भाजपा पर यह भी जाता है कि क्या भाजपा खुद ही उत्तर प्रदेश में जातीय संघर्ष का दौर शुरू करना चाहती है। मुझे ऐसा लगता है कि भाजपा ऐसा चाहती है, लेकिन इस स्थिति से वह किस तरह का राजनीतिक और सामाजिक फायदा लेना चाहती है, यह अभी पता करना मुश्किल हो रहा है।

सहारनपुर की घटना के बाद से अब तक लगभग गुमनाम रही, और सामाजिक कार्यों में लगी रही भीम आर्मी जिस तरह से चर्चा में आई है, उससे उसके सदस्यों और नेताओं का हौंसला बढ़ना स्वाभाविक है। वंचित तबके के सदस्यों की होने के कारण उसके साथ एक सहानुभूति और समर्थन सामाजिक न्याय की बात करने वाले लेखकों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का रहना ही है। ऐसे में यह भी दिखने लगा है कि इस तरह के अन्य संगठन बनें या न बनें, लेकिन कम से कम भीम आर्मी का तो विस्तार जल्द ही पूरे राज्य में हो सकता है।

बहुजन समाज पार्टी की जमीनी मामलों में निष्क्रियता के कारण दलित आंदोलन के खाली पड़े स्पेस को भरने का मौका भीम आर्मी को दिखाई दे रहा है। ऐसे में उसकी उग्रता और आक्रामकता बढ़ सकती है, और उत्तर प्रदेश में जातीय हिंसा का दौर बढ़ सकता है।

गौ-रक्षक दल के नाम पर भाजपा केवल मुसलमानों को ही नहीं, दलितों को भी टारगेट कर रही है। ऐसे में भी आसार बन रहे हैं कि भीम आर्मी या इसी तरह के कुछ और संगठन अस्तित्व में आ जाएँ, और भाजपा की उत्तर प्रदेश को जातीय हिंसा की आग में झोंकने की साजिश पूरी हो जाए।

अभी तक राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों ने इस बारे में विचार नहीं किया है कि भाजपा इस आग का लाभ किस तरह से उठाएगी। भाजपा या संघ के किसी छोटे-बड़े नेता ने भी इस बारे में कुछ नहीं कहा है, जबकि सामान्य तौर पर कोई न कोई छुटभैया नेता मूर्खतावश भाजपा की साजिशें उजागर कर देता है। ऐसा लगता है कि ये साजिश एकदम शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर और बेहद गोपनीय तरीके से रची जा रही है, और जिन पर इनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है, उन्हें भी इस बारे में कुछ नहीं बताया जा रहा है। ऐसे में भाजपा की साजिश अभी तक अनसुलझा रहस्य ही बनी हुई है, जिस पर अमल तो दिखाई दे रहा है, लेकिन बाकी रूप-रेखा समझ नहीं आ रही है।


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