दो पाटों के बीच नर्मदा के वाशिंदे, मेधा पहुंची जेल

नर्मदा नदी के इस पार और उस पार रहने वाले फिर चाहे वे गुजरात के कच्छ के किसान हों या फिर मध्यप्रदेश के सबसे पिछड़े जिले बडवानी के, दोनों राजनीतिक पाट में पीसने को मजबूर हैं। मेधा पाटकर नर्मदा नदी पर बांध को लेकर लंबी लड़ाई लड़ती रही हैं लेकिन इस बार मामला गुजरात चुनाव के कारण भाजपा के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण बन गया है। बता रहे हैं अमरीश हरदेनिया :

बीते 10 अगस्त 2017 की शाम, नर्मदा बचाओ आंदोलन (एनबीए) की 62 वर्षीय नेता मेधा पाटकर को ‘’संज्ञेय अपराध घटित होने से रोकने के लिए’ दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के अधीन गिरफ्तार कर मध्यप्रदेश के धार जिला मुख्यालय में स्थित जेल में दाखिल करा दिया गया। साथ् ही उन पर अपहरण, शासकीय कर्मी के कर्तव्यपालन में बाधा डालने व किसी व्यक्ति को बिना सहमति के रोककर रखने के आरोप भी लगाए गए हैं।

मेधा पाटकर को गिरफ्तार करती मध्यप्रदेश की पुलिस

अब, जबकि मेधा पाटकर सींखचों के पीछे पहुंच गई हैं, मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार  नर्मदा घाटी में चल रहे आंदोलन को बेरहमी से कुचल सकती है और गुजरात स्थित सरदार सरोवर बांध के जलाशय को उसकी पूरी ऊँचाई तक भरा जा सकता है। इसके बाद, मोदी और शाह यह दावा कर सकते हैं कि उन्होंने कच्छ की झुलसी हुई भूमि को पानी उपलब्ध करवा दिया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इससे भाजपा को चार माह बाद गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनावों में भरपूर लाभ मिलेगा।

नर्मदा बचाओ आंदोलन, राज्य के धार और बड़वानी जिले के पन्द्रह हजार विस्थापित परिवारों को न्याय दिलवाने के लिए संघर्षरत है। इन लोगों को सरदार सरोवार बांध के जलाशय को पूरी ऊँचाई तक भरे जाने के बाद अपने घरबार छोड़ने पड़ेंगे। मेधा को गिरफ्तार करने के पहले, 10 अगस्त की दोपहर को सरकार ने उनके धार और बड़वानी जिले में प्रवेश पर एक वर्ष के लिए प्रतिबंध लगा दिया था।

धार के अनुविभागीय दंडाधिकारी द्वारा जारी इस आदेश को मेधा पाटकर को तब तामील किया गया, जब वे इंदौर के एक अस्पताल से छुट्टी के बाद बड़वानी की तरफ बढ़ रहीं थीं। बड़वानी के लिए रवाना होने से पहले, पाटकर ने इंदौर के एक अस्पताल में एनबीए के उन आंदोलनकारियों से भेंट भी की, जो पुलिस द्वारा उन्हें जबरदस्ती अनशन स्थल से उठाने के दौरान पुलिस को रोकने के प्रयास में घायल हो गए थे।

आदेश में कहा गया था कि ‘प्रशासन को यह जानकारी मिली है कि वे डूब क्षेत्र में जाने का प्रयास करेंगी और आंदोलनरत लोगों को उपवास या अन्य ऐसे कार्य करने के लिए उकसाएंगी, जिनसे उनका जीवन खतरे में पड़ सकता है‘। जब मेधा ने इस आशय के वचनपत्र पर हस्ताक्षर करने से इंकार कर दिया, तब उन्हें धारा 151 के तहत गिरफ्तार कर लिया गया।

यही नहीं, एनबीए के 2,530 कार्यकर्ताओं पर हिंसा करने और शासकीय सेवकों के कर्तव्यपालन में बाधा डालने के लिए मुकदमे कायम किए गए हैं। इनमें से 30 आरोपी नामजद हैं और शेष अज्ञात। इसके अतिरिक्त, 500 लोगों पर एक एंबुलेंस के चालक की शिकायत के आधार पर मुकदमा कायम किया गया है। उन पर यह आरोप है कि उन्होंने एंबुलेंस पर पत्थर फेंके। ये सभी प्रकरण धार जिले के कुक्षी थाने में 9 अगस्त को दर्ज किए गए।

इस घटनाक्रम से स्तब्ध एनबीए ने इसे ‘न्याय का प्रहसन और आंदोलन को आतंकित करने का प्रयास‘ बताया। आंदोलन ने कहा, ‘पिछले दस दिनों का घटनाक्रम, भारतीय इतिहास के एक ऐसे दौर के रूप में याद किया जाएगा जिसमें सरकार ने अपने ही लोगों को जलसमाधि देने के लिए हर संभव प्रयास किए‘।

चार अगस्त को मध्यप्रदेश के पिछड़े जिले बडवानी में पहले अनशन स्थल चिकल्दा में मेधा पाटकर के साथ प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एस सी बेहर

मेधा को बड़वानी जिले के चिकल्दा, जहां वे अनशन पर थीं, से 7 अगस्त को पुलिस द्वारा जबरदस्ती उठाकर इंदौर के बांबे हास्पिटल में भर्ती करा दिया गया था। वह उनके अनशन का 12वां दिन था।

यद्यपि उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार नहीं किया गया था तथापि अस्पताल में उन्हें एनबीए के एक कार्यकर्ता को छोड़कर, किसी से मिलने नहीं दिया गया। उन्हें उनके मोबाईल फोन के इस्तेमाल की इजाजत भी नहीं थी।

मेधा की अस्पताल से रिहाई 10 अगस्त को तब हुई जब एनबीए ने जबलपुर उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर कहा कि उसके कार्यकर्ताओं को 8 और 9 अगस्त को उनके नेता से मिलने नहीं दिया गया। इसके पहले दोपहर में अस्पताल से छुट्टी के बाद, मेधा, करीब चार बजे शाम को इंदौर से रवाना हुईं थीं। अस्पताल से छुट्टी के बाद उन्होंने अपने समर्थकों से मुलाकात की और कुछ देर आराम किया। अस्पताल में भी उनका उपवास जारी रहा।

एनबीए की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, ‘जब मेधा का वाहन बड़वानी की ओर बढ़ रहा था तब पुलिस के लगभग 35 गाड़ियों के काफिले ने उसे रोक लिया। वाहन के ड्राईवर को गाड़ी से बाहर निकाल दिया गया और एक पुलिस अधिकारी ने स्टीयरिंग व्हील संभाल लिया। वे उन्हें धार की तरफ ले गए‘।

अस्पताल से निकलने के बाद संवाददाताओं से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि पुलिस की कार्यवाही के बाद भी सरदार सरोवर के विस्थापितों के उचित पुनर्वास के लिए आंदोलन जारी रहेगा। उपवास और आंदोलन तब तक चलेगा जब तक कि विस्थापितों का पूर्ण पुनर्वास नहीं हो जाता। उन्होंने यह भी कहा कि अस्पताल में रहने के दौरान भी उन्होंने खाना नहीं खाया और उनका उपवास जारी रहा।

पाटकर ने पुलिस की कार्यवाही को तानाशाहीपूर्ण बताते हुए कहा कि ‘मुझे गैर-कानूनी हिरासत में रखा गया। मुझे मेरा मोबाईल फोन इस्तेमाल नहीं करने दिया गया। अस्पताल में मरीजों से मिलने के लिए निर्धारित समय में भी मुझे किसी से मिलने नहीं दिया गया‘।

ध्यातव्य है कि एनबीए पिछले लगभग 32 सालों से नर्मदा घाटी में विस्थापितों के लिए संघर्षरत है। उसके इस लंबे और कठिन संघर्ष में उसे बहुत सारी सफलताएं भी मिली हैं। एनबीए का ताजा आंदोलन जुलाई के मध्य में तब शुरू हुआ, जब सरकार ने यह घोषणा की कि वह 31 जुलाई को, उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई अनुमति के अनुरूप, सरदार सरोवर बांध के गेट बंद करने जा रही है ताकि बांध के जलाशय को उसके उच्चतम स्तर 138.69 मीटर तक भरा जा सके। वर्तमान में जलाशय 121.92 मीटर ऊँचाई तक भरा हुआ है। जलाशय को उच्चतम स्तर तक भरने से 176 नए गांव अंशतः या पूर्णतः डूब जाएंगे जिससे 21,808 परिवार प्रभावित होंगे।

मेधा ने अपना आमरण अनशन 27 जुलाई से प्रारंभ किया था। उनकी मांग है कि डूब क्षेत्र में पानी भरने से पूर्व सभी विस्थापितों का पुनर्वास पूर्ण हो जाना चाहिए। मेधा का कहना है कि पुनर्वास का अर्थ केवल विस्थापितों को मकान दे देना नहीं है। उनकी रोजी-रोटी की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। उपवास शुरू करने के कई दिनों बाद तक सरकार ने मेधा की कोई सुध नहीं ली और ना ही एनबीए के साथ किसी वार्ता की पेशकश की। इसकी जगह, मुख्यमंत्री अपने निवास पर भाजपा विधायकों द्वारा बसों में भरकर लाए गए तथाकथित विस्थापितों से मिलते रहे और उन्हें आश्वासनों का झुनझुना पकड़ाते रहे। जब मुख्यमंत्री पर दबाव बढना शुरू हुआ तब 3 अगस्त को उन्होंने ट्वीट कर मेधा से अपना अनशन समाप्त करने का अनुरोध किया। इसके अगले दिन, तीन वरिष्ठ अधिकारियों का एक दल मेधा से बातचीत करने चिकल्दा पहुंचा। दल के सदस्यों ने लगभग साढे तीन घंटे तक मेधा और उनके साथियों की शिकायतें और मांगें सुनीं और उसके बाद यह घोषणा की कि वे तो मात्र डाकिए हैं और वे इतना ही कर सकते हैं कि उनकी मांगों को मुख्यमंत्री तक पहुंचा दें।

यह किया गया या नहीं यह कहना मुश्किल है परंतु अगले ही दिन से नर्मदा घाटी में बड़ी संख्या में हथियारबंद पुलिसकर्मी पहुंचने लगे। अनशन स्थल के चारों ओर पुलिस ने घेरा डाल दिया और किसी को वहां जाने की इजाजत नहीं दी गई। सात अगस्त को मेधा को वहां से जबरदस्ती उठा लिया गया। पुलिस महानिरीक्षक (गुप्तवार्ता) मकरंद देउस्कर ने दावा किया कि इस कार्यवाही में 32 महिला पुलिसकर्मी घायल हुईं। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ महिला पुलिसकर्मियों के साथ पुरूष आंदोलनकारियों ने छेड़छाड़ और बदतमीजी की और उनमें से कुछ तो इससे इतनी दुःखी और परेशान हैं कि उन्होंने पुलिस की नौकरी छोड़ने का निर्णय कर लिया है!

ऐसे घरों में किया जा रहा प्रभावितों का पुनर्वास

ऐसा माना जा रहा है कि चौहान ने एनबीए के साथ किसी प्रकार की चर्चा इसलिए नहीं कि क्योंकि उन्हें डर था कि इससे मोदी नाराज हो जाएंगे। गुजरात के अपने मुख्यमंत्रित्वकाल के दौरान, मोदी ने एनबीए के खिलाफ जबरदस्त दमनचक्र चलाया था और यहां तक कि एनबीए के अहमदाबाद स्थित कार्यालय में ताला जड़ दिया गया था। गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और चौहान ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहते थे जिससे गुजरात को सिंचाई के लिए पानी मिलने में बाधा पड़े। गुजरात के एक बड़े इलाके में भूगर्भीय जलस्तर बहुत नीचे पहुंच गया है। इसका कारण है अधिक सिंचाई की आवश्यकता वाली फसलों जैसे कपास और मूंगफली की खेती करने के लिए टयूबवेलों की अंधाधुंध खुदाई।

इस बीच नागरिकों के एक दल ने 4 से 6 अगस्त तक घाटी के डूब क्षेत्र के कुछ गांवों का दौरा किया। दल ने यह पाया कि सरकार के दावों और जमीनी हकीकत में बहुत बड़ा फर्क है। विस्थापितों के पुनर्वसन के संबंध में सरकार के दावे, जमीनी हकीकत से मेल नहीं खा रहे हैं। इस चार सदस्यीय दल में राज्य के पूर्व मुख्य सचिव एससी बैहार, पूर्व पुलिस महानिदेशक अरूण गुर्टु, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता एलएस हरदेनिया व हिन्दुस्तान टाईम्स और इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व क्षेत्रीय संपादक चंद्रकांत नायडू शामिल थे।

अपनी रपट में दल ने कहा कि पुनर्वसन के लिए चिन्हित या आवंटित लगभग सभी क्षेत्र, सड़क से काफी नीचे हैं और इनमें किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य करने के पूर्व भराव किया जाना आवश्यक होगा। दल ने पाया कि पुनर्वसन स्थलों में जलप्रदाय, जलमल निकासी, विद्युत व शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।

रपट में कहा गया है कि निसरपुर नामक पुनर्वसन स्थल, जिसे सरकार द्वारा आदर्श पुनर्वसन स्थल बताया जा रहा है, में निर्माण कार्य की वर्तमान स्थिति को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि काम पूरा होने में कई महीने लगेंगे। सरकारी नुमांइदे ऐसे अनेक फोटो दिखा रहे हैं जिनमें स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, सामुदायिक केन्द्र, पानी की टंकियां और मकान आदि दिखाए गए हैं। बताया जा रहा है कि ये फोटो पुनर्वसन स्थलों के हैं। परंतु ऐसा लगता है कि ये फोटों अन्य किसी क्षेत्र में लिए गए हैं, क्योंकि वे जमीनी स्थिति से मेल नहीं खाते। कुल मिलाकर, दल ने यह पाया कि पुनर्वास के संबंध में सरकार के दावे काफी हद तक खोखले हैं।      

(अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद लेखक स्वयं)


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