क्यों सता रहे नेताओं को भूत-प्रेत?

लालू प्रसाद के बेटे व बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप को इन दिनों भूतों का डर सता रहा है। हालांकि भूतों से डरने वाले वे अकेले राजनेता नहीं है। देश के मानसिक स्वास्थ्य पर ये नेता कैसा असर डालते हैं, बता रहे हैं अनिल गुप्ता :

एक समय था जब सेवाभावी लोगों पर समाजसेवा और राजनीति का ऐसा ‘भूत’ चढ़ता था कि लाख जतन कीजिए, उतरता ही नहीं था। लोगबाग अपना सर्वस्व लुटाकर भी दीन-दुखियों की सेवा और राजनीति करते थे। तब ऐसे लोगों की सेवा और राजनीति में ईमानदारी और ‘देने’ का भाव होता था। मगर जैसे-जैसे राजनीति से सेवा की यह ईमानदारी और ‘देने’ का भाव खत्म होता गया वैसे-वैसे राजनीतिज्ञों पर से वह ‘भूत’ भी उतरता चला गया। आज तो हमारे राजनीतिज्ञों को भूतों का प्रकोप डराने और परेशान करने लगा है। बिहार के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव ने अपना मंत्री वाला बंगला कथित रूप से “भूतों के उत्पात” के कारण छोड़ दिया। इसी प्रकार, राजस्थान विधानसभा में “भूतों के प्रकोप” की खबरें भी इन दिनों मीडिया में सुर्खियां बटोर रही हैं। शगुन-अपशगुन और तंत्र-मंत्र से ग्रसित हमारे राजनेताओं में भूतों का यह प्रकोप उनकी ईमानदारी, प्रगतिशीलता और बुद्धि स्तर को रेखांकित करता है।

पटना में आयोजित एक कार्यक्रम में शंख बजाकर उद्घाटन करते पूर्व स्वास्थ्य मंत्री तेज प्रताप यादव

राजद प्रमुख लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव बिहार की महागठबंधन सरकार में स्वास्थ्य मंत्री थे तो 3-देशरत्न मार्ग स्थित तीन एकड़ में फैला बंगला उन्हें आवंटित किया गया था। नीतीश कुमार के महागठबंधन से अलग होकर और बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद पूर्व मंत्री रह गए तेजप्रताप बंगला खाली नहीं कर रहे थे। अब कुछ दिनों पूर्व जब उन्होंने बंगला खाली किया तो इसके पीछे अजीबोगरीब तर्क दिए। उन्होंने कहा- ‘मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्‍यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने मुझे डराने और परेशान करने के लिए बंगले में भूत छोड़ दिया था। लिहाजा, मैंने इसे छोड़ने का फैसला किया।’

इसी प्रकार, राजस्थान के विधायकों को विधानसभा में भूतों का प्रकोप दिख रहा है। यहां विधायकों की कुल संख्या 200 है, लेकिन वर्ष 2000 में जब विधानसभा नए भवन में शिफ्ट हुई, तभी से यहां कभी एक साथ 200 विधायक नहीं बैठे। कभी किसी विधायक की मौत हो गई तो कभी किसी को जेल जाना पड़ा। विधानसभा में सरकारी मुख्य सचेतक और भाजपा के वरिष्ठ विधायक कालूलाल गुर्जर का कहना है कि यह विधानसभा भवन श्मशान की जमीन पर बना हुआ है, इस कारण यहां आत्माएं घूम रही हैं। आत्माओं और ग्रहों की शांति के लिए अनुष्ठान कराने के साथ ही ब्राह्मण भोज कराया जाएगा। भाजपा विधायक हबीबुर्रहमान का कहना है कि विधायकों की मौत अपशकुन के कारण हो रही है। वे चाहते हैं कि पंडितों से यज्ञ कराया जाए और मौलवियों से शुद्धि कराई जाए। निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल और कांग्रेस के श्रवण कुमार ने भी विधानसभा परिसर में पूजा-पाठ कराने की जरूरत बताई। विधायकों ने कहा कि पूरे परिसर को गंगाजल से धोना चाहिए।

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे

गौरतलब है कि वर्ष 1999 में बनकर तैयार हुए राजस्थान के नए विधानसभा परिसर के निर्माण के दौरान ही आधा दर्जन मजदूरों की विभिन्न कारणों से मौत हो गई थी। वर्ष 2000 से नए भवन में नियमित बैठकें शुरू होने के बाद किसी ना किसी कारण एक साथ सभी 200 विधायक नहीं बैठे। वर्ष 2000 में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार के मंत्री भीखा भाई की मौत हो गई थी। इसके बाद विधायक भीमसेन चौधरी, वर्ष 2003 में मंत्री राम सिंह विश्नोई, वर्ष 2005 में विधायक अरुण सिंह की मौत हो गई। इसके बाद वर्ष 2011 में तत्कालीन अशोक गहलोत सरकार के कैबिनेट मंत्री महिपाल मदेरणा और कांग्रेस विधायक मलखान सिंह को चर्चित भंवरी देवी हत्या प्रकरण में जेल जाना पड़ा। इसके बाद इसी वर्ष एक एनकाउंटर मामले में भाजपा के दिग्गज विधायक राजेन्द्र राठौड को जेल जाना पड़ा। वर्ष 2013 में कांग्रेस विधायक बाबूलाल नागर और अप्रैल, 2017 में बसपा के बीएल कुशवाह को जेल जाना पड़ा। सितम्बर, 2017 में भाजपा विधायक कीर्ति कुमारी की स्वाइन फ्लू से मौत हुई। अब हाल ही भाजपा विधायक कल्याण सिंह की मौत के बाद से विधायकों में भय बना हुआ है।  

राजस्थान विधानसभा के बाहर भूतों की तलाश करता एक तांत्रिक

भारतीय राजनीति में बड़ी संख्या में मूढ़मति और डपोरशंखी राजनेताओं के उदाहरण मिलते हैं। कई बड़े और कठोर फैसलों के लिए जानी जाने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक के कुर्सी के लिए पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ, तंत्र-मंत्र और शगुन-अपशगुन के उदाहरण भरे हैं। ईश्वर के प्रति सामान्य व्यक्तिगत श्रद्धा से ज्यादा मुल्ला-ब्राह्मण के प्रपंचों वाले इन कृत्यों में हमारी निष्ठा यह साबित करती है कि हमारा अभी बुद्धिजीवी होना बाकी है ही, मनुष्यता का पाठ पढ़ना भी शेष है। वर्ना विज्ञान-तकनीक और कंप्यूटर-इंटरनेट वाली इक्कीसवीं सदी में जब पूरी दुनिया विकास और रोजगार की बात कर रही है; हम अभी भी सामाजिक गैर बराबरी को खत्म करने में ही क्यों लगे हुए हैं? हालांकि हमारा यह प्रयास भी नकली और अपर्याप्त है, क्योंकि हम तो सामाजिक गैर बराबरी को मजबूत करने वाले फन्दों में ही जकड़े हुए हैं।

वर्ष 2014 में एक तांत्रिक से मिलते बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

हमारे पीछे खबरों में व्याप्त किसी सरकारी बंगले अथवा विधानसभा भवन का भूत नहीं; बल्कि स्वर्ग-नरक रचने वाली चतुर ब्राह्मणवादी व्यवस्था का भूत पड़ा है, जो हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। आज विश्व सभ्यता जात-पांत, रंग-रूप, स्त्री-पुरुष के भेद से ऊपर उठकर सभी मनुष्य के लिए बराबरी का संदेश देती है। लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं कमोबेश हर देश में समान नागरिक अधिकारों और कर्तव्यों की वकालत करती हैं। किसी कथित ईश्वरीय सत्ता के प्रतिनिधि के तौर पर पारिवारिक या जातीय शासन, सत्ता या विशेषाधिकार के लिए लोकतंत्र में आज कोई स्थान नहीं है। मगर भारत में सदियों की स्थापित ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था की जड़ें काफी गहरी हैं और उन्हें मजबूत करने वाले हजारों टूल सक्रिय हैं। भूत-प्रेत भी उन्हीं में से एक है।

सरकारी बंगले और विधानसभा में भूतों के प्रकोप से घबराए हमारे जनप्रतिनिधियों को कभी रोहित बेमुला का भूत अथवा कर्ज, गरीबी और बेरोजगारी के कारण जान गंवाने वाले किसी गरीब किसान या मजदूर का भूत कभी नहीं सताता। उन्हें सीमा पर अथवा आतंकवादियों से जूझते हुए शहीद हो जाने वाले सैनिकों के भूत भी नहीं मिलते। न तो किसी भंवरी देवी का भूत और न ही किसी फर्जी एनकाउंटर में मारे गए किसी व्यक्ति का भूत उन्हें परेशान करता है। उन्हें तो केवल कुछ चुनिंदा किस्म के भूत ही परेशान करते हैं, जिनकी चर्चा के बाद जरूरी जनपक्षीय मुद्दों की चर्चा का समय ही नहीं बचता। इस प्रकार की चर्चा और खबरों से आम जनता का ध्यान उनकी जरूरत के विषयों से हटाना भी आसान होता है।

प्रत्येक चुने गए जनप्रतिनिधियों पर सरकारें जनता से वसूले गए टैक्स के लाखों रुपये हर महीने खर्च करती हैं। राज्य विधानमंडलों की बैठकों का करोड़ों रुपयों का खर्चा बैठता है। भले ही बहकावे, फुसलावे और प्रचार के झांसे में आकर, मगर बेचारी जनता यह समझकर ही विधायकों और दूसरे जनप्रतिनिधियों का चुनाव करती है कि वे उनकी तरक्की, खुशहाली और सुरक्षा के इंतजाम करेंगे। मगर चुनाव होते ही हमारे विधायक और दूसरे जनप्रतिनिधि जनता की बजाय अपनी और अपने परिजनों, दोस्तों की तरक्की, खुशहाली और सुरक्षा के इंतजाम करने में लग जाते हैं। ‘जनता के लिए, जनता का, जनता के द्वारा’ वाली लोकतंत्र की परिभाषा किताबी होकर रह जाती है।

बहरहाल, यह तर्क दिया जा सकता है, बल्कि कुछ लोग देते भी हैं कि जैसा समाज और जैसे लोग होंगे, वैसे ही नेता और जनप्रतिनिधि भी होंगे। यह आधा सच है। हमारे विधायकों और दूसरे प्रतिनिधियों का चुनाव हमारे बीच से होता जरूर है; मगर वे हमारे नेता होते हैं- हमारे बीच के, मगर हमसे विशिष्ट। कायदे से हमारे नेताओं को हमसे ज्यादा बुद्धिमान, जनपक्षीय दृष्टि वाला और स्वार्थ, लालच जैसे कई सहज मानवीय अवगुणों से मुक्त होना चाहिए। उनके यह गुण नेता चुने जाने से पूर्व के उनके सामाजिक कार्य-व्यवहार से परिलक्षित होना चाहिए। मगर हमारे लोकतंत्र का यह पूरा का पूरा व्यवहारिक पक्ष बाजारवाद और ब्राह्मणवाद द्वारा अपहृत कर लिया गया है। इसे अपने को जागरूक और जनपक्षीय मानने वाले प्रत्येक कार्यकर्ता और आम जनता को भी समवेत प्रयास करके अपहर्ताओं के चंगुल से मुक्त कराना होगा। बंगले और विधानसभा का भूत तभी भागेगा, जब ईमानदारी के साथ समाजसेवा और राजनीति का भूत फिर से सिर चढ़कर बोलेगा।


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +919968527911, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें :

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

‘महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार 

About The Author

Reply