कांग्रेस का ओबीसी सम्मेलन : आधे-अधूरे मन से ओबीसी हितों की चर्चा

कांग्रेस ओबीसी समुदाय के हितों की उपेक्षा और विरोध करती रही, जबकि भाजपा ने अपने को इस समुदाय के साथ खड़ा किया। 2014 और उसके बाद के चुनावों में भाजपा की जीत में इस समुदायों के वोटों की निर्णायक भूमिका रही है। इस पूरे परिदृश्य में कांग्रेस के ओबीसी सम्मेलन के बारे में अरूण कुमार की रिपोर्ट :

कांग्रेस की ओबीसी समुदाय के प्रति क्या नीति रही है?

आज दिनांक 11 जून 2012 को  दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कांग्रेस पार्टी ने ‘ओबीसी सम्मेलन’ का आयोजन किया था। इस सम्मेलन को राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ-साथ पार्टी के संगठन मंत्री व राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने भी संबोधित किया। इससे पहले पार्टी ने वर्षों से मृतप्राय ओबीसी विभाग को पुनर्जीवित करते हुए छत्तीसगढ़ दुर्ग से सांसद ताम्रध्वज साहू को इसका अध्यक्ष बनाया है। छत्तीसगढ़ में साहू जाति की अच्छी-खासी संख्या है इसलिए ताम्रध्वज साहू को ओबीसी विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर छत्तीसगढ़ के साहू समाज को भी साधने का प्रयास किया है। वहां शीघ्र ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।छत्तीसगढ़ का साहू समाज भारतीय जनता पार्टी का समर्थक माना जाता है। वह प्रधानमंत्री मोदी को अपनी जाति का मानता है। कांग्रेस ने गुजरात प्रभारी रहे और ओबीसी नेता अशोक गहलोत को संगठन मंत्री बनाकर भी ओबीसी मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश की है कि उसकी ओबीसी नीति बदल रही है।

कांग्रेस के ओबीसी सम्मेलन को संबोधित करते राहुल गांधी (तालकटोरा स्टेडियम नई दिल्ली)

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की पराजय का सबसे बड़ा कारण बड़े पैमाने पर ओबीसी मतदाताओं का उसके विरोध में और बीजेपी के समर्थन में ध्रुवीकरण है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार रहे नरेन्द्र मोदी ओबीसी समुदाय के हैं। श्री मोदी ने अपने चुनाव अभियान में इस बात को भी खूब प्रचारित किया कि वे ओबीसी हैं और पहली बार एक ओबीसी प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। श्री मोदी की  इन बातों का ओबीसी पर काफी प्रभाव पड़ा और उन्होंने बड़े पैमाने पर बीजेपी की जीत में योगदान दिया। ओबीसी मतदाताओं ने ओबीसी प्रधानमंत्री बनाने के लिए बीजेपी को वोट दिया, यह एक कारण हो सकता है। कुछ और महत्वपूर्ण कारण है जिससे ओबीसी कांग्रेस से नाराज़ हुए। यूपीए-2 के शासन काल में प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह की सरकार ने कुछ ऐसे काम किये जिससे शिक्षित ओबीसी को लगा कि यह सरकार उनके हितों के या तो खिलाफ है या फिर अनदेखी कर रही है। हालांकि यूपीए-1 की सरकार ने 2006 में उच्च शिक्षा में ओबीसी आरक्षण लागू करके एक बड़ा काम किया था लेकिन इसे लागू करने वाले तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री श्री अर्जुन सिंह को जिस तरह से दरकिनार किया गया उससे ओबीसी में गलत संदेश गया।

कांग्रेस के ओबीसी सम्मेलन में उपस्थित लोग और ओबीसी समुदाय के अशोक गहलोत का भाषण सुनते राहुल गांधी

यूपीए-2 के शासन में कांग्रेस ने ओबीसी के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण में बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ करने की कोशिश की। इसी 27 प्रतिशत में से 4 प्रतिशत आरक्षण धार्मिक आधार पर मुसलमानों को देने की कोशिश की गई। इसी 27 प्रतिशत आरक्षण में से 3 प्रतिशत का कोटा किन्नरों को भी देने की घोषणा की गई। यह भी कहा गया कि किन्नर चाहे किसी भी वर्ग ( अनुसूचित जाति/ जनजाति/ओबीसी या सामान्य) में जन्म लिया हो उन्हें ओबीसी के लिए तय 27 प्रतिशत आरक्षण के तहत ही आरक्षण दिया जाएगा। मतलब सीधा था कि सभी किन्नरों को ओबीसी मान लिया जाए। उसके बाद घुमन्तु विमुक्त जातियों  को भी ओबीसी कोटे के अन्दर 7 प्रतिशत कोटा देने की बात चली। इससे ओबीसी के आरक्षण समर्थकों में डर का माहौल पैदा हुआ। यूपीए-2 के कार्यकाल में ही जामिया मिल्लिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय आदि संस्थानों को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देकर उसमें ओबीसी आरक्षण को समाप्त कर दिया गया। इसी समय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने अनुसूचित जाति/जनजाति के शोधार्थियों के लिए राजीव गांधी राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना और अल्पसंख्यक वर्ग के लिए मौलाना आज़ाद छात्रवृत्ति योजना शुरू की, लेकिन उसमें ओबीसी शोधार्थियों के लिए कोई जगह नहीं थी। ओबीसी शोधार्थी यूजीसी अध्यक्ष प्रो. सुखदेव थोराट और सामाजिक न्याय व अधिकारिता मन्त्री श्री मुकुल वासनिक के यहां ओबीसी के लिए भी ऐसी ही छात्रवृत्ति योजना शुरू करने की गुहार लगाते रहे लेकिन उन्होंने नहीं सुनी। बाद में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने ओबीसी शोधार्थियों को भी राजीव गांधी राष्ट्रीय छात्रवृत्ति योजना का लाभ देने की घोषणा की। इससे भी ओबीसी में कांग्रेस विरोध की भावना जगी। दूसरी तरफ बीजेपी ने यूपीए-2 की इन सभी नीतियों का खुलकर विरोध किया। इस परिस्थिति में नरेन्द्र मोदी के चेहरे को सामने पाकर ओबीसी के अधिकांश वोट बीजेपी के समर्थन में पड़े जिसके कारण कांग्रेस की करारी हार हुई।

 

हालांकि आज़ादी के बाद के कांग्रेस के इतिहास पर गौर करें तो हम पाते हैं कि ओबीसी के प्रति उसकी नीति या तो उदासीन रही है या फिर विरोध की। कांग्रेस ने जिस सामाजिक समीकरण को साधा वह सवर्ण-दलित-मुसलमान पर आधारित था। वह लगातार देश की 52 प्रतिशत आबादी ओबीसी को दरकिनार कर चलती रही। इसीलिए कभी भी कांग्रेस में किसी ओबीसी नेता का कद बड़ा नहीं हो पाया। 1990 के दशक में कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार की अनुपस्थिति में ओबीसी नेता सीताराम केसरी का कद बढ़ा और वे राष्ट्रीय अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए लेकिन जैसे ही सोनिया गांधी का आगमन हुआ श्री केसरी को कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड,दिल्ली से बेइज्जत करके बाहर निकाल दिया गया। एक निर्वाचित अध्यक्ष कांग्रेस मुख्यालय से रोता हुआ बाहर निकला था। दूसरी तरफ ओबीसी आरक्षण के प्रति भी कांग्रेस का रवैया विरोध का ही रहा। प्रथम ओबीसी आयोग काका कालेलकर आयोग की सिफारिशों को कांग्रेस ने लागू ही नहीं होने दिया। जब मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसने 1979 में मंडल आयोग का गठन किया। मंडल आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट इंदिरा गांधी की सरकार को सौंप दिया लेकिन इसे भी ठंढे बस्ते में डाल दिया गया। बाद में 7 अगस्त 1990 को प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह की सरकार ने जब मंडल आयोग की सिफारिशों में से केवल एक ओबीसी को केन्द्र सरकार की नौकरियों में 27 प्रतिशत स्थान सुरक्षित करने सम्बन्धी सिफारिश को लागू करने की घोषणा की, तो राजीव गांधी ने संसद में बाकायदा विरोध किया। संयोग की बात है कि जनता पार्टी की सरकार में बीजेपी अपने पुराने जनसंघ के रूप में शामिल थी, तो वी. पी. सिंह की सरकार को भी बीजेपी का समर्थन था। अर्थात मंडल आयोग के बनने से लेकर लागू होने तक में बीजेपी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष} ढंग से समर्थन में खड़ी थी। जब राजीव गांधी ने संसद में मंडल आयोग के विरोध में अपनी बातें रखी तब भी बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी ने पक्ष में लम्बा भाषण दिया था। मंडल आयोग का विरोध करना कांग्रेस को महंगा पड़ा।

मंडल आन्दोलन के कारण ओबीसी में राजनीतिक महत्वाकांक्षा का उभार हुआ। ओबीसी की इस राजनीतिक महत्वाकांक्षा को भुनाने में भी कांग्रेस पीछे रह गयी और उसे अब भी अपने सामाजिक आधार सवर्ण-दलित-मुसलमान पर ही भरोसा रहा। ओबीसी की इस राजनीतिक महत्वाकांक्षा को बीजेपी ने भुनाया और उसने प्रदेश की राजनीति ओबीसी को सौंप दी। बीजेपी ने प्रदेशों में ओबीसी छत्रप खड़े कर दिए। कल्याण सिंह, विनय कटियार, सुशील मोदी, शिवराज सिंह चौहान, उमा भारती जैसे कई ओबीसी छत्रपों ने बीजेपी के लिए ओबीसी वोट जुटाए जिसके कारण कांग्रेस लगातार कमजोर होती गयी।

कांग्रेस का यह ओबीसी सम्मेलन उसकी पुरानी भूलों को याद करने और उसके लिए माफी मांगने का एक सुनहरा अवसर हो सकता था। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने संबोधन में ओबीसी हितों के संरक्षण पर मजबूती से खड़े होने की बात कह सकते थे लेकिन वे चूक गए। उनके वक्तव्य का अधिकांश कोका कोला, किसान आदि से ही सम्बन्धित रहा।


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