ओबीसी की राजनीति : दोस्त बनेंगे दुश्मन और दुश्मन बनेंगे दोस्त!

केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा महाराष्ट्र में छगन भुजबल से मिल रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद का हालचाल लिया है। गुजरात में अल्पेश ठाकोर और हार्दिक पटेल एक साथ ओबीसी की राजनीति का शंखनाद कर रहे हैं। वहीं राजस्थान में कांग्रेस पिछड़ी जाति से आने वाले अशोक गहलोत को नेता मान चुनावी समर में कूद चुकी है। मामला अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से जुड़ा है। बता रहे हैं नवल किशोर कुमार

पूरा देश अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के मूड में आ गया है। जाति से लेकर धर्म तक के राजनीतिक समीकरण बनाये जा रहे हैं। फिर चाहे वह भाजपानीत एनडीए हो या कांग्रेसनीत यूपीए। सभी अपने-अपने राजनीतिक मोहरे बिछाने में जुट गये हैं। खास बात यह है कि 2014 के तर्ज पर ही इस बार भी निशाने पर ओबीसी होंगे। इसके संकेत मिलने शुरू हो गए हैं।  महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के मामले सजायाफ्ता छगन भुजबल को जमानत मिल चुकी है और वे अब नई पारी खेलने को तैयार हैं। उनसे मुलाकात कर केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने यह साफ कर दिया है कि उनकी राजनीति भाजपा की कोर राजनीति से बिल्कुल अलग है। इससे पहले उन्होंने नई दिल्ली के एम्स में इलाज करवा रहे राजद प्रमुख लालू प्रसाद से मिलकर भी परोक्ष रूप से यही संदेश दिया था।

बीते दिनों मुंबई में छगन भुजबल से मिलते केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा

बात केवल उपेंद्र कुशवाहा तक ही सीमित नहीं है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इन दिनों भाजपा के साथ दबाव की राजनीति करने लगे हैं। हालांकि नीतीश कुमार ने स्वयं कोई बात नहीं कही है। लेकिन उनके चीफ सिपाहसलार व राज्यसभा में जदयू के नेता आरसीपी सिंह ने साफ कह दिया है कि नीतीश कुमार बिहार में 25 सीटों से कम में मानेंगे नहीं। उन्हें हर हाल में वरीयता चाहिए। यह इधर वाले भी जान लें और उधर वाले भी। कहने का मतलब यह कि नीतीश कुमार अब खुलकर ओबीसी की राजनीति करने को तैयार हैं। लेकिन बिहार में उनके अपने आधार वोट की हिस्सेदारी कम होने के कारण उन्हें हर बार किसी न किसी गठबंधन का दामन थामना पड़ता है। 2014 में अकेले चुनाव लड़ने का हश्र वे जान चुके हैं जब उनकी पार्टी को केवल दो सीटें मिली थीं। संभवत: यही कारण है कि चार माह से इलाजरत लालू प्रसाद की याद उन्हें बीते 26 जून को आयी जब उन्होंने दूरभाष पर उनका हालचाल पूछा।

2014 में  हुए लोकसभा चुनाव का परिणाम

बिहारउत्तर प्रदेश
दलसीटें/पूर्व के चुनाव के मुकाबले वोट प्रतिशत में अंतरदलसीटें/पूर्व के चुनाव के मुकाबले वोट प्रतिशत में अंतर
राजद4 (+0.80)सपा5  (-1.06)
कांग्रेस2 (-1.86)कांग्रेस2 (-10.75)
भाजपा22 (+15.47)भाजपा71  (+24.80)
जदयू2 (-8.24)अपना दल2
रालोसपा3बसपा0  (-7.82)
स्रोत : चुनाव आयोग का अधिकारिक वेबसाइट

बिहार से निकलकर यदि उत्तर प्रदेश की राजनीति पर नजर दौड़ायें तो योगी की राजनीति में ओबीसी की बढ़ती भूमिका का असर साफ-साफ देखा जा सकता है। केशव प्रसाद मौर्य से लेकर अनुप्रिया पटेल तक को भाजपा अपने स्तर से पुश कर रही है। वहीं ओम प्रकाश राजभर के सहारे वह अति पिछड़ा कार्ड खेल रही है। यानी भाजपा के निशाने पर इस समय दोनों हैं। एक तरफ वह ओबीसी समुदास से यादव समाज को अलग करने की रणनीति को अंजाम दे रही है तो दूसरी ओर वह कुशवाहा, कोईरी, कुर्मी और सैनी समाज के लोगों को गोलबंद करने की तैयारी कर रही है। समाजवादी पार्टी भी ओबीसी राजनीति के अपने खुंटे को उखड़ने नहीं देना चाहती है। इसलिए अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती ने दलित-पिछड़ा गठजोड़ बनाया है। यह भाजपा के ओबीसी पालिटिक्स का एक जवाब भी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में ये दोनों पार्टियां अकेले-अकेले लड़ने की सजा पा चुके हैं। रही सही कसर पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव ने पूरी कर दी। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में एकतरफा जीत हासिल की। हालांकि लोकसभा उपचुनाव में गोरखपुर और फुलपुर की सीटें जीत सपा-बसपा ने भाजपा की नींद उड़ा दी है।

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वहीं कांग्रेस इन दिनों कर्नाटक में हार के बावजूद जीत मिलने पर उत्साह से लबरेज है। राजस्थान में पिछड़ी जाति से आने वाले अशोक गहलोत के नेतृत्व में चुनाव की सारी तैयारी हो चुकी है। गहलोत राहुल गांधी द्वारा बनाये गये थिंक टैंकरों की टीम में सबसे अहम स्थान रखते हैं। बिहार में कांग्रेस लालू प्रसाद के साथ फिलहाल ओबीसी पालिटिक्स को साध रही है तो दूसरी ओर उसे नीतीश कुमार से भी कोई खास परेशानी नहीं है। माना जा रहा है कि यदि लालू प्रसाद के साथ सीटों के बंटवारे में यदि कोई उठापटक हुई तो वह नीतीश कुमार को अपने पाले में शामिल करने से हिचकेगी नहीं। वहीं नीतीश कुमार के लिए भी यह घाटे का सौदा नहीं होगा। इसी को ध्यान में रखते हुए वे रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा के साथ दलित और पिछड़ा कार्ड खेलने की कोशिश कर रहे हैं।

दरअसल नीतीश कुमार के लिए उपेंद्र कुशवाहा सबसे बड़े बाधक हैं। ठीक वैसे ही जैसे महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों छगन भुजबल भाजपा के लिए सबसे बड़े रोड़े। दलित पहले से ही भाजपा से नाराज हैं। ऐसे में उसकी पहली कोशिश ओबीसी को साधने की है ताकि महाराष्ट्र में उसे जो जीत 2014 में मिली थी, उसकी पुनरावृति हो सके। लेकिन भाजपा की परेशानी यह है कि छगन भुजबल शिवसेना और भाजपा दोनों से समान दूरी बनाकर चल रहे हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे उपेंद्र कुशवाहा नीतीश और लालू दोनों से समान दूरी और समान रिश्ता बनाकर अपनी चाल चल रहे हैं।

लेकिन भाजपा के समक्ष समस्या अकेले केवल महाराष्ट्र की ही नहीं है। गुजरात में भी उसे एड़ी-चोटी का जोड़ लगाना पड़ रहा है। अल्पेश ठाकोर और हार्दिक पटेल दोनों ने मिलकर उसकी नाक में दम कर रखा है। इसका असर पिछले साल हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में देखने को मिला था। हालत यह हो गयी थी कि भाजपा को हारते-हारते जीत मिली।

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मुद्दों की बात करें तो ओबीसी के सवाल महत्वपूर्ण होने वाले हैं। भाजपा ने यह पहले ही भांप लिया था। यही वजह रही कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को भंग कर एक नये आयोग का गठन करने की बात कह दी गयी। वह भी संवैधानिक शक्तियों से लैस। लेकिन इसका लाभ ऐन चुनाव के मौके पर मिले, इसकी भी चाल भाजपा ने उसी समय चल दी। उसने जस्टिस रोहिणी की अध्यक्षता में एक और कमेटी का गठन कर दिया जिसके जिम्मे ओबीसी का उपवर्गीकरण की जिम्मेदारी है। पहले इस कमेटी का कार्यकाल तीन महीने का था और अब इसे फिर से तीन महीने के लिए बढ़ा दिया गया है।

देश में ओबीसी कितना महत्वपूर्ण है इसका अनुमान 2014 में हुए लोकसभा चुनाव के आंकड़े बता देते हैं। बिहार में जदयू, राजद अलग-अलग लड़े तब भाजपा ने उपेंद्र कुशवाहा को अपने साथ मिलाकर ओबीसी का कार्ड खेला। वोट के लिहाज से राजद की सेहत पर तो असर नहीं पड़ा लेकिन जदयू बिखरकर रह गया। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री रहते हुए अपने दल को -8.24 प्रतिशत वोटों की हानि से नहीं बचा सके। कांग्रेस को भी बड़ी कीमत अदा करनी पड़ी। उसके वोटों में -1.86 प्रतिशत का नुकसान झेलना पड़ा। यही हाल उत्तर प्रदेश में भी हुआ था। सपा और बसपा अलग-अलग लड़े तब भाजपा ने अपना दल को अपने साथ मिला लिया और ओबीसी वोटरों पर अपना अधिकार हासिल कर लिया। परिणाम यह हुआ कि उसे 71 सीटें तो मिली ही, वोटों की हिस्सेदारी में भी 24.80 प्रतिशत की वृद्धि हो गयी।

बहरहाल, ओबीसी की राजनीति देश में रंग दिखाएगी। देश में शासन उसी का होगा जिसके साथ देश का ओबीसी होगा। इसका अहसास कांग्रेस को भी है और भाजपा को भी। लाख टके का सवाल यह है कि इस राजनीति से देश के ओबीसी को कितना लाभ मिलेगा।

(कॉपी एडिटर : सिद्धार्थ)


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