बोगस पत्रिकाओं के संपादक भी हैं पंजाब विश्वविद्यालय के नवनियुक्त कुलपति

पंजाब विश्वविद्यालय के नए कुलपति डॉ. राजकुमार दो ऐसी पत्रिकाओं के संपादक मंडल में शामिल हैं जो उच्च शिक्षा के शोध और अध्ययन क्षेत्र में कुख्यात हैं। ऐसे जर्नल्स जो यूजीसी की मान्यता सूची से बाहर तो है ही विश्वस्तर पर भी प्रतिबंधित हैं। पूरा ब्यौरा दे रहे हैं कमल चंद्रवंशी :

पंजाब विश्वविद्यालय के नवनियुक्त कुलपति डॉ. राजकुमार अपने दस दिन के कार्यकाल में एक मामले में फंस गए हैं। इस कारण पंजाब विश्वविद्यालय के छात्र संगठनों से लेकर शोधार्थी और अकादमिक बिरादरी सकते में है कि नए कुलपति राजकुमार दुनिया की उन दो ‘बोगस’ और ‘फरेबी’ पत्रिकाओँ (जर्नल्स) के संपादक मंडल में हैं जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध होने के बाद उनको विश्वस्तर और भारत में यूजीसी की ओर से प्रतिबंधित किया जा चुका है। 23 जुलाई को गुलदस्तों के साथ वीसी का स्वागत करने वाले पंजाब विश्वविद्यालय की अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) इकाई भी उनके विरोध में खड़ी हो गई है और उसने कहा है कि शिक्षा की साख बचाए रखने के लिए वीसी को तुरंत अपने पद से हट जाना चाहिए।

सवालों के घेरे में पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर राजकुमार

आपको बता दें कि 23 जुलाई को भारी विरोध के बीच कुलपति राजकुमार ने अपना कार्यभार संभाला था। राजकुमार इससे पहले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में मैनेजमेंट स्डटी के हेड थे। राजकुमार ने प्रोफेसर अरुण कुमार ग्रोवर की जगह वीसी बनाया गया जिनका कार्यकाल 22 जुलाई को समाप्त हुआ था। छात्रों को जैसे ही उनकी नियुक्ति की खबर मिली तो उन्होंने भूख हड़ताल और घेराव शुरू किया। छात्रों ने ‘संघी वीसी नहीं चाहिए’, ‘वीसी गो बैक’ ‘चोर वीसी गो बैक’ के नारे लगाए। स्टूडेंट्स फार सोसायटी (एसएफएस) ने स्टूडेंट्स सेंटर में वीसी के खिलाफ प्रदर्शन किया था। यहां ये भी बताते चलें कि प्रोफेसर राजकुमार पर आरएसएस के नजदीकी होने और बीएचयू में एक अपने हमनाम (राजकुमार) छोटे कर्मचारी के खाते से एटीएम से धोखाधड़ी कर पैसे की निकासी का भी आरोप है।

उच्चशिक्षा में फर्जी जर्नल्स रातोंरात कुकुरमुत्तों की तरह पनप रहे हैं। इन दो पत्रिकाओं के संपादक मंडल में कुलपति राजकुमार का नाम है जिससे वे विवादों में आ गए हैं

समाज विज्ञान और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में शोध-अध्ययनों को लेकर पिछले एक दशक से ‘प्रेडटॉरी जर्नल्स’ काफी चर्चा में है। प्रेडटॉरी जर्नल्स आमतौर पर नकली, छद्म और अध्ययन के नाम पर पैसा लूटने के मकसद के लिए चलाई जा रही कारोबारी किस्म की पत्रिकाओं को कहा जाता है जो किसी भी तरह से मौलिक नहीं हैं। जाहिर है उनमें शोध से जुड़े ज्यादातर अध्ययन कहीं से कॉपी पेस्ट करके, कुछ पुनर्लेखन करके अपने नाम पर छाप दिए जाते हैं। साथ ही ये पत्रिकाएं ‘पे एंड पब्लिश’ (पैसा दो और छपाओ) के लिए कुख्यात रही हैं। पीयू के नए वीसी ऐसी ही दो पत्रिकाओं के संपादक मंडल में हैं।

बीएचयू की आधिकारिक वेबसाइट पर कहा गया है कि “प्रोफेसर राजकुमार को शिक्षण और शोध की दुनिया का 35 सालों का अनुभव है। वह विश्वख्याति के इंटरनेशनल जर्नल ऑफ इंजीनियरिंग एंड मैनेजमेंट साइंसेज (आईजेईएमएस) और मैनेजमेंट एंड सोशल साइंस (आईजेएमएसएस) जैसी पत्रिकाओं के संपादक मंडल में हैं।” इंडियन एक्सप्रेस के चंडीगढ़ संस्करण ने इस पूरे मामले की खबर ली और कहा है कि अकादमिक जगत इस बात से परेशान है कि ये दोनों पत्रिकाएं कोलोराडो विश्वविद्यालय के जेफरी बील संपादित सूची से बाहर हैं और ‘प्रेडटॉरी जर्नल्स’ के तौर पर लिस्टेट (सूचीबद्ध) हैं। ज्ञात रहे जेफरी बील की सूची को दुनिया के 30 बड़े मीडिया संस्थानों की मदद और पड़ताल के बाद तैयार किया गया था जिसमें भारत की ओर से यह काम इंडियन एक्सप्रेस समूह ने किया था। मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से हाल में हुई पहल के बाद यूजीसी ने अपनी मान्यता सूची से इन दोनों पत्रिकाओं बाहर कर दिया था।

कुलपति का बीजेपी के छात्र संगठन ने स्वागत किया था। वह भी अब विरोध पर उतर आए हैं

इस रिपोर्ट के बाद सवाल उठना लाजिमी है कि क्या पंजाब विश्वविद्यालय के वीसी प्रोफेसर राजकुमार का पूरा बायोडाटा फर्जी है। दांव उल्टा पड़ते देख और दोनों पत्रिकाओँ की साख पर खड़े सवाल को दरकिनार करते हुए प्रोफेसर राजकुमार ने सफाई दी है कि ‘पत्रिकाओं के संपादकीय बोर्ड में होना मेरे लिए हमेशा सम्मान बात रही है। हां, अगर पत्रिका की विश्वसनीयता पर मेरे होने से कोई संकट आता है तो उनसे अपना नाम वापस लेने को तैयार हूं। कुलपति के तौर पर मैं पीयू में जैसी यहां की विरासत रही है, उस दिशा में ठोस कार्य करूंगा। शोध और अध्ययन की हमारे समाज और औद्योगिक विकास के लिए अहम भूमिका रही है।’

आईजेईएमएस लखनऊ से तो आईजेएमएसएस हरियाणा स्थित इंटरनेशनल जर्नल ऑफ मल्टी-डायमेंशनल रिसर्च की ओर से प्रकाशित होते हैं। लखनऊ से संबद्ध लोगों का कहना है कि उन्होंने बायोडाटा के आधार पर प्रोफेसर राजकुमार को संपादक मंडल में रखा है लेकिन उनमें व्यक्तिगत तौर पर किसी तरह का परिचय नहीं होने की बात भी स्वीकार की गई है। दूसरी पत्रिका हरियाणा के यमुनानगर के पते से निकलती है लेकिन उनकी वेबसाइट में मौजूद फोन नंबर को कोई नहीं उठाता।

पीयू की अकादमिक बिरादरी में रोष है। विश्वविद्यालय में रिसर्च प्रमोशन सेल के एसोसिएट प्रोफेसर रजत सुधीर कहते हैं कि “यूजीसी को ऐसी पत्रिकाओं के व्यावसायीकरण और बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। अकादमिक लोगों के लिए गुणवत्ता वाली पत्रिकाओं को अलग करना मुश्किल काम है क्योंकि उनको मान्यता मिली होती है। उन्होंने इस बात पर तसल्ली जताई कि यूजीसी अब इस तरह के प्रकाशनों को लेकर ज्यादा सतर्क हो गया है और वह नए कदम उठा रहा है।”

एनएसयूआई की चंडीगढ़ इकाई ने इस मामले में विरोध तेज कर दिया है। पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस स्टूडेंट्स काउंसिल के पूर्व सचिव वाणी सूद ने कहा कि यदि वीसी ऐसी पत्रिकाओं से जुड़े हैं तो उनको अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी ताकि शिक्षकों और छात्रों के लिए बीच वैज्ञानिक और सामाजिक वातावरण बनाने की दिशा में काम हो।


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