विधेयक के बदले अध्यादेश : कहीं दलितों और आदिवासियों को मूर्ख तो नहीं बना रहे एनडीए के दलित?

केंद्र सरकार में शामिल रामविलास पासवान एवं अन्य दलित नेता एससी/एसटी एक्ट को लेकर अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं। जबकि संसद का मानसून सत्र 7 अगस्त तक है। वे चाहें तो सरकार पर विधेयक लाने का दबाव बना सकते हैं। लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। नवल किशोर कुमार की रिपोर्ट :

बीते 21 जुलाई को अविश्वास मत प्रस्ताव पर सरकार के समर्थन में बोलते हुए केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने कहा कि केंद्र सरकार (जिसमें वह स्वयं भी काबीना मंत्री हैं) अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम को मजबूत बनाने के लिए अध्यादेश जारी करे। इसके ठीक दो दिनों बाद उनके नेतृत्व में दलित सांसदों की बैठक हुई जिसमें केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले और उदित राज सहित अनेक सांसद शामिल हुए। इस बैठक में भी अध्यादेश जारी करने की मांग की गयी। इसी मांग को बाद में लोक जनशक्ति पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष व सांसद चिराग पासवान ने प्रेस कांफ्रेंस में दुहराया और केंद्र सरकार को चेताया। उन्होंने कहा कि यदि सरकार अध्यादेश नहीं लाती है तो लोजपा आगामी 9 अगस्त से पूरे देश में व्यापक आंदोलन छेड़ेगी।

एनडीए के दलित : रामदास आठवले, रामविलास पासवान और उदित राज

लोजपा नेताओं का मानना है कि इसी वर्ष 28 मार्च को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी गाइडलाइन ने एससी/एसटी एक्ट को कमजोर किया है। उनके मुताबिक इसे और सख्त बनाया जाना चाहिए ताकि दलितों और आदिवासियों पर होने वाले अत्याचार में कमी आये। जबकि अपने गाइडलाइन में सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकी दर्ज करने व प्राथमिक अनुसंधान की प्रक्रिया में सुधार की बात कही थी। तब संपूर्ण विपक्ष ने हो हल्ला मचाया था और 2 अप्रैल को भारत बंद का आह्वान किया था। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि तब एनडीए में शामिल दलित नेताओं ने कोई विरोध व्यक्त नहीं किया था। अलबत्ता केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने अपने एक बयान में विपक्ष के आरोपों को खारिज किया था और कहा था कि विपक्ष इस मामले में देश को गुमराह कर रहा है। इसी तरह की प्रतिक्रिया रामदास आठवले ने दी थी।

अपनी प्रतिक्रिया में पूर्व राज्यसभा सांसद व योजना आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. भालचंद्र मुणगेकर ने कहा कि रामविलास पासवान व एनडीए में शामिल अन्य दलित नेता तब कहां थे जब सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद निर्णय दिया था। उनका यह भी कहना है कि श्री पासवान स्वयं सरकार में शामिल हैं और वे किस मुंह से अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं। उनके द्वारा ऐसा कहा जाना साबित करता है कि मोदी सरकार में शामिल दलित सदस्यों की कोई सुनता नहीं है। वे प्रभावहीन हैं। प्रो. मुणगेकर यह भी कहते हैं कि पासवान संसदीय नियम-कानून भी भूल गये हैं। उन्हें क्या इस बात की जानकारी नहीं है कि जब लोकसभा का सत्र जारी हो तब अध्यादेश लाये जाने का कोई मतलब नहीं है। यदि वाकई में उन्हें दलितों और आदिवासियों की चिंता है तो उन्हें अपनी सरकार पर विधेयक लाने का दबाव बनाना चाहिए।

पूर्व राज्यसभा सांसद सह योजना आयोग के पूर्व सदस्य प्रो. भालचंद्र मुणगेकर

तकनीकी रूप से बात करें तो प्रो. मुणगेकर की बातों में दम है। अध्यादेश एक अधिकारिक आदेश है जो किसी विशेष स्थिति से निपटने के लिए राज्य के प्रधान शासक द्वारा जारी किया जाय। साफ शब्दों में कहें तो जब सरकार आपात स्थिति में कोई कानून लागू करना चाहती है और उसे सदन में समर्थन नहीं प्राप्त हो रहा होता है तब वह अध्यादेश का सहारा लेती है। अध्यादेश एक सीमित अवधि के लिए ही लागू किया जा सकता है। यह अवधि केवल 6 सप्ताह की होती है। अवधि समाप्त होने के पहले सरकार को अध्यादेश के आलोक में विधेयक संसद में लाना पड़ता है जहां पारित होने के बाद राष्ट्रपति के अनुमोदन के उपरांत ही वह कानून लागू हो पाता है। संविधान के रचनाकारों ने ऐसा सोच समझकर प्रावधान किया होगा ताकि देश में संसद की महत्ता बनी रहे और सत्ताधारी दल तानाशाह तरीके से देश पर राज न कर सके।

प्राख्यात चिंतक व बिहार विधान सभा के पूर्व सदस्य प्रेम कुमार मणि

प्राख्यात चिंतक व बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य प्रेम कुमार मणि भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। उनके मुताबिक संसद का सत्र जारी रहने की स्थिति में अध्यादेश लाये जाने की मांग पूरी तरह लोगों को दिग्भ्रमित करने वाला है। उन्हाेंने कहा कि असली सवाल यह नहीं है कि वे ऐसी मांग कर रहे हैं। बल्कि वे ऐसी मांग क्यों कर रहे हैं,  यह मुख्य सवाल है। आप ही सोचिए यदि मोदी सरकार एससी/एसटी एक्ट को सुदृढ करने के लिए कोई नया संशोधन विधेयक लाये तब कौन विरोध करेगा? यदि कांग्रेस या अन्य विपक्षी दल इसका विरोध करते हैं तो मोदी सरकार को चाहिए कि वह उन्हें विरोध करने दे। उनके पास बहुमत है। कानून तो बना ही लेंगे। लेकिन इसी बहाने कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों का स्टैंड भी सामने आ जाएगा। प्रेम कुमार मणि यह भी कहते हैं कि असली समस्या विपक्ष नहीं है। भाजपा इस बात को समझती है कि उसके अंदर के कुलीन ही इसके लिए तैयार नहीं होंगे कि एससी/एसटी को और सख्त बनाया जाय।

(कॉपी एडिटर : एफपी डेस्क)


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