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एलेनर जेलिअट की नज़र में डॉ. आंबेडकर

एलेनर जेलिअट की किताब ‘आंबेडकर्स वर्ल्ड : द मेकिंग ऑफ़ बाबासाहेब एंड द दलित मूवमेंट’ डॉ. आंबेडकर के जीवन के सामाजिक-राजनीतिक पक्षों एक विस्तृत और गंभीर अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह पूरा अध्ययन प्रमाणिक तथ्यों और संदर्भों से युक्त है। डॉ. आंबेडकर को समझने के लिए यह एक जरूरी किताब है। यशवंत ज़गाडे :

एलेनर जेलिअट ने 1960 के दशक में आंबेडकर पर जो शोध पत्र लिखा उसका विषय था आंबेडकर्स वर्ल्ड : द मेकिंग ऑफ़ बाबासाहेब एंड द दलित मूवमेंट। यही उनकी पी.एच.डी. का थीसिस भी था। उनका यह शोधपत्र हमें एक इतिहासकार की दृष्टि से आंबेडकर के जीवन और दलित आन्दोलन के बारे में विस्तार से बताता है। उनकी यह पुस्तक आज भी एक महत्त्वपूर्ण कृति है क्योंकि बाबासाहेब के नहीं रहने के बाद दलित आन्दोलन पर लिखा गया यह पहला अकादमिक शोध था। इस शोधपत्र ने इस आन्दोलन के इतिहास को वैश्विक पाठकों तक पहुंचा दिया क्योंकि इसकी भाषा (अंग्रेजी) सरल और प्रांजल थी।

जेलिअट आंबेडकर के सामाजिक-राजनीति जीवन को पांच खंडों में बांटती हैं : (1) महार पृष्ठभूमि, (2) अस्पृश्य आन्दोलन, (3) राजनीति में दबे-कुचले वर्ग, (4) धर्मांतरण आन्दोलन, (5) आंबेडकर की पार्टी राजनीति

जेलिअट परम्परागत बलुतेदारी व्यवस्था में महारों की भूमिका और औपनिवेशीकरण की वजह से इसमें आए परिवर्तनों के बारे में लिखा है : कैसे ब्रिटिश सेना में भर्ती होने की वजह से उनके सामाजिक-आर्थिक स्थिति में परिवर्तन आया। इसकी वजह से आंबेडकर से पहले गोपाल वालंगकर, किसन बनसोडे और शिवराम काम्बले दलितों के हितचिन्तक और मार्गदर्शक बनकर उभरे। इन नेताओं ने महारों में आलोचनात्मक चेतना की आधारशिला रखी और शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में उनकी उन्नति के लिए कई संस्थानों की स्थापना की।

एलेनर जेलिअट

इस पुस्तक के दूसरे खंड में उन विभिन्न तरीकों का जिक्र है जिसको आंबेडकर ने अपने शुरुआती दिनों में अपनाया। इनमें पूरे महाराष्ट्र में आयोजित अस्पृश्यों के सम्मलेन भी शामिल हैं। इन सम्मेलनों का उद्देश्य अस्पृश्यों में चेतना का विकास करना और आम कार्रवाई के लिए जनमत जुटाना था। दूसरा, अमरावती, नासिक और पुणे में मंदिर-प्रवेश आन्दोलन शुरू किया गया।  आंबेडकर ने इनमें से किसी भी आन्दोलन का नेतृत्व नहीं किया; उनका नेतृत्व वास्तविक से ज्यादा सांकेतिक था। यहाँ लेखक एक पत्र प्रस्तुत करती हैं जो 1934 में आंबेडकर ने भाउराव गायकवाड को लिखा था जिसमें उन्होंने लिखा था की मंदिर-प्रवेश आन्दोलन “दलित वर्गों” में जोश का संचार करने का सबसे अच्छा तरीका है ताकि वे हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में अपनी निम्न स्थिति के बारे में सजग हो जाएं। नासिक सत्याग्रह के बाद, उन्होंने महसूस किया कि इस आन्दोलन से जिस उद्देश्य की प्राप्ति की उम्मीद थी उसे प्राप्त कर लिया गया है और मंदिर-प्रवेश का आन्दोलन अब अप्रासंगिक हो गया है। दो साल बाद, 1936 में आंबेडकर ने धर्मांतरण की योजना की घोषणा की।

आंबेडकर्स वर्ल्ड : द मेकिंग ऑफ़ बाबासाहेब एंड द दलित मूवमेंट

तीसरा, आंबेडकर ने अखबारों का प्रयोग जातिवाद -विरोधी संघर्ष के लिए किया। उनके पूर्ववर्तियों ने भी ऐसा किया था पर उन्होंने इसके लिए काफी हद तक अखबारों के साथ मिलकर रणनीति बनाई और मूकनायक, बहिष्कृत भारत, जनता और प्रबुद्ध भारत जैसे अखबारों की मदद ली। यह विरासत आज भी ज़िंदा है। चौथा और अन्तिम, उन्होंने बहिष्कृत हितकारी सभा जैसे संस्थानों की स्थापना की। इस संस्थान की भूमिका में लोगों को शिक्षित करना और इसमें सभी “अस्पृश्य” जातियों और सभी दलित वर्गों के जीवन के सभी पक्षों को शामिल करना था। इस पुस्तक का तीसरा अध्याय साउथबरो कमिटी (1918), साइमन कमीशन (1928)  और गोलमेज सम्मलेन (1930-32) जैसे विभिन्न आयोगों में उन्होंने जो अपनी बात रखी उसकी अंतर्दृष्टि से हमें रू-ब-रू कराता है। चूंकि ब्रिटिश सरकार भारत में सुधार लागू करने जा रही थी, उस स्थिति में आंबेडकर की बातचीत ने अस्पृश्यों के लिए राजनीतिक अधिकार हासिल करने में महती भूमिका निभाई। हालांकि, पूना संधि के लिए गांधी को जबरदस्ती बाध्य करने के बाद आंबेडकर को अस्पृश्यों के लिए अलग निर्वाचक-मंडल की अपनी मांग के बदले उनके लिए आरक्षित सीटों से ही संतोष करना पड़ा।

चौथा है धर्मांतरण आन्दोलन जो 1936 में शुरू हुआ और 1956 तक चला। यहाँ पर लेखक हमें बताती हैं कि देश के सिख, इसाई और मुस्लिम नेता उस समय आंबेडकर के संपर्क में थे और उन्हें अपने-अपने धर्मों में शामिल होने का न्योता दे रहे थे। पर आंबेडकर, जो उस समय संविधान का प्रारूप बनाने में व्यस्त थे, बौद्धिक और राजनीतिक तौर पर इन विकल्पों से संतुष्ट नहीं थे। अंततः, 5 लाख महारों और अन्य अस्पृश्यों के साथ उन्होंने नवयान बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। यह बौद्ध धर्म की उनकी अपनी व्याख्या थी जो उनको बचपन से ही प्रभावित करता आया था।

योला, नासिक में एक बैठक को संबोधित करते डॉ. आंबेडकर

इस पुस्तक का अंतिम अध्याय पार्टी की राजनीति के माध्यम से आंबेडकर ने राजनीतिक क्षेत्र में जो हस्तक्षेप किया उसका जिक्र है। उन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (आईएलपी), शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना की। पर इनमें से सिर्फ आईएलपी ही सफल रहा क्योंकि, जेलिअट के अनुसार, आंबेडकर एक मजबूत पार्टी के गठन पर अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाए। फिर, उदाहरण के लिए, आज की बहुजन समाज पार्टी  की तुलना में उनकी पार्टी को सिर्फ अस्पृश्यों का ही समर्थन प्राप्त था जबकि मूल रूप से दलित आधार के बावजूद बहुजन समाज पार्टी “सामाजिक इंजीनियरिंग” के तहत अन्य हिन्दू जातियों को रिझाने और उनका वोट प्राप्त करने में भी सफल रही है। जेलिअट कहती हैं कि बाबासाहेब ने अपना सम्पूर्ण जीवन राजनीतिक के शीर्ष पर बिताया : आजादी के पहले ब्रिटिश शासन के साथ उनका संपर्क विभिन्न आयोगों के माध्यम से था जबकि आजादी मिलने के बाद संविधान सभा और फिर संसद के सदस्य के रूप में। अपने पूरे जीवन में वे सिर्फ तीन ही प्रदर्शनों के हिस्सा बने।

पर एक पाठक के रूप में इस पुस्तक में आंबेडकर के आन्दोलन को सिर्फ महार आन्दोलन तक सीमित रखने की बात अखरने वाली है।  यद्यपि जेलिअट ने इस पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है कि शुरू में इस पुस्तक का शीर्षक था “आंबेडकर एंड द महार मूवमेंट”  जिसे बाद में बदलकर “आंबेडकर एंड द दलित मूवमेंट” कर दिया गया और उन्होंने इस पुस्तक के अध्यायों में महार आन्दोलन के बारे में सारे सन्दर्भों को यथास्थान रखा है। यद्यपि महारों ने आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, पर शायद आंबेडकर इसे महार आन्दोलन का नाम नहीं देते। क्योंकि उनका लक्ष्य अस्पृश्यों, सभी पिछड़ी जातियों का उद्धार और खुद जाति का विनाश था।

पुस्तक का नाम : आंबेडकर्स वर्ल्ड : द मेकिंग ऑफ़ बाबासाहेब एंड द दलित मूवमेंट

लेखक :  एलेनर जेलिअट

प्रकाशक : नवयान

प्रकाशन का वर्ष 2013

मूल्य 350 रुपए

(कॉपी संपादन-सिद्धार्थअंग्रेजी से अनुवाद : अशोक झा)


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लेखक के बारे में

यशवंत ज़गाडे

यशवंत ज़गाडे टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस, मुंबई में पीएचडी कर रहे हैं

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