हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया पर जारी बहस में हिस्सा लें

सामाजिक कार्यकर्ता विशद कुमार का दावा है कि ‘हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया’ के गठन की घोषणा उच्च शिक्षा के बाज़ारीकरण की साजिश है, जिसे बहुत सुनियोजित तथा चरणबद्ध तरीके से अंजाम दिया जा रहा है। आपकी राय क्या है

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (यूजीसी) को खत्म कर उसकी जगह नयी शिक्षा नीति लाने का केंद्र के फैसले पर कई अकादमिशियनों को इस तर्क के साथ ऐतराज है कि नेताओं को अकादमिक विषयों में शामिल नहीं होना चाहिए।

गौरतलब है कि पिछले माह मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने यूजीसी अधिनियम, 1951 को रद्द कर उसके स्थान पर हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया, 2018 (एचईसीआई) लाने की घोषणा की थी। जिसे अमली जामा पहनाने तैयारी जोर-शोर पर है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा) ने भी यूजीसी को खत्म करने के सरकार के  फैसले का विरोध किया है। डूटा ने साफ कहा कि नई संस्था के आने से शिक्षा प्रणाली में सरकार का सीधा हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। क्योंकि यूजीसी और एचईसीआई में काफी बड़ा अंतर है। यूजीसी के पास विश्वविद्यालयों को रेगुलेट करना और उन्हें अनुदान यानी कि ग्रांट देने का अधिकार है। जबकि एचईसीआई के पास अनुदान देने का अधिकार नहीं होगा। एचईसीआई के आने पर अनुदान सीधे मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से जारी किया जाएगा।

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