बिहार की चुनावी राजनीति : जाति-वर्ग का समीकरण (1990-2015)

फारवर्ड प्रेस बुक्स द्वारा शीघ्र प्रकाश्य यह पुस्तक मंडल आंदोलन के बाद बिहार की राजनीति के विभिन्न आयामों जाति, धर्म, गरीबी और राजनीतिक आकांक्षाओं आदि पर प्रकाश डालती है। वही बिहार जिसने समय-समय पर देश की राजनीति की दशा और दिशा निर्धारित करने में महती भूमिका का निर्वहन किया है

इतिहास इस बात का साक्षी है कि बिहार बहुत ही लंबे समय से राजनीति के केंद्र में रहा है। इसे इसी तथ्य से समझा जा सकता है कि पिछले सात दशकों में भारत में जो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव हुए हैं, बिहार की धरती उसकी जननी रही है। 1990 के दशक में बिहार न केवल मंडल-समर्थक और मंडल-विरोधी आंदोलन के केंद्र में था, 1975 में वह आपातकाल-विरोधी आंदोलन का भी केंद्र रहा जो “जेपी आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है और जिसका नेतृत्व जयप्रकाश नारायण ने किया था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू कर दिया था। यह बताना जरूरी है कि ब्रिटिश शासन के दौरान भी बिहार ने राजनीतिक बदलाव लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। हमारे इतिहास की पुस्तकों में जिसे चंपारण आंदोलन के नाम से जाना जाता है, नील की खेती करने वाले किसानों के शोषण के खिलाफ यह आंदोलन महात्मा गांधी ने 1917 में बिहार के चंपारण से शुरू किया जो कि बिहार के उत्तर-पूर्व में स्थित एक जिला है।

फारवर्ड प्रेस बुक्स द्वारा शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक बिहार की चुनावी राजनीति : जाति-वर्ग का समीकरण (1990-2015) का कवर पृष्ठ

मंडल-दौर के बाद देश के उत्तरी राज्यों में जिस तरह की राजनीतिक लड़ाई और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की शुरुआत हुई उसकी गहरी जड़ें बिहार में ही थीं।

देश के अन्य राज्यों की तरह ही, अतीत में बिहार की राजनीति में मुख्यतः काँग्रेस का दबदबा रहा है। बिहार में कई दशकों तक काँग्रेस का निर्बाध शासन रहा और यह 1990 तक जारी रहा। इस बीच सिर्फ पांच बार जब राज्य में कुछ समय के लिए गैर-काँग्रेसी शासन रहा। पर मंडल-आंदोलन के बाद की स्थिति ने राज्य की राजनीति की दिशा और दशा बदल दी – चुनावी राजनीति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व अब पहले जैसे नहीं रहे। इस दौर में क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों का उदय हुआ और व्यापक जनाधार वाले क्षेत्रीय नेता भी सामने आए, विशेषकर समाज के निचले तबके, जैसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), दलित, आदिवासी (अविभाजित बिहार में) और मुस्लिमों में। मंडलोत्तर राजनीति ने राज्य में काँग्रेस के अवसान की शुरुआत कर दी। राज्य में मंडल आंदोलन के बाद पहला विधानसभा चुनाव 1995 में हुआ और उसके बाद से राज्य में काँग्रेस का जनाधार निरंतर गिरा है – चुनाव दर चुनाव – और आज 125 साल से ज्यादा पुरानी इस पार्टी का राज्य में राजनीतिक वजूद नगण्य हो गया है।

बिहार में मंडलोत्तर राजनीति की शुरुआत 1990 के दशक में राष्ट्रीय पार्टी के रूप में स्थापित काँग्रेस बनाम नवोदित पार्टी से हुई और यह नवोदित पार्टी थी जनता दल (जद)। पर आज यह राजनीतिक लड़ाई इसी जनता दल के दो फाड़ हुए धड़ों – राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जनता दल यूनाइटेड (जदयू) जैसी दो प्रभावशाली क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के बीच सिमट गई है जबकि दो राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियां, काँग्रेस और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों ही क्षेत्रीय दलों की सहयोगियों के रूप में सहायक की भूमिका में हैं।

लालू, शरद और रामविलास पासवन : मंडल की राजनीति के तीन सितारे

हालांकि, कभी कभार राजद के साथ गठबंधन करने वाली काँग्रेस भी राज्य में कुछ चुनाव अपने दम पर लड़ी है। भाजपा और नीतीश कुमार के नेतृत्व में जदयू 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद राज्य में टिकाऊ गठबंधन करने में कामयाब रहे। अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां जैसे राम विलास पासवान के नेतृत्व वाली लोक जन शक्ति पार्टी (एलजेपी), वामपंथी पार्टियां जैसे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (भाकपा-माले) और कुछ अन्य छोटी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों ने पिछले तीन दशक की चुनावी राजनीति में अपना योगदान दिया है। ये छोटी क्षेत्रीय पार्टियां सामान्यतया मामूली भूमिका अदा करती हैं, पर कई बार राज्य की चुनावी राजनीति में इन्होंने बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं भी निभाई हैं। फरवरी 2005 में हुए विधानसभा चुनावों में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और लोजपा द्वारा  ज्यादा सीटें जीतने वाली किसी बड़ी पार्टी को समर्थन नहीं देने की वजह से राज्य में अक्तूबर 2005 में दुबारा चुनाव हुआ। इस बार राज्य में सत्ता बदल गई। भाजपा से गठजोड़ कर दूसरी बार नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने।  

मंडलोत्तर राजनीति के तीन दशक की इस अवधि के दौरान बिहार की राजनीति में कई तरह के उतार-चढ़ाव आए हैं। इस कड़ी में नवीनतम उतार-चढ़ाव जुलाई 2017 में उस समय आया जब नीतीश कुमार ने राजद के साथ महागठबंधन को तोड़ दिया और सरकार से इस्तीफा दे दिया पर 24 घंटे के अंदर ही भाजपा से गठजोड़ कर पुनः मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता पर काबिज हो गए। यहाँ यह गौर करना जरूरी है कि नीतीश कुमार ने 2015 का चुनाव राजद और काँग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था जो कि अपने आप में एक असामान्य गठबंधन था। बिहार की राजनीति के दो धुर विरोधी, नीतीश कुमार और लालू प्रसाद साथ आए और ‘महागठबंधन’ बनाया; उनका एकमात्र उद्देश्य बिहार में भाजपा को चुनाव जीतने से रोकना था। यह महागठबंधन 2015 का चुनाव जीतने में सफल रहा और उसने भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टी लोजपा एवं राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी) को हराकर राज्य में सरकार का गठन किया; पर यह सरकार अल्पजीवी साबित हुई। नीतीश कुमार ने उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव व राजद के अन्य नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोपों और उनके खिलाफ सीबीआई के छापे के कारण महागठबंधन को तोड़ दिया। नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार के प्रति कोई हमदर्दी नहीं दिखाने का दिखावा किया पर वे अंततः उसी पार्टी के समर्थन के साथ सरकार में वापस आए जिस पर उन्होंने 2015 के विधानसभा चुनाव के दौरान सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया था। अगर चुनाव से पहले लालू प्रसाद और काँग्रेस के साथ मिलकर नीतीश कुमार का ‘महागठबंधन’ बनाना लोगों को अस्वाभाविक लगा था तो उसी भाजपा के साथ मिलकर उनका सरकार बनाना भी लोगों को अजीब लगा जिसके खिलाफ चुनाव में उन्होंने बिहार की जनता का समर्थन हासिल किया था। बिहार में शोधकर्ताओं की टीम द्वारा किए गए अनुभवजन्य शोधों के आधार पर यह पुस्तक मंडलोत्तर बिहार की राजनीति में आए इन उतार-चढ़ावों का काफी विस्तार से विश्लेषण करती है।

अक्टूबर 2005 में दूसरी बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालते नीतीश कुमार(फोटो : कृष्णमुरारी किशन)

किसी भी राज्य की राजनीति उसके समाज और उसकी अर्थव्यवस्था के बीच संबंधों की देन होती है। बिहार के सामाजिक और आर्थिक इतिहास की समझ पिछले कई दशकों में इसकी चुनावी राजनीति की बदलती प्रकृति को समझने में मदद करेगी। इस पुस्तक के अध्याय एक में बिहार के सामाजिक और आर्थिक इतिहास की भूमिका की चर्चा की गई है। जब बिहार अविभाजित था और झारखंड भी इसका हिस्सा था, उस समय राज्य मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों में विभाजित था – उत्तरी बिहार, मध्य बिहार और दक्षिण बिहार। बिहार से झारखंड के अलग होने के बाद समाजिक, सांस्कृतिक और राजनीति भिन्नताओं के आधार पर राज्य का एक नया भौगोलिक वर्गीकरण किया गया। यह अध्याय राज्य के इन पाँच क्षेत्रों – तिरहुत, मिथिला, मगध, भोजपुर और सीमांचल (पूर्व) में इन भिन्नताओं की विस्तार से चर्चा करता है। यद्यपि यह वर्गीकरण मूलतः सांस्कृतिक है, इनका प्रयोग राजनीतिक अनुस्थापनों के अध्ययन के लिए भी होता है। हर क्षेत्र अपनी विशिष्ट सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के अनूठे सम्मिश्रण को प्रदर्शित करता है और इनकी भाषा और बातचीत का लहजा एक-दूसरे से अलग है। राज्य की राजनीति में जाति एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। इसे ध्यान में रखते हुए इस अध्याय में सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में विभिन्न जातियों के महत्त्व पर विस्तार से चर्चा कर उचित ही किया गया है। किसी जमाने में ऊंची जातियों की वर्चस्व वाली राजनीतिक संरचना के लिए जाने वाले बिहार में मंडलोत्तर राजनीति ने प्रभावशाली मध्य जातियों जैसे आम तौर पर ओबीसी और विशेषकर यादवों को बिहार की राजनीति के केंद्र में ला दिया। यह पुस्तक मंडलोत्तर बिहार की राजनीति की ही चर्चा पर केन्द्रित है। बिहार के मतदाताओं में यादवों और मुसलमानों की संख्या काफी अधिक है। कटिहार, दरभंगा, पूर्णिया, सीवान और कुछ अन्य जिलों में मुसलमानों की अच्छी ख़ासी उपस्थिति का परिणाम यह निकला है कि राजनीतिक पार्टियां मुसलमानों को वोट बैंक की तरह देखने को मजबूर हुई हैं। कुछ राजनीतिक पार्टियां मुस्लिमों को वोट बैंक समझकर ही लामबंदी करती हैं। इस अध्याय के एक हिस्से में बिहार की महत्त्वपूर्ण राजनीतिक पार्टियों के संक्षिप्त इतिहास, उनके चुनावी इतिहास और उनके नेतृत्व की चर्चा की गई है।

इसके बावजूद कि इस पुस्तक की केन्द्रीय विषयवस्तु मंडलोत्तर बिहार में चुनावी प्रक्रिया और राजनीतिक परिवर्तनों  का विश्लेषण है, वर्तमान को समझने के लिए राजनीतिक इतिहास हमेशा ही महत्त्वपूर्ण होता है। अध्याय 2 में 1967 और 1989 के बीच बिहार के राजनीतिक इतिहास का विश्लेषण किया गया है।

भारतीय चुनावी इतिहास में इस अवधि को काँग्रेस काल कहा जाता है, इसके बावजूद कि इसकी निरंतरता में संक्षिप्त व्यवधान उपस्थित हुए। देश में पहली बार बिहार सहित कई राज्यों में गैर-काँग्रेसी सरकार की स्थापना हुई। आजादी के बाद के बिहार के राजनीतिक इतिहास पर नजर दौड़ाने से इसके तीन भिन्न चरणों का पता चलता है। इसका पहला चरण (1947-1967) काँग्रेस के वर्चस्व का काल है जब ऊंची जातियाँ इसकी सत्ता-संरचना के शीर्ष पर बैठी दिखती हैं। दूसरा चरण (1967-1990) को संक्रमण काल कहा जा सकता है जब राजनीतिक क्षेत्र में काँग्रेस के साथ-साथ ऊंची जातियों के प्रभुत्व में आ रही क्रमशः गिरावट और इसके साथ ही मध्य जातियों के धीमे किन्तु निरंतर उभरते प्रभाव को देखा जा सकता है। तीसरा चरण (1990 और उसके बाद) प्रथम चरण का पूर्ण विपर्यय है जिसमें काँग्रेस पार्टी और ऊंची जातियाँ राज्य की राजनीति में हाशिये पर चली जाती हैं। इस अध्याय में राज्य के चुनावी इतिहास के विभिन्न चरणों का विस्तार से विश्लेषण किया गया है।

जननायक कर्पूरी ठाकुर एक जनसभा को संबोधित करते हुए

1990 का दशक बिहार सहित कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत का है। 1989 के लोकसभा चुनावों में जीत के बाद वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद बिहार में ओबीसी राजनीति की शुरुआत का संकेत भी यह देता है। वीपी सिंह के प्रधानमंत्री बनने के बाद राज्य में पहला विधानसभा चुनाव 1990 में हुआ। अध्याय तीन में 1990 और 1995 के विधानसभा चुनावों में राजनीतिक लामबंदी और राजनीतिक परिणामों की प्रक्रिया की विस्तार से चर्चा की गई है। 1990 के विधानसभा चुनावों के बाद राज्य में काफी दिनों बाद गैर-काँग्रेसी सरकार का गठन हुआ और लालू प्रसाद यादव प्रथम बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। जनता दल की इस जीत ने बिहार में काँग्रेस के लंबे शासन का अंत कर दिया। 1990 के विधानसभा चुनावों में हारने के बाद काँग्रेस के हाथ से न केवल बिहार की सत्ता गई, बल्कि इस पराजय ने काँग्रेस के व्यवस्थित पराभव की शुरुआत भी कर दी। 1995 के विधानसभा चुनावों ने लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जद के प्रभुत्व को और ज्यादा स्थापित कर दिया और बहुतों की अपेक्षाओं के विपरीत पार्टी ने अपने दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया। राज्य में भाजपा के समर्थन का सीमित आधार, काँग्रेस के निरंतर घटते जनाधार और नीतीश कुमार की जनता दल से विदाई के बाद लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने 1995 के विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत से विजय हासिल की। नीतीश कुमार ने जनता दल से नाता तोड़कर अलग समता पार्टी का गठन किया। मंडलोत्तर काल में हुआ यह पहला चुनाव था जिसमें चुनावी लड़ाई में मुख्यतः ओबीसी ही ओबीसी के खिलाफ थे।

चौथे अध्याय में 1995 के विधानसभा चुनावों से 1999 के आम चुनावों के बीच बिहार के राजनीतिक इतिहास की चर्चा की गई है। इस अवधि में जो विभिन्न राजनीतिक उथल पुथल हुए उसकी इसमें पड़ताल की गई है। 1990 और 1995 के विधानसभा चुनावों में लालू प्रसाद यादव के एकतरफा प्रभाव से लेकर भाजपा की चुनावी उपस्थिति में तेजी से आए चढ़ाव तक, इस अध्याय में राज्य की राजनीति की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विश्लेषण केंद्र में राजनीतिक आदेश की बदलती प्रकृति की पृष्ठभूमि में किया गया है। क्षेत्रीय दलों के भाग्योदय और पिछड़ी जातियों के रसूख को काँग्रेस के घटते प्रभाव के बरक्स तौला गया है और दोनों ही मामलों का गहन विश्लेषण इसकी संभावित प्रक्रिया को समझने के लिए किया गया है। इसके अलावा जाति और धार्मिक पहचानों की राजनीतिक पार्टियों के साथ संबंधों को लोकनीति-सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटी (सीएसडीएस) की टीम के सर्वेक्षणों से प्राप्त आंकड़ों और निष्कर्षों के आधार पर किया गया है ताकि राजनीतिक गठबंधनों और राजनीतिक दलों पर पड़ने वाले इसके प्रभावों की गत्यात्मकता की जांच की जा सके। मतदाताओं के व्यवहार और अभिप्रेरणा का प्रश्न केंद्र में आ जाता है क्योंकि यह अध्याय बिहार की राजनीति की अस्पष्ट प्रकृति की चर्चा करता है जहां परिवर्तन नियमित है और मतदाता, पार्टी और नेता के बीच संबंध जटिल और बहुस्तरीय समाज के साथ होने वाले संवाद पर निर्भर करता है।

अध्याय पांच प्राथमिक रूप से 1999 के लोकसभा चुनावों के बाद बिहार की राजनीतिक स्थिति के बारे में है। इन चुनावों में भाजपा-जदयू गठबंधन को विश्वसनीय जीत मिली, पर राज्य में विधानसभा का चुनाव आते-आते इनमें आपसी लड़ाई इतनी बढ़ गई कि इससे राजद-काँग्रेस गठबंधन को लाभ हुआ और उनको भारी बहुमत से जीत हासिल हुई। इस तरह, यह अध्याय इनकी अविश्वसनीय जीत का विश्लेषण करता है और इसका कारण जानने का प्रयास करता है। इसके अतिरिक्त, इस अध्याय में 2014 के लोकसभा चुनावों में राजद की हैरान करने वाली जीत का कारण तलाशने की भी कोशिश की गई है। लालू-राबड़ी के शासनकाल में विकास का नहीं होने के बावजूद राजद को गरीब पिछड़ी जातियों का निरंतर समर्थन एक विरोधाभास की तरह लगता है पर यह अध्याय इस मुद्दे को पहचान और सामाजिक न्याय के चश्मे से इसका विश्लेषण करता है और कहता है कि लालू की सरकार का विकास के मोर्चे पर खराब प्रदर्शन के बावजूद ‘गरीबों के मसीहा’ के रूप में उनकी करिश्माई छवि ने उनकी जीत सुनिश्चित करने में काफी अहम भूमिका निभाई।   

इस अध्याय में बिहार से झारखंड के अलग होने और राज्य की चुनावी राजनीति पर इसके असर की भी चर्चा की गई है। अंततः, इस अध्याय का अंत 2005 के विधानसभा चुनावों में भाजपा-जदयू गठबंधन की जीत से होती है जिसने लालू के विजय रथ को थोड़े समय के लिए रोक दिया। इस जीत की पड़ताल के क्रम में, मतदाताओं के व्यवहार को जरूरत से ज्यादा सरल बताने से बचने की कोशिश इस अध्याय में की गई है और कहा गया है कि यह जीत विभिन्न जातियों, विकास और आर्थिक कारकों के मिश्रित प्रभाव के कारण हुआ जिसने नीतीश कुमार के उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया जबकि लालू प्रसाद यादव के अवसान को संभव बना दिया।

अध्याय 6 में 2005 के विधानसभा चुनावों पर ध्यान केन्द्रित किया गया है और मतदान के तरीकों और गठबंधन की राजनीति पर गौर किया गया है जो इस ऐतिहासिक चुनाव के पीछे मुख्य कारक रहे। राज्य की राजनीति पर नजर रखने वाले अधिकांश पर्यवेक्षकों के लिए इस चुनाव ने बिहार में न केवल एक नई राजनीतिक युग की शुरुआत की बल्कि इसने एक नए सामाजिक और आर्थिक जीवन की भी नींव रखी। इस चुनाव में नीतीश कुमार का सबसे बड़ा नारा था “नूतन बिहार” जिसने उनका नाम न केवल राज्य के बल्कि देश के बड़े नेताओं में शुमार कर दिया। आनेवाले वर्षों में गरीब बिहार जिसका नाम अक्षमता, भ्रष्टाचार और अपराध से जुड़ा था, अब ऐसा नहीं रहा; इसमें महत्त्वपूर्ण बदलाव आया और इसका श्रेय जाता है कुमार के उस इंद्रधनुषी गठबंधन का जो उन्होंने तैयार किया।

इस अध्याय में राज्य की ओर से होने वाली कार्रवाई में सामाजिक न्याय की गत्यात्मकता को किस तरह शामिल किया गया इसका बहुत ही बारीकी से विश्लेषण किया गया है और इसमें महादलित आयोग के गठन से लेकर महिला सशक्तीकरण पर दिये गए ज़ोर और इनकी वजह से हुए राजनीतिक फायदे का आकलन किया गया है। राज्य में जाति-आधारित लामबंदी की पड़ताल करते हुए इस अध्याय में जानबूझकर किसी विशेष जाति के मतदाताओं के व्यवहार के बारे में किसी व्यापक सूक्ष्म सिद्धान्त के प्रतिपादन की अनदेखी की गई है ताकि मतदान के तरीकों की चेतनता और इसकी क्षणिकता को किसी तरह के दर्जे में फिट होने का मामला न बनाया जाए। उदाहरण के लिए, यह आम तौर पर माना जाता है की मुस्लिम राजद के प्रबल समर्थक रहे हैं, अध्याय 5 में राज्य में चुनाव अध्ययन के बारे में सीएसडीएस के आंकड़ों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण कर यह बताया गया है कि 1995 और 2005 के बीच हुए चुनावों में राज्य में राजद और मुस्लिम मतदाताओं के बीच संबंधों में भी बदलाव आया। ऐसा करते हुए इस अध्याय का उद्देश्य उस गत्यात्मकता की प्रकृति को समझना है जो राज्य के राजनीतिक जीवन की विशेषता है। इसके अतिरिक्त, इस अध्याय में भारत निर्वाचन आयोग ने जो महत्त्वपूर्ण चुनाव सुधार लागू किए हैं, उसकी भी चर्चा की गई है और इन सुधारों की पड़ताल भी की गई है। इस बात को जानने की कोशिश की गई है कि इन सुधारों ने मतदाताओं की संख्या को कैसे बढ़ाया और क्या इसकी वजह से किसी राजनीतिक दल (राजद) की हार हुई और दूसरे (भाजपा-जदयू) को इसका लाभ पहुंचा। इन दोनों ही पक्षों के कारण राज्य में इस अवधि में हुए सुधारों की एक सम्मिलित स्पष्ट तस्वीर हमारे सामने उभरती है और यह नीतीश कुमार को नए बिहार के परिवर्तनकामी राजनीति का चेहरा के रूप में स्थापित करता है।

अगर 2009 का लोकसभा चुनाव राजद और उसके नेता लालू प्रसाद यादव को बहुत ही शक्तिशाली झटका दिया, तो 2010 के विधानसभा चुनावों ने उन्हें और भी शर्मसार किया। इन चुनावों में उनके लिए मतदान करने वाले लोगों की संख्या में भारी कमी आई और उनको सीट भी काफी कम मिले। कई पर्यवेक्षकों ने तो यहाँ तक कहना शुरू कर दिया था कि मतदाताओं ने लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय की राजनीति को अब नकार दिया है और अब उन्होंने नीतीश कुमार के विकास पर आधारित मॉडल में अपना विश्वास जता दिया है। इन दावों पर गौर करते हुए अध्याय 7 में इस तरह की बहसों के प्रभावों को समझने की कोशिश की गई है। बिहार के विभिन्न क्षेत्रों की सामाजिक और राजनीतिक संस्कृति के वैविध्य पर गौर करते हुए इस अध्याय में उन सभी तरह के कारणों की चर्चा की गई है जिसकी वजह से नीतीश कुमार को (लालू यादव के खिलाफ) मतदाताओं का समर्थन मिला। आंकड़ों, सर्वेक्षणों की रिपोर्टों और मतदान के अंतिम आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए इस अध्याय में उन संभावित कारकों पर ज्यादा प्रकाश डाला गया है जिन्होंने 2010 के चुनावों को इतने ठोस रूप में एकतरफा बना दिया। विकास, जाति और जाति-आधारित लामबंदी में से प्रत्येक पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है और इस अध्याय में जाति पहचान, आकांक्षावादी राजनीति और चुनावी राजनीति के बीच अंतरसंबंधों की पड़ताल की गई है।

इस पुस्तक के अंतिम अध्याय आठ में पिछले कुछ सालों में बिहार की राजनीति में आए बदलाव का विश्लेषण किया गया है। इसमें लोजपा और रालोसपा के साथ भाजपा के गठबंधन का विश्लेषण किया गया है जिसके कारण भाजपा को 2014 में भारी विजय मिली और इसी गठबंधन को अगले साल 2015 में हुए विधानसभा चुनावों में मुंह की खानी पड़ी और फिर किस तरह नीतीश कुमार अपने गठबंधन के साथी राजद को बदलकर भाजपा के साथ दुबारा सत्ता में आ गए। इस अध्याय के प्रथम खंड में 2014 के लोकसभा चुनावों का विश्लेषण किया गया है जो कि कई अर्थों में विशिष्ट था। पहला, इस चुनाव ने जदयू और भाजपा के बीच दशकों से चले आ रहे गठबंधन का अंत कर दिया; दूसरा, भाजपा को जो जनादेश मिला वह पिछले कुछ दशकों में राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी पार्टी को मिले जनादेश में सबसे ज्यादा स्पष्ट था; और अंत में, बिहार में चुनाव जीतने के लिए जो गठबंधन बना उसमें ऐसे दल शामिल थे जिनका एकसाथ आना बड़ी बात थी। नीतीश के साथ अपनी सफल साझेदारी से बाहर निकलते हुए भाजपा ने राम विलास पासवान के लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा के रालोसपा से हाथ मिलाया और इस गठबंधन ने बिहार में लोकसभा की 40 में से 31 सीटों पर कब्जा कर लिया। 2014 के लोकसभा चुनावों के परिणाम के बारे में यह कहा गया कि यह जातिवादी गठबंधनों पर विकास की राजनीति की जीत है। इस अध्याय ने जाति और विकास पर होने वाली बहस को एक बार फिर खोला है। हालांकि इस पर इसके पिछले अध्याय में भी चर्चा की गई है, पर इसमें जो चर्चा है वह भाजपा के पक्ष में और नीतीश के रूपांतरकारी नीतियों की सफलता के खिलाफ है। भाजपा की जीत के लिए कई कारकों जैसे सत्ताधारी काँग्रेस-विरोधी लहर और भाजपा के पूर्ण बदलाव वाली तेज गति से विकास के वादे को जिम्मेदार बताया गया है। इस अध्याय में कहा गया है कि राज्य में जातियों के परंपरागत निष्ठा में बदलाव तो आया पर यह विकास के लिए जाति को नकारने का मामला एकदम नहीं है।

इस अध्याय के दूसरे खंड में एक अन्य ऐतिहासिक चुनाव की चर्चा की गई है – बिहार विधानसभा चुनाव 2015 की। यह चुनाव बिहार में भाजपा के विजय रथ को रोकने में कामयाब रहा और बिखर रहे विपक्ष में आशा का संचार किया। इस अध्याय में कहा गया है कि महागठबंधन की सफलता के कई कारण थे जिसकी वजह से महागठबंधन भाजपा पर भारी पड़ा। जाति ने एक बार फिर इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई पर यह अध्याय सरकार के 10 साल के सकारात्मक सुधारों के बारे में जनता की समझ को समझने की बात करता है। इस क्रम में, इस अध्याय में विकास और जाति पहचान को आपस में जोड़ने के झूठ को चुनौती दी गई है। इसमें एक-दूसरे को सूचना-संपन्न रखने, प्रभावित करने और उनमें परिवर्तन लाने वाले तरीकों पर गौर किया गया है जो राज्य में राजनीति को काफी गत्यातमक और बहुमुखी बनाए रखता है। अगर इस पुस्तक में राजनीति में आए नवीनतम बदलाव का जिक्र नहीं किया जाता तो यह पाठकों के साथ अन्याय होता, इसलिए अंतिम अध्याय के अंतिम खंड में नीतीश कुमार और लालू यादव के बीच नीतीश कुमार के मंत्रिमंडल में उप-मुख्यमंत्री के ओहदे पर बैठे राजद नेता तेजस्वी यादव पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण गठबंधन के टूटने का विस्तार से विश्लेषण किया गया है। इस विश्लेषण का समापन आम तौर पर बिहार में भावी चुनावी राजनीति की संभावनाओं और नीतीश कुमार की छवि विशेषकर उनकी लोकप्रियता के बारे में संकेत से होता है। पर जो प्रश्न शेष रह जाता है वह है – क्या नीतीश कुमार गठबंधन के नए पार्टनरों की तलाश कर और उनसे गठबंधन की नई राजनीतिक चाल चलकर चुनावी फायदे में रहेंगे, या ऐसा तो नहीं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी तरह की हमदर्दी नहीं दिखाने के यज्ञ में आहुति देते हुए वे अपनी उंगली जला बैठे हैं?

(अंग्रेजी से अनुवाद : अशोक झा, कॉपी संपादन सिद्धार्थ/एफपी डेस्क)


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