कंगला मांझी सरकार की पुण्यतिथि पर गोंड आदिवासियों ने लिया एक होने का संकल्प

गोंड आदिवासियों के नेता कंगला मांझी की 34वीं पुण्यतिथि पर छत्तीसगढ़ के बलोद जिले के दुर्ग में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौके पर सूबे के सभी जिलों से गोंड समाज के लोग शामिल हुए और एकजुट होने का संकल्प लिया। फारवर्ड प्रेस की खबर :

गोंड आदिवासियों ने बीते 5 दिसंबर 2018 को कंगला मांझी (हीरा सिंह देव) को उनकी 34वीं पुण्यतिथि पर कृतज्ञतापूर्वक याद किया और एकजुटता का संकल्प लिया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ के बलोद जिले के बघमार रिजर्व विकास क्षेत्र (दुर्ग) में कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसके पहले कंगला मांझी द्वारा स्थापित संगठन किसान सैनिक के सदस्यों द्वारा उनके निवास स्थान पर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इस अवसर पर कंगला मांझी की पत्नी बिरझा देवी भी मौजूद रहीं।

कंगला मांझी की स्मृति में एक रैली निकाली गई, जो शहर के मुख्य मार्ग से होती हुई उनके निवास स्थान तक पहुंची। इस दौरान ‘जय बुढ़ादेव’, ‘भारत माता की जय’, ‘सुभाष चंद्र बोस की जय’, ‘तीर कमान – एक समान, सभी आदिवासी एक समान’ तथा ‘मांझी अंतर्राष्ट्रीय सरकार की जय’ के नारे लगाए गए। साथ ही गोंडवाना राष्ट्रगान ‘‘देवगणों का देश हमारा, झण्डा ऊंचा रहे हमारा’’ गाया गया तथा छत्तीसगढ़ के सभी जिलों से आए किसान सैनिकों का सम्मान किया गया।

कंगला मांझी की पुण्यतिथि पर उपस्थित गणमान्य व किसान सैनिक

इस मौके पर सैनिकों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय सरकार मांझी के द्वारा शुरू किए गए समाजवाद अंतर्राष्ट्रीय किसान सैनिक संगठन को सुचारू रूप से चलाने के साथ-साथ एकजुट रहने का संकल्प लिया गया।

कार्यक्रम को संबोधित करते महेश उईके

इस मौके पर संस्था के सबसे पुराने किसान सैनिक महेश उईके ने मांझी अंतर्राष्ट्रीय सरकार उर्फ कंगला मांझी (हीरा सिंह देव मांझी) के साथ बिताए गए अनुभवों को साझा किया। उन्होंने कहा, “कंगला मांझी जी ने आदिवासियों के लिए आजादी की लड़ाई लड़ी और बस्तर के बैलाडिला के लोहा खदान से अंग्रेजी शासन का अंत होना शुरू हुआ। कंगला मांझी ने ललकार कहा कि इस धरती के एक ही मालिक आदिवासी हैं और हम आदिवासी अपने जल,जंगल और जमीन किसी को नहीं देंगे। तब ब्रिटिश सरकार के अधिकारी ने कहा कि हम विश्व के सबसे ताकतवर राष्ट्र हैं, हमें कोई हरा नहीं सकता है। इस पर मांझी ने कहा कि हम आदिवासी भील हैं, आदिशक्ति महादेव, बुढ़ादेव के वंशज हैं। हमें कोई हरा नहीं सकता। इस पर अंग्रेज अधिकारी ने कहा कि हमारे तोप-गोले, बंदूक के सामने ये तुम्हारा तीर, धनुष, भाला और बरछी काम नहीं आएगा। तुम एक तीर चलाओगे, तब हम गोलियों की बौछार कर देंगे। मांझी ने तब ललकार कर कहा था कि तुम एक बार छीनोगे, हम उससे कहीं अधिक हथियार लाएंगे। तुम्हारी एक गोली चलने से पहले हम सैकड़ों तीर गिरा देंगे। मांझी ने वैसा ही किया और लगभग 15 दिन चली लड़ाई में आदिवासियों ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए।”

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महेश उईके ने कहा, “आदिवासी समाज और गोंड समाज को बांट दिया गया। इसके पीछे मोहनदास करम चंद गांधी थे, जो बाहर से आए आर्यों की मनुवादी विचारधारा पर काम कर रहे थे। गोंड समाज की संस्कृति को तहस-नहस कर दिया गया। आदिवासी मूर्ति पूजा नहीं करते थे, लेकिन उन पर इसे थोपा गया।”

(कॉपी संपादन : प्रेम/एफपी डेस्क)


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