खोए हुए बुद्ध की खोज : इतिहास का पुनर्पाठ

भाषा वैज्ञानिक डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने अपनी पुस्तक ‘खोए हुए बुद्ध की खोज’ में भारतीय इतिहास के कई अनछुए अध्याय-पहलू को उजागर किया है। वे बुद्ध, बौद्ध सभ्यता और खासतौर से प्राचीन भारतीय इतिहास को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने के लिए प्रेरित करते हैं

बुद्ध का जिक्र आते ही मानस पटल पर सत्य और समानता के संदेशक गौतम बुद्ध की छवि उभरती है। हमें यह भी बताया गया है कि गौतम बुद्ध का नाम सिद्धार्थ था। विश्व विख्यात इतिहासकार डी.डी. कोसंबी ने गौतम बुद्ध का नाम गोतम कहा है। भाषा वैज्ञानिक डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह का मानना है कि सिद्धार्थ का पूरा ध्वनिशास्त्र संस्कृत का है, इसलिए शाक्य मुनि गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ होना संभव नहीं है। वह एक अभिलेख का साक्ष्य पेश करते हुए यह सिद्ध करते हैं कि गौतम बुद्ध के बचपन का नाम सुकिति था। गौतम बुद्ध के निर्वाण के बाद उनके शाक्य बंधुओं ने उनके भस्मावशेष को अस्थि-कलश में रखकर पिपरहवा स्तूप का निर्माण कराया था। पिपरहवा स्तूप के अस्थि कलश पर एक अभिलेख अंकित है। अभिलेख की भाषा ब्राह्मी (धम्म) और भाषा प्राकृत है। अभिलेख पर ‘सुकिति भतिनं स भगिनिकन स पुतदलन इयं सलिल निधाने बुधस भगवते सकियन’ लिखा हुआ है। इसका हिंदी में अर्थ हुआ कि ‘सुकिति के शाक्य भाइयों ने भगवत बुद्ध का यह शरीर-निधान (स्तूप) बनवाया’

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डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने अपनी पुस्तक ‘खोए हुए बुद्ध की खोज’ में भारतीय इतिहास के कई अनछुए अध्याय-पहलू को उजागर किया है। वे बुद्ध, बौद्ध सभ्यता और खासतौर से प्राचीन भारतीय इतिहास को एक नए परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने के लिए प्रेरित करते हैं। यह भी कहा जा सकता है कि इस भाषा वैज्ञानिक ने कथित तौर पर राष्ट्रवादियों के शीर्षासन कर रहे इतिहास को पैरों के बल खड़ा कर दिया है। ठीक वैसे ही जैसे कार्ल मार्क्स ने हीगेल के दर्शन को उलट करके सीधा किया था।

‘खोए हुए बुद्ध की खोज’ पुस्तक का कवर पृष्ठ

मसलन, डाॅ. सिंह ने बुद्ध की परम्परा का जिक्र करते हुए कहा है कि गौतम बुद्ध से पहले भी कई बुद्ध हुए। देशी और विदेशी दोनों स्रोत बताते है कि गौतम से पहले भी बुद्ध थे। सम्राट अशोक मौर्य का निग्लीवा अभिलेख, भरहुत अभिलेख, एलोरा की गुफा में बनी सप्त बुद्ध की मूर्तियां, पालि साहित्य, फाहियान सहित अनेक विदेशी यात्रियों ने पूर्ववर्ती बुद्धों का उल्लेख किया है। जातक अट्ठकथा में 24 पूर्व बुद्धों का विवरण है। वहीं, महायान बौद्ध साहित्य 54 बुद्धों का उल्लेख करता है। विपस्सी बुद्ध, सिखी बुद्ध, वेस्सभू बुद्ध, कुकुसन्ध बुद्ध, कोनागमन बुद्ध, कस्सप बुद्ध और गोतम बुद्ध के चित्र एलोरा की गुफाओं में उकेरे गए हैं। सप्त बुद्ध ही हिंदू साहित्य में सप्त ऋषि के रूप में पौराणिक आख्यान के रूप में परिवर्तित दिखाई पड़ते हैं। आलोच्य पुस्तक में राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने यह स्पष्ट किया है कि बौद्ध सभ्यता में स्तूप, चक्र, दो हिरण, पीपल, स्तम्भ, सील आदि प्रमुख हैं। कुषाण काल, मौर्य काल के अलावा सिंधु घाटी की सभ्यता तथा मुअनजोदड़ो व राखीगढ़ सहित देश के कई भू-भाग में बौद्ध सभ्यता के ही अवशेष मिले हैं। सिंधु सभ्यता से लेकर मौर्य-कुषाण काल तक के इतिहास में तारतम्य है। मेजर फोर्ब्स ने भी इसकी पुष्टि की है।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने एक महत्वपूर्ण तथ्य रखा है कि जब सिंधु घाटी की सभ्यता नगरीय है, तो उसके बाद ग्राम सभ्यता कैसे आयी? यह अटपटी और अवैज्ञानिक है। मुअनजोदड़ो और हड़प्पा के अतिरिक्त देश के कई इलाकों में सिंध सभ्यता के अवशेष मिलने लगे हैं। श्री सिंह सिंधु सभ्यता को बौद्ध सभ्यता मानते हैं और इसका साक्ष्य भी प्रस्तुत करते हैं। इस संदर्भ में वह मौर्यवंश के अंतिम शासक की हत्या करके पुष्यमित्र शुंग के शासक बनने के बाद वैदिक सभ्यता का भारत में उद्भव बताते हैं। उनका कहना है कि पुष्यमित्र ने वैदिक धर्म और आर्य साम्राज्य की स्थापना की है। वह ईरान के शासक डेरियस प्रथम (532-486 ई. पू.) के शिलालेख और संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन भी पेश करते हैं। हालांकि यह तथ्य सर्वविदित व सर्वमान्य है कि आर्य ईरान होकर ही भारत में आए। ईरान की पुरानी फारसी भाषा में लिखा गया अवेस्ता और भारत में रचे गए ऋग्वेद में काफी समानता है। व्याकरण और भाषाशैली तक समान है। फर्क सिर्फ यिम और यम का है। भाषा वैज्ञानिक इतिहास के अध्येताओं को यह स्मरण दिलाते हैं कि सिंधु घाटी से लेकर गौतम बुद्ध तक बौद्ध सभ्यता चतली रही। भारत का आर्यीकरण डेरियस प्रथम के समय से शुरू हुआ। आर्य वस्तुतः 321 ई. पू. में उस इलाके में बसना शुरू किए थे, जिसे सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त मौर्य को दहेज में दिया था। वह एरियाना प्रदेश…..आर्यावर्त था। संभवतः इसीलिए महाभारत में आर्यावर्त के बाहर के देश को भारत कहा गया है। सिंधु घाटी में मिली प्रतिमा पशुपति यानी पूर्व बुद्ध की है। पुष्यमित्र शुंग वैदिक युग का पुनरूद्धारक नहीं बल्कि संस्थापक है।

डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह यह भी कहते हैं कि गौतम बुद्ध ने वैदिक सभ्यता-धर्म का विरोध नहीं किया है। उनके मुताबिक गौतम बुद्ध ने पूर्व से चली आ रही बलिप्रथा-हिंसा का विरोध किया। इसी प्रसंग में एक और दिलचस्प तथ्य को उजागर किया है कि धम्म चक्र को ही वैदिक धर्म के इतिहासकारों ने सुदर्शन चक्र के रूप में कृष्ण व विष्णु को थमा दिया है। इस संदर्भ में भाषा वैज्ञानिक राजमल बोरा की पुस्तक ‘प्राकृत भाषा का इतिहास और भूगोल’ में कही गई यह बात भी याद आ रही है कि कृष्ण के भाई ही जैन परंपरा के बाइसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि हैं।

बिहार के औरंगाबाद जिले के ओबरा प्रखंड के मनोरा गांव के एक मंदिर में स्थापित बुद्ध की प्रतिमा (तस्वीर डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह के फेसबुक वाल से साभार)

चूंकि राजेन्द्र प्रसाद सिंह भाषा वैज्ञानिक हैं, इसलिए उन्होंने अपनी पुस्तक के प्रथम अध्याय ‘बुद्ध का वैश्विक परिप्रेक्ष्य’ में बताते हैं कि पालि का झान जब चीन पहुंचा तो चान/चियान हुआ। कोरिया पहुंचा तो सिओन/सानजान हुआ। भारतीय आचार्यों ने झान को ध्यान बनाया। भारत को बौद्ध सभ्यता की दृष्टि से ही विश्व गुरु कहा जाता है। भारत में बौद्ध धर्म का विकास वैदिक धर्म की प्रतिक्रिया में नहीं हुआ। पूर्वी भारत में बुद्ध और जैन परंपरा विकसित होती है। इस इलाके में वैदिक प्रभाव नहीं था। वैदिक आर्य तो पश्चिमोत्तर भारत सिंध-पंजाब में थे। अगर उनके विरोध में बुद्ध होते तो बौद्ध दर्शन का उद्भव पश्चिमी भारत में होना चाहिए था।

अपने शिष्यों को संदेश देते बुद्ध की एक प्रतिमा (तस्वीर डॉ. राजेंद्र प्रसाद सिंह के फेसबुक वाल से साभार)

‘खोए हुए बुद्ध को खोज’ पुस्तक हमें बौद्ध सभ्यता के परिप्रेक्ष्य में पुरातात्विक साक्ष्यों, शिलालेखों, पुरातन पालि/प्राकृत भाषा के साहित्य और सामाजिक विज्ञान के नियमों के आलोक में भारतीय इतिहास के नए सिरे से अध्ययन एवं पुनर्लेखन के लिए प्रेरित करती है। lसाथ ही, भाषा विज्ञान से इतिहास की अबूझ पहेलियों और इतिहास की गुत्थियों को सुलझाने की नसीहत भी देती है। जनजातियों की भाषा, जीवन शैली, टोटेम आदि को इतिहास अध्ययन के लिए जरूरी करार देती है। पौराणिक आख्यानों और मिथकों को इतिहास नहीं समझा जाए, यह सीख भी देती है।

भाषा वैज्ञानिक डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह की यह पुस्तक इतिहास के छात्रों के अलावा वर्तमान में अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान व अस्मिता के लिए कथित राष्ट्रवादियों और हिंदुत्ववादियों से जूझ रहे शोषित, पीड़ित एवं दमन के शिकार बन रहे मूल निवासियों के लिए बेहद उपयोगी है।

समीक्षित पुस्तक : खोए हुए बुद्ध की खोज

लेखक : डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह

प्रकाशक : कौटिल्या बुक्स, नई दिल्ली

मूल्य : 195 रुपए

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)


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