बूथ कैप्चरिंग : बिहार के दो गांवों की कहानी

बिहार में 1990 से पहले सवर्ण लोग बूथ कैप्चरिंग में आगे थे। उस समय उन्हीं के पास ताकत भी थी और हिम्मत भी। वोट का महत्व भी वही समझते थे। लगभग सभी मतदान केन्द्र उन्हीं के दरवाजे पर होते थे। बूथ कैप्चरिंग में पिछड़ी जातियों ने 1990 के बाद दखल देना शुरू किया। जब बूथ कैप्चरिंग के मामले में सवर्ण कमजोर पड़ने लगे तभी से उन्होंने चुनाव सुधार का शोर मचाना शुरू किया

हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के दरभंगा से सांसद कीर्ति झा आजाद कांग्रेस में शामिल हुए। कांग्रेस में शामिल होने के बाद उनके संसदीय क्षेत्र दरभंगा में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने स्वागत समारोह का आयोजन किया था। इस समारोह में उन्होंने कहा कि पहली बार जब मैं चुनाव लड़ रहा था तब मेरे लिए बूथ कैप्चरिंग की गई थी तथा मेरे पिता और बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आज़ाद के लिए भी कांग्रेस के कार्यकर्ता बूथ कैप्चरिंग करते थे। मीडिया ने उनके इस बयान को ‘विवादास्पद’ कहा, लेकिन यह बात बिल्कुल सही है। जो लोग बिहार की राजनीति को करीब से देखते-समझते हैं, उन्हें श्री आज़ाद के इस बयान को सुनकर कोई हैरानी नहीं हुई।

कीर्ति झा आज़ाद के इस बयान को सुनकर मुझे भी कोई हैरानी नहीं हुई और मुझे मेरे गांव के बूथों की कैप्चरिंग और उसके संदर्भ व उससे जुड़ी कई कहानियों की याद आ गईं।

प्रेमकुमार मणि ने अपने उपन्यास ‘ ढलान’[1] में बूथ कैप्चरिंग का बड़ा ही यथार्थ चित्रण किया है। ‘ढलान’ में रानाबिगहा और पुरन्दरपुर नाम के दो गांव हैं। प्रेमकुमार मणि लिखते हैं जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है कि रानाबिगहा पिछड़ी जाति बहुल गांव है और पुरन्दरपुर सवर्ण जातियों विशेषकर भूमिहार वर्चस्व वाला गांव। पुरन्दरपुर के सवर्ण कांग्रेस के वोटर हैं और वे पिछड़ों के वोट भी छाप लेते हैं। उपन्यास के नायक सुमन जी के रानाबिगहा गांव आने से इस गांव के पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना आती है और उन्हीं के प्रभाव में कांग्रेस पहली बार एक पिछड़ी जाति के व्यक्ति को विधानसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाती है। दूसरी तरफ कम्युनिस्ट पार्टी से भूमिहार जाति के वरुण शर्मा चुनाव मैदान में उतरते हैं। रातों-रात पुरन्दरपुर के सवर्ण पार्टी बदलकर कम्युनिस्ट हो जाते हैं । अब तक जो लोग कांग्रेस के लिए बूथ कैप्चरिंग करते थे अब कम्युनिस्ट पार्टी के लिए करने लगे।

प्रेमकुमार मणि द्वारा लिखित उपन्यास ‘ढलान’ का कवर पृष्ठ। किताब खरीदने के लिए तस्वीर पर क्लिक करें

प्रेमकुमार मणि ने ‘ढलान’ में बूथ कैप्चरिंग’ से जुड़ी एक और घटना का जिक्र किया है। सवर्ण बहुल एक गांव की बूथ पर पिछड़ी जाति के कुछ लोग वोट देने जाते हैं। यहां के सवर्ण भी कांग्रेसी हैं और पिछड़ी जाति के लोग भी कांग्रेसी ही हैं। इसके बावजूद भी सवर्ण लोग पिछड़ों को वोट देने से रोकते हैं । वह इसलिए कि तुम भी वोट दो और हम भी वोट दें फिर हमारे वोट का क्या महत्व? पहली बार वोट देने के लिए सवर्णों और पिछड़ों में मार-पीट होती है।

अब बूथ कैप्चरिंग के संदर्भ में जिन दो गांवों की कहानी मैं कहने जा रहा हूं वे दो गांव हैं- बिहार के मुजफ्फरपुर जिला का अहियापुर और पूर्वी चंपारण जिला का हुसैनी गांव। अहियापुर, जहां मेरा जन्म हुआ और जहां मैं पला बढ़ा। हुसैनी जो मेरी मां का मायका है, जहां खूब आना-जाना हुआ। दोनों गांव पिछड़ी जाति ‘ओबीसी बनिया’ बहुल गांव हैं।

मेरे नाना जगदीश साह कांग्रेस के आजीवन समर्थक रहे। महात्मा गांधी सन 1917 में जब चम्पारण आए थे उस समय मेरे नाना की उम्र 18-19 वर्ष रही होगी। जिस दिन गांधी ने चंपारण की धरती पर पैर रखा उस दिन से लेकर गांधी जी के चंपारण छोड़ने तक जगदीश साह उनके साथ ही रहे। श्री साह के आग्रह पर गांधी जी हुसैनी भी आए थे। भोजन के दौरान गांधी जी ने कह दिया कि कांग्रेस को मजबूत करना है। गांधी जी की इस बात को आज्ञा मानकर उन्होंने जीवन भर पालन किया। प्रत्येक चुनाव के दिन वे एकदम सुबह नहाकर नया कुर्ता-धोती पहन लेते और बूथ पर जाकर अपना वोट कांग्रेस को दे आते। उनका मानना था कि वोट देने जाना मंदिर जाने से ज्यादा पवित्र और महत्वपूर्ण काम है।

उस समय तक हुसैनी गांव के सवर्ण लोग भी कांग्रेसी ही थे इसलिए कोई विवाद नहीं हुआ। विवाद की शुरुआत हुई 1984 के लोकसभा चुनाव में मोतिहारी संसदीय क्षेत्र से जब कांग्रेस ने पिछड़ी जाति के महिला उम्मीदवार श्रीमती प्रभावती गुप्ता को उम्मीदवार बनाया। कम्युनिस्ट पार्टी ने सवर्ण समुदाय के कमला मिश्र मधुकर को उम्मीदवार घोषित किया। रातों-रात सवर्ण जाति के लोगों ने पार्टी बदल ली और कम्युनिस्ट हो गए। सबने अपने-अपने घरों से कांग्रेस के तिरंगा को हटाकर कम्युनिस्ट पार्टी का लाल झंडा टांग दिया।

चुनाव के दिन जब मेरे नाना जगदीश साह वोट डालने गए तो सवर्णों ने विरोध किया। उसके बाद एक तरह से दोनों समुदायों में जंग छिड़ गई। दोनों तरफ से लाठियां चलीं, कई लोग घायल हुए और पिछड़ों ने बूथ कैप्चरिंग कर सारे वोट छाप लिए। प्रभावती गुप्ता चुनाव जीत गईं। हुसैनी में बूथ कैप्चरिंग का यह सिलसिला आगे भी चलता रहा।

अब आते हैं अहियापुर!

अहियापुर में भी ‘ओबीसी बनिया’ जाति की संख्या सर्वाधिक है लेकिन यहाँ के वोट बगल के गांव सलेमपुर के ‘भूमिहार’ छाप लेते थे। चुनाव के दिन चार-पांच भूमिहार जाति के लोग बन्दूकें लेकर आते और करीब 1400  पिछड़ी जातियों और दलितों के वोट छाप लेते। कोई विरोध नहीं करता। अहियापुर के पिछड़ी जातियों में राजनीतिक चेतना का उभार हुआ मंडल आन्दोलन के दौरान 1989 में। 1989 के लोकसभा चुनाव के दिन हमेशा की तरह सलेमपुर के लोग वोट छापने आए। अहियापुर गांव के लोगों ने विरोध किया तो सवर्ण भड़क गए। जबरदस्त मारपीट हुई जिसके कारण मतदान रद्द हो गया। इसका लाभ यह हुआ कि उसके बाद दुबारा कोई भी बूथ कैप्चरिंग करने अहियापुर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

इसी समय एक और घटना घटी। सवर्णो और पिछड़ों के बीच मारपीट में अहियापुर के ब्राह्मणों ने सलेमपुर के भूमिहारों का साथ दिया था। इस मारपीट में अहियापुर के कुछ ब्राह्मणों को भी चोटें आईं थीं। इस घटना के दो-तीन दिनों के बाद गांव में एक व्यक्ति के यहां ‘लखरांव[2] पूजा’ का आयोजन होना था। जब पूजा करने के लिए ब्राह्मणों के पास पहुंचे तो उन्होंने पिछड़ी जातियों के यहां पूजा कराने से साफ इन्कार कर दिया। इसके बाद गांव में एक सभा हुई जिसमें यह फैसला हुआ कि सभी लोग आर्य समाजी हो जाएं। सभी लोग आर्य समाजी हो भी गए। पिछड़ी जाति का ही एक व्यक्ति पूजा करवाने लगा।

दरअसल, बिहार में 1990 से पहले सवर्ण लोग बूथ कैप्चरिंग में आगे थे। उस समय उन्हीं के पास ताकत भी थी और हिम्मत भी। वोट का महत्व भी वही समझते थे। लगभग सभी मतदान केन्द्र उन्हीं के दरवाजे पर होते थे। बूथ कैप्चरिंग में पिछड़ी जातियों ने 1990 के बाद दखल देना शुरू किया। जब बूथ कैप्चरिंग के मामले में सवर्ण कमजोर पड़ने लगे तभी से उन्होंने चुनाव सुधार का शोर मचाना शुरू किया।

(कॉपी संपादन : एफपी डेस्क)

[1] वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण, 2000

[2] लखरांव पूजा – तिरहूत इलाके में यह खास उत्सव मनाया जाता है। इसमें शंकर की पूजा की जाती है। इसके लिए बड़ी संख्या में मिट्टी की मूर्तियां बनायी जाती है और यह जिम्मेदारी ब्राह्मणों की होती है।


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