विभागवार आरक्षण : कोर्ट में याचिका नहीं, अध्यादेश लाए सरकार

सरकार एक तरफ आरक्षण के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने की बात कह रही है, तो दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद कई विश्वविद्यालयों ने एमएचआरडी व यूजीसी के सर्कूलर का इंतजार किए बगैर ही विभागवार आरक्षण के आधार पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी कर दिए हैं

11 फरवरी को दिल्ली में होगा बड़ा प्रदर्शन, पार्लियामेंट तक निकाली जाएगी रैली

दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों के एक संगठन फोरम ऑफ एकेडमिक फॉर सोशल जस्टिस ने कहा है कि विभागवार आरक्षण को खत्म करने के लिए केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने के बदले संसद में अध्यादेश लाए। इस संबंध में सरकार पर दबाव बनाने के लिए फोरम 11 फरवरी 2019 को दिल्ली में बड़े प्रदर्शन और रैली के आयोजन की तैयारी कर रहा है। यह जानकारी फोरम द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में दी गई है। इसके मुताबिक, सरकार का विरोध करने के लिए बड़ी संख्या में शिक्षक सड़क पर उतरेंगे और संसद मार्ग तक रैली निकालेंगे।

विरोध-प्रदर्शन की तैयारी को लेकर एक आपातकालीन बैठक 6 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस में आयोजित की गई। बैठक में सभी शिक्षकों ने केंद्र सरकार की कटु आलोचना करते हुए कहा कि सरकार आरक्षण पर अध्यादेश लाने की बजाय नियुक्तियों पर फिर से तलवार लटकाना चाहती है, ताकि मामला लंबा खिंचे और गेस्ट फैकल्टी/एडहॉक शिक्षकों से काम चलाया जा सके। शिक्षकों ने यह भी कहा कि वे 8 फरवरी को हो रहे एसी/ईसी चुनाव में इसका मुंहतोड़ जवाब देंगे।

 

दिल्ली में विभागवार आरक्षण का विरोध करते युवा

शिक्षकों का कहना है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय एक तरफ आरक्षण के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने की बात कह रहा है, वहीं दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय और झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय समेत कई विश्वविद्यालयों ने एमएचआरडी/यूजीसी के सर्कुलर जारी किए बगैर ही नियुक्तियों के विज्ञापन देने शुरू कर दिए हैं। इन विज्ञापनों में एससी, एसटी और ओबीसी को केंद्र सरकार की आरक्षण नीति के हिसाब से आरक्षण नहीं दिया गया है।

बैठक में शिक्षकों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार विभागवार आरक्षण के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर करने का तात्पर्य है कि वह नहीं चाहती कि रोस्टर व आरक्षण पर अध्यादेश लाया जाए। ऐसे में स्पष्ट हो गया है कि यूजीसी द्वारा भेजा गया 5 मार्च, 2018 का वह सर्कुलर ही केंद्रीय विश्वविद्यालयों, राज्य सरकारों के विश्वविद्यालयों, मानद और सरकार द्वारा वित्त पोषित शिक्षण संस्थानों में मान्य हो रहा है। जिन विश्वविद्यालयों ने 200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम के तहत रिक्तियों का विज्ञापन निकाला है, उस पर सरकार को आपत्ति नहीं है और कोर्ट के निर्णय के बाद यूजीसी सर्कुलर ही मान्य होगा, जो विभागवार और विषयवार 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम लागू करने का निर्देश देता है। इससे कभी भी एससी, एसटी और ओबीसी के अभ्यर्थियों को आरक्षण तथा बराबर का प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। इसके साथ ही जिन विज्ञापनों में एसटी उम्मीदवारों के लिए रिक्तियां निकाली गई थीं, अब 13 पॉइंट रोस्टर सिस्टम यानी विभागवार भर्तियों के चलते वह पद समाप्त हो जाएगा यानी एसटी का हक मारा जाएगा।

फोरम के उपाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार ने कहा है कि एसएलपी खारिज करने के बहाने सरकार अब समीक्षा याचिका ड़ालने का बहाने वह अपने उत्तरदायित्व से भागना चाहती है। सरकार पहले अध्यादेश लाने की बात कहकर आरक्षित वर्गों के शिक्षकों के साथ धोखा कर चुकी है। कोर्ट ने आरक्षण के खिलाफ फैसला सुना दिया है। अब एक ही रास्ता बचा है कि हम सबको सड़क पर उतरकर सरकार को अपनी एकता का एहसास कराना होगा।

डॉ. राजेन्द्र कुमार ने कहा कि सरकार को समीक्षा याचिका दायर करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उसके स्थान पर अध्यादेश लेकर आए। उन्होंने कहा कि समीक्षा याचिका की आड़ में केंद्रीय, राज्य के विश्वविद्यालय और कॉलेज अपने यहां रिक्तियां निकालकर सवर्ण शिक्षकों को नियुक्त कर खाली पद भर लेंगे। बाद में एससी, एसटी और ओबीसी शिक्षकों की उपस्थिति उच्च शिक्षा में दर्ज नहीं हो पाएगी।

बैठक की अध्यक्षता करते हुए प्रो. के.पी. सिंह ने कहा कि मीडिया के माध्यम से हमें पता चला है कि जिस तरह से केंद्र सरकार विभागवार आरक्षण के खिलाफ समीक्षा याचिका दाखिल करने जा रही है, उससे सरकार की मंशा का पता चलता है कि वह आरक्षण जैसे गंभीर मामले पर कितनी सजग है। उनका कहना है कि हमें शुरू से ही सरकार की नीति और नीयत पर भरोसा नहीं था। जिस दिन सरकार ने एसएलपी डाली थी, हमें पता था कि इस तरह से एससी, एसटी, ओबीसी के हक में फैसला नहीं होने वाला है।

बैठक में डॉ. संदीप कुमार, डॉ. प्रशांत कुमार बजरंग, डॉ. शांतनु कुमार दास, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. मनोज कुमार, डॉ. प्रमोद कुमार, डॉ. सौम्या, डॉ. सुरेश कुमार आदि ने भी अपने विचार रखे।

 

(कॉपी संपादन : प्रेम बरेलवी/एफपी डेस्क)


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