ललई सिंह यादव केस : सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हिंदी अनुवाद

ललई सिंह यादव ने 1968 में पेरियार की चर्चित  किताब ‘रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ का हिंदी अनुवाद ‘सच्ची रामायण’ के रूप में प्रकाशित किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रतिबंध के आदेश को खारिज कर दिया और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी ललई सिंह यादव के पक्ष में फैसला दिया

(9 दिसंबर, 1969 में उत्तर प्रदेश सरकार ने ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ की पुस्तक  ‘रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ की अंग्रेज़ी और हिंदी प्रतियों को ज़ब्त करने का आदेश दिया था। इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद ललई सिंह यादव ने प्रकाशित किया था।

इस पुस्तक के प्रकाशक ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने सरकारी आदेश को निरस्त कर दिया। उत्तर प्रदेश सरकार  हाईकोर्ट के इस आदेश के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गई। और फिर सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई। सुनवाई तीन जजों की खंडपीठ ने की थी, जिसकी अध्यक्षता न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने की।  इस बेंच में दो अन्य जज, पी .एन. भगवती और सैयद मुर्तज़ा फ़ज़ल अली थे।

तो इस तरह से ‘रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ का मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 16 सितंबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट  ने अपना फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी उत्तर सरकार द्वारा ‘रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ के हिंदी अनुवाद और मूल अंग्रेजी पर प्रतिबंध और जब्ती के खिलाफ फैसला सुनाया। यह फैसला कई मामलों में ऐतिहासिक और दिलचस्प है।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रश्न को मानव समुदाय की विकास के यात्रा के साथ जोड़कर देखा और व्यक्ति एवं समाज की प्रगति के लिए अनिवार्य तत्व के रूप में रेखांकित किया। प्रस्तुत है, इस ऐतिहासिक मुकदमे के फैसले का मुकम्मिल अनुवाद)


पेरियार की सच्ची रामायण पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

  • सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ

16 सितंबर 1976 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का हूबहू हिंदी अनुवाद

भारत का सर्वोच्च न्यायालय

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ललई सिंह यादव

याचिकाकर्ता:

उत्तर प्रदेश राज्य

बनाम

प्रत्यर्थी:

ललई सिंह यादव

निर्णय  दिनांक 16 / 09/1976

पूर्णपीठ:

कृष्ण अय्यर, वी. आर.

भगवती, पी.एन.

फज़ल अली सैय्यद मुर्तजा

निर्णय :

आपराधिक अपीली अधिकारिता : आपराधिक अपील संख्या 291 , 1971

(इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 19-1-1971 के निर्णय और आदेश से विशेष अनुमति की अपील। विविध आपराधिक केस संख्या 412/70)।

अपीलकर्ता की ओर से डी.पी. उनियाल तथा ओ.पी. राणा। प्रत्यर्थी की ओर से एस.एन. सिंह।

न्यायालय का निर्णय न्यायाधीश कृष्ण अय्यर द्वारा सुनाया गया था। कुछ मामले ऊपर से दिखने में अहानिकर तो लगते हैं, किन्तु वास्तविक रूप में ये लोगों की स्वतंत्रता के संदर्भ में अत्यधिक चिंताजनक समस्याएं पैदा कर सकते हैं। प्रस्तुत अपील उसी का एक उदाहरण है। इस तरह की समस्याओं से मुक्त होकर ही ऐसे लोकतंत्र की की नींव पड़ती है, जो आगे चलकर फल-फूल सके।

प्रस्तुत अपील विशेष अनुमति से उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार द्वारा की गई। जो तमिलनाडु के दिवंगत राजनीतिक आंदोलनकर्ता तथा तर्कवादी आंदोलन के नेता पेरियार ईवीआर द्वारा अंग्रेज़ी में लिखित ‘रामायण : ए ट्रू रीडिंग’ नामक पुस्तक और उसके हिंदी अनुवाद की ज़ब्ती के आदेश से संबंधित है। यह आवेदन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 99 -ए के तहत दिया गया था।  

अपीलकर्ता उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार, यह पुस्तक पवित्रता को दूषित करने तथा अपमानजनक होने के कारण आपत्तिजनक थी। इसके पीछे  ‘भारत के नागरिकों के एक वर्ग- हिन्दुओं के धर्म और उनकी धार्मिक भावनाओं को अपमानित करते हुए जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने की मंशा थी। अतः इसका प्रकाशन धारा 295 एआईपीसी के तहत दंडनीय है।’ इस अधिसूचना में सारणीबद्ध रूप में एक परिशिष्ट प्रस्तुत किया गया है। जिसमें पुस्तक के अंग्रेज़ी और हिंदी संस्करणों में निहित उन प्रासंगिक पृष्ठों तथा वाक्यों का सन्दर्भ दिया गया है जिन्हें संभवतः अपमानजनक सामग्री के रूप में देखा गया। तत्पश्चात, ‘प्रत्यर्थी प्रकाशक ने धारा 99  सी के तहत उच्च न्यायालय को एक आवेदन भेजा। उच्च न्यायालय की विशिष्ट पीठ द्वारा आवेदन स्वीकार किया गया तथा अधिसूचना को ख़ारिज कर दिया।

सच्ची रामायण का कवर पृष्ठ

उच्च न्यायालय के निर्णय से असंतुष्ट राज्य सरकार ने विशेष अनुमति से इस न्यायालय में अपील दायर की है। अपीलकर्ता के अधिवक्ता ने हमारे समक्ष आग्रहपूर्वक कहा कि सरकार की अधिसूचना में ऐसा कोई दोष नहीं है जिसके कारण उच्च न्यायालय ने उसे अमान्य घोषित किया। चूंकि इस विवादित पुस्तक के लेखक ने कठोर शब्दों में श्री राम जैसे महान अवतारों की निंदा किया है और सीता तथा जनक की छवि को तिरस्कारपूर्वक धूमिल किया है। इसीलिए यह पुस्तक विशाल हिन्दू समुदाय की धार्मिक भावनाओं पर अनुचित प्रहार करती है, जो इन समस्त दैवीय महाकाव्यात्मक चरित्रों की आराधना या पूजा करता है। लेखक का यह कार्य  निंदनीय है। इन मुद्दों को किनारे लगाते हुए उच्च न्यायालय ने बहुमत से इस आदेश को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि राज्य सरकार ने धारा 99 ए के अनुसार उन तथ्यों का विवरण नहीं दिया है जिनके आधार पर उसने किताब के बारे में यह राय बनाई। सिर्फ एकमात्र इस कारण से याचिका की अनुमति दी जानी चाहिए और न्यायालय ( इलाहाबाद उच्च न्यायालय) के आदेश को ख़ारिज किया जाना चाहिए।’

धारा 99 ए का गहन विश्लेषण प्रारम्भिक बिंदु से किया जाना चाहिए ताकि विवादित आदेश में त्रुटि का पता लगाया जा सके। वाक्य-रचना सम्बन्धी अतिरेक की स्थिति से मुक्त ( जो मुद्दे इस केस के मामले में में उठाए गए ), प्रावधान में तीन ऐसी स्थितियां हैं, जो नागरिकों द्वारा सृजित रचनाओं को ज़ब्त करने का अधिकार देते हैं। इसके तीन प्रासंगिक भागों को पुन: उद्धृत कर रहे हैं : “99 ए (1) —- जहाँ

(क) कोई समाचार पत्र या पुस्तक  … अथवा

(ख) कहीं से भी मुद्रित ऐसा दस्तावेज़, जिसमें निहित सामग्री या कोई अंश राज्य सरकार को भारत के नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच दुश्मनी या घृणा की भावनाओं को बढ़ावा देता हुआ या देने की मंशा रखता हुआ प्रतीत हो, या जिसका उद्देश्य जान-बूझकर और दुर्भावनापूर्ण रूप से किसी भी ऐसे वर्ग के धार्मिक विश्वासों का अपमान कर उसकी धार्मिक भावनाओं को आहत करना हो। अर्थात, कोई भी सामग्री जिसका प्रकाशन भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए, धारा 153-ए या धारा 295-ए के तहत दंडनीय है। राज्य सरकार अपनी राय को आधार बताते हुए, आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसी सामग्री का प्रसार करने वाले समाचार पत्र, पुस्तक या अन्य दस्तावेज़ की हर प्रति  को ज़ब्त करने का आदेश दे सकती है … ।”

अतः एक प्रामाणिक आदेश के त्रिपक्षीय पहलू इस प्रकार हैं :

(i) कि पुस्तक या दस्तावेज़ में कोई सामग्री हो;

(ii) ऐसी सामग्री या तो भारत के नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच शत्रुता या घृणा की भावनाओं को बढ़ावा देती हो या देने का इरादा रखती हो;

(iii) सरकार ने राय किन तथ्यों के आधार पर बनाया, इसका विवरण दिया जाय

उसके पश्चात राज्य सरकार अधिसूचना के माध्यम से ऐसी सामग्री का प्रचार करनेवाली पुस्तक या दस्तावेज़ की प्रतियों को ज़ब्त करने का आदेश दे सकती है।

ललई सिंह यादव (1 सितंबर 1921 – 7 फरवरी 1993)

क्या प्रस्तुत अधिसूचना वैधानिक तौर पर अनिवार्य तीसरी मांग को पूरा करती है या फिर कारणों (जब्ती के कारणों) के विवरण के अभाव में यह अपनी वैधता खो देती है? इस महत्वपूर्ण तत्त्व की कमी को ध्यान में रखते हुए उच्च न्यायालय ने आदेश को खारिज कर दिया है। परन्तु सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील, श्री उनियाल ने कहा कि यद्यपि सरकार की राय के आधार का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है, तथापि परिशिष्ट द्वारा इसकी पूर्ति हो जाती है। उनका तर्क है कि आपत्तिजनक पुस्तक के पृष्ठों तथा पंक्तियों की संख्या मामले की ‘विषयवस्तु’ तथा ‘आधार’ दोनों पर प्रकाश डालती है, खासकर ‘आधार’ तो इतना प्रत्यक्ष है कि इसकी किनारे लगाना असंगत है। अधिक स्पष्ट रूप से कहें तो ऐसा मामला जिसका पर्याप्त रूप से विस्तृत विवरण दिया जा चुका है। यह विवरण चाहे कार्यात्मक रूप से दिया गया हो, चाहे अंतर्निहित अर्थ के माध्यम से अथवा आवश्यक निहितार्थ द्वारा। ये विवरण कारणों के विवरण की कानूनी आवश्यकता को पूरा करता है। इससे सरकारी निष्कर्ष के आधार अथवा कारण प्रस्तुत करने की आवश्यकता काफी हद तक पूरी हो जाती है, हालांकि औपचारिक तौर पर ना सही, लेकिन परिशिष्ट से पूरी हो जाती है। परिशिष्ट भी  आदेश का एक अभिन्न अंग है,जो स्वतः ही स्पष्ट सामग्री प्रस्तुत कर देता है। जब कारण स्वतः स्पष्ट हों, तो चुप्पी बहुत कुछ कह जाती है और कानून महज़ औपचारिकता की पूर्ति के लिए उनकी अलग से व्याख्या करने की मांग नहीं करता है। इसका प्रतिवाद यह है कि दंड संहिता द्वारा अभिव्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता पर रोक लगाने की शर्तों को निहितार्थ के सुविधाजनक सिद्धांत द्वारा कमज़ोर नहीं किया जा सकता है, क्योंकि यह शर्त बहुत सोच-समझकर लगाई गई है। इस अधिकार की मूल प्रकृति के मद्देनज़र विशिष्ट प्रावधानों के सख्त और प्रकट अनुपालन के बिना बाधित नहीं किया जाना चाहिए। आख़िरकार एक मुक्त गणराज्य में सभी मौलिक अधिकार मौलिक होते हैं। सिर्फ राष्ट्रीय आपातकाल के समय को छोड़कर। क्योंकि आपातकाल के समय संवैधानिक रूप से स्वीकृत कठोर प्रतिबंधों को सीमित कर दिया जाता है। हमारे विचार के केंद्र में दंड प्रक्रिया संहिता और दंड संहिता हैं और ये कानून हर समय लागू रहते हैं। इसलिए हमें कानून की व्याख्या इस तरह से करनी होगी कि संविधान और कानूनों में निर्धारित देश की सुरक्षा-आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भी स्वतंत्रता को पूर्ण रूप से संरक्षित रखा जाए।

फिर भी, अपीलकर्ता के वकील का तर्क है कि ज़ब्त किताब में दिए गए संदर्भ, जैसा कि आदेश के परिशिष्ट में दर्शाया गया है, श्री राम, सीता और जनक का इतने कठोर तरीके से प्रतिकारक और निंदा करते हैं कि न्यायालय को उत्तर प्रदेश के हिंदुओं की अपमानित भावनाओं की कल्पना स्वयं करनी चाहिए तथा यह मान लेना चाहिए कि आदेश में कारणों को अदृश्य स्याही से लिखा गया है। इस तर्क की महत्ता का आकलन करते हुए, हमें दो बिंदुओं पर ध्यान देना होगा (अ) संवैधानिक परिप्रेक्ष्य,अर्थात क्या मूल स्वतंत्रता को कानूनी रूप से बाधित करने की कोशिश की जा रही है; और (ब)  प्रकाशित सामग्री की लोकप्रिय समझ में किसी वैकल्पिक संभावनाओं का अस्तित्व है जो कि उन परिस्थितियों तथा कारणों के विवरण की अनिवार्यता को दर्शाता है जो सरकार को लोकाचार की शर्तों के अनुरूप या फिर अन्यथा दर्ज़ की गयी राय तक पहुंचने के लिए प्रेरित करते हैं।

शीघ्र प्रकाशित होगा पेरियार के प्रतिनिधि विचारों का परिवर्द्धित संकलन

भारत में सरकार धर्मनिरपेक्ष है और उसका हमारे बहुलतावादी समाज में प्रचलित किसी एक या अन्य धर्म की आस्थाओं से कोई सीधा सरोकार नहीं है। लेकिन वह मात्र शांति और लोक-व्यवस्था के उल्लंघन के विरुद्ध समाज का संरक्षण और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ही बाध्य नहीं है, बल्कि वह ऐसी स्थिति बनाये रखने के लिए भी बाध्य है जिसमें अशिष्ट भाषा में लिखित लेख या आपत्तिजनक प्रकाशन भिन्न या विरोधी मान्यताओं के लोगों की भावनाओं को इस तरह आहत न करें, जिससे ये जनसमूह हिंसक कृत्यों की ओर प्रवृत्त हों। अच्छी सरकार को अनिवार्य रूप से शांति और सुरक्षा की दरकार होती है और जो कोई भी बम अथवा पुस्तकों के माध्यम से सामाजिक शांति भंग करता है, वह सरकार की कानूनी कार्रवाई के निशाने पर होता है ।

हमारा प्रस्ताव है कि हम अपने समक्ष आए मसले को विषय-वस्तु की दृष्टि से तथा व्यापक परिप्रेक्ष्य, दोनों में संदर्भ में देखें और इन दोनों के समागम से इस निष्कर्ष पर पहुंचें कि उच्च न्यायालय गलत नहीं था और अपील नामंज़ूर होनी चाहिए। भारत में विभिन्न उच्च न्यायालयों को इस प्रश्न पर विचार करने का अवसर प्राप्त हुआ लेकिन वे अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुंचे हैं, जैसा कि वर्तमान केस में दिखाई देगा।

रामायण : अ ट्रू रीडिंग के लेखक पेरियार ई. वी. रामासामी

जब क़ानून द्वारा एक नागरिक के अधिकार पर कठोर प्रतिबंध लगाया जाता है, तो उसके पीछे एक ठोस कारण की आवश्यकता होती है। खासकर तब, जब इसके अर्द्ध-दंडात्मक (क्वाजि पीनल) परिणाम भी होते हैं। दंड प्रक्रिया संहिता के माननीय रचयिताओं ने धारा 99 ए को नागरिकों की चिंता तथा सरकार द्वारा इसके प्रयोग पर सतर्क नियंत्रण बरतने के आदेश को केंद्र में रखते हुए तैयार किया है। इसके प्रावधानों का प्रयोग विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही किया जा सकता है। स्पष्ट रूप से यह धारा सरकार को ऐसे मामले में हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य करती है, जहां सरकार को नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच दुश्मनी और घृणा की भावना को बढ़ावा देने के स्पष्ट और वर्तमान खतरे पर विचार करना हो अथवा इसकी प्रवृत्ति या मंशा ऐसे नागरिकों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने की हो (धारा में अन्य प्रवृत्तियां भी व्यक्त हैं जिनका सरोकार वर्तमान मामले से नहीं है)। ऐसे मामले में सरकार आवश्यक रूप से अपनी राय के आधार को वर्णित करने के लिए बाध्य है। हमारा सरोकार अंतिम भाग से है। जब धारा स्पष्टतः कहती है कि आपको यह आधार बताना होगा, तो यह कोई जवाब नहीं है कि उन्हें वर्णित करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वे अन्तर्निहित हैं। आप प्रत्यक्ष रूप से शांत रहकर किसी भी चीज़ का वर्णन नहीं करते। वर्णन करने से तात्पर्य है ‘घोषणा करना या विशेष रूप से सटीक, औपचारिक या आधिकारिक तरीके से निर्धारित करना; कुछ कहना, विशेष रूप से ज़ोर देते हुए कहना’ (रैंडम हाउस शब्दकोश)। यह ऐसा निष्कर्ष है, जिससे बचा नहीं जा सकता – 8 — 1234SCI /76 । दंडनीय अपराध के अंतर्गत ज़ब्ती आधार का एक औपचारिक आधिकारिक निर्धारण वैधानिक रूप से अनिवार्य है यदि आप टालमटोल करते हैं और इसे हटा देते हैं, तो कानून इस आदेश को शून्य करार देता है। इस तथ्य को राज्य सरकार को विशेष रूप से समझना चाहिए। क्योंकि किसी पुस्तक की दंडनीय अपराध के अंतर्गत ज़ब्ती एक गंभीर मामला है, न कि उदासीनता के साथ निष्पादित किया जाने वाला एक नियमित कार्य। दंड संहिता के अनुसार उपेक्षा का परिणाम वैधानिक मान्यता का खात्मा है। ये विचार और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं जब हम राज से गणतंत्र में बदलाव को स्वीकारते हैं और लोगों को सौंपे गए महान अधिकारों के उच्च स्थान का सम्मान करते हैं। जहां बोलना एक संवैधानिक कर्तव्य है, वहां मौन रहना एक घातक अपराध है। जोकि विभिन्न धाराओं के समन्वय से स्पष्ट होता है। मसलन, धारा 99 सी असंतुष्ट पक्ष को निषेधात्मक आदेश को खारिज करने के लिए उच्च न्यायालय में आवेदन करने का अधिकार देती है और न्यायालय आदेश में सरकार द्वारा दिए गए कारणों की जांच कर उसकी पुष्टि करता है या उसे ख़ारिज करता है। न्यायालय आदेश में निर्धारित कारणों से परे जांच नहीं कर सकता है और यदि इन कारणों को पूरी तरह से निकाल दिया जाता है तो न्यायालय किसकी जांच करेगा? और, इस चूक से, चाहे वह लापरवाही से हो या सुनियोजित रूप से, न्यायालय में अपील करने का महत्वपूर्ण अधिकार अर्थहीन हो जाता है। अगर प्रकाशन की स्वतंत्रता को कानून द्वारा प्रदत्त दायरे तक अनुमति देना है तो न्यायालय द्वारा धारा के उस भाग से असहमति ज़ाहिर की जानी चाहिए, जो ऐसे खतरनाक परिणाम की सम्भावना पैदा करता हो तथा संवैधानिक उपचार की मूल संरचना के साथ छेड़छाड़ करता हो। इस तर्क की पुष्टि हरनाम दास बनाम यू.पी. राज्य (1) मामले द्वारा होती है जिसमें इस न्यायालय ने रेखांकित किया है :

“जब सरकार अपने मत का आधार नहीं बताती है तो क्या होता है? ऐसे में यदि उच्च न्यायालय ने आदेश को बरकरार रखा होता, तो हो सकता है कि ऐसा उन कारणों से किया गया हो, जिन पर सरकार ने बिलकुल चिंतन नहीं किया था।” यदि उच्च न्यायालय ने ऐसा किया होता तो वास्तव में उसने खुद ज़ब्ती का आदेश दिया होता, न कि सरकार द्वारा इस तरह के आदेश को बरकरार रखता। जैसा कि पहले ही कहा गया है, यह धारा 99- डी के अंतर्गत उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। इसलिए हमारे लिए यह स्पष्ट है कि इस तरह के मामले में उच्च न्यायालय को धारा 99- डी के तहत आदेश को रद्द करना चाहिए, क्योंकि इससे यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि सरकार द्वारा प्रस्तुत कारण आदेश को सही ठहराते हैं। आप एक ऐसी चीज़ के बारे में संतुष्ट नहीं हो सकते जिसे आप नहीं जानते।” हमारे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि ज़ब्त करनेवाले पक्ष को प्राथमिक तथ्यों को जोड़ने वाले आधार या कारण, विस्तार से बताना चाहिए। यह स्थितियों पर पर निर्भर करता है । कुछ मामलों में एक संक्षिप्त विवरण पर्याप्त हो सकता है, दूसरों में एक विस्तृत विचार उचित हो सकता है। लेकिन कभी भी मौन की हद तक कारण और आधार बताने से किनारा नहीं किया जा सकता है। एक आदेश संक्षिप्त हो सकता है लेकिन आधार-विहीन नहीं हो सकता। यह निष्कर्ष दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 99 ए और मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 19 के मध्य एक संवैधानिक तालमेल स्थापित करता है।

फैसला देने वाले खंडपीठ के अध्यक्ष जस्टिस कृष्ण अय्यर, वी. आर.

धारा 99 ए में दिए गए निर्देश के बावजूद राज्य को ज़ब्ती के कारणों का विवरण देने के दायित्व से मुक्त करना, लोगों की निश्चित स्वतंत्रता पर शक्ति के उपयोग का हिंसात्मक अवसर देना है। हम ऐसा क्यों कहते हैं? निश्चित रूप से राष्ट्र की सुरक्षा और समाज की शांति व्यक्तिगत अधिकारों पर प्रतिबंध की मांग तो करती है और चाहे हम स्वतंत्र क्यों न हों, हम फिर भी क़ानून के अधीन हैं।

(1)  ए.आइ.आर 1961 एस.सी.1662, 1666.  

विरोधी मतों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हमारे संविधान निर्माताओं की आस्था मिल्स के प्रसिद्ध कथन और वाल्तेयर की प्रेरित करने वाले इस कथन का सम्मान करती थी। जो इस प्रकार है:

“यदि एक व्यक्ति को छोड़कर सम्पूर्ण मानव जाति का एक मत हो और केवल उस एक व्यक्ति का विरोधी मत हो तो मानवजाति द्वारा उसको चुप करा देना न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन यदि उस अकेले व्यक्ति में मानव जाति को मौन करने की शक्ति हो तो यह न्यायसंगत होगा।” (अपने निबंध ‘ऑन लिबर्टी’ में मिल्स, पृ. 19-20: थिंकर लाइब्रेरी सं., वाट्स)

“तुम जो कहते हो, मैं उसे अस्वीकार करता हूं, परन्तु तुम्हारे यह कहने के अधिकार की रक्षा, मैं अंतिम श्वास तक करूंगा।”  (वाल्तेयर, एस. जी.टालंटयर, द फ्रेंड्स ऑफ़ वाल्तेयर, 1907)

अधिकार और उत्तरदायित्व ‘एक जटिल प्रणाली’ है और हमारे संविधान के रचयिताओं ने स्वतंत्रता के उदारवादी प्रयोग पर तर्कसंगत प्रतिबंध निर्धारित किए, क्योंकि ये वे लोग, जो अराजकता के स्वरूप से भली-भांति अवगत थे।  संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर ने तर्क दिया कि यह कहना गलत है कि मौलिक अधिकारों पर कोई प्रतिबन्ध लगाना वर्जित है और उन्होंने गितलो बनाम न्यू यॉर्क के दो स्वतः स्पष्ट अनुच्छेदों को उद्धृत किया। जो इस प्रकार हैं:

“बोलने की स्वतंत्रता और प्रेस की स्वतंत्रता एक लंबे अरसे से स्थापित  बुनियादी सिद्धांत है जो कि संविधान द्वारा सुरक्षित अधिकार हैं। लेकिन यह वस्तुतः गैर-ज़िम्मेदाराना तरीके से बोलने या प्रकाशित करने की पूरी छूट नहीं देते हैं। हमें चुनना होगा, या तो हमें अपने भावों को व्यक्त करने का उचित अधिकार मिले, या फिर एक अप्रतिबंधित और अनियंत्रित अधिकार। जो भाषा के हर संभव प्रयोग को उन्मुक्तता प्रदान करे और उन लोगों को दण्डित होने से बचाए जो इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं।”

x x x x x “सरकार पुलिस के माध्यम से अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए उन लोगों को दण्डित कर सकती है जो लोक कल्याण के प्रतिकूल बातें करके अपनी इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं, जो आम जनता की नैतिकता को भ्रष्ट करने में प्रवृत्त होते हैं, अपराध करने के लिए उकसाते हैं और जन-शान्ति को भंग करते हैं। इस पर विवाद या संदेह नहीं किया जा सकता। …. “

इस संवैधानिक सारांश में सुस्पष्ट रूप से व्याख्यायित, संहिता की धारा 99 ए हमारा स्पष्टीकरण सिद्ध करता है। लोक व्यवस्था तथा शांति के हित में जन-शक्ति की भूमिका इसलिए नहीं होती कि बहुसंख्यक रूढ़िवादियों को संतुष्ट करने के लिए चंद रूढ़ि-विरोधियों का दमन किया जाए, बल्कि उसकी उपस्थिति  प्रत्येक व्यक्ति के मस्तिष्क में उत्पात मचाने के ख्यालों के पोषण को रोकने के लिए होती है। विशाल जनसमूह के बीच घृणा, उपद्रव जैसी भावनाएं गुप्त रूप से हिंसा भड़का सकती हैं और सरकार समाज की सुरक्षा और शांति बनाए रखने के लिए अपने सुविचारित आधारों पर लिए गए निर्णय के ज़रिए पुस्तक के प्रसार पर रोक को वरीयता दे सकती हैं।

कोई भी प्रबुद्ध सरकार इस शक्ति का उपयोग उन्नत आर्थिक विचारों, विवेकशील तथा तर्कसंगत आलोचनाओं या पुरातन रूढ़िवादी सच्चाई को साहस के साथ सामने लाने के प्रयास को कुचलने के लिए नहीं करेगी। सुव्यवस्थित सुरक्षा एक संवैधानिक मूल्य है। यदि प्रगतिशील तथा प्रतिगामी लोगों का शांतिपूर्वक सहअस्तित्व सुनिश्चित करना है तो इसका संरक्षण समझदारी से किया जाना चाहिए। संहिता की धारा 99 ए का यही सार है।

वास्तविक प्रयोग सैद्धांतिक तर्क पर नहीं बल्कि व्यावहारिक ज्ञान पर निर्भर करेगा। जहां मौलिक अधिकारों के प्रतिबंध पर आधारित ‘सुस्पष्ट और आसन्न खतरा’ का अमेरिकी सिद्धांत भारत में अनिवार्य रूप से लागू नहीं भी हो सकता है, वहीं होम्स जे. के ज्ञानवर्धक विचार प्रशासक और न्यायाधीश को सीख देने में सहायक हैं। शेनेक बनाम यू.एस.(1) मामले में होम्स जे.  ने इस वास्तविक परीक्षण को स्वीकार करने के लिए बाध्य किया। उन्होंने कहा कि “हम यह मानते हैं कि कई जगहों पर और सामान्य परिस्थितियों में प्रतिवादी अपने द्वारा प्रसारित परिपत्र में जो कुछ भी कहता है, वह अपने संवैधानिक अधिकारों के दायरे में रहकर ही कहता है। लेकिन प्रत्येक व्यवहार का स्वरूप उन परिस्थितियों पर निर्भर करता है जिनमें वैसा व्यवहार किया जाता है … कानून द्वारा बोलने की स्वतंत्रता की कड़ी सुरक्षा ऐसे व्यक्ति का बचाव नहीं करेगी जो थिएटर में ‘आग -आग’ चिल्लाकर भगदड़ मचाएगा। यह ऐसे व्यक्ति को दी गयी निषेधाज्ञा से भी नहीं बचाती है जो अपने शब्दों के बल से समाज पर अनुचित प्रभाव डालता हो। हर मामले में उठने वाला सवाल यह होता है कि क्या प्रयुक्त शब्द ऐसी ही परिस्थितियों में प्रयोग किये गए थे और क्या वे ऐसी प्रकृति के थे, जो प्रत्यक्ष और तात्कालिक खतरा पैदा करने वाले थे। जो वास्तविक खतरा पैदा करते हों, जिसे रोकने का अधिकार कांग्रेस को है?  यह खतरा कितना और किस स्तर का है, इससे जुड़ा हुआ प्रश्न है। “

एब्राइन्स बनाम यू.एस. (2) मामले में एक प्रसिद्ध परिच्छेद में उन्होंने इस सिद्धांत को विकसित करते हुए कहा कि:

“विचारों की अभिव्यक्ति पर दंड देना मुझे पूरी तरह से तर्कसंगत लगता है। यदि आपको अपने प्रत्युत्तर या अपनी शक्ति पर कोई संदेह नहीं है और तह-ए -दिल से कोई परिणाम चाहते हैं, तो आप स्वाभाविक रूप से कानून के दायरे में रहकर अपनी इच्छाएं व्यक्त करते हैं और विपक्ष को परास्त कर देते हैं। विरोध को अस्वीकार करने से यह इंगित होता है कि आप कहने को प्रभावी शक्ति नहीं मानते हैं, जैसे कि जब कोई व्यक्ति कहता है कि उसने कोई असंभव कार्य को संभव कर दिया हो, या यह कि आप परिणाम के लिए पूरे मन से परवाह नहीं करते हैं, या यह कि आपको या तो अपनी शक्ति पर या फिर अपने प्रत्युत्तर पर संदेह है।

“लेकिन जब मनुष्य को यह महसूस होगा कि समय ने साथ कई विरोधी विचारधाराओं औंधे मुंह गिरी हैं, तो उन्हें अपने आचरण के आधारों से भी ज़्यादा विश्वास इस विचार पर हो सकेगा कि वे जिस सर्वोत्तम स्थिति की इच्छा करते हैं, वह विचारों के मुक्त आदान-प्रदान के बेहतर तरीके से हासिल की जा सकती है,  सत्य की उत्तम परीक्षा तब होती है जब मनुष्य की विचार-शक्ति को दूसरों के समक्ष रखा जा सके और उनके विचारों की अभिव्यक्ति स्वीकार की जा सके और जब उन्हें यह अहसास हो कि सत्य ही वह एकमात्र आधार है, जिसपर वे अपनी इच्छाओं को निरापद रूप से पूरा कर सकते हैं। हर हाल में वही हमारे संविधान का सिद्धांत है। यह एक प्रयोग है, क्योंकि हमारा सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रयोग है।”  

बोमेन बनाम सेकुलर सोसाइटी लिमिटेड  (2) मामले में लार्ड समर ने एक बार फिर आलंकारिक भाषा में लिखित एक परिच्छेद में स्वतंत्रता तथा सुरक्षा की गतिशीलता को रेखांकित किया था, जोकि एक साथ सुबोधगम्य भी है और सुरुचिपूर्ण भी है:

(1) (1918)249 यू.एस.47.52=63 एल.ई.डी.470.473-474.

(2) (1919) 250 यू.एस.616, 629=63 एल.ई.डी.1173, 1180.

(3) (1917) ए.सी. 406, 466-7.

“समाज को खतरे में डालने वाले शब्द तथा कृत्य समय-समय पर अनुपात में भिन्न होते हैं, क्योंकि वास्तव में समाज स्थिर या असुरक्षित होता है, या उसके विवेकशील सदस्य यह मानते हैं कि उस पर हमला हो सकता है। वर्तमान समय में ऐसी सभाओं तथा जुलूसों को कानूनी तौर पर वैध माना जाता है जिन्हें डेढ़ सौ साल पहले राजद्रोही माना जाता और ऐसा इसलिए नहीं है कि कानून कमज़ोर पड़ गया है या बदल गया है, बल्कि इसलिए कि समय के बदलने से समाज पहले से ज़्यादा सशक्त हुआ है।

वर्तमान समय में विवेकशील मनुष्यों को समाज के विघटन या पतन का डर नहीं होता क्योंकि धर्म पर सार्वजनिक तौर पर जिन युक्तियों से चोट की जाती है, वे अपमानपूर्ण नहीं होतीं। भविष्य में हमारे समाज की महत्वपूर्ण संस्थाओं को क्षीण करने के लिए अभिकल्पित धर्म-विरोधी हमले  जनसाधारण के लिए खतरा पैदा करने के दोष से अपने आप में अपराध सिद्ध होंगे, इसकी कोई सम्भावना उत्पन्न नहीं होती। क़ानून की नज़र में एक दिशा में आगे बढ़ने वाला विचार खुद को नए अनुभवों के आधार पर दूसरी दिशा में मुड़ने से नहीं रोकता, ना ही परिस्थितियों के फिर से बदलने पर वह अपनी उत्तरवर्ती पीढ़ियों को बांधे रखता है।

आखिर, किसी भी मत का समाज के लिए खतरा होना, समय तथा वास्तविकता पर निर्भर है। मैं ऐसा कुछ नहीं कहना चाहूंगा जिससे समाज का खुद को आवश्यक्तानुसार खतरों से बचाव करने का कानूनी अधिकार सीमित हो जाए। लेकिन इतना कहना चाहूंगा कि जो अनुभव कभी खतरे को वास्तविक सिद्ध करते थे, अब नगण्य हो चुके हैं, और जो खतरे कभी बहुत निकट महसूस होते थे, अब टल गए हैं। सामान्य नियमों के अनुसार ईश्वर-निंदा और अधर्म जैसा कुछ भी नहीं होता… जो हमें अपने समय में उस अनुभव के अनुसार विशेष परिस्थितियों में उन्हें लागू करने के अलग-अलग तरीकों को अपनाने से रोक सके।”

ऐसी है हमारी संवैधानिक योजना। ऐसी विधिशास्त्र-सम्बन्धी गतिशीलता और स्वतंत्रता एवं संयम के तात्विक आधार। कानून एवं राजनीति के सूक्ष्म संगम की संवेदनशीलता को न्यायाधीशों को कर्तव्यनिष्ठा से संभालना पड़ता है। अब पूरी बहस अपने समापन पर पहुंच गयी है। सरकार को सामाजिक शांति को बनाए रखने और इसे खतरे में डालने वाले प्रकाशनों को ज़ब्त करने का प्राधिकार है और यह उसकी ज़िम्मेदारी भी है। लेकिन इस मामले में जिस अधिकार पर रोक लगाई गयी है, वह है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार से जुड़ा है।जो मनुष्य की प्रगति के स्थायी  हितों को बढ़ावा देता है। इसलिए, कानून (धारा 99 ए) प्रशासन को प्रतिबन्ध लगाने और अपने इस निर्णय के पीछे के आधारों का ब्यौरा देने के दायित्व पर विचार करने का स्मरण कराता है। इस स्तर पर की गयी गलती क़ानून के आदेश का उल्लंघन करने के बराबर है। इस मामले में इतना कहना पर्याप्त है।

समापन से पहले, हम यह स्पष्ट करते हैं कि हम पुस्तक की गुणवत्ता या उसकी भड़काऊ और अपमानसूचक शब्दावली पर कोई विचार व्यक्त नहीं कर रहे हैं। यह कई कारक तत्वों की मेल पर निर्भर करता है। जो विचार रूढ़िवादियों को ठेस पहुंचा सकता है, वह प्रगतिशील समुदायों के लिए हास्यास्पद हो सकता है। जनश्रुति के आधार पर किसी एक धर्म, संप्रदाय, देश या समय के लिए जो विचार या शब्द अपमानजनक हो सकता है, वह दूसरों के लिए उतना ही पवित्र हो सकता है। रूढ़िवादियों को स्वामी विवेकानंद की इस फ़टकार से अब भी  आक्रोश पैदा हो सकता है:

“हमारा धर्म रसोई में है, हमारा ईश्वर वह बर्तन है जिसमें हम खाना पकाते हैं और हमारा धर्म कहता है – मुझे मत छूना मैं पवित्र हूं’ (जवाहरलाल नेहरू द्वारा उनकी  ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के पृ. 339 से उद्धृत)। मानव उन्नति का सूत्र स्वतंत्र विचार और उनकी अभिव्यक्ति में निहित है। लेकिन जहां जनहित का प्रश्न हो, वहां सामाजिक अस्तित्व यथोचित नियंत्रणों का भी विधान करता है। न्यायिक समीक्षा की देखरेख में शासकीय विवेक संतुलन बनाए रखता है। हम न तो आपातकालीन स्थितियों की बात कर रहे हैं और ना ही संवैधानिक रूप से पवित्र माने गए विशेष निर्देशों की, बल्कि हम तो सामान्य समय और व्यावहारिक कानूनों का समर्थन करते हैं जो सब के काम आए।

जाते-जाते हम अपीलकर्ता के अधिवक्ता से यह कहना चाहेंगे कि यदि राज्य सरकार वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए विवादित पुस्तक के विरुद्ध  धारा 99 ए लागू करने के लिए खुद को विवश महसूस करे तो वह ऐसा करने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन निश्चित रूप से उसे अपने मत के आधारों के विवरण और धारा 99 सी के तहत कार्यवाही करने के कारणों की न्यायालयीय माँग को पूरा करना होगा। हमारा विस्तृत विचार-विमर्श कानूनी प्रश्नों को हल करता है और एक दूसरे के विरुद्ध खड़े विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णयों में आंतरिक या प्रत्यक्ष द्वंद्वों का समाधान प्रस्तुत करता है। विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुकदमे निम्न हैं :

अरुण रंजन घोष बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1); और ज्वालामुखी बनाम ए.पी.  राज्य (2) जो अपीलकर्ता द्वारा प्रस्तावित विचार का समर्थन करते हैं; और मोहम्मद खालिद बनाम मुख्य आयुक्त (3); चिन्ना अन्नामलाई बनाम राज्य (4) और बेनेट कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड बनाम जम्मू -कश्मीर राज्य (5) जो अपील के तहत इलाहाबाद के निर्णय से सहमत थे। संभवतः उपरोक्त मामलों में से प्रत्येक में अनुपात पर चर्चा करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि इस निर्णय के पहले हिस्से में प्रत्यर्थियों के विचारों पर अमल किया जा चुका है।

विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा कई मौकों पर दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 99 ए के तहत शक्तियों के प्रयोग की मांग की संभाव्यता हमें विरोध की स्थिति में ला देती है। विविधता में एकता के अलावा, भारत सांस्कृतिक विपर्ययों, कई धर्मों तथा विधर्मों, तर्कवाद और धार्मिक कट्टरता तथा आदिम पंथों और भौतिकवादी सिद्धांतों के सह-अस्तित्व का देश है। इतिहास और भूगोल की बाध्यताएं और मध्ययुगीन संस्कृति के शिथिल पड़ते प्रभावों पर आधुनिक विज्ञान का प्रहार, प्रिय-अप्रिय लड़ियों से बने एक मोज़ाइकनुमा चित्रपट प्रस्तुत करते हैं,  जिसने उनकी आपसी आलोचना की उदारचेता सहिष्णुता को व्यापक रूप से जीवन का एक आवश्यक अंग बना दिया है, भले ही उनकी अभिव्यक्ति अनर्गल ढंग से क्यों न होती हो। हमें विश्वास है कि ज़ब्ती के कठोर निर्देशों की कार्यवाही में सरकारें अपने अभिमान को हावी नहीं होने देंगी, बल्कि हमारे समाज की इन अटल सच्चाइयों पर ग़ौर करेंगी।

यदि कुछ क्षण के लिए हम भारत के महान विचारकों – मनु से लेकर नेहरू तक को छोड़ भी दें तो पाएंगे कि गैलीलियो और डार्विन, थॉरो और रस्किन से लेकर कार्ल मार्क्स, एच. जी. वेल्स, बेर्नार्ड शॉ तथा बर्ट्रैंड रसेल तक, कई मनीषियों के विचारों एवं कथनों पर आपत्ति जताई गयी है। आज भी हमारे देश में, कहीं न कहीं ऐसे कट्टर लोग मिल जाते हैं जो उनके लेखन से आहत होते हैं, लेकिन कोई भी सरकार इतनी रूढ़िवादी नहीं होगी कि उनके बारे में चंद कट्टरपंथियों के दुराग्रही विचारों के मद्देनज़र, उनके महान लेखन को ज़ब्त करने के अधिकार की मांग करे। (1) आइ. एल. आर [1957] 2. कलकत्ता . 396. (2)आइ. एल. आर [1973] ए.पी. 114 .

(3) एआईआर 1968 दिल्ली 18 (एफ.बी.)। (4) एआईआर 1971 मद्रास 44  ((एफ.बी.)।

(5) 1964  जे एंड के एल.आर.591।1974

विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं के प्रति एक प्रसिद्ध माओवादी विचार उदार दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से इस प्रकार व्यक्त करता है-

“कला और विज्ञान की उन्नति को बढ़ावा देने के लिए सौ फूलों को खिलने तथा सौ विचारधाराओं के बीच वाद-विवाद का अवसर देने की नीति उपयोगी होती है।”

हेराल्ड लास्की, जिन्होंने अपनी ‘ए ग्रामर ऑफ पॉलिटिक्स’ के ज़रिये भारत के कई प्रगतिशील विचारकों को प्रभावित किया है। उनके निम्नांकित कथन में एक चिरकालिक सच्चाई दृष्टिगत प्रकट होती है:

“कोई भी सरकार सामाजिक मुद्दों को लेकर कभी भी इतनी दृढ़मत नहीं होती कि वह राष्ट्र के नाम पर उन्हें दंडनीय घोषित कर दे। पिछले कुछ वर्षों के अमेरिकी अनुभवों से यह दुखद रूप से स्पष्ट होता है कि सरकारी तंत्र में कभी भी सटीक तौर पर अंतर करने की पर्याप्त क्षमता नहीं होती जिससे वह यह तय कर सके कि अक्षेपित विचार समुचित रूप से वर्तमान अव्यवस्था को जन्म देता है।”  

xxxxxx “इसका यह तात्पर्य नहीं है कि अव्यवस्था का महिमामंडन किया जा रहा है। यदि हिंसात्मक विचारों का सरकार पर इतना नियंत्रण हो कि उसकी बुनियाद ही हिल जाए, तो उसकी शासन -प्रणालियों में कोई घोर गड़बड़ी है।”    

XXXXXxx “लगभग हमेशा ही, ऐसे मामले कम देखने को मिलते हैं जिनमें दमन करने वाला पक्ष जीतता है। चूंकि स्वतंत्र अभिव्यक्ति से तनावग्रस्त स्थिति में शांति बहाल की जा सकती है, इसलिए, लगभग हमेशा ही, उसका प्रयोग न्यायसंगत सिद्ध होता है। इसके साथ ही, बोलने की स्वतंत्रता पर रोक लगाने का अर्थ है किसी आंदोलन को भूमिगत रूप से चालित होने के लिए बाध्य करना जो अवैधानिक है। वोल्तेयर से फ्रांस को खतरा उनके अकादमी में चुनाव से नहीं था, बल्कि उनकी इंग्लैंड यात्रा से था।  

लेनिन ड्यूमा में उतना ज़्यादा खतरनाक नहीं रहा होगा जितना कि स्विट्ज़रलैंड में रूसी ज़ारशाही व्यवस्था के लिए था। वस्तुतः बोलने की स्वतंत्रता, जिसमें वैधानिक स्वीकृति अन्तर्निहित होती है, एक साथ असंतोष का भाव-विरेचन तथा यथास्थिति में सुधार लाने की आवश्यकता का आह्वान है। एक सरकार अपने समर्थकों द्वारा अपने प्रशस्ति-गान की तुलना में अपने विरोधियों की आलोचना से अधिक सीख सकती है। उस आलोचना का दम घोंटना अंततः, कम से कम, स्वयं के विनाश की ही तैयारी है।”   

सावधानी के रूप में एक टिप्पणी। संवैधानिक रूप से घोषित आपातकाल के वर्तमान संदर्भ में, क़ानून को आपातकाल सम्बन्धी प्रावधानों में अंकित परिमित दायरों में रहकर ही कार्यवाही करनी पड़ेगी और यह निर्णय पूर्व-आपातकालीन कानूनी आदेश से संबंधित है। अतः हम अपील को खारिज करते हैं।

(अनुवाद : देविना अक्षयवर, कॉपी संपादन : सिद्धार्थ/नवल)


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