भारत के आम आदमी के सवालों का दस्तावेज

रामजी यादव ने अपनी किताब में देश की उस तस्वीर को सामने रखा है, जो भले ही अखबारों-चैनलों और संसद में नहीं दिखती हो; लेकिन देखता उसे हर आदमी है। साथ ही यह भी कि गरीबी-बेरोजगारी के सवाल किस तरह खारिज कर दिए जाते हैं और कैसे केवल सत्ता में बने रहने के लिए भ्रमजाल फैलाया जाता है

समाज में रोजाना घटित होने वाली घटनाओं को लिखना एक जटिल कार्य है। वजह यह कि आदमी जब इन घटनाओं को लिखने बैठता है, तो वह खुद उसमें शामिल हो जाता है। फिर घटना चाहे मॉब लिंचिंग की हो या फिर किसी गरीब के घर में लगी आग की। लेखक घायल भी होता है और झुलसता भी है। जब घायल और झुलसा हुआ लेखक कलम उठाएगा, तो वह सवाल तो करेगा ही; यह भी कहेगा कि भले ही कोई स्वयं को खुदा क्यों न मान ले, पर उससे समाज को क्या?

इसी थीम पर लिखी गई किताब है  ‘तुम ख़ुदा ही सही हमारे किस काम के!’। लेखक हैं रामजी यादव। किताब में कुल अट्ठारह अध्याय हैं; जो सामाजिक विघटन और दलितों-पिछड़ों के खिलाफ देश में रचे जा रहे षड्यंत्रों का न केवल खुलासा करते हैं, बल्कि आज की अलग-अलग समस्याओं को भी उजागर करते हैं। साथ ही बताते हैं कि किस तरह देश के निचले पायदान पर खड़े शोषित वर्गों को स्वर्णिम सपनों का कल दिखाकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की भाजपा सरकार उनके साथ धोखा कर रही है और उन्हें मूर्ख बनाकर गुलामी की गहरी खाई में धकेल रही है। 

रामजी यादव, लेखक, समीक्षित पुस्तक ‘तुम खुदा ही सही हमारे किस काम के’

हालांकि, कई जगहों पर लेखक सही जगह पर चोट करने से चूक भी गए हैं। मसलन, वे इन कारणों का खुलासा नहीं करते हैं, जिनके कारण गरीबी और बेरोजगारी आदि के सवाल भारतीय जनता को प्रभावित नहीं कर सके। इसके बावजूद रामजी यादव ने बड़ी दिलेरी के साथ घटनाओं और घटनाओं को लेकर समाज में होने वाली मंत्रणाओं को कलमबद्ध किया है। 

 जैसे पुस्तक के पहले ही अध्याय ‘सवा अरब का झूठ और राजनीति के चोर दरवाजे’ की शुरुआत लेखक ने रेल यात्राओं के दौरान यात्रियों के बीच होने वाली बहस और राजनीतिक चर्चा से की है। यह चर्चा भाजपा सरकार के वर्तमान कार्यकाल में आम रही है। हालांकि, समय के निकलने के साथ-साथ चर्चा और बहस के मुद्दे बदलते रहें हैं; पर चर्चा के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही रहे हैं। इस अध्याय की भी शुरुआत लेखक ने कुछ इस तरह से की है- ‘इधर रेल यात्राओं में मैंने गौर किया है कि दैनिक यात्रियों की भीड़ लगभग हमेशा ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस वायदे पर जबरदस्त बहसें कर डालती है कि देश के हरेक आदमी के खाते में पंद्रह-पंद्रह लाख रुपए कब आएंगे? असली बहस इसके बाद शुरू होती है…’ वे इस अध्याय का अंत भी वे कुछ यात्रियों द्वारा उठाए गए उन प्रश्नों से करते हैं, जिनका जवाब विकास के नाम पर धोखा खा चुकी जनता आज भी प्रधानमंत्री से मांग रही है। 

समीक्षित पुस्तक ‘तुम खुदा ही सही हमारे किस काम के’ का कवर पृष्ठ

पुस्तक के दूसरे अध्याय ‘कालेधन की नाव पर सवार मोदी और बेजुबान शहादतें’ में लेखक ने बताया है कि जिस कालेधन को लाने का झूठा वादा जनता से मोदी ने किया, वही कालाधन कैसे उनको मजबूत बनाने का संसाधन बना और बन रहा है। इसी अध्याय में वे लिखते हैं कि ‘‘देश की जनता यह भी देखे ‘गरीबों के मसीहा मोदी’ उसे किस प्रकार बेरोजगारी और भूख के मुहाने पर ले जाकर खड़े कर रहे हैं?’’ पुस्तक के तीसरे ‘बेचारे किसान और गैस सिलेंडर वाली उज्ज्वलाएँ’ और चौथे ‘महंगी खेती, मरते किसान और मुनाफे में कॉर्पोरेट’ अध्यायों में लेखक ने किसानों की बढ़ती दुर्दशा, कर्ज और भुखमरी से आजिज होकर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे लोगों और कॉर्पोरेट घरानों पर सरकार की मेहरबानी को इंगित किया गया है। पांचवें अध्याय ‘वो दिन कि जिसका वादा है…’ में लेखक ने धर्म के नाम आश्रम खोलकर बैठे बाबाओं, स्वयंभू भगवानों द्वारा स्त्री शोषण, उनके चीर हरण और उनके बचाव की घटनाओं पर विमर्श किया है। 

बहरहाल, ‘तुम ख़ुदा ही सही हमारे किस काम के!’ …यह मिसरा देश के राजनीतिक खुदाओं की कर्तव्य विमूढ़ता और अकर्मण्यता को बखूबी बयां करता है। नेताओं, मंत्रियों और सरकारों की इसी कर्तव्य विमूढ़ता और अकर्मण्यता पर आजकल सार्वजनिक वाहनों में, आम स्थानों पर और आम लोगों के बीच खूब चर्चा और बहस होती रहती है। रामजी यादव ने इसी राजनीतिक मंत्रणा और बहस को इस पुस्तक में उकेरा है। आम जनता की इस मंत्रणा और बहस पर उन्होंने एक समीक्षक और साहित्यकार की दृष्टि से तुलनात्मक विचार व्यक्त किया है। हालांकि, उन्होंने न तो इसे (जनता की बहस और राजनीतिक मंत्रणा को) काटा-छांटा है और न ही कोई सुझाव दिया है। हां, सभी पक्षों की बात को जनता, खासकर पाठकों के सामने रखने के साथ-साथ अपना पक्ष रखकर उनके स्वयं निर्णय पर छोड़ दिया है, कि वे सवयं सही और गलत का निर्णय करें।

समीक्षित पुस्तक   : तुम खुदा ही सही हमारे किस काम के!

लेखक : रामजी यादव

प्रकाशन : अगोरा प्रकाशन, शिवपुर, वाराणसी (उ.प्र.)

संपर्क. : 09479060031  

मूल्य : सजिल्द- 290/- एवं पेपरबैक- 120/- रुपए                

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(कॉपी संपादन : नवल)


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