वर्ण-व्यवस्था से मुक्ति की गाथा लिख सकते हैं शहर

लेखक विभूति नारायण राय बता रहे हैं कि नव उदारवादी युग में गांवों में किस तरह के बदलाव हुए हैं और यह भी कि इन बदलावों के मद्देनजर शहरों में हो रहे पलायन को किस नजरिए से देखा जाय। उनका मानना है कि गाँवों को नर्क बनाने के लिये सबसे अधिक ज़िम्मेदार संस्था वर्ण-व्यवस्था से काफ़ी हद तक मुक्त शहरों को अधिक मानवीय बनाया जा सकता है

सालों बाद गांव में भत्तवान खाने जा रहा था। भत्तवान मतलब भात और दाल का भोजन, अधिक से अधिक साथ में आलू का चोखा या भरता और कहीं गृहस्वामी की हैसियत के मुताबिक़ देशी घी। कभी-कभार सजाव दही के दर्शन भी हो जाते। भत्तवान शादी-विवाह के घरों मे महिलाओं को दम मारने की फ़ुर्सत देने के लिये रखा जाता था। हफ़्तों चलने वाली वैवाहिक रस्मों के बीच यह गृहिणियों को थोड़ा आराम दे देता। लड़के वालों के यहां बारात निकलने के एक दिन पहले नातेदारों, पट्टीदारों और व्यवहार वाले परिवारों को भत्तवान के लिये न्योता जाता। लड़की के घर पर कहीं तो शादी के एक दिन पहले और कहीं बारात वाले दिन का आयोजन होता। मेरा न्योता जहां था वहां से दूसरे दिन बारात उठनी थी। भत्तवान वाले घर मे कई बदलाव मेरा इंतज़ार कर रहे थे।

सबसे पहले तो इस यथार्थ से साक्षात्कार हुआ कि अब भत्तवान सिर्फ़ दाल-भात का भोज नही रह गया है। चावल के अतिरिक्त वहां पूड़ी, कचौड़ी और आधे दर्जन से अधिक व्यंजन मेरी पत्तल मे परोसे गये। पत्तल भी कहां , उसकी जगह पाॅलीथीन चढ़ी एक काग़ज़ की प्लेट थी। मेरे जैसे कुछ लोगों के लिये ज़मीन पर बैठने की जगह कुर्सी मेज़ की व्यवस्था थी। पहली नज़र मे ही समझ मे आ गया कि पूड़ियां गांव जवार की महिलायें नही बेल रहीं बल्कि कोई कैटरर है जिसके लोगों ने सारा खाना बनाया है। परोसने मे ज़रूर नाते–रिश्ते के लोग लगे थे। भोजन पकाती महिलाओं के न होने से वे गीत भी अनुपस्थित थे जो अतिथियों को भोजन कराते समय गूँजते रहते थे। अपनी मुश्किल ज़िंदगी की नीरसता को दूर करने के लिये महिलाओं के पास हर मौक़े के लिये गीत हैं। जाताँ, चक्की, रोपनी, कंटनी, जन्म, मृत्यु, मुंडन, विवाह–ग़रज़ यह कि हर मौक़े के लिये औरतों के पास गीत हैं और उल्लास या विलाप की सामूहिक अभिव्यक्ति के रूप मे उनसे हमारा साबका पड़ता रहता है।

गांवों में बदली है पंगत की तस्वीर

गाँव मे बाज़ार पूरी तरह से पहुँच चुका है इसका पहला अहसास तो कैटरर की उपस्थिति से हुआ । पुराना वक़्त गया जब किसी घर मे शादी पड़ी तो नाते–रिश्ते, अड़ोस–पड़ोस की महिलायें इकट्ठी होकर पूड़ी बेलतीं और गीत के स्वरों के साथ टोले-मोहल्ले के लड़के दौड़-दौड़ कर उन्हें परोसते। उन दिनों बारात तीन दिन रुका करती थी[1], उसके रुकने के लिये चारपाई, गद्दा, रज़ाई, चादर, तकिया सब अड़ोस-पड़ोस से इकट्ठा होता। बारात वापसी के बाद माँग कर लाये गये सामान लौटाते समय कुछ मनोरंजक विवाद ज़रूर पैदा होते। पर कैटरर के आते ही इस सामाजिकता का अंत हो गया है।

बहुत सी चीज़ें ख़त्म हुईं हैं। मसलन कूआँ अब नही दिखता। इंडिया मार्का टू चाँपाकल ने एक झटके से उसकी ज़रूरत ख़त्म कर दी है। पनघट के गीत और उससे जुड़ी शरारतें भी ख़त्म हो गयीं। पता नही अब जब प्यासा बटोही किसी चाँपाकल के नीचे अँजुरी पसारता होगा तो हैंडिल चलाते हुये के साथ उसका कोई संवाद होता भी है या नही? खेती मे बैलों का उपयोग ख़त्म होने के बाद अब गृहस्थ को भोर होने से पहले आकाश मे सुकुआ या शुक्र तारा की स्थिति देख कर बिस्तर छोड़ने की ज़रूरत नही पड़ती। इसी लिये अब सूरज की पहली क़िरण के साथ कंधे पर हल लिये खेतों की तरफ़ हड़बड़ाते जाते किसान की छवि भी विलुप्त हो गयी है। साप्ताहिक हाट का चलन अब सिर्फ़ औपचारिकता मात्र है क्योंकि हर संभव स्थल पर रोज़ खुलने वाली दूकान खुल गयी है जिस पर मल्टी नेशनल कम्पनियों तक का सामान हमेशा उपलब्ध रहता है।

बिन पानी एक शाही कूआं। नई दिल्ली के राजीव चौके समीप है अग्रसेन की बावली

यह फ़ैसला करना बड़ा मुश्किल है कि बाज़ार के इस दख़ल पर ख़ुश हुआ जाय या दुःखी? पनघट के सरस बिम्ब के पीछे ठाकुर के कुएँ का खुरदरा यथार्थ भी छिपा था जिसमें आप पानी की तलाश मे आये दलित को पशु से भी गिरी अवस्था मे पा सकते थे। चाँपाकल पानी से उसका रिश्ता मनुष्योचित बनाता है। बाज़ार के आने से ही सँभव हुआ है कि निरंकुश बिरादरी पंचायतें अब किसी का हुक्का-पानी बंद नही कर पातीं। गाँव के नाई,,धोबी या बढ़ई अब सड़कों के किनारे गुमटी लगाकर अपने श्रम का नगद मेहनताना माँग सकते हैं। वे उस अमानवीय प्रथा से मुक्त हो गये हैं जिसमें साल भर बेगार की तरह अगड़ी और समृद्ध मझोली जातियों की सेवा मे खटते थे और फ़सल कटते समय उनकी दया पर आधारित मजूरी लेकर घर आते थे। मशीनीकरण से सिर्फ़ खेती किसानी की सुविधाएँ और उत्पादन ही नही बढ़े बल्कि उसकी गति के पीछे के मनुष्य की हैसियत भी बदल गयी। हल का बैल हाँकने वाला और मालिक की नज़र मे पशु से भी गया गुज़रा हलवाहा ट्रैक्टर का स्टीयरिंग संभालते ही ‘ड्रायवर साहब’ बन जाता है। बाज़ार दलित को मनुष्य बनने मे मदद करता है पर वह भी लोगों को बाँध कर नही रख पा रहा है।

दिल्ली में भीड़भाड़ वाला इलाका बेतरतीब लक्ष्मीनगर। इस इलाके में यूपी और बिहार आदि राज्यों से पलायन कर आये लोगों की संख्या सबसे अधिक है। (तस्वीर : नवल)

हर यात्रा मे पता चलता है कि कुछ नये लोग शहरों की तरफ़ पलायन कर गये हैं। एक पुराना लोकगीत है – लागल झुलनिया का धक्का बलम कलकत्ता पहुँच गये’ अर्थात शादी हुई कि प्रिय को जीविका कमाने के लिये कलकत्ता भागना पड़ा। यह उन दिनो का गीत है जब लड़कपन में ही विवाह हो जाता था अर्थात होश संभालने के साथ ही पलायन की नियति से साक्षात्कार होता था। आज भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं। पहले के लोकगीतों मे कलकत्ते या बंबई का ज़िक्र होता था, आज सूरत, अमृतसर, नोयड़ा और गुड़गाँव नये केंद्र बन गये हैं जहाँ रोज़गार की तलाश मे नौजवान भाग रहे हैं। ग्रामीण पलायन का अध्ययन करने वाली हिना देसाई का कहना है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों से 80 प्रतिशत से अधिक नौजवानों का पलायन हो चुका है। इनमे सभी जातियों के लोग शरीक हैं। गाँवों मे आपको सिर्फ़ बूढ़े, औरतें या बच्चे दिखते हैं। सरकारी आँकड़े भी गवाही दे रहे हैं कि आज शहरी और ग्रामीण आबादी लगभग बराबर हो गयी है। यह एक वैश्विक प्रक्रिया है जिसे हम रोक नही सकते और शायद रोकना भी नही चाहिये।

गाँवों के उजड़ने को लेकर बहुत नोस्टाल्जिक होने की जगह क्या यह उचित नही होगा कि हम शहरों की तरफ़ भाग रहे मनुष्यों के लिये बुनियादी सुविधाओं से युक्त बेहतर रिहायशी ठिकाने बनायें? गाँवों को नर्क बनाने के लिये सबसे अधिक ज़िम्मेदार संस्था वर्ण-व्यवस्था से काफ़ी हद तक मुक्त शहरों को अधिक मानवीय बनाया जा सकता है बशर्ते वे सिर्फ़ अनियंत्रित भीड़ को राम भरोसे छोड़ कर अनियोजित तरीक़े से खपाने के अड्डे न बनें और राज्य उन्हें पर्यावरण का ध्यान रखते हुये सड़क, बिजली, पानी , स्वास्थ्य , शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं वाली नियोजित बस्तियों के रूप में विकसित करें।

(कॉपी संपादन : नवल)

 

[1] बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में तीन दिनों तक रूकने वाली बारात को मरजाद कहा जाता है। अब यह परंपरा लगभग खत्म हो चुकी है


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