आंकड़ों के आईने में बिहार की राजनीति का विश्लेषण

डॉ. कविता नन्दन बता रहे हैं कि सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार द्वारा लिखित यह पुस्तक केंद्रित भले ही बिहार की चुनावी राजनीति पर है। परंतु, इसके जरिए पूरे देश की राजनीति को समझा जा सकता है

बिहार की चुनावी राजनीति : जाति-वर्ग का समीकरण (1990-2015)

फारवर्ड प्रेस और सेज भाषा द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित इस पुस्तक के संदर्भ में कुछ भी कहने से पहले यह कहना मैं जरूरी समझता हूँ कि यह बिहार की राजनीति पर केंद्रित बिलकुल नए तरीक़े का शोधकार्य है, जिसे पढ़ने से पहले आपको समझना होगा कि कि आप बिहार को नहीं बल्कि भारत में रहने वाली जनता के मिज़ाज को समझने जा रहे हैं। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ समझना बहुत जरूरी है। दरअसल दो दशक पहले का बिहार भौगोलिक रूप से पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करता रहा है। यहां पहाड़ी इलाकों के साथ जंगल और नदियों के साथ रेतीली ज़मीन भी है। समतल मैदानी इलाकों के साथ कृषि योग्य भूमि भी है। कोयला खदानों से लेकर गंगा की रेत का उत्खनन अबाध गति से चलता है। यहां सीधे-सादे नागरिकों से लेकर माफ़िया समूह मिलते हैं जो समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और विकास पर अपनी मज़बूत पकड़ बनाए हुए हैं। विश्वविख्यात शिक्षा का केंद्र है तो अशिक्षितों की भारी आबादी है। कहने का मतलब पूरे देश में अलग-अलग प्रदेशों की सारी विशेषताएं आपको बिहार में एकाकार होती हुई मिल जाएंगी। बिहार को किसी भी तरह कम आंकने की भूल नहीं करनी चाहिए क्योंकि सुपर थर्टी की धमाल से लेकर नक्सली मूवमेंट का हिस्सा रहा बिहार विभाजन से पूर्व औद्योगिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता रहा और पूंजीपतियों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ था। इसके बावजूद यहां ज़मीनी स्तर पर आम आदमी के लिए अभी 1950 से पहले वाला भारत है जो जार्ज पंचम के जमाने से जनगण मन अधिनायक को ढूंढ रहा है किंतु आज तक उसे भारत का वह भाग्य विधाता नहीं मिला क्योंकि मिलता तो उसका भी भाग्य बदलता; वह भी तो भारतीय है न !

यह पुस्तक बिहार की चुनावी राजनीति में पिछले तीन दशकों में जो कुछ घटित हुआ है, न केवल उसका एनेलिसिस करती है बल्कि उस दृश्य को बिना किसी दबाव या पूर्वाग्रह के यथावत प्रस्तुत करती है। मेरी नज़र में, भारत में किसी भी राज्य के राजनीतिक सरोकारों, मुद्दों पर केंद्रित होकर अब तक लिखी गई तमाम पुस्तकों में एक खास ढंग का दृष्टिकोण मिलता है जिसके पीछे सामाजिक, राजनीतिक या बाज़ार का दबाव होने के साथ ही रचनाकार की अपनी विचारधारा और पूर्वाग्रहों का सम्मिश्रण होता है जो अपने पाठक को प्रभावित करने का प्रयास कहा जा सकता है। इस पुस्तक के साथ ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा नहीं कि इसमें कोई दृष्टिकोण ही नहीं है बल्कि यह पुस्तक क़ाबिल-ए-ग़ौर है कि जो कुछ आप के सामने पेश करती है उसके पीछे एक स्वस्थ दृष्टिकोण है। यह दृष्टिकोण आपको बिलकुल आज़ाद छोड़ता है कि वस्तुगत सत्य को जानने के बाद समाज, देश और राजनीतिक व्यवस्था की दुर्व्यवस्था के प्रति जवाबदेह सरकार के साथ ही आप बतौर जिम्मेदार नागरिक  अपने उत्तरदायित्व का उचित अवलोकन कर सकें।

सेंटर फार द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के निदेशक संजय कुमार ने बिहार की चुनावी राजनीति से संबंधित इस शोध में उपकरण के रूप में सर्वेक्षण पद्धति का उपयोग किया है और विश्वसनीय डाटा के साथ अलग-अलग अध्यायों के जरिए पिछले तीन दशकों में जनता के बीच राजनीतिक रुझान को विश्लेषित करते हुए उन तथ्यों की जांच-पड़ताल करने का महत्वपूर्ण प्रयास किया है जो वर्तमान बिहार में बड़े परिवर्तन के कारक बने तथा वर्तमान परिस्थितियों के लिए वास्तविक रूप से जिम्मेदार हैं। हम इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकते कि किसी भी राज्य की राजनीति का स्वरूप निर्धारित करने में उसके समाज और वहां की अर्थव्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सामाजिक संघर्ष और  आर्थिक तनाव किसी भी राज्य के लिए अभिशाप होते हैं जबकि सामाजिक सौहार्द्र और आर्थिक सुरक्षा राज्य एवं राष्ट्रीय विकास के लिए वरदान साबित होते हैं। इसी के साथ ही यह भी तथ्यात्मक सत्य है कि राज्य को अभिशप्त करने अथवा विकसित करने में वहां की राजनीति की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जिसके लिए नागरिकों से अधिक हमारे राजनेताओं और सरकारों की जवाबदेही बनती है। यह पुस्तक अपने गंभीर विश्लेषण में उन तथ्यों को जो बिहार ही नहीं बल्कि पूरे भारत को एक साथ प्रभावित करते रहे हैं, उसे ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में समझने का महत्वपूर्ण प्रयास है। 15 नवंबर 2000 को झारखंड नए राज्य के रूप में अस्तित्ववान हुआ। बिहार भारत का एक महत्वपूर्ण राज्य है, देश की कुल आबादी में 8.7 प्रतिशत जनसंख्या के आधार पर तीसरा सबसे बड़ा राज्य है।

कभी दोस्त, कभी दुश्मन : पिछले तीन दशकों से लालू प्रसाद और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द ही रही है बिहार की राजनीति

आज़ादी से पहले देश के भीतर जो सामंती व्यवस्था विद्यमान थी उसे भारत के स्वतंत्र होने के बाद ध्वस्त करने की बात कही गई लेकिन सामंती मूल्यों का विनाश नहीं हुआ। यह एक अज़ीब सी आज़ादी थी जहाँ देश की अपनी सरकार थी, संविधान था वहीं भूस्वामी, मालिक, मज़दूर, बंधुआ, बेकार सभी थे लेकिन लाचारी से मुक्ति का कोई विधान नहीं था। 1950 तक शासक वर्ग देश की जनता के भीतर क्या चल रहा है, अच्छी तरह जान चुका था। भूस्वामियों का सरकार पर दबदबा था ही और हम अच्छी तरह जानते हैं कि कुलीन अभिजात्य वर्ग से गए हुए लोग कांग्रेस में प्रतिष्ठित नेतृत्व कर रहे थे। इसीलिए कृषि प्रधान देश की भूमि पर कब्ज़ा जमाए भूस्वामियों के हित सुरक्षित थे। भूदान आंदोलन हो या फिर भूमि वितरण का कार्यक्रम शासक वर्ग और सत्ता के निकटस्थ ताक़तवर लोगों ने वह प्रक्रिया नहीं अपनाई जिससे आज़ादी का सुफल प्रत्येक भारतीय को मिल सके। पुस्तक में इस मुद्दे को गंभीरता से समझने का प्रयास किया गया है। लेखक अपने विश्लेषण में भूमि अधिग्रहण अधिनियम और हस्तांतरण में जानबूझकर बरती गई अनियमितताओं को रेखांकित करने की ईमानदार कोशिश करता है। वह बताता चलता है कि किस तरह से देश की आबादी में भूमि के स्वामित्व को लेकर कई फांक होती चली गई और भूमि वितरण में हुई धांधली ने भूमिहीन वर्गों के बीच तनाव को जन्म दिया जो आने वाले वर्षों में हिंसक जातिगत संघर्ष में तब्दील हो गया, जिसने बिहार को खूनी संघर्ष की त्रासदी झेलने के लिए विवश कर दिया। इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि देश की आजादी क्यों कुछ लोगों के लिए जश्न का माहौल दे गई और आबादी के एक तिहाई से भी ज्यादा बड़े हिस्से को तबाही की सौगात मिली जिससे वह आज तक जूझती हुई बद से बदतर ज़िंदगी जीने के लिए मज़बूर हो गई है।


1948 के बाद तमाम दुश्वारियों को पार करते हुए, भूमि सुधार कानून के तहत ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा उच्च वर्गीय पिछड़ी जातियों ख़ासतौर से यादवों, कोइरियों और कुर्मियों को हस्तांतरित किया गया। इस प्रकार अभिजात्य वर्ग के भूस्वामियों के साथ ही यह नया भूस्वामी वर्ग पैदा हुआ। यह नया भूस्वामी वर्ग, उच्च वर्गीय जातियों के समानांतर शक्ति के रूप में संगठित होने लगा। अगड़ी जातियों के भूस्वामियों  और उच्च वर्गीय पिछड़ी जातियों के नए भूस्वामियों के बीच संगठित शक्ति जातियों की निजी सेनाएं परस्पर जातीय संघर्ष के लिए संगठित हो रही थीं। इस दृष्टिकोण से बिहार भारत का एक विशिष्ट राज्य बन गया था। यहाँ ठाकुर सेना, भूमिहार सेना और लोरिक सेना जैसी सेनाओं द्वारा हिंसक घटनाओं को अंजाम दिया जा रहा था। अगड़ी जातियां और उच्च वर्गीय पिछड़ी जातियां, निम्न वर्गीय पिछड़ी जातियों और दलित जातियों के विरुद्ध लामबंद थीं। अपनी हिंसक घटनाओं से भूमिहीन जातियों के भीतर आतंक का ऐसा वातावरण तैयार किया गया कि जिन्होंने अपने परिजनों को खो दिया वे या तो अपना सब कुछ छोड़कर पलायन कर गए या फिर हमेशा के लिए अपने अधिकारों के नाम पर ख़ामोश हो गए। सरकार के ढुलमुल रवैये और प्रायोजित हिन्दू-मुस्लिम दंगों ने भी सामाजिक समरसता को बिगाड़ने में एक हद तक मदद पहुंचाई। अगड़ी जातियों के प्रति कांग्रेस के नर्म रवैये ने पिछड़ी जातियों, दलितों और मुस्लिम मतदाताओं में असंतोष को बढ़ावा दिया। इस तरह से फैलते असंतोष के भीतर नए राजनीतिक परिवर्तन की मांग का होना स्वाभाविक ही था। ऐसे वातावरण में ही बिहार के भीतर क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का जन्म हो रहा था।

मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने के नाम से ही भारतीय राजनीति में जिस तरह की हलचल मची और पूरे भारत के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया, उसका बिहार की राजनीति में जबरदस्त और गहरा संबंध है। मंडलोत्तर राजनीति यानि कि 1990 के दशक से बिहार की चुनावी राजनीति का स्वरूप किन परिवर्तनों के साथ वर्तमान तक आया है यह विषय ही विश्लेषण के केंद्र में है। बिहार में भूमि सुधार को लेकर चलाए गए कार्यक्रम को किस तरह भूस्वामियों ने अपने अनुकूल बनाने की शातिर चाल चली ताकि थोड़े नुकसान के साथ अपने वर्चस्व को कायम रखा जा सके। जमींदारी उन्मूलन के लागू होने के बाद उन्होंने अपने भूमि स्वामित्व के अधिकारों को न्यायसंगत और युक्तियुक्त रूप से वैधानिक बनाने के लिए पट्टेदारों/जोतेदारों में नियोजित करने की शातिराना चाल चली। इसका परिणाम यह हुआ कि कृषक वर्ग और पट्टेदारों का जो नया वर्ग सामने आया उसकी हैसियत भूमिहीनों की तुलना में काफी बेहतर हो गई। निश्चित रूप से उसकी वफादारी अपने मालिकों के प्रति थी। ज़मीन के इस हस्तांतरण का सर्वाधिक लाभ सवर्ण जातियों के अतिनिकट रहने वाली उच्चवर्गीय पिछड़ी जातियों विशेष रूप से यादवों, कोइरियों और कुर्मियों को हुआ था। इस हस्तांतरण ने उनकी शक्ति को बढ़ाया जिसका परिणाम हुआ कि राजनीतिक सत्ता में अधिक प्रतिनिधित्व की मांग उनकी ओर से की जाने लगी। यह एक बिलकुल नए ढंग का माहौल निर्मित हुआ। जहाँ अब तक कांग्रेस में सवर्णो का वर्चस्व था, अब उसी कांग्रेस पर अस्तित्व में आ रहे इस नए वर्ग का राजनीतिक दबाव बढ़ने लगा। कांग्रेस का वह वोट बैंक जो कभी सवर्णों के इशारे पर उसकी झोली में गिरता था वह प्रतिनिधित्व और समझौतों की मांग के जरिए उसके लिए चुनौती बनने जा रहा था। यदि 2001 की जनगणना पर ध्यान दें तो बिहार की कुल जनसंख्या में दलितों की हिस्सेदारी करीब 17.1 प्रतिशत, मुस्लिमों की 16.5 प्रतिशत है। माना जाता है कि यादव, कोइरियों और कुर्मियों को छोड़ कर शेष अन्य पिछड़ी जातियों का जनसंख्या राज्य की कुल आबादी का लगभग बीस प्रतिशत है। यदि यह आंकड़े ज़मीनी स्तर पर एकीकृत हो जाएं तो चुनाव परिणामों में निर्णायक भूमिका ही नहीं निभाएंगे बल्कि उसकी दिशा तय कर सकते हैं। लालू प्रसाद यादव की छवि मुस्लिम मतदाताओं के बीच हमेशा ही लोकप्रिय बनी रही और वह कमोबेश राजद के साथ अपने आप को आज भी सुरक्षित अनुभव करते हैं।

लालू, शरद और रामविलास पासवन : मंडल की राजनीति के तीन सितारे

इस पुस्तक के विश्लेषण में सर्वेक्षण वाले आंकड़ों का उपयोग तो किया ही गया है, मतदाताओं को समझने में जिस राजनीतिक ऐतिहासिक दृष्टिकोण का उपयोग किया गया; वह अपनी तार्किकता में बड़ा लाजवाब है। जब सच का आईना सामने हो तो आप झुठलाएंगे किसे। मंडलोत्तर राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरने वाले लालू प्रसाद यादव और राजद की महान जीत के पीछे बिहार में जातीय हिंसा का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। मंचों से किए गए तमाम वादों से ज्यादा महत्वपूर्ण वह दावे थे जो उच्च वर्गीय जातियों के आतंक से भयभीत पिछड़ी जातियों के साथ दलितों और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट कर लालू यादव तक ले गया। 1986 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने निजी सेनाओं को प्रतिबंधित जरूर किया लेकिन हिंसक घटनाओं का अखाड़ा बना बिहार भय और आतंक के साए से मुक्त नहीं हो सका। यह पुस्तक उन लोगों को जरूर पढ़नी चाहिए जो बड़े राजनीतिक दलों के पतन के कारणों की पड़ताल करते हैं। भय और आतंक का वातावरण बना कर राज्य अथवा देश के भीतर होने वाली मनमानी पर लगाम शक्तिशाली वर्ग नहीं लगाता बल्कि परिस्थितियों से निर्मित वातावरण शक्तिहीनों का एकीकरण कर उन्हें शक्तिमान बना देता है। यह बात इस तथ्य से भी प्रमाणित होती है कि आज तक कांग्रेस अपनी खोई हुई जगह वापस नहीं पा सकी। उच्च वर्गीय जातियों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा का केंद्र में लगातार यह दूसरा कार्यकाल लेकिन बिहार में सत्ता अगड़ों के हाथ न होकर पिछड़ों के हाथ में है। 

लेखक ने अपने विश्लेषण द्वारा चुनावी राजनीति में जाति-वर्ग के समीकरण को लेकर काफी गहनता से छानबीन की है। लालू प्रसाद यादव के चमत्कारिक व्यक्तित्व वाली राजनीति का उभार और अवसान जिस तरह विश्लेषित किया है वह बताता है कि किस तरह राजद की राजनीतिक कार्यवाहियों ने सत्ता और शासन का यादवीकरण कर डाला और परिणाम यह निकला कि उच्च वर्गीय पिछड़ी जातियों में विशेष रूप से कोइरियों, कुर्मियों ने अपनी निकटता नीतीश कुमार से बना लिया। इन्हीं बिगड़ती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच भाजपा को भी अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए पर्याप्त अवसर मिला। राजद की नीतियों ने बिहार को नई राजनीतिक परिस्थितियों की ओर धकेलना शुरू कर दिया। कभी सामाजिक न्याय के प्रतीक बन चुके लालू प्रसाद यादव से अन्य पिछड़ी जातियों, गरीबों, दलितों का दूर होते जाना इस बात का स्पष्ट संकेत था कि जिस अनुपात में यादवों का सशक्तिकरण हुआ अन्य जातियों का नहीं किया गया। दूसरी ओर कोइरियों, कुर्मियों का भी मोहभंग हुआ था जिसके कारण वह समता पार्टी/जदयू की ओर आकर्षित हो रहे थे। यह अनायास नहीं हो रहा था कि उच्च वर्गीय और निम्न वर्गीय पिछड़ी जातियों के बीच एक ख़ास किस्म का अलगाव पैदा हुआ है। उच्च वर्गीय पिछड़ी जातियों से सताई दलितों, महादलितों वाली जातियों में भी अपने अधिकारों के प्रति राजनीतिक जागरूकता आई है जिसके कारण उनके यहां भी विकल्पों की तलाश हो रही है। लालू प्रसाद यादव के डेढ़ दशक के लंबे शासन के बाद स्थिति यह बन गई कि दलितों के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता रामविलास पासवान बन गए। जिसका नतीजा हुआ कि 2005 में हुए विधानसभा चुनाव ने एक नई इबारत लिखी। सर्वेक्षण से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए लेखक स्पष्ट करता है कि बिहार की आबादी का लगभग बीस प्रतिशत निम्न वर्गीय पिछड़ी जातियों का रहा है जो कभी सामूहिक रूप से एक जगह मतदान नहीं करते थे लेकिन नीतीश कुमार के ‘नवीन बिहार’ वाले नारे के साथ उनका जुड़ाव बढ़ा। अक्टूबर 2005 के विधानसभा चुनाव में इस जातीय वर्ग के मतदाताओं ने सामूहिक रूप से जदयू के पक्ष में मतदान कर निर्णायक भूमिका निभाई थी। उनकी यह प्रतिबद्धता बाद के चुनावों में भी देखने को मिली। 2010 के विधानसभा चुनाव और 2009 के लोकसभा चुनाव में जिस तरह निम्न वर्गीय पिछड़ी जातियों ने भाजपा और जदयू के गठबंधन को मतदान कर निर्णायक भूमिका निभाई है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि जातीय समीकरण के प्रति बिहार का मतदाता अतिसंवेदनशील रहा है और जब उसे जातीय नेतृत्व नहीं मिला है तो वह विकास के एजेंडे को अपनाने में देर नहीं करता है। नीतीश कुमार के यहां भी लालू प्रसाद यादव की तरह ही कुर्मी जाति का वर्चस्व रहा है लेकिन उन्होंने स्थिति को विकृत नहीं होने दिया बल्कि उनके यहां उच्च वर्गीय जातियों, निम्न पिछड़ी जातियों तथा दलितों के लिए संभावनाएं बनी रहने के कारण ही वह बिहार की आबादी के बड़े हिस्से में लोकप्रिय नेता बनने में क़ामयाब हुए।

फारवर्ड प्रेस बुक्स द्वारा शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक बिहार की चुनावी राजनीति : जाति-वर्ग का समीकरण (1990-2015) का कवर पृष्ठ

2014 में दक्षिणपंथी राजनीति की भारी विजय के साथ केंद्र में सत्ता स्थापित होना और उसके बाद जिस तरह पूरे देश में उत्पात हुआ उसने बुद्धिजीवी वर्ग को ही नहीं बल्कि राजनीतिज्ञों को अपने मतभेद भुलाकर एक होने के लिए विवश किया। बिहार देश का पहला राज्य था जिसने दक्षिणपंथी राजनीतिक उभार को रोकने के लिए महागठबंधन का आह्वान किया। धुर विरोधी हो चुके लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का मिलन ऐतिहासिक घटना के रूप में दर्ज हुआ जिसमें कांग्रेस की भूमिका महत्वपूर्ण। भाजपा के उभार को रोकने के लिए यह तीनों राजनीतिक दल महागठबंधन के साझेदार बने। 2015 के विधानसभा चुनाव में मतदाताओं की भूमिका ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो गई जिसे देखकर स्पष्ट होता है कि वे राजनीतिक रूप से जागरूक हो चुके हैं। यह पुस्तक अपने विश्लेषण के द्वारा मतदाताओं के व्यवहार और राजनीतिक रुझानों को आंकड़ों के साथ रोचकता से प्रस्तुत करती है। पुस्तक का अंतिम हिस्सा इसे और विशिष्टता प्रदान करता है जहां संजय कुमार ने 2017 की गर्मियों में नीतीश कुमार द्वारा महागठबंधन को तोड़ने के नाटकीय घटनाक्रम का हवाला दिया है। इस छोटे से अंश के जरिए उन्होंने उस भयानक त्रासदी को दर्शाने का प्रयास किया है जिसे राजनीति और राजनेताओं द्वारा जनता के प्रति विश्वासघात के रूप में पहचाना जाता है। वह मतदाता जो विश्वास के अधीन हो अपना बहुमूल्य वोट देकर नेतृत्व का चुनाव करता है किंतु नेता द्वारा किया गया विश्वासघात देखकर अपने को ठगा सा अनुभव करता है। मतदाताओं ने सामूहिक रूप से एकजुट हो कर महागठबंधन को विजय इसलिए नहीं दिलाई थी कि नीतीश कुमार उस जीत की सौदेबाज़ी भाजपा के साथ करें लेकिन मतदाताओं से विश्वासघात की यह राजनीति 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद तेज़ी से विकसित हुई है जिसने पूरे देश की लोकतांत्रिक छवि को धूल-धूसरित किया और संवैधानिक संस्थानों को नष्ट करने पर तुली हुई है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि मतदाताओं से राजनीतिक विश्वासघात सामाजिक और आर्थिक तबाही लाता है, विकास नहीं। सुशासन बाबू के संबोधन से संबोधित किए जाने वाले नीतीश कुमार बिहार को किस ओर ले जा रहे हैं, यह देखना, समझना भी राजनीतिक रूप से अनिवार्य होगा।

अंत में कहना चाहूंगा कि राज्यों और देश की राजनीति में गंभीर दिलचस्पी रखने वाले पाठकों, विश्लेषकों के पढ़ने योग्य पुस्तक है, जिसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए।

समीक्षित पुस्तक : बिहार की चुनावी राजनीति : जाति-वर्ग का समीकरण (1990-2015)

लेखक : संजय कुमार

प्रकाशक : फारवर्ड प्रेस/ सेज भाषा

प्रकाशन वर्ष : 2018

मूल्य : 350 रुपए (पेपर बैक), 850 रुपए (हार्ड कवर)

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(कॉपी संपादन : नवल)


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