डीयू में कबीर की जाति से लेकर सुदूर असम में महिलाओं की स्थिति पर चर्चा

साहित्यिक, बौद्धिक और अकादमिक जगत कबीर की रचनाओं को आज याद करके सामाजिक सौहार्द कायम करना चाहता है। एक विमर्श उनकी जाति को लेकर भी है। यह विमर्श दिल्ली विश्वविद्यालय में होगा। इसके अलावा कमल चंद्रवंशी का हफ्तावार कॉलम में बता रहे हैं देश के विभिन्न प्रांतों के शैक्षणिक संस्थाओं में होने वाले आयोजनों के बारे में

आगामी आयोजन

दिल्ली विश्वविद्यालय में कबीर पर चर्चा, उठेंगे जाति को लेकर सवाल भी

दिल्ली विश्वविद्यालय के आत्माराम सनातन धर्म महाविद्यालय (एआरएसडी) कॉलेज में हाल के दिनों में अकादमिक गतिविधियां काफी तेज हुई हैं। परिसर में भक्ति आन्दोलन और कबीर विषयक एक राष्ट्रीय सेमिनार का 19-20 सितम्बर, 2019 को आयोजन किया गया है। खास बात ये है कि इसमें जाति के प्रश्न पर कबीर की रचनाओं को देखा-परखा जाएगा। कार्यक्रम में कमलेश वर्मा दूसरे दिन विचार रखेंगे, जिनका इस बारे में उल्लेखनीय कार्य है। वे राजकीय महिला महाविद्यालय, सेवापुरी, वाराणसी में हिंदी के एसोसिएट प्रोफेसर हैं।

कमलेश वर्मा के अनुसार, ’जाति के प्रश्न पर कबीर’ विषय के कई आयाम हैं। इन आयामों पर विचार करने से कबीर से सम्बन्धित कुछ पक्षों पर विचार की संभावना बनती है। पहला पक्ष यह है कि कबीर की स्वयं की जाति पर विचार! वे ब्राह्मण से लेकर दलित जाति के बीच तरह-तरह की सामाजिक पहचान लिए हिन्दी आलोचना में व्याख्यायित होते रहे हैं। इसी से जुड़ी चीज है- उनकी धार्मिक पहचान! किवदंतियों से लेकर चमत्कारिक घटनाओं को ‘इतिहास’ और आलोचना की पुस्तकों में जगह देकर मान्यताएं बनाने का काम भी खूब होता रहा है। कहने की जरूरत नहीं कि निर्णय प्रामाणिक साक्ष्यों के आधार पर लिया जाना चाहिए था। इस विषय का दूसरा पक्ष यह है कि कबीर ने अपनी कविताओं में विभिन्न जातियों का जिक्र किया है। इन जातियों के बारे में टिप्पणी की है।

प्रो. वर्मा के मुताबिक, ऐसी तमाम टिप्पणियों के आधार पर जातियों की सामाजिक स्थिति के बारे में जानने का एक आधार हमें प्राप्त होता है। हालांकि, यह सब व्यक्त करते हुए कबीर की बुनियादी जमीन भक्ति की बनी रही है। वे भक्ति की जमीन से ही समाज की जाति-आधारित बनावट पर टिप्पणी करते हैं। विभिन्न जातियों का जिक्र करती हुई कबीर की अनेक कविताएं हैं। पौने तीन सौ ऐसी कविताओं को ‘जाति के प्रश्न पर कबीर’ पुस्तक में मैंने परिशिष्ट में संकलित किया है। इस विषय का तीसरा पक्ष यह है कि कबीर की जाति के बारे में तरह-तरह की बातें प्रचलित किए जाने के पीछे के उद्देश्यों पर विचार करना। कबीर ने अपनी जाति छिपाने की कोशिश कभी नहीं की। वे खुलकर कहते हैं कि वे जुलाहा हैं। फिर भी उन्हें विधवा ब्राह्मणी के पुत्र के रूप में प्रचारित किया गया। दलित-विमर्श के दौर में उन्हें दलित बताया गया, जबकि जुलाहा जाति दलित वर्ग के अंतर्गत नहीं मानी जाती है। कबीर किसी भी धर्म को नहीं मानते थे; मगर जन्म से उनके साथ एक धर्म जुड़ा हुआ था– इस्लाम। हिन्दी आलोचना कबीर की जाति का जिक्र जरूर करती है; मगर कमजोर और अविश्वसनीय बुनियाद पर! इसी तरह उनके धर्म का जिक्र करती है; मगर उनकी लाश के फूल में बदल जाने की कहानी बनाकर! कबीर की जाति और धर्म को हिन्दी आलोचना में तभी ठीक से रखा जा सकता है, जब कबीर से जुड़े जाति के प्रश्नों पर खुले मन से तथ्यों के आधार पर विचार किया जाए।

यह कार्यक्रम यूजीसी के सहयोग से हो रहा है। एआरएसडी के आयोजकों का कहना है कि भक्ति आंदोलन के व्यापक पटल पर कबीर का मूल्यांकन करने और उनके योगदान को रेखांकित करने के लिए हमें कबीर के जीवन और काव्य को बहुत नजदीक से देखना–परखना पड़ेगा। उन्हें सिर्फ निर्गुण प्रतिपादक, दार्शनिक, हिंदू-मुस्लिम एकता और समन्वय के पुरोधा के रूप में देखकर संतुष्ट होना नाकाफी है। कबीर खुद को हद और बेहद दोनों से परे मानते थे- “हद चले सो मानवा बेहद चले सो साध, हद-बेहद दोनों तजे ताको मता अगाध।”

उत्तरप्रदेश के बनारस में कबीर मठ में कबीर एवं उनके अनुयायियों की प्रतिमाएं

कार्यक्रम में प्रस्तुति के लिए प्रपत्र इन विषयों पर हो सकते हैं- 1. भक्ति आदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, 2. भक्ति आंदोलन और हिंदी भक्ति साहित्य, 3. भक्ति आंदोलन का दार्शनिक परिप्रेक्ष्य, 4. भक्ति आंदोलन राजनीतिक तथा सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य, 5. भक्ति आंदोलन का अखिल भारतीय स्वरूप, 6. दो भारतीय भाषाओं के भक्ति आंदोलन में तुलनामक अध्ययन 7. तुलसी/ सूर/ मीरा/ रैदास और भक्ति आंदोलन, 8. भक्ति काव्य की ऐतिहासिकता, 9. तलुसी/ सूर/ मीरा/ रैदास में मौजूद ऐतिहासिक संदर्भ, 10. हिंदी साहित्य का इतिहास और भक्ति साहित्य।

महाविद्यालय के इतिहास और हिंदी विभाग ने ये कार्यक्रम अंबेडकर स्टडी सर्किल के सौजन्य से आयोजित किया है। कार्यक्रम के संरक्षक आचार्य डॉ. ज्ञानतोष कुमार झा हैं; जबकि संयोजक हैं- दीपाकंर, जिनका फोन नंबर 9990179780 है। अधिक जानकारी के लिए डॉ. अरविंद कुमार मिश्र (9311558473) अजीत कुमार, डॉ. श्रीधरम, डॉ. विकास कुमार से संपर्क किया जा सकता है।

सीएसडीएस में ‘कल्चरल लेबर’ पर विमर्श 

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) दिल्ली ने ब्रह्म प्रकाश की पुस्तक “कल्चरल लेबर” पर संस्थान में 13 सितंबर, 2019 को विशेष पुस्तक-चर्चा का आयोजन किया है।  इस चर्चा में स्मिता तिवारी जस्साल और देवनाथ पाठक शिरकत करेंगे। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रभात कुमार करेंगे।

आयोजकों का कहना है कि “कल्चरल लेबर” पुस्तक उन सब अर्थों और लोक-व्यवहार को सामने लाने का काम करती है, जो समाज और लोगों के रीति-रिवाजों से लेकर लोक-मंच और कानूनों से निकलकर आते हैं। यह पुस्तक अपने त्वरित संदर्भ में संस्कृति और श्रम के आपसी तानेबाने को देखती है। थिएटर और परफॉर्मिंग कला के समकालीन सिद्धांत को खोलती हुई इस पुस्तक में खुद लेखक के अपने अनुभवों की भी छाप है।


पुस्तक के लेखक ब्रह्म प्रकाश जेएनयू में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पुस्तक चर्चा में शिरकत कर रही स्मिता तिवारी जस्साल मिडिल ईस्ट टेक्नीकल यूनिवर्सिटी, अंकारा, तुर्की में प्रोफेसर हैं; जबकि देवनाथ पाठक साउथ एशियन यूनिवर्सिटी नई दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।

सीएसडीसी दिल्ली के 29 राजपुर रोड पर स्थित है। कार्यक्रम शाम के 4:30 बजे शुरू होगा। ज्यादा जानकारी के लिए 011 23942199 या ईमेल jaya@csds.in पर संपर्क किया जा सकता है।

विज्ञान लेखक सम्मेलन

उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान, लखनऊ ने 20 और 21 सितंबर, 2019 को “राष्ट्रीय हिंदी विज्ञान लेखक सम्मेलन एवं परिसंवाद 2019” का आयोजन किया है। इस कार्यक्रम को डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ, सीएसआईआर- विज्ञान संचार एवं सूचना स्रोत संस्थान नई दिल्ली द्वारा इंडियन साइंस कम्युनिकेशन सोसायटी के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। इसमें “हिंदी विज्ञान लेखन के विविध आयाम” पर चर्चा की जाएगी। कार्यक्रम डॉ. शकुंतला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ में होगा। इस सम्मेलन में वैज्ञानिक, विज्ञान के विषयों पर लिखने वाले लेखक, पत्रकार और विद्यार्थी शामिल हो सकते हैं।

कार्यक्रम में शामिल होने के लिए किसी तरह का पंजीकरण शुल्क नहीं लिया जाएगा। इस संबंध में ज्यादा जानकारी के लिए प्रदेश भाषा संस्थान 721-722 सातवां तल, इंदिरा भवन, अशोक मार्ग, लखनऊ से संपर्क किया जा सकता है। यहां का फोन नंबर है- 0522-2288354। ईमेल एड्रेस है- rhvlsup@gmail.com , अधिक जानकारी के लिए वेबसाइट www.vigyanlekhan.com  को देखा जा सकता है।

सुदूर असम में महिलाओं की उपस्थिति पर चर्चा 

यह चिंता सुदूर प्रदेशों की भी है कि किस तरह से भारतीय स्त्रियों का प्राचीन समय से शोषण होता आया है, और यह स्थिति आज भी काफी विकट बनी हुई है। कॉटन यूनिवर्सिटी पनबाजार, गुवाहाटी ने यूनिटी एजुकेशन फाउन्डेशन के साथ मिलकर “भारतीय साहित्य और समाज में स्त्री अध्ययन के विभिन्न आयाम” विषय को लेकर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया है। यह सेमिनार 28 और 29 सितंबर होगा।

सेमिनार के मुख्य विषय के साथ-साथ भारत में स्त्री संबंधित अध्ययन का इतिहास (सामाजिक और साहित्यिक दृष्टि से), भारतीय परंपरा और स्त्री, समाज निर्माण में स्त्री, परिवार में स्त्री, भारतीय समाज में स्त्री (विधाओं के संदर्भ में स्त्री), भारतीय दलित साहित्य में स्त्री, भारतीय आदिवासी समाज और साहित्य में स्त्री, बांग्ला साहित्य में स्त्री, अंग्रेजी साहित्य में स्त्री, भारतीय सामाजिक आंदोलनों में स्त्री की भूमिका, हिंदी और विविध भारतीय भाषाओं के साहित्य में स्त्री, भारतीय समाज में स्त्री (विभिन्न धर्मों, जनजातियों और क्षेत्रों के संबंध में) पूर्वोत्तर भारत में और समाज में स्त्री, मीडिया में स्त्री, टेलीविजन धारावाहिकों में स्त्री जैसे विषयों पर भी विचार और संवाद किया जाएगा।

आयोजकों की ओर से जारी की गई कार्यक्रम की रूपरेखा में कहा गया है कि पुरुषवादी समाज की सत्ता में महिलाएं हमेशा दूसरे पाए में खड़ी रही हैं। कहना न होगा कि महिलाओं के लिए कदम-दर-कदम संघर्ष रहा है। समाज, शिक्षा और राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य कर दी गई। महिलाओं के साथ भारत ही नहीं, विश्व-भर में एक जैसा व्यवहार हुआ है। लेकिन भारत के संदर्भ में देखें, तो अब महिलाओं ने समाज में हर तरह से अपनी पैठ बनाई है और वे अपनी उपलब्धियों में पुरुषों से कहीं भी कम नहीं हैं। इस स्थिति को साहित्य में भी समानांतर ढंग से देखा जा सकता है। साहित्य में देखा गया है कि प्राचीन-काल से लेकर, मध्यकालीन भारत और वर्तमान भारत में महिलाएं अपनी जगह बनाने को लिए संघर्षरत हैं। वे अपने को अभिव्यक्त करना चाहती हैं और इसके लिए आजादी चाहती हैं। स्त्रियों की प्राचीन-काल से ही साहित्य में बड़ी भूमिका रही है। वे साहित्य में क्रिएटर की भूमिका में हैं; जिनसे पूरी दुनिया प्रेरणा लेती है। 19वीं सदी के मध्य में देखें, तो पता चलता है कि स्त्रियों को किस तरह से दबा-कुचला दिखाया गया। अनीता देसाई के उपन्यास में महिलाएं हर समय अपनी पहचान के संघर्ष करती दिखती हैं; तो भक्ति बनर्जी के उपन्यास में पुरुष-सत्ता से जूझती हुई पहचान खोजती हुई दिखती हैं।

आयोजकों ने पूरे देश-भर के स्कॉलर्स से कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी की अपील की है। कार्यक्रम की अध्यक्ष डॉ. कुसुम कुंजा मालाकार हैं; जबकि डॉ. नूरजहां रहमतुल्लाह सेमिनार की संयोजक हैं। आलेख और शोध-पत्र का सारांश भेजने की अंतिम तिथि 15 सितंबर, 2019 है; जबकि पूर्ण शोध 25 सितंबर तक भेजा जा सकता है। आलेख और शोध-पत्र अग्रेजी, हिंदी के अलावा असमिया भाषा में भी भेजा जा सकता है। आलेख और शोध-पत्र researchunity@gmail.com पर भेजे जा सकते हैं। आयोजक कमेटी से मोबाइल नंबर- 8471960948, 7578937766 पर संपर्क कर विस्तार में जानकारी ली जा सकती है।


सेमिनार के संरक्षक प्रोफेसर चंद्रभूषण गोस्वामी हैं, जो कॉटन यूनिवर्सिटी गुवाहाटी के कुलपति हैं; जबकि मुख्य सलाहकार प्रो. डी.के. दास हैं। इसके अलावा संजीव कुमार दत्ता भी आयोजन समिति में हैं। कार्यक्रम कॉटन यूनिवर्सिटी के सुदर्मसेन हाल में होगा।

संचार क्रांति के युग में पुस्तक बचाने का संघर्ष

कला, साहित्य, संस्कृति और मानविकी से संबद्ध ताज-नगरी आगरा की संस्था “हिचकी” और आगरा कॉलेज के पत्रकारिता और जन संचार विभाग ने 11 अक्टूबर से 20 अक्टूबर तक महात्मा गांधी मार्ग आगरा कॉलेज में आगरा साहित्य उत्सव- 2019 का आयोजन किया है। कार्यक्रम राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी सप्ताह के तहत आगरा साहित्य उत्सव न्यास प्रस्तुत कर रहा है। 12 से 19 अक्टूबर तक के तमाम विषय शिक्षकों और शोध-छात्रों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं।

18 अक्टूबर को “संचार क्रांति की चुनौती और पुस्तक संस्कृति” विषय पर संगोष्ठी और परिचर्चा की जाएगी। इसमें पूर्व सांसद और पत्रकार संतोष भारतीय, महाराष्ट्र से प्रियंका सोनी, गोवा से डॉ. किरन पोपकर और भारत ज्ञानकोश के अध्यक्ष आदित्य चौधरी विशिष्ट वक्ता और मेहमान होंगे। इस कार्यक्रम के उप-विषय हैं- संचार के साधनों का बिगड़ता सामाजिक परिदृश्य, डिजिटलीकरण के दौर में पुस्तकों की प्रासंगिकता, संचार माध्यम और पुरातन पुस्तक संस्कृति, पुस्तक प्रकाशन और लेखक की समस्याएं।

19 अक्टूबर को “ब्रज साहित्य, संस्कृति और लोकसंपदा” विषयक चर्चा होगी, जिसमें पद्मश्री मोहन स्वरूप भाटिया के अलावा प्रो. सोम ठाकुर, हिंदुस्तानी अकादमी के उदय प्रताप सिंह और साहित्यकार राज बहादुर सिंह राज प्रमुख विद्वान शामिल होंगे। इस दिन के लिए उप-विषय हैं- ब्रज के प्रमुख साहित्यकारों का योगदान, ब्रज की लोक-संस्कृति के प्रमुख तत्त्व, ब्रज का लोक-नाटक और उसका विकास, ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा इतिहास, परंपरा और विरासत।

इससे पहले 12 अक्टूबर को मुंशी प्रेमचंद का साहित्य और वर्तमान समाज पर संगोष्ठी होगी। इसमें कमल किशोर गोयनका, ज्योति नारायण, यासमीन मूमन प्रमुख वक्ता होंगे। इस दिन के उप-विषयों में प्रेमचंद के साहित्य और व्यक्तित्व से जुड़े विभिन्न विषय रखे गए हैं। 13 अक्टूबर को विश्व साहित्य में रामकथा, 14 अक्टूबर को कश्मीर धारा 370 से पहले और अब, 15 अक्टूबर को भारतीय इतिहास के विविध पक्षों में गौरव का उन्नयन, 16 अक्टूबर को बाल साहित्य की सामाजिक परिवर्तन और विकास में भूमिका और 17 अक्टूबर को 20वीं सदी के प्रमुख वैचारिक अधिष्ठान विषय पर संगोष्ठी और परिसंवाद होगा।

आयोजकों का पता है- आगरा साहित्य उत्सव न्यास, 1/ 25 प्रेम विहार, पीपल मंडी रोड, आगरा, 282003, उत्तर प्रदेश। ईमेल पता है- sahityautsavagra@gmail.com जब फोन नंबर हैं- 9720912422, 9837074024, कार्यक्रम के प्रायोजकों में अन्य के अलावा आकाशवाणी भी है।

तिरुपति दिखाएगा रास्ता

मुख्य समाज से जिस तरह से दलित-बहुजन तबकों के विषय हाशिए पर पटक दिए जाते हैं, उसी तरह की स्थिति हिंदी साहित्य में भी है। इस पक्ष पर सचमुच बात करने का यह सबसे मुफीद वक्त है; जबकि हिंदी विषय, भाषा और साहित्य पर तमाम चर्चाएं हो रही हैं। श्रीवेंकटेश्वर विश्वविद्यालय तिरुपति के हिंदी विभाग ने हिंदी दिवस पर 19 सितंबर से दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की है, जिसका विषय है- “हिंदी कथा साहित्य में उपेक्षित वर्ग।” इसके लिए शोधार्थियों और शिक्षकों से आलेख और शोध-पत्र मंगाए गए हैं। सबसे अहम बात है कि तिरुपति जैसी जगह से इस बात की पहचान होती दिखती है कि हिंदी में कथाकारों ने बहुजन समाज की आवाज को उठाने का काम बहुत समर्थता के साथ किया है।

आयोजकों का कहना है कि देश में सभी जानते हैं कि प्रकृति परिवर्तनशील हैI सूर्य का उदय हमेशा नए विचारों और जीवन की नई राहों को लेकर आता है। 21वीं सदी भी ऐसे ही कुछ नए विचारों, अपेक्षाओं और चुनौतियों को लेकर उभरती दिखाई देती है। इस नई सदी के पंद्रह-बीस वर्षों की समयावधि में में समाज में जिस तरह से बदलाव हुआ है, उसी तरह से साहित्य में भी परिवर्तन हुए हैंI हिंदी साहित्य में कविता की तुलना में कथा साहित्य का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। समसामयिक हिंदी में जितनी भी समस्याएं उभरकर सामने आई हैं, उनका जीता-जागता चित्रण कथा साहित्य में प्रतिफलित हुआ है।

आयोजकों ने अपनी कार्यक्रम भूमिका में यह भी लिखा है कि हिंदी कथा साहित्य में जितने प्रमुख तत्त्व दिखे हैं, उनमें एक ज्वलंत मुद्दा उपेक्षित वर्ग है। इस सदी में हिंदी कथा साहित्य में काफी बढ़ोतरी हुई है। आज हिंदी कथा साहित्य देश में पढ़ा और लिखा जा रहा है। हिंदी कथा साहित्य में सिर्फ मुख्यधारा के समाज कहे जाने वालों की ही आवाज नहीं, बल्कि उपेक्षित वर्ग के दुःख-दर्द भी सुने और पढ़े जा सकते हैं। यह बेहद खुशी की बात है कि उपेक्षित वर्ग की आवाज को खासी जगह मिल रही है। हिंदी कथा साहित्य के माध्यम से उपेक्षित वर्ग भी अभिव्यंजित हो रहा है। इस मुद्दे पर ही विस्तृत विचार के लिए दो दिवसीय गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है।

बीज भाषण के साथ इन दो दिनों में चलने वाले सत्र में जो प्रमुख उप-विषय होंगे वो हैं- 1. हिंदी कथा साहित्य में दलित, 2. हिंदी कथा साहित्य में आदिवासी, 3. हिंदी कथा साहित्य में किन्नर/विषमलिंगी, 4. हिंदी कथा साहित्य में विकलांग, 5. हिंदी कथा साहित्य में नारी, 6. हिंदी कथा साहित्य में वेश्याएं, 7. हिंदी कथा साहित्य में किसान, 8. हिंदी कथा साहित्य में प्रवासी, 9. हिंदी कथा साहित्य में बच्चे, 10. हिंदी कथा साहित्य में अनाथ, 11. हिंदी कथा साहित्य में अन्य तिरुपति में इस समय श्रीवेंकटेश स्वामी मंदिर में खासी भीड़ रहती है। प्रतिभागियों के लिए रुकने या मंदिर के दर्शन कराने के इंतजाम में आयोजक मदद नहीं कर सकेंगे। ज्यादा जानकारी के लिए आयोजन समिति के श्रीवेंकटेश्वर यूनिवर्सिटी के डॉ. नारायण से- 9441674830,7013223971 नंबरों पर फोन करें या फिर narayanasvu@gmail.com पर मेल करके पूछें।

कुंवर नारायण की याद

हिंदी कवि कुंवर नारायण के जन्मदिन के मौके पर उनकी याद में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में तीन दिन का विशेष आयोजन है। 17 से 19 सितंबर को होने वाले इस कार्यक्रम में कुंवर नारायण की कविताओं की पहचान, परंपरा और नैतिकता को लेकर व्याख्यान है; कविता पाठ और कविताओं पर बनी लघु फिल्मों के प्रदर्शन का कार्यक्रम है। कुंवर नारायण हिंदी के विलक्षण और बहुत संवेदनशील कवि माने जाते रहे हैं, जिनका असर आजादी के बाद हर पीढ़ी के कवियों पर रहा है।

जाहिर है इस आयोजन से, खासकर कविताओं के पाठ से “साधो फिल्म महोत्सव” के 2015 या उससे पहले के कार्यक्रम याद आ सकते हैं। संयोग से “साधो” से जुड़े लोग इस कार्यक्रम से भी संबद्ध हैं। कुंवर नारायण की आवाज में एक उनकी कविताओं की ऑडियो सीडी “साधो” ने 2015 में जारी की थी।

पहले दिन मृणाल पांडे की अध्यक्षता में प्रताप भानु मेहता का व्याख्यान होगा। 18 सितंबर को कविताओं पर आधारित लघु फिल्मों का प्रदर्शन किया जाएगा। ये फिल्में गौतम भट्टाचार्य, ओड्वेग क्लाएव, टीना गिल, पैट्रिसियो अगस्ती और गौरव भारद्वाज प्रस्तुत करेंगे। विजुअल रीडिंग ऑफ स्टोरीज की प्रस्तुति पूनम गिरधानी, सुमन वैद्य, अमिताभ श्रीवास्तव, दुर्गा शर्मा और अनिला सिंह देंगे। इसके अलावा रेखा सेठी और जितेंद्र रामप्रकाश कुंवर नारायण की कविताओं का पाठ करेंगे। इस पूरी परिकल्पना को जाने माने रंगकर्मी देवेंद्र राज अंकुर ने तैयार किया है। 19 सितंबर को गायिका शुभा मुद्गल कुंवर नारायण की कविताओं पर जीवन राग नाम से संगीतमय प्रस्तुति देंगी। इसी दिन जितेंद्र राम प्रकाश फिर से कुंवरजी की कविताओं का पाठ करेंगे। कार्यक्रम शाम से 6.30 बजे शुरू होंगे। इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, 40 मैक्स मूलर मार्ग नई दिल्ली में स्थित है।

वैश्विक दौर में फैलती हिंदी

महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी के हिंदी विभाग और दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास ने 14 और 15 सितंबर को राष्ट्रीय संगोष्ठी “वैश्वीकरण के दौर में हिंदी” को लेकर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की है।

संगोष्ठी के उपविषय हैं- हिंदी की वैश्विक चुनौतियां और रास्ते, बहुभाषिक देश में हिंदी का कारवां, राष्ट्रीय एकता की सूत्र भाषा हिंदी, हिंदी की संवैधानिक स्थिति और स्वरूप, हिंदी का भविष्य, स्वाधीनता संग्राम और हिंदी, हिंदी- माध्यम की भाषा के रूप में, हिंदी प्रतिरोध की भाषा, आदि। इस कार्यक्रम के लिए आलेख और शोध-पत्र भेजने की अंतिम तारीख 13 सितंबर, 2019 है। शोध पत्र ईमेल पते dept.hind, office@mgkvp.ac.in पर भेजें।

ज्यादा जानकारी के लिए नंदलाल- 9795776921, दीपक यादव- 7007285929, पाठक धनंजय- 8423722734 और जितेंद्र को 9517227722 पर संपर्क किया जा सकता है। कार्यक्रम के संयोजक प्रो. निरंजन सहाय हैं, जो हिंदी भाषा और आधुनिक भारतीय भाषा विज्ञान काशी विद्यापीठ, वाराणसी से ही ताल्लुक रखते हैं।

बता दें कि प्रोफेसर दीपक कुमार दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा मद्रास के कुलसचिव हैं और वे इस आयोजन से जुड़े हैं।

खाद्य सुरक्षा पर राष्ट्रीय सम्मेलन

विश्व खाद्य दिवस पर सारी दुनिया खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करने की ओर बढ़ रही है। बनारस हिंदू विश्विद्यालय के मिर्जापुर कैंपस के खाद्य प्रसंस्करण और प्रबंधन विभाग ने 16 अक्टूबर, 2019 को खाद्य प्रबंधन और खाद्य की ओर बढ़ते कदम विषय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है।

इसके लिए आयोजकों ने शिक्षकों, छात्रों और उद्योग जगत से जुड़े प्रतिनिधियों व अन्य स्कॉलर्स से शोध-पत्र और आलेख मंगाए हैं। शोध-पत्र का सार-संक्षेप भेजने की अंतिम तारीख 2 अक्टूबर है; जबकि पूर्ण शोध 11 अक्टूबर तक भेजा जा सकता है। आलेख या शोध-पत्र foodspark2019@gmail.com पर भेजे जा सकते हैं। ज्यादा जानकारी के लिए कार्यक्रम के सांगठनिक सचिव डॉ. प्रज्ञा मिश्रा और डॉ. सना फातिमा से संपर्क किया जा सकता है। पता है- डीडीयू कौशल केंद्र, राजीव गांधी साउथ कैंपस बरकछा, मिर्जापुर, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय। फोन नंबर हैं- 9452096368, 9794260305, 9415352550। कार्यक्रम के संयोजकों में प्रोफेसर रतन शंकर मिश्रा हैं, जो बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डीडीयू कौशल केंद्र से जुड़े हैं। आयोजन स्थल एलटी कॉम्प्लेक्स, आरजीएसजी, बरकछा, मिर्जापुर होगा।

सेक्स वर्कर्स के साथ संवाद

कैसुरीना हॉल, इंडिया हैबिटेट सेंटर, नई दिल्ली में 12 सितंबर, 2019 को देश की कुछ प्रतिष्ठित संस्थाओं ने सेक्स वर्कर्स की समस्याओं को लेकर खास आयोजन किया है। आयोजकों ने हाशिए पर रहने वाले समुदायों को लेकर अपना पांचवां आयोजन रखा है, जिसका विषय है- “रीमैजिनिंग वर्क एंड लेबरिंग बॉडीज : कन्वर्सेशन्स विद इंडियाज सेक्स वर्कर्स”। जाहिर है देश के बौद्धिक समाज के प्रतिनिधि और यौनकर्मी एक मंच पर बड़ी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाएंगे।

कार्यक्रम की रूपरेखा में आयोजकों का कहना है कि ‘गरिमापूर्ण’ और ‘वास्तविक’ श्रम पर जीने वाले यौनकर्मी अपराधीकरण का शिकार होते हैं। हमारे समाज में यौनकर्मियों की कहीं सुनवाई नहीं होती। वे सचमुच हाशिए पर रहने को मजबूर होते हैं और उन्हें ट्रेड यूनियन बनाने से रोक दिया जाता है और सामाजिक कल्याण की योजनाओं तक उनकी कई जानी मानी वजहों के कारण कोई पहुंच नहीं है। लेकिन, हम उनके व्यक्तिगत और राजनीतिक जीवन के संघर्ष को भूल जाते हैं और ये भी उनकी रोजमर्रा की वास्तविकताओं और संघर्षों की बारीकियां क्या हैं? यौन कार्य को उनके पेशे की संस्कृति के हम उनके प्रति अमानवीय होते जाते हैं। हालांकि, सबको पता है कि वो अपने यौनकर्मी होने से ही होने वाली आय इस पर निर्भर करते हैं, जो अपने घर चलाते हैं और किसी अन्य व्यक्ति की तरह अपने परिवारों के साथ होते हैं, मदद करते हैं।

सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज ने न्यूजक्लिक के साथ मिलकर यौनकर्मियों को अपने रोजमर्रा के अनुभव, उनकी आकांक्षाओं, संघर्षों को साझा करने और नीतिगत हस्तक्षेप बढ़ाने को लेकर लोगों से कार्यक्रम शामिल होने की अपील की है। परिचर्चा में शामिल हो रहे पैनल में ऑल इंडिया नेटवर्क ऑफ सेक्स वर्कर्स कुसुम और सुल्ताना, नेशनल वर्कर्स ऑफ सेक्स वर्कर्स की आयशा शामिल हो रहे हैं। इनके साथ चर्चा को आगे बढ़ाने में साथ देंगे हर्ष मंदर।

पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर जाने-माने विचारक और लेखक हैं। उनके अध्ययन केंद्र का देश-विदेश में नाम है; जिन्होंने सांप्रदायिक हिंसा, असमानता और बंधुत्व को नुकसान पहुंचाने वाले कई बड़े शोध और विश्लेषण दुनिया के सामने रखे हैं। पिछले दिनों उन्होंने मध्य प्रदेश के एक कार्यक्रम में अपने व्याख्यान में उन्होंने लिंचिंग को देश के भाईचारे के खतरनाक कहा था, जिसके बाद काफी विवाद हो गया था और उनको सुनने वाले उनके प्रति लगभग हमलावर हो गए थे।

कार्यक्रम शाम के सात बजे शुरू होगा; जिसमें हर वर्ग और तबके के लोग शिरकत कर सकते हैं। इसीलिए इस कार्यक्रम को सार्वजनिक कार्यक्रम का नाम दिया गया है।

एसटी का समावेश और विकास की राह

“भारत में अनुसूचित जनजातियों का सामाजिक समावेश और विकास विषय” को लेकर 12-13 सितंबर, 2019 को आईजीएनटूयू अमरकंटक, मध्य प्रदेश ने दो दिन की राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया है। कार्यक्रम को सामाजिक विज्ञान में प्रभावशाली नीति अनुसंधान (इंप्रेस), भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) नई दिल्ली और सामाजिक कार्य विभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय (आईजीएनटीयू), जो केंद्रीय विश्वविद्यालय है; ने मिलकर ये आयोजन किया है।

कार्यक्रम में शिक्षाविद, शोधकर्ता, चिकित्सक, पीएचडी/ एमफिल के स्कॉलर शामिल हो रहे हैं। कार्यक्रम में क्षेत्र विशेष के अध्ययन, सामाजिक सर्वेक्षण, केस अध्ययन, साक्ष्य के आधार पर मूल शोध रखे जाने हैं। इसके प्रमुख विषय हैं- 1. अनुसूचित जनजातियों का सामाजिक समावेश और विकास, चुनौतियां और उपलब्धियां, 2. भारत में एसटी का सामाजिक परिवर्तन और विकास, 3. एसटी और पीवीटीजी (सरकारी पहल का) सामाजिक समावेशन और विकास, 4.पारंपरिक ज्ञान प्रणाली और आदिवासी भारत का आजीविका : चुनौतियां और सफलता की कहानियां, 5. भारत में एसटी का आजीविका संवर्धन-मॉडल और अभ्यास, 6. मानव पूंजी, कौशल विकास और आदिवासी आजीविका : नए प्रयास।

प्रमुख उप विषय हैं- 1. भारत में अनुसूचित जनजातियों (एसटी) का सामाजिक समावेश और विकास : मुद्दे, चुनौतियां और उपलब्धियां, जिसके तहत सामाजिक समावेश और बहिष्करण की एजेंसियां ​​और तंत्र, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीजीवीटीजी और उनकी चुनौतियां; विषय में जनजातीय क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण और बाल संरक्षण, एसटी के खिलाफ अत्याचार, जनजातीय क्षेत्रों में रुग्णता, मृत्यु दर, कुपोषण और स्वास्थ्य, धर्मांतरण, पुनर्निर्माण सामाजिक समावेशन और बहिष्करण, भूमि अलगाव और बंधुआ मजदूरी,  जनजातीय क्षेत्रों में नक्सलवाद और उग्रवाद, संरक्षण, विकास और विस्थापन को कवर किया जाएगा।

  1. भारत में एसटी के बीच सामाजिक परिवर्तन और विकास विषय के तहत जनजातीय क्षेत्रों में कृषि संक्रमण, जनजातीय आजीविका और गरीबी, आवास और अवसंरचना विकास, प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण, पर्यावरण, जल और स्वच्छता, वन में हकमारी और आजीविका, शासन और जनजातीय आजीविका जैसे उप-विषय शामिल किए गए हैं।
  1. सामाजिक समावेशन और एसटी और पीवीटीजी का विकास : सरकार की पहल के तहत भारत में जनजातीय नीति का विकास, जनजातीय कल्याण कार्यक्रम, एकीकृत जनजातीय विकास परियोजनाएं और उनका प्रशासन, वन नीति, विधान और जनजातीय अधिकार, जनजातीय क्षेत्र में पंचायत राज संस्थाओं का प्रदर्शन, पांचवीं और छठी अनुसूची क्षेत्रों से संबंधित मुद्दे, जनजातीय क्षेत्रों में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा पहल विषय होंगे।
  1. भारत में पारंपरिक ज्ञान प्रणाली और जनजातीय क्षेत्र की आजीविका में चुनौतियां और सफलता की कहानियां, जनजातीय संस्कृति, विश्व दृश्य और पारिस्थितिक संरक्षण, जनजातीय नृत्य, संगीत, नाटक, भोजन और त्योहार, वन, पारंपरिक ज्ञान, औषधीय अभ्यास और जनजातीय आजीविका, पारंपरिक कला, शिल्प और विकास, जनजातीय पहचान, भाषा और विकास, लघु वनोपज और जनजातीय आजीविका विषय कवर किए जाएंगे।
  1. भारत में एसटी का आजीविका संवर्धन : मॉडल और व्यवहार के तहत पारंपरिक जनजातीय संस्थान और जनजातीय विकास, जनजातीय आंदोलन और स्व-संगठन और विकास, गांधीवादी रचनात्मक कार्य, जनजातीय क्षेत्रों में स्वामी विवेकानंद द्वारा प्रेरित हस्तक्षेप रणनीतियां, नानाजी देशमुख की चित्रकूट पहल, वनवासी कल्याण आश्रम आजीविका संवर्धन का मॉडल, ईसाई मिशनरी और आदिवासी विकास, स्वैच्छिक पहल विषय हैं।
  1. मानव पूंजी, कौशल विकास और जनजातीय आजीविका : नए प्रयास शीर्षक के तहत आईसीटी और आदिवासी विकास, कौशल विकास, प्रौद्योगिकी और उद्यमिता, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहल, पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के माध्यम से पहल उप-विषय शामिल किए गए हैं।

कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आयोजकों से swconference@igntu.ac.in पर संपर्क करें। डॉ. एम नागलिंगम, संयोजक, डॉ. रमेश बी सह-संयोजक, को संबंधित फोन नंबर 9894524322 और 9479390830 पर संपर्क किया जा सकता है।

गणित की गुत्थी

“नंबर थ्योरी, स्पेशल फंक्शन, एंड देयर एप्लीकेशन्स इन कंप्यूटर साइंस” को लेकर टीडी पीजी कॉलेज जौनपुर और गणित और गणितीय विज्ञान रामानुजम सोसायटी ने संयुक्त रूप से 8 से 10 नवंबर, 2019 को दो दिन का राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया है।

कार्यक्रम की रूपरेखा में आयोजकों ने कहा है कि सम्मेलन में “संख्या सिद्धांत, विशेष कार्य और कंप्यूटर विज्ञान में उनके अनुप्रयोग” विषय के आयोजन का एक मकसद गणितज्ञों को एक साथ लाना है; ताकि विचारों के आदान-प्रदान हो और नवीनतम खोजों और उस ओर बढ़ते प्रयासों को देखा जा सके। विभिन्न हिस्सों के अनुसंधान विद्वान, संख्या सिद्धांत, विशेष कार्य, भिन्नात्मक आकलन, विश्लेषण और उनके में विकास को देखने की कोशिशें की जाएंगी। इस सम्मेलन में शामिल किए जाने वाले अपेक्षित विषय कंप्यूटर हैं- विज्ञान, विशेष कार्यों और अन्य शाखाओं में कंप्यूटर विज्ञान के अनुप्रयोग। गणित, हाइपर जॉमेट्रिक सीरीज (साधारण और बुनियादी दोनों), संख्या सिद्धांत, आंशिक कैलकुलस, स्पेशल फंक्शन्स, लाई थ्योरी, ऑर्थोगोनल पोलीनोमिअल्स, पार्टिशन थ्योरी, कंटीन्यूड

फक्शन्स और महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का योगदान।

कार्यक्रम के लिए शोध पत्र या आलेख 31 अक्टूबर, 2019 तक snsp39@yahoo.comsnsp39@gmail.com  पर आयोजन समिति को भेजें। प्रतिभागियों को चाहिए कि वे अपने शामिल होने के बारे में पूर्व में जानकारी दें। आयोजन समिति के सचिव गणित विभाग के डॉ. सत्य प्रकाश सिंह है। इस संबंध में गणित विभाग के डॉ. एस.पी. सिंह को 09451159058 फोन नंबर पर संपर्क किया जा सकता है। आयोजन की जानकारी वेबसाइट- www.rsmams.org से भी ली जा सकती है।

अंतर्धर्म, अंतर्जातीय संवाद की संस्कृति

“इंटरफेथ डायलॉग इन इंडिया- कंसर्न्स एंड चैलेंजेज” पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में 13 सितंबर को एक अहम सेमिनार आयोजित किया गया है। विभिन्न धर्मों, जातियों और विश्वासों में खत्ते और खंडों में रह रहे देशवासियों के लिए इस संगोष्ठी से कई संदेश मिल सकते हैं। बीएचयू की सोशल साइंस फैकल्टी ने ये कार्यक्रम गृह मंत्रालय के तहत आने वाले स्वायत्त संस्थान नेशनल फाउंडेशन फॉर कम्युनल हार्मनी- एनएफसीएच के साथ मिलकर किया है।

एनएफसीएच का कहना है कि देश में आज सांप्रदायिक सद्भाव के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी गतिविधियों को आगे बढ़ाने की जरूरत है। हम देश के भीतर एकता के बंधन को उजागर करें, ताकि देश मजबूत हो। और विभिन्न समूहों के बीच संबंधों को फाउंडेशन ने गति दी है और अहिंसा के सिद्धांतों में विश्वास को बढ़ाया है, ताकि विभिन्न समूहों के बीच विवादों को सुलझाने में मदद मिले। इस लक्ष्य के लिए वर्षों से अपने दम पर फाउंडेशन ने विभिन्न विश्वविद्यालयों के सहयोग से या फिर कॉलेजों, नागरिक समाज समूहों, गैर सरकारी संगठनों आदि के जरिए कई कार्यक्रम, सम्मेलन आयोजित किए हैं। सेमिनार और संगोष्ठियां व सांस्कृतिक कार्यक्रम किए हैं। अंतर-धार्मिक और अंतर्जातीय समझ को बढ़ावा देने के लिए  इंटरफेथ डागलॉग रखा गया है।

संगोष्ठी कार्यक्रम के प्रारूप में आयोजकों ने कहा है कि देश के सतत विकास और सामाजिक सद्भाव के लिए परस्पर विश्वास होना जरूरी है। हर धर्म हमें रोशनी दिखाता है, जिसमें अंतर्दृष्टि होती है और टिप्पणियां होती हैं। व इसीलिए सार्वभौमिक रूप से स्वीकार्य हैं कि एक तरह के ये निर्देश समाज के विकास में सहायक हैं। सभी धर्म आपसी प्यार और एकता मूल्यों को विकसित करते हैं, अहिंसा, समानता, न्याय, करुणा और सत्य की राह दिखाते हैं। धर्म में मूल्यों की पैठ उसकी आत्मा है और शरीर एक अनुष्ठान। जाहिर है, धर्म का सार जानकर ही हम समाज और अपने को लाभान्वित कर सकते हैं।

‘इंटरफेथ डायलॉग’ पर सेमिनार का उद्देश्य इंटरफेथ समझ की संस्कृति को बढ़ावा देना है; ताकि समकालीन चुनौतियों के संदर्भ में उस सार को पकड़ा जा सके, जो हर नागरिक में नैतिक मूल्यों का निर्माण करता है। इस तरह के इंटरेक्शन के माध्यम से हम धार्मिक प्रतिनिधियों, विद्वानों, पेशेवरों के साथ साथ शिक्षाविदों और संस्थाओं को आपस में जोड़ सकते हैं, जो अपने अपने माध्यमों से शांति और सद्भाव का संदेश लोगों तक ले जाते हैं। इसके अलावा इस संगोष्ठी के जरिए उन संबंधित आकस्मिक मुद्दों की भी तलाश होगी, जो विभिन्न समुदायों में मौजूद हैं।

प्रस्तावित इंटरफेथ डायलॉग में धर्म की भूमिका से लेकर सामंजस्य, एकीकरण और आपसी समझ के तत्त्वों पर बात होगी। फाउंडेशन को उम्मीद है कि यह पहल हमें करीब लाने में खासी मददगार होगी; जो एक शांतिपूर्ण, स्थिर, सुरक्षित और समृद्ध भारत के लिए जरूरी है।

बीएचयू का कहना है कि इस सेमिनार के जरिए धार्मिक शिक्षा में मौजूद तत्त्व-  चुनौतियां और अवसर; सुशासन के लिए धर्म में मौजूद महत्वपूर्ण उपकरण; समकालीन भारतीय समाज में धर्म की महत्ता; सहिष्णुता और परिपक्व समाज के निर्माण के लिए धार्मिक परंपराओँ को प्रोत्साहित करना और समाज में सांप्रदायिक सौहार्द के लिए युवाओं की सक्रिय भागीदारी को बढ़ावा देना इस संगोष्ठी के मकसद हैं।

कार्यक्रम संबोधित सभा, समता भवन, सामाजिक विज्ञान संकाय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में होगा। सोशल साइंस फैकल्टी को प्रोफेसर डी.पी. सिंह कार्यक्रम के को-ऑर्डिनेटर हैं। अधिक विवरण के लिए http://www.bhu.ac.in पर जाएं।

बीएचयू में रिसर्च मेथोडोलॉजी कोर्स

सोशल साइंस में एमफिल/ पीएचडी/ पीडीएफ स्कॉलर्स के लिए रिसर्च मेथोडोलॉजी कोर्स 21 सितंबर से 30 सितंबर तक विशेष सम्मेलन बनारस हिंदू विश्विविद्यालय में आयोजित किया गया है। सोशल साइंस फैकल्टी के अर्थशास्त्र विभाग ने यह कार्यक्रम आईसीएसएसआर, नई दिल्ली के सहयोग से आयोजित किया है।

10 दिन के इस आयोजन का मुख्य मकसद डॉक्टरेट अनुसंधान के नियोजन चरण में छात्रों को इनपुट्स देना, शोध प्रश्नों के सैद्धांतिक और पद्धतिगत ढांचे के विकास और अनुसंधान के बारे में बताना है। साथ ही छात्रों को ये भी जानकारी प्रदान की जाएगी कि कैसे पद्धति से मुश्किल राह आसान होगी या विश्लेषणात्मक बाधाएं कैसे दूर होंगी। ऐसे स्कॉलर्स के लिए भी इनपुट दिए जाएंगे, जिनका अनुसंधान कार्य अंतिम चरण में है और जो डेटाबेस तैयार कर रहे हैं। रिसर्च मेथोडोलॉजी कोर्स (आरएमसी) में भाग लेने के लिए जो भी सदस्य यूजीसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय/ डीम्ड विश्वविद्यालय/कॉलेजों/ संस्थानों के एमफिल/ पीएचडी/ पीडीएफ के लिए नामांकित हैं, वो इसमें शामिल हो सकते हैं।

कोर्स के लिए कुल 30 विद्वानों का चुनाव किया जाएगा। 10 छात्र दूसरे राज्यों से, जबकि 10 छात्र स्थानीय होंगे। कार्यक्रम सोशल साइंस फैकल्टी के सेमिनार हॉल में होगा।  ज्यादा जानकारी के लिए डॉ. जे.बी. कोमराइच से संपर्क किया जा सकता है, जिनका फोन नंबर है- 9450710386। इसके अलावा डॉ. मनोकामना राम से भी उनके फोन नंबर- 7839143384 पर जानकारी ली जा सकती है। ईमेल पता है- bhuecoicssr2019@gmail.com

परीक्षा प्रणाली की चुनौती और समाधान

महात्मी गांधी काशी विद्यापीठ वाराणसी ने भारत की परीक्षा प्रणाली : चुनौतियां और समाधान विषय पर 27 व 28 सितंबर को दो दिन की राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया है। इस संबंध में 25 सितंबर संबंधित शोध-पत्र दिए जा सकेंगे। यह कार्यक्रम मदन मोहन मालवीय नेशनल मिशन ऑन टीचर्स एंड ट्रेनिंग के तहत आयोजित किया जा रहा है।

इस संबंध में ज्यादा जानकारी के लिए अरविंद कुमार पांडेय, समन्वय को 9451894651 (ईमेल- arvindkumarpandey62@gmail.com)  और आलोक कुमार द्विवेदी से फोन नंबर- 7007870872 व (ईमेल- dwivedi.alok@gmail.com) पर संपर्क किया जा सकता है। इस बारे में विद्यापीठ की ओर से विस्तृत जानकारी जल्द ही आधिकारिक बेवसाइट http://www.mgkvp.ac.in पर अपलोड की जा रही है।

सोशल मीडिया की अच्छाई और बुराई

आज सूचना और प्रौद्योगिकी का युग है; जहां संचार डिजिटल रूप से नियंत्रित हो रहा है। उसने हमारे समय में सूचना क्रांति की तरह दस्तक दी है और अभिव्यक्ति को लेकर खुला मैदान सामने रख दिया है। उसके कई सकारात्मक पहलू हैं। लेकिन, उसने कई तरह के विचलन और बाधाएं पैदा की हैं। ऐसी स्थिति में सोशल मीडिया की प्रासंगिकता और चुनौतियों पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। इस पहलू को ध्यान में रखते हुए मेरठ कॉलेज ने “रेलिवेंस एंड चैलेंजेज ऑफ सोशल मीडिया – ए ग्लोबल प्रोस्पेक्टिव” (सोशल मीडिया की प्रासंगिकता और चुनौतियां : एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य) विषय को लेकर 23 और 24 नवंबर को दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया है। कॉलेज ने ये कार्यक्रम भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) के सौजन्य से आयोजित किया है।

सेमिनार के उप-विषय इस तरह रखे गए हैं- 1. सोशल मीडिया और समाज पर इसका प्रभाव : सुरक्षा और सुरक्षा, संबंध : व्यक्तिगत, सामाजिक, पेशेवर, सांप्रदायिक सौहार्द, अतिवाद और आतंकवाद, सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता, 2. सोशल मीडिया और राजनीति पर इसका प्रभाव : राजनीतिक दलों द्वारा उपयोग, घृणा और उत्पीड़न की राजनीति, चुनाव अभियानों में उपयोग, राजनीतिक लामबंदी और व्यस्तता, 3. सोशल मीडिया और व्यापार पर इसका प्रभाव : सोशल मीडिया अपने आप में एक व्यवसाय है, ब्रांड प्रचार, मार्केटिंग, 4. सोशल मीडिया और सार्वजनिक क्षेत्र पर इसका प्रभाव : प्रभावी शासन, ई-गवर्नेंस, सार्वजनिक एजेंसियों के प्रति विश्वास, नागरिक की गोपनीयता और सुरक्षा, फेक न्यूज और गलत जानकारी, 5. सोशल मीडिया और स्वास्थ्य और कल्याण पर इसका प्रभाव : शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य, किशोर/किशोरी का व्यवहार, स्मार्टफोन की लत, आभासी दुनिया बनाम वास्तविक दुनिया आदि।

शोध-पत्र और आलेख का सार का 15 अक्टूबर तक भेजना होगा। इसी दिन सेमिनार के लिए रजिस्ट्रेशन भी किया जा सकता है। पूर्ण शोध जमा करने की तारीख 30 अक्टूबर है। शोधकर्ताओं के लिए सर्वश्रेष्ठ पेपर पुरस्कार भी रखा गया है।

कार्यक्रम के संरक्षक डॉ. आर.के. गुप्ता, सेठ दयानंद गुप्ता मानद सचिव, प्रबंधन समिति, अध्यक्ष, डॉ. संगीता गुप्ता (प्रिंसिपल) और संयोजक डॉ. अनिता मोरल हैं। कार्यक्रम में शोध-पत्र और आलेख भेजने आदि को लेकर मोरल से 9837418208 पर संपर्क किया जा सकता है। और अधिक जानकारी के लिए psychologymcm@gmail.com पर संपर्क करके पूछा जा सकता है। इसके लिए आयोजकों का वाट्सऐप नंबर है- 8755529386।

(संपादन : नवल/प्रेम बरेलवी)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

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