उत्तर पूर्व : सिक्किम – तीस्ता नदी की छाया में ….        

उत्तरी सिक्किम में कई अन्य जगहों की तरह ‘द्ज़ुम्सा’ नाम की स्वयं शासन की व्यवस्था है, जिसमें हर परिवार का सदस्य पारंपरिक व्यवस्था के अंतर्गत शहर के प्रशासन में अपना हाथ बंटाता है. इस व्यवस्था में मुखिया ‘पिपोन’ जनतांत्रिक ढंग से निर्वाचित होता है

(भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्य मूल रूप से आदिवासी-प्रदेश हैं, जो भारतीय राजनीति और शासन-व्यवस्था के नक्शे पर उपेक्षित और वंचित हैं। फुले-आम्बेडकरवादी आंदोलनों को समावेशी बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम विभिन्न प्रकार की वंचनाओं की शिकार समुदायों/समाजों को गहराई से समझें और उनके साथ एका बनाने की कोशिश करें। फारवर्ड प्रेस की यह पहल इसी दिशा में है। इसके तहत हम हिंदी के चर्चित लेखक जितेंद्र भाटिया के पूर्वोत्तर यात्रा वृत्तांत की यह शृंखला प्रस्तुत कर रहे हैं। श्री भाटिया ने इन यात्राओं की शुरूआत वर्ष 2014 में की थी, जो अभी तक जारी हैं। वे भूटान सहित पूर्वोत्तर राज्यों की यात्राएं कर रहे हैं और वहां की विशेषताओं, विडंबनाओं व समस्याओं को हमारे सामने रख रहे हैं – प्रबंध संपादक)


बस्ती बस्ती परबत परबत 

मार्च-अप्रैल, 2019 

यह बाईस वर्ष पहले 1997 का किस्सा है. तब बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएं उफान पर थी और बांग्लादेश की आज़ादी में भारत के योगदान को एक सिरे से नकारते हुए, वर्ष 1996 तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री रही बेगम खालेदा ज़िया ने एक सार्वजनिक सभा में जोश भरा ऐलान किया था कि वे बांग्लादेश को भूटान या सिक्किम हरगिज़ नहीं बनने देंगी. उनका यह ज़हरीला बयान न सिर्फ बांग्लादेश के शुभचिंतक भारत बल्कि भूटान और सिक्किम के लिए भी बेहद आपत्तिजनक था क्योंकि और चाहे कुछ भी हो, भारत ने कभी किसी देश की ओर साम्राज्यवादी नज़रों से नहीं देखा.

वक्त के साथ भावनाएं और विचार बदल जाते हैं और भारत से बांग्लादेश की वर्तमान सत्ता के रिश्ते काफी हद तक सुधर चुके हैं, हालांकि सिक्किम से निकलकर पश्चिम बंगाल और फिर बांग्लादेश की ओर बहने वाली तीस्ता नदी के पानी का सवाल अब भी दोनों देशों के बीच कटुता की बड़ी वजह है और हम इसके बारे में लिख भी चुके हैं. लेकिन मैडम ज़िया का भूटान और सिक्किम को लेकर बाईस साल पहले कसा गया तंज़ दरअसल भारत की तथाकथित प्रभुत्व जमाने या बड़े भाई (बिग ब्रदर) का किरदार अदा करने की ख्वाहिश (या कि आतंक) से ताल्लुक रखता था. हम देख ही चुके हैं कि कदम-दर-कदम भारत पर निर्भर होने के बावजूद भूटान किस तरह बौद्ध राष्ट्र के रूप में अपनी मुख्तलिफ पहचान बनाए हुए है. दूसरी तरफ व्यापक जनमत के आधार पर सिक्किम का भारत में विलय हो चुका है और इसमें कहीं कोई सांस्कृतिक संकट सामने नहीं आया है.  जहाँ तक बांग्लादेश का सवाल है तो उस प्रदेश से हमारे यहाँ वैध-अवैध आने वाले ‘घुसपैठिये’ हमेशा से चिंता का विषय रहे हैं और अब मोदी सरकार ने तो नागरिकता संशोधन विधेयक में मुसलमानों को छोड़ दूसरे धर्म के शरणार्थियों को कालांतर में देश की नागरिकता देने और दूसरी तरफ मुसलमानों को एक सिरे से रोकने का मन बनाया है. बेगम ज़िया इन दिनों भ्रष्टाचार के मामलों में जेल की सज़ा काट रही हैं. ऐसे में बांग्लादेश, भूटान और सिक्किम को लेकर बेगम की बाईस वर्ष पुरानी प्रेत-चिंता आज कोई ख़ास मायने नहीं रखती.

सिक्किम में लोक नृत्य पेश करते कलाकार

पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके में सिलीगुड़ी से कलिम्पोंग का रास्ता तीस्ता नदी के किनारे  चलता है, जहां जगह-जगह आपको सूचनाएं टंगी मिलेंगी कि पानी बहुत गहरा है, आप नदी के पास जाने की कोशिश न करें. तीस्ता बाज़ार से आगे इसी नदी के किनारे बसा है छोटा सा गाँव मेल्ली जिसका एक पाँव पश्चिम बंगाल और दूसरा सिक्किम में स्थित है और जवाहरलाल नेहरु पुल इन दोनों सिरों को आपस में जोड़ता है. यहीं से एक रास्ता ऊपर दाहिनी ओर 20 किलोमीटर आगे कलिम्पोंग की ओर चढ़ता है और दूसरा नीचे सिक्किम की ओर निकल जाता है. नेपाली भाषा में श्मशान को ‘मेल्ली’ कहते हैं लेकिन अब यहाँ नदी के किनारे दाह संस्कार शायद ही होते होंगे. अलबत्ता कुछ फासले पर एक छोटी मोटी कंपनी  नदी में पर्यटकों के लिए रिवर राफ्टिंग का कारोबार ज़रूर चलाती है. रबर की नावों में सीट बेल्ट लगाकर नदी के बहाव के साथ हिचकोले खाने का यह रोमांचक खेल अब कुल्लू से लेकर ऋषिकेश, और टोंस से लेकर तीस्ता नदियों तक काफी लोकप्रिय हो चला है. मेल्ली बाज़ार से कुछ ही आगे सिक्किम की सबसे बड़ी बीयर फैक्ट्री युक्सोम ब्रुअरीज है जहां ‘डांसबर्ग’ और दूसरे ब्रांडों की तीस लाख से अधिक बीयर की बोतलें हर साल उत्पादित होती है. हमारी जीप का ड्राइवर कुछ गर्व के साथ हमें जानकारी देता है कि फिल्म अभिनेता डैनी डेन्जोंगपा और उनका परिवार बीयर के इस कारखाने का मालिक है. हमारे देश के पर्यटन स्थलों में ग़ाइड, ड्राइवरों, रिक्शावालों और दुकानदारों का धंधा मेहमानों को इसी तरह की फुटकर दिलचस्प जानकारी देते हुए चलता है और इसमें हर्ज़ भी क्या है! 

मेल्ली बाज़ार में पुल के नीचे एक छोटे से ढाबे में भोजन के समय से बहुत पहले हमारा ड्राइवर हमें खाने पर मजबूर करता है. भोजन की ज़रूरत शायद हमसे अधिक उसे है क्योंकि सुबह से गाड़ी चलाते हुए उसने कुछ नहीं खाया है. पहाड़ों के इन ढाबों में भोजन का सीमित चुनाव बहुत मुश्किल नहीं होता. पहाड़ों के सबसे लोकप्रिय और व्यापक रूप से उपलब्ध वाई वाई नूडल आपको हर जगह मिल जाएंगे. इसका एकमात्र विकल्प है मोटे चावल के साथ पतली दाल और पत्तागोभी की सब्जी. मेरे मन में जिज्ञासा है कि ‘वाईवाई’ और ‘मैगी’ के शुरू होने से पहले यहाँ के लोग और पर्यटक भला क्या खाते होंगे? शायद सिर्फ चावल और घरों में बनाए जाने वाले देशी नूडल, ‘मोमो’ और ‘थुपका’, जिनका प्रचलन कुछ कम हो गया है और नेपाली ‘थुपका’ भी अब इन्हीं इंस्टेंट नूडल से बनाया जाने लगा है. 

पहाड़ों में व्यवसाय की संभावनाएं ढूँढने वालों में एक अत्यंत सफल कहानी वाईवाई की है.  शेखावटी (राजस्थान) के छोटे से गाँव चुरी-अजीतगढ़ के भूरमल चौधरी नेपाल के राणा राज घराने में राजस्थान के पारंपरिक रंगीन कपड़े बेचने का सुझाव पाकर अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत में काठमांडू आ गए थे. दशकों तक वे घर-घर जाकर ये कपड़े बेचते रहे. उन्हीं के पोतों ने  1972 में चौधरी ग्रुप स्थापित कर काठमांडू में पहले एक बड़ा स्टोर और बाद में थाईलैंड की मदद से नूडल की फैक्ट्री डाली थी. 2015 में सीसा मौजूद होने के आरोप में जब मैगी बनाने वाली नेस्ले के नूडल पर कई महीनों का प्रतिबन्ध लगा था तो इसका सबसे अधिक फ़ायदा प्रतिद्वंद्वी ब्रांड वाईवाई को मिला था. आज चौधरी ग्रुप की 8000 करोड़ की सालाना बिक्री में विभिन्न देशों में स्थित एक दर्जन से अधिक नूडल कारखाने शामिल हैं. आज इनके और प्रतिद्वंद्वी मैगी के बगैर पहाड़ों में सफ़र की कल्पना करना भी मुश्किल है. लद्दाख से लेकर सुदूर अरुणाचल प्रदेश तक पहाड़ों के हर छोटे से छोटे ढाबे या टपरी पर मिलने वाले ये नूडल पर्यटकों से लेकर स्थानीय बाशिंदों तक भूख मिटाने का सबसे आसान ज़रिया बन चुके हैं. थोड़े से प्याज़ और टमाटर डालकर इन्हें और लज़ीज़ बनाया जा सकता है. ये बहुत न होते हुए भी अगले पड़ाव तक के लिए काफी होते हैं. इन्हें मांगने और चीनी मिट्टी के भाप छोड़ते गरमा-गर्म कटोरे में आपके सामने उपस्थित होने में बहुत कम समय लगता है. इन्हें सुविधा के अनुसार पानी की मात्रा के आधार पर सूप या गाढ़े नूडल की शक्ल में परोसा जा सकता है. ये और ‘मोमो’ निस्संदेह अब पहाड़ों का सबसे सुलभ, सर्वप्राप्य भोजन बन चुके हैं. 

नीचे खाई में लेटी, विपरीत दिशा से हमारी ओर बहती तीस्ता नदी के पूर्वी किनारे पर पश्चिम बंगाल में चलते हुए हम रांगपो नदी और तीस्ता के संगम पर आ पहुंचे हैं. नदी के दूसरी  ओर रांगपो शहर है, जो एक तरह से सिक्किम का प्रवेश द्वार है. रांगपो के बारे में कोई भी खुशनुमा बात कह पाना बेहद मुश्किल होगा. धूल भरी सड़क के दोनों ओर बेतरतीब दूकानें, ढाबे और शहरी सभ्यता के संकेतों के रूप में मोटरसाइकिलों, गाड़ियों,मोबाइल फ़ोनों, जूतों, कल-पुर्जों और पैसे उधार देने वाली कंपनियों के शोरूम, ढाबे, पेट्रोल पंप और एक जैसी परचून की दुकानें. इस इलाके में दवाओं के कई छोटे-बड़े कारखाने भी हैं. यहाँ से दाहिनी ओर एक रास्ता राज्य की राजधानी गंगटोक की ओर निकल जाता है और दूसरा सीधे तीस्ता नदी के साथ-साथ हमारे गंतव्य की ओर उत्तर में चलता है. 

तीस्ता नदी का मनोरम दृश्य

आने वाले दिनों में रांगपो सिक्किम का पहला रेलवे स्टेशन भी होने जा रहा है. सिलिगुड़ी के नज़दीक सेवोक स्टेशन से रांगपो तक की रेलवे लाइन योजना का शिलान्यास 2009 में हुआ था लेकिन विभिन्न कारणों से इसपर काम शुरू होना अभी बाकी है. सन 2022 तक इस लाइन के बन जाने के बाद सिलिगुड़ी और संभवतः कोलकाता से रांगपो के लिए सीधी गाड़ियाँ चलने लगेंगी, हालांकि विलम्ब के कारण योजना की मूल 1340 करोड़ की लागत अब बढ़कर 6000 करोड़ रुपये हो चुकी है. गंगटोक के नज़दीक पकयोंग में बने सिक्किम के पहले हवाई अड्डे से कोलकाता की विमान सेवाएं हाल ही में शुरू हुई हैं. बताया जा रहा है कि इन सेवाओं से सिक्किम के पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा. लेकिन विकास का हर कदम अपने साथ पर्यावरण के खतरों को भी उजागर करता है. महानंद अभयारण्य को काटती रांगपो रेल योजना जंगली हाथियों और वहाँ से विस्थापित मनुष्यों के लिए जीवन के जो नए संकट पैदा करेंगी, उन्हें हम बहुत आसानी से ‘विकास की कीमत’ मानकर नज़रंदाज़ कर देंगे.      `         

सिंगम गाँव के नज़दीक हम फिर से तीस्ता के तट पर आ निकले हैं. नदी बहुत चौड़ी नहीं, लेकिन इसमें तेज़ गति है. हमें कई गांवों में तीस्ता के पार जाने के लिए लकड़ी के पैदल पुल भी दिखाई देते हैं. दिक्चू नदी से संगम के कुछ ही ऊपर बाँध से बनी झील को अब पर्यटक स्थल में बदला जा रहा है. यहाँ हाइड्रोइलेक्ट्रिक पद्धति से नदी का पानी 96 मेगा वाट बिजली पैदा करेगा. इन सुरम्य स्थलों तक अभी होटल नहीं पहुंचे हैं, लेकिन कई लोगों ने अपने घरों के अतिरिक्त कमरों में पर्यटकों के लिए ‘होम स्टे’ बना लिए है. हमें भी यहाँ से आगे मंगन में  ऐसे ही एक ‘होम स्टे’ में ठहरना है.


छोटे-छोटे स्थानीय बाज़ारों में दूसरी चीज़ों के अलावा बड़ी इलाइची के ढेर थे. यही बड़ी इलायची ‘भारतीय गरम मसाला’ परिवार का महत्वपूर्ण सदस्य होता है. घरों के पिछवाड़ों में चारपाइयों पर बिछी चादरों पर भी इलाइची सूख रही थी. हमें जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि सिक्किम देश में बड़ी इलाइची का सबसे बड़ा और विश्व में दूसरे नंबर का उत्पादन करने वाला प्रदेश है. कुछ समय पहले तक सिक्किम को दुनिया में बड़ी इलाइची का उत्पादक होने का श्रेय प्राप्त था, लेकिन अब निकटवर्ती दार्जीलिंग और नेपाल में भी इसकी भरपूर खेती होती है अब तो हाल यह है कि नेपाल इसके उत्पादन में भारत से भी आगे निकल गया है. कहा जाता है कि लेपचा जनजाति ने सबसे पहले सिक्किम में इलाइची की खेती शुरू की थी. और बाद में भूटिया, नेपालियों एवं दार्जीलिंग/बंगाल के गोरखाओं ने भी इसे उगाना शुरू कर दिया था. भारत में मिलने वाली 88 प्रतिशत इलाइची सिक्किम से आती है. 

हम तीस्ता के तट पर बसे छोटे से गाँव तिंगचिम से नदी के खूबसूरत दृश्य देखने के लिए ठहर गए हैं. यहाँ से आगे ऊपर चढ़ने से पहले आपको एक बाज़ार मिलेगा, जहां पहाड़ों की तमाम ज़रूरतें उपलब्ध होंगी. कई बार किसी पेट्रोल पंप के इर्द-गिर्द एक बस्ती उगनी शुरू हो जाती है और कालांतर में वहां ढाबे, दुकानें, चायघर, गाड़ी की मरम्मत वर्कशॉप और दूसरी फुटकर गतिविधियाँ उग उठती हैं. इन बाजारों को कई बार ‘ज़ीरो पॉइंट’ का नाम भी दिया जाता है जिसका निहितार्थ यही होता है कि ‘जो चाहिए यहाँ से ले लो, आगे नहीं मिलेगा!’ भीड़ बढ़ने के साथ साथ खोमचे वाले भी धंधे की उम्मीद में आने लगते हैं और पेट्रोल पंप के आसपास टैक्सियों और बसों का स्वतःस्फूर्त अड्डा बनने में भी बहुत समय नहीं लगता.  

हमें यहाँ से कुछ आगे, उत्तरी सिक्किम के प्रवेशद्वार और ज़िले के प्रमुख शहर मंगन में  रात के लिए ठहरना है. इन टूटी फूटी खस्ताहाल सड़कों पर एक घंटे में बीस या पच्चीस किलोमीटर से अधिक तय कर पाना मुश्किल होता है. और रात का सफ़र तो और भी दुष्कर है. साढ़े तीन हज़ार फीट की ऊँचाई पर बसे मंगन से सिक्किम के सबसे बड़े ज़िले उत्तरी सिक्किम का पहाड़ी इलाका शुरू हो जाता है, जो एक तरह से तिब्बती पठार का ही एक विस्तार है. यहाँ मैदानों से पहाड़ों तक की चढ़ाई इतनी सख्त है कि मैदानों से कुल 80 किलोमीटर के सीधे फासले में सात सौ फीट की ऊँचाई से दुनिया के तीसरे नंबर और देश के सबसे ऊंचे शिखर कंचनजंघा की अटट्ठाईस हज़ार फीट की ऊँचाई तक पहुंचा जा सकता है. अगले सात-आठ दिनों के दौरान इन्हीं मुश्किल सड़कों पर हमें हो सके तो साढ़े सत्रह हज़ार फीट की ऊँचाई तक का सफ़र करना है, लेकिन ताज़ा जानकारी के अनुसार सर्दियों की बर्फ़बारी के बाद लाचेन से आगे की सड़क अभी खुली नहीं है. 

उत्तर सिक्किम के लगभग सभी बर्फीले ठिकानों का सफ़र मंगन से शुरू होता है और यहाँ के अधिकाँश रास्ते तीस्ता और उसमें मिलने वाली नदियों के किनारों पर चलते हैं. अपने भौगोलिक महत्व और खुशनुमा ठंडी आबोहवा के कारण मंगन अपने आप में एक पर्यटन स्थल का दर्ज़ा प्राप्त कर चुका है. बड़ी तादाद में स्थानीय लोग और पर्यटक यहाँ के प्रसिद्ध फेनसांग, फोडोंग और लबरंग बौद्ध विहारों को देखने आते हैं. लेकिन यहाँ से उत्तर की ओर बढ़ने से पहले  प्रत्येक स्थान के लिए अनुमति की आवश्यकता है और विदेशियों को यहाँ एक सीमा से आगे जाने की मनाही है. यही कारण है कि इन पहाड़ों में ऊंचे स्तर की आवास सुविधाओं का नितांत अभाव दिखेगा. 

मंगन से गंगटोक के रास्ते में ही कबी लिंग्चोक का वह ऐतिहासिक स्थल है जहां पुरातन समय में भूटिया सरदार के बुर्न सा ने पहली बार लेपचा प्रमुख थेकोंग तेक की ओर दोस्ती और भाईचारे का हाथ बढ़ाया था. सिक्किम की दो सबसे बड़ी जनजातियों भूटिया और लेपचा के बीच का यह अनूठा मिलन सिक्किम के सांस्कृतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है. 

दरअसल सिक्किम के इतिहास में लेपचा और भूटिया के अलावा गुरुंग, लिम्बू, मगर और गोरखा जातियों का भी समावेश है लेकिन लेपचा यहाँ के मूल निवासी हैं. वज्रयान बौद्ध समुदायों के बीच संघर्ष के बाद भूटिया तिब्बत से सिक्किम की ओर आकर यहाँ बस गए थे. तेरहवीं शताब्दी में दोनों जनजातियों ने कबी लिंग्चोक में एक दूसरे को ‘खून के रिश्ते’ का भाई स्वीकार किया था. इन दोनों की अपनी मिलती जुलती भाषा थी और ये दोनों बौद्ध धर्म को मानते थे. इसके बाद कालान्तर में नेपाली हिन्दू गोरखा भी इस प्रदेश में आकर बसने लगे.

तिब्बत की ओर से आने वाले बौद्ध विस्थापितों के अलावा यह प्रदेश दक्षिण पूर्व में भूटान और पश्चिम में नेपाल से आने वाली साम्राज्यवादी सेनाओं के भी निशाने पर रहा है. कहा जाता है कि इन पहाड़ों में अनगिनत दर्रे हैं जिनसे होकर तिब्बत की चुम्बी घाटी और उससे आगे राजधानी ल्हासा तक भी पहुंचा जा सकता है. यही व्यापारियों का वह विख्यात ‘सिल्क रूट’ है जहां अभी आगे, अगली कड़ी में हमें पहुंचना है. जनजातियों में अटूट आस्था है कि सिंग्लीला के इन्हीं पहाड़ों के बीच ईश्वर का वास है और इसी की गहराइयों में वह हिम मानव यती (स्थानीय भाषा में ‘चु मुंग’) भी छिपा है जिसे हमारी सभ्यता आज तक ढूंढ नहीं पायी है. लेकिन यहाँ के लोगों की मानें तो उसके होने के बारे में किसी तरह का संदेह लोगों के मन में नहीं है. संभवतः हमारे दुष्कर्मों के कारण ही वह आज तक हमें नहीं मिला है. शायद आने वाली किसी तारीख में, जब हमारी सभ्यता उससे मिलने के लायक हो जायेगी तो किसी उजले मोड़ पर वह खुद-ब-खुद प्रकट हो जाएगा. अदृश्य यती की इस आशावान सोच में ही शायद दुर्गम पहाड़ों की आत्मा वास करती है. 

सिक्किम का सत्रहवीं शताब्दी से पहले का इतिहास बहुत स्पष्ट नहीं है, सिवाए इसके कि यहाँ लेपचा और दूसरी जन जातियां रहती थी और चौदहवीं शताब्दी में तिब्बत की ओर से भूटिया यहाँ आए थे. 1642 में भूटिया नरेश फुन्त्सोग नामग्याल ने यहाँ के पहले धार्मिक प्रमुख—चोग्याल के रूप में राज संभाला. इसी नामग्याल वंश ने 1974 तक यहाँ शासन किया. अट्ठारहवीं शताब्दी में पहले भूटान और फिर नेपाल ने सिक्किम पर हमले किए. तिब्बत की मदद से भूटान के हमले को तो अंततः नाकाम कर दिया गया पर नेपाल ने पश्चिमी सिक्किम के एक बड़े हिस्से को हथिया लिया. अंग्रेजों के आने के बाद 1814-1816 में  नेपाल से हुए युद्ध में चोग्याल का समर्थन पाने के बाद अंग्रेजों ने नेपालियों द्वारा जीता गया प्रदेश सिक्किम को लौटा दिया और बदले में सिक्किम अंग्रेज़ों का संरक्षित राज्य बन गया. लेकिन इसके कुछ वर्षों में ही सिक्किम से अंग्रेज़ों के सम्बन्ध बिगड़े तो ईस्ट इंडिया कंपनी ने दार्जीलिंग और कई अन्य मैदानी इलाकों को हथिया कर सिक्किम को परास्त किया, जिसके परिणामस्वरूप 1861 में एक संधि के तहत अंग्रेज़ों को इस प्रदेश में व्यापार के खुले अधिकार मिल गए. 1922 में सिक्किम को अंग्रेजों ने एकबार फिर रियासत का दर्ज़ा दे दिया. 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद सिक्किम पृथक देश बना रहा, लेकिन वहाँ राजघराने के विरुद्ध संघर्ष बढ़ते जा रहे थे. 1974  में व्यापक बहुमत से देश की जनता ने भारत में विलय का फैसला लिया और इस तरह सिक्किम भारत का ही एक राज्य बन गया. 

सिक्किम में नामग्याल वंश के अंतिम शासक पैलदेन थोन्दूप नामग्याल

अक्सर सवाल पूछा जाता है कि भूटान और सिक्किम के बीच बड़ा अंतर क्या है. ज़ाहिर है  कि भूटान भारत से संरक्षण प्राप्त स्वतंत्र देश है जबकि सिक्किम का भारत में विलय हो चुका है और इसने सिक्किम की भारतीय पहचान को कुछ और उजागर कर दिया है. सिक्किम का भारत में  विलय वहाँ के नागरिकों की इच्छा के अनुसार हुआ है. इससे पहले भूटान और सिक्किम की स्थिति समान थी. लेकिन इन दोनों देशों को लेकर भारत के इरादे (चीन के तिब्बत अधिग्रहण की तरह) कभी साम्राज्यवादी नहीं रहे, यह जवाहरलाल नेहरु के उस वक्तव्य से स्पष्ट हो जाता है जिसमें देश की स्वतंत्रता से पहले उन्होंने कहा था कि ये दोनों प्रदेश भारत के  राज्य नहीं हैं और इनका भविष्य भारतीय स्वतंत्रता के दायरे से बाहर तय होगा. इसी आधार पर दोनों को भारत द्वारा संरक्षित देशों का दर्ज़ा मिला था. स्वतंत्रता के बाद सत्ताईस साल तक सिक्किम की आम जनता चोग्याल की सल्तनत के विरुद्ध जनतंत्र की मांग करती रही. और इस संघर्ष की अन्विति 1974 में व्यापक जनमत द्वारा सिक्किम के भारत से विलय में हुई.

भूटान और सिक्किम के बीच दूसरा अंतर यह है कि अट्ठारहवीं शताब्दी और उसके बाद के दौर में नेपाली हिन्दुओं की एक बड़ी संख्या नेपाल से सिक्किम आ बसी थी और कालांतर में ये लेपचा और भूटिया बौद्धों से भी अधिक हो गए थे. आज सिक्किम में तीन चौथाई  नेपाली भाषी हिन्दू हैं और एक चौथाई लेपचा और दूसरी जनजातियां. इसके विपरीत भूटान की अधिकाँश जनसंख्या बौद्ध धर्म की अनुयायी है और वहां अल्पसंख्यक हिन्दुओं की आबादी बेहद कम है. दोनों प्रदेशों के बीच का यह धार्मिक और सांस्कृतिक अंतर भी उन्हें एक दूसरे से अलग करता है.       

अगली सुबह मंगन के ‘होम स्टे’ में हमारी आँख खुली तो खिड़की के बाहर बेहद नज़दीक, कंचनजंघा की चोटियों पर धूप की पहली किरणें गिर रही थी. यह दृश्य संदकफू में कंचनजंघा  के ‘सोए हुए बुद्ध’ के नज़ारे से काफी अलग था, जिसे शब्दों में बाँध सकना मुश्किल था. ‘होम स्टे’ के नज़दीक ही पहाड़ी पर एक हेलिपैड था जहां से चारों दिशाओं का दृश्य साफ़ साफ़ दिखता था. ये पर्वतमालाएं अक्सर अलस्सुबह ही देखी जा सकती हैं; बाद में बादल इन्हें ढँक लेते हैं.

मंगन से कंचनजंघा का दृश्य (तस्वीर : जितेंद्र भाटिया)

हमें मंगन से चलकर शाम ढलने से पहले पर्वतीय प्रदेश के आखिरी शहर लाचेन तक पहुंचना था. जीप में चढ़ने से पहले ही सुखद सूचना मिली कि सर्दियों के बाद बर्फ़बारी से ढंका पहाड़ों का रास्ता दो दिन पहले खुल गया है और मिलिट्री वाले अब गाड़ियों को निकलने की इजाज़त दे रहे हैं. इसी के चलते हमारा गुरुडोंगमार झील तक का परमिट भी स्वीकृत हो गया था, जिसके चलते हर पड़ाव पर उसे दिखाने के बाद हमें आगे बढ़ना था.  

मंगन से आगे बढ़ते ही सड़क पर जगह-जगह सेना की उपस्थिति दर्ज़ होनी शुरू हो जाती है. छावनियां, सैनिक ट्रेनिंग स्कूल, भोजनालय, अस्पताल और सिपाहियों की गुमटियां. यह इलाका अक्सर भूस्खलन का शिकार होता रहा है. 2011 के भयानक भूकंप के बाद से सड़कों की स्थिति बिगड़ती चली गयी थी. अब कुछ महीने पहले 2018 में पहाड़ों के बीच से आधी किलोमीटर लम्बी थेंग सुरंग बन जाने से वाहनों को कुछ राहत मिली है. लाचेन चू और लाचुंग चू नदियों के संगम पर खड़ा चार हज़ार बाशिंदों का छोटा सा शहर चुंगथांग है, जहां ‘तीस्ता 3’ योजना के अंतर्गत 1200 मेगावाट का बिजलीघर ‘तीस्ता ऊर्जा कंपनी’ ने बनाया  है. इन दोनों नदियों के मिलन से तीस्ता का उदय होता है. चुंगथांग में 60 मीटर ऊंचे बाँध के लिए नदी के रास्ते में परिवर्तन किया गया है. कई लोग मानते हैं कि इस भूस्खलन और भूकंप बहुल प्रदेश में ये ऊंचे बाँध आने वाले समय में विनाश का कारण भी बन सकते हैं. लेकिन दूसरी ओर इंजीनियरों का कहना है कि प्रदेश में भूकंप की संभावनाओं को देखते हुए सभी बांधों के जलाशय यथासंभव छोटे रखे गए हैं और ये पूरी तरह सुरक्षित हैं. इसके अलावा योजनाओं में विलम्ब होने से इनका कुल खर्च भी हमेशा दुगुना या इससे भी अधिक हो जाता है जिससे बिजली की दर भी बढ़ानी पड़ती है. ‘तीस्ता 3’ का कुल खर्च विलम्ब के कारण 5705 से बढ़कर 13965 करोड़ हो गया जिससे बिजली का प्रस्तावित मूल्य 1.92 प्रति यूनिट से बढ़ाकर 6 रुपये प्रति यूनिट करना पड़ा. जब पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश की सरकारों ने इस मूल्य पर बिजली लेने से इनकार कर दिया तो सरकार और निजी संस्थानों के सहयोग से बनी इस योजना को खुले बाज़ार में 3 रुपये प्रति यूनिट में बिजली खुले बाज़ार में बेचनी पड़ी. यही हाल ‘तीस्ता 6’ तक नदी पर प्रस्तावित लगभग सभी योजनाओं का है. 

कर्णभेदी नामक यह पंछी हिमालय की चोटियों पर मिलता है। लंबी चोंच इसे बर्फ में दबे भोजन निकालने में इसकी मदद करता है। (तस्वीर : जितेंद्र भाटिया)

पचास हज़ार की आबादी का छोटा सा शहर चुमथांग अपने नानक लामा गुरुद्वारे और  नागा, भीम नाला और भेवमा जल प्रपातों के लिए जाना जाता है. यहाँ से आगे सड़क पहले से संकरी है और सेना की ट्रकों के काफिले कुछ कम हो चले हैं. लाचेन को जाने वाली सड़क का सुन्दर रास्ता तीस्ता की सहायक लाचेन नदी के किनारे धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है. यह सिक्किम का सबसे कम रिहाइश वाला इलाका है जहां प्रत्येक वर्ग किलोमीटर में कुल दस बाशिंदे रहते हैं और यहाँ की कुल पचास हज़ार से कम की आबादी में अधिकाँश परिवार भूटिया और लेपचा जातियों के हैं. 

सिक्किम का लगभग आधा हिस्सा जंगलों से घिरा है और यहाँ का वन विभाग पेड़ों को बचाने और उनके संरक्षण के लिए अभिनव योजनाएं बनाता रहता है. ऐसी ही एक योजना स्थानीय भाषा में ‘मिटिनी’ है जिसमें कोई भी व्यक्ति निजी या सार्वजानिक ज़मीन पर खड़े किसी पेड़ के साथ ‘मिटिनी’ सम्बन्ध स्थापित कर उसे अपनी संतान की तरह दत्तक पेड़ घोषित कर सकता है. अपने किसी दिवंगत संबंधी के नाम पर आप किसी पेड़ को ‘स्मृति तरु’ बना सकते हैं. इसके अलावा 20 फीट से बड़े घेरे वाले सभी पेड़ों को ‘विरासत पेड़’ का दर्ज़ा दिया जाता है और इन सब पेड़ों का विधिवत पंजीकरण हो जाने के बाद इन्हें नष्ट करना कानून के दृष्टि में अपराध समझा जाता है.

अखरोट, उटिस, देवदार, भोजपत्र और फूलों से लदे बुरांश और मैगनोलिया वृक्षों तथा  अनगिनत पक्षियों और बंदरों के बीच से होते हुए हम शाम ढलने के बाद आखिरकार लाचेन पहुँचते हैं. लाचेन यानी लेपचा भाषा में ‘बड़ा दर्रा’. अगले तीन दिनों के लिए यह हमारे लिए यात्रा का आधार आवास होने वाला है. यहाँ से आगे सिर्फ थांगू में रहने की जगह है लेकिन इस प्रदेश के अधिकाँश यात्री लगभग नौ हज़ार फीट पर स्थित लाचेन में रहना पसंद करते हैं. अभी गर्मियां आने में देर है और घाटी से इस ओर आती ठंडी हवाओं के साथ हल्की बारिश में मौसम और भी सर्द हो उठा है. यहाँ हर चाय की टपरी, ढाबे, रेस्त्रां और पंसारी की दुकान से आप देशी और विदेशी शराब खरीद सकते है. बेहद बेतरतीब ढंग से बसा लाचेन टेढ़े मेढ़े मकानों, उनके बीच से जाती संकरी गलियों और बस्तियों से घिरा है. हमें इन्हीं के बीच एक ‘तथाकथित होम स्टे’ की तीसरी मंजिल पर रहना है. पहली मंजिल पर मकान मालिक अपने परिवार के साथ रहता है. हमारे खाने की व्यवस्था मुख्य सड़क पर स्थित एक रेस्त्रां नुमा ढाबे में है जहां से बोतलों में गर्म पानी भरकर आप कमरे में ले जा सकते हैं. मुख्य हॉल में लगा बड़ा सा टीवी दिन रात फ़िल्मी गानों से अपने शहरी मेहमानों का दिल बहलाता है और इक्का-दुक्का स्थानीय फुर्सतज़दा स्थानीय लोग भी यहाँ वक्त काटते के लिए आ जमते हैं. हमने हर शाम यहाँ नए लोगों को देखा. शायद शहर के तमाम ‘होम स्टे’ आवासों के बीच भोजन का यही एक विश्वसनीय ठिकाना था.

शहर के बुज़ुर्ग यास्के हमें बताते हैं कि लाचेन में उत्तरी सिक्किम की कई अन्य जगहों की तरह ‘द्ज़ुम्सा’ नाम की स्वयं शासन की व्यवस्था है जिसमें हर परिवार का सदस्य पारंपरिक व्यवस्था के अंतर्गत शहर के प्रशासन में अपना हाथ बंटाता है. इस व्यवस्था में मुखिया ‘पिपोन’ जनतांत्रिक ढंग से निर्वाचित होता है. इनके द्वारा प्रदेश में कई सांस्कृतिक आयोजन भी होते हैं और गर्मियों में यहाँ से 30 किलोमीटर दूर थांगू में याक पशुओं की एक पारंपरिक दौड़ भी आयोजित होती है.  

प्रदेश में अभी अभी आम चुनाव संपन्न हुए हैं लेकिन उसके बहुत कम अवशेष सड़कों पर दिखाई देते हैं. अलबत्ता गलियों और दुकानों में दिखते लोगों के बीच परिवर्तन की एक चाह ज़रूर दिखाई दी, जो वहां से लौटने के कुछ सप्ताह बाद  निकले चुनावों के नतीजों में सही भी साबित हुई. पिछले पच्चीस सालों से सिक्किम में सिक्किम जनतांत्रिक मोर्चे (एस डी एफ) के पवन चैम्लिंग सत्ता में थे. हमें सड़क के लोगों से सरकार की स्थितिप्रज्ञता और कभी कभी भ्रष्टाचार के किस्से सुनने को मिले, हालांकि पिछले दशक में सिक्किम ने पर्यावरण के क्षेत्र में अव्वल स्थान प्राप्त किया है. प्लास्टिक बोतलों पर प्रतिबन्ध लगाने वाला यह पहला राज्य है और राज्य में खेती की लगभग सारी पैदावार जैविक खेती से होती है. 2013 में बनी सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा पार्टी (एस के एम) के प्रेम सिंह तमांग (गोले) जो पहले एसडीएफ के सभापति थे, अब राज्य के नए मुख्यमंत्री हैं. यह देखना अभी बाकी है कि भविष्य में वे सिक्किम को किस दिशा में लेकर जाते हैं. 

लाचेन से आगे के रास्ते से और ऊपर चढ़ना एक तरह से उत्तरी सिक्किम के सबसे सुन्दर बर्फ से ढंकी वादियों तक पहुंचना भी है. यहाँ सुबह के वक्त अक्सर बौद्ध मन्त्रों के साथ हिन्दू भजन भी सुनाई देंगे. लेकिन इन्हें बजाने वाले बहुत से लोग बाहर के हैं. लाचेन से 30 किलोमीटर उत्तर में लगभग साढ़े बारह हज़ार की ऊँचाई पर स्थित थांगू घाटी तक पहुँचते हुए रास्तों पर बर्फ मिलनी शुरू हो जाती है. मकानों के छज्जों पर आपको कई बार हिम कबूतर और बर्फ के दूसरे पक्षी बैठे दिखाई दे जायेंगे. यदि बाहर अधिक ठण्ड लगे तो आप किसी भी ढाबे में बुखारी के नज़दीक बैठकर गर्मागर्म सूप में डूबे नूडल का आनंद ले सकते है. अधिकांश ढाबे औरतें चलाती हैं और पर्यटकों के आगमन के बाद यहाँ स्वच्छ बाथरूम भी मिल जायेंगे. लेकिन इन आरामदेह चायघरों के बाहर अधिकांश ज़िन्दगी फ़ौज के सिपाहियों को समर्पित है.

गुरुडोंगमार के रास्ते पर भारतीय सेना का विशाल जमावड़ा फैला है जहां फोटो खींचने की सख्त मनाही है. इनमें देश के अलग अलग प्रदेशों की सिपाही टुकड़ियाँ, युद्ध स्कूल, और निशानेबाज़ी के रेंज मिल जायेंगे. इनमें सेना का मानवीय चेहरा भी अनिवार्य रूप से शामिल है. एक सीमा से आगे यहाँ चाय की दुकानें और ढाबे नहीं मिलेंगे. लेकिन सेना की व्यापक उपस्थिति में इनकी कमी नहीं खलेगी. लगभग हर टुकड़ी द्वारा सड़क के किनारे बने किसी तम्बू में आपको कैंटीनों में तैयार स्वच्छ नाश्ता किफायती दरों पर मिल जाएगा. साथ में चाय, जिसके पैसे नहीं देने होंगे. एक बड़ी वर्कशॉप में टी 88 टैंकों का एक जत्था अभ्यासरत था. यदि आप जिज्ञासावश इन सिपाहियों से कुछ पूछना चाहें तो वे मुस्कराहट के साथ आपको समझाएंगे. रास्ता खुलने के बाद ज्यों ज्यों गर्मियां बढ़ती हैं, इस उबड़-खाबड़ रास्ते पर पर्यटकों की आवाजाही भी बढ़ जाती है. मद्रास और बॉम्बे सैपर्स के खेमों से आगे भूटिया और लेपचाओं के प्रदेश में हमें पैनज़ेर कैफ़े में चौदह हज़ार फीट की ऊँचाई पर गुजरात का खालिस ढोकला खाने को मिला. काउंटर के पीछे बैठे अवधेश जौनपुर से आये है. वे बताते हैं कि यहाँ आम तौर पर दो से ढाई साल की पोस्टिंग होती है. अधिकाँश तम्बू बुखारी से गर्म हो जाते हैं और सभी को धीरे धीरे इस ठण्ड की आदत हो जाती है. शांति के समय इन सिपाहियों का जीवन जितना व्यवस्थित और शांत होता है, उतना ही युद्ध के समय संगीन हो उठता है. ये सिपाही आपके सवालों के जवाब देने के बाद अनिवार्य रूप से आपके शहर और आपके काम के बारे में सहज भाव से पूछेंगे. सरहद और आतंकी ठिकानों पर मारे जाने वाले दुश्मन और शहीद होने वाले जवानों का ब्यौरा आप अक्सर अखबारों में पढ़ते हैं, लेकिन इस सब में भारतीय सेना का हर हाल में मुस्कराता मानवीय चेहरा कम ही दिखाई देता है. 

जमी हुई गुरूडोंगमार झील (तस्वीर : जितेंद्र भाटिया)

वापस लाचेन लौटने के बाद अगली सर्द सुबह तड़के हम सफ़र के सबसे उत्तरी ठिकाने के लिए रवाना होते हैं. यहाँ तापमान ज़ीरो से भी नीचे होने वाला है. सैनिक ठिकानों को पार कर हम तीस्ता की उसी लाचेन धारा के करीब आगे निकलते जाते हैं. यह स्थान पेड़ों की रेखा से भी बहुत ऊपर है. पानी के दूसरी ओर बर्फ के पठार हैं. कहीं कहीं नदी के पार जाने के लिए छोटे छोटे पुल बने हुए हैं. हमें लगता है कि  उस पार कोई नहीं है, न मनुष्य न पशु न कोई और. लेकिन यह हमारा भ्रम है. कुछ ही आगे उस सर्द पानी में एक विरल पक्षी—सफ़ेद गले वाला डिपर, मछलियाँ या न जाने क्या पकड़ता मिलता है. यह धरती हर हाल में अपनी जीवित सम्पदा को बचाए रखने का इंतज़ाम रखती है. पता नहीं कितना आगे निकल चुकने के बाद हम अनंत तक फैले एक सपाट पठार तक पहुँच जाते हैं. यह जगह चीन की सीमा से बहुत दूर नहीं है. यहाँ बर्फ पर दौड़ते तिब्बती हिममुर्गों का एक समूह हमें अचंभित करता है. सूखे, बर्फीले मैदानों पर नीली भेड़ें, तिब्बती गधे त्यांग और लुप्तप्राय चिरु हिरण आराम से विचरते मिलते हैं जहां हमारे लिए खुले में कुछ देर के बाद खड़े रहना तक मुश्किल है.

और किसी कहानी की आखिरी कभी न भूलने वाले दृश्य के रूप में बर्फीले पहाड़ों के नीचे, हमें पूरी तरह जमी हुई गुरुडोंगमार झील मिलती है. साढ़े सत्तरह हज़ार फीट की ऊँचाई पर फ़ैली झील, जिसे बौद्ध, सिख और हिन्दू सामान रूप से पूजते हैं. कहा जाता है कि तिब्बती बौद्ध धर्म के संस्थापक पद्मसंभव—गुरु रिनपोचे आठवीं शताब्दी में यहाँ आए थे और पंद्रहवीं शताब्दी में गुरु नानक ने इसे पवित्र किया था. झील के उस ओर सिख सिपाहियों ने 1997 में एक गुरुद्वारा बनाया था जिसे लेकर बाद में काफी विवाद हुआ और फिलहाल इसे स्थानीय बौद्ध विहार को सौंप दिया गया है.       

 

(संपादन : नवल)


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