जब मैं बाबासाहब के निधन का समाचार पढ़ रहा था, कई लोग रो रहे थे : पवार

दलित पैंथर के सह-संस्थापक ज.वि. पवार बता रहे हैं कि पहली बार उन्होंने कब डॉ. आंबेडकर को जाना। मुंबई मिरर की संपादक मीनल बघेल से बातचीत में पवार यह भी बता रहे हैं कि वे कैसे नौका से बम्बई पहुंचे, कैसे उन्होंने अपना जीवनयापन किया और किस तरह वे एक सामाजिक कार्यकर्ता बने. और यह भी कि शिवसेना का उदय कैसे हुआ

[दलित पैंथर का गठन 1970 के दशक में हुआ। यह एक ऐसा आंदोलन साबित हुआ, जिसने अत्यंत ही कम समय में दलितों को जोश से भर दिया था। उन दिनों महाराष्ट्र में कहीं भी कोई दलित अत्याचार का शिकार होता, दलित पैंथर के सदस्य सक्रिय हो जाते और लोकतांत्रिक तरीके से प्रतिकार करते थे।  उत्साही और संवेदनशील दलित युवाओं के इस संगठन के सह-संस्थापक जयराम विट्ठल पवार (ज.वि. पवार) से मुंबई मिरर की संपादक मीनल बघेल ने बातचीत की। इसे 30 सितंबर 2019 को अंग्रेजी में प्रकाशित किया गया। इसका हिंदी अनुवाद हम साभार प्रकाशित कर रहे हैं]

प्रस्तुत है, ज.वि. पवार की दृष्टि से बम्बई से मुंबई तक की यात्रा – उस लड़के की यात्रा जो एक नाव में सवार होकर बम्बई पहुंचा और दलित पैंथर का सह-संस्थापक बना. 

“उस दिन बाबासाहब का नाम मेरे दिल और दिमाग पर हमेशा के लिए अंकित हो गया”

मीनल बघेल : सर, मुंबई की आपकी सबसे पुरानी यादें क्या हैं?

ज.वि. पवार : चौथी कक्षा तक मैं रत्नागिरी जिले के चिपलून तालुका में अपने गाँव में रहता था. मुझे पक्का नहीं पता कि मेरी मां ने बाबासाहेब आंबेडकर के बारे में कुछ सुना था या नहीं। परन्तु मैं यह जानता हूँ कि उन्होंने मेरे पिता से कहा था कि मुझे आगे की शिक्षा दिलवाई जानी चाहिए. उन्होंने अनिच्छापूर्वक मुझे बम्बई भेजने का निर्णय लिया. मैं समुद्र के रास्ते बम्बई पहुंचा. जब मैंने पहली बार इस शहर को देखा तो मैं चकित रह गया कि यह कितना बड़ा शहर था. मेरे गाँव में घर बहुत छोटे हुआ करते थे. जब मैं यहाँ पहुंचा, तब बरसात का मौसम था. मुझे याद है कि एक ट्रैफिक पुलिसकर्मी को लोगों पर चिल्लाते हुए देख कर मैं कितना सहम गया था. मैंने एक बिल्डिंग की दूसरी मंजिल पर रहना शुरू कर दिया. यह भी मेरे लिए एक नया अनुभव था. 

एमबी : वह  बिल्डिंग कहा थी?

जेवीपी : धोबी तालाब, फर्स्ट क्रॉस लेन, मेट्रो सिनेमा के पास. हम 25 से ज्यादा लोग एक ही कमरे में रहते थे. हम सब विभिन्न गांवों से बम्बई आये थे. हमारे साथ एक महिला भी रहती थीं, जो हमारे लिए खाना पकातीं थीं. हम सब पेइंग गेस्ट थे. मैं अपने पिता और भाई के साथ रहता था. कमरा इतना बड़ा नहीं था कि उसमें हम सब समा पाते. इसलिये मैं अपना बिस्तर सड़क पर बिछा कर वहीं सोता था. 

दलित पैंथर के सह-संस्थापक ज. वि. पवार

एमबी : क्या और लोग भी सड़क पर सोते थे?

जेवीपी : हाँ, मेरी तरह कम से कम दस लोग सड़क पर सोते थे. उन दिनों बम्बई नगर निगम पानी से सड़कों को धोया करती थी. कभी कभी, हम लोगों को काफी जल्दी उठ जाना पड़ता था, क्योंकि हमारे चारों और पानी ही पानी होता था. मैं सड़क पर लगे खम्बों की रोशनी में पढता था. मेट्रो सिनेमा एयरकंडिशन्ड था और मुझे याद है कि मुझे वह बहुत आकर्षित करता था. उन दिनों मैं थिएटर में जाने और उससे निकलने वालों को सलाम ठोंक कर पैसे कमाता था. हम लोग यह दिखाते थे कि हम उनकी कारों की रखवाली करते हैं. वे हमें ढब्बू पैसा (आप उसे दो पैसा कह सकतीं हैं) देते थे. मेट्रो में केवल अंग्रेजी फिल्में लगतीं थी. जब फिल्म चलती रहती थी, तब हम थिएटर के बाहर केले और चने बेचा करते थे. मैं चार-पांच आने कमा लेता था.

एमबी : और इसी से आप अपनी पढ़ाई का खर्च उठाते थे?

जेवीपी : हाँ, मेरे पिता बेस्ट में काम करते थे. वे फिटर थे. उन्हें जो भी धनराशि वेतन में मिलती, वे उसे मेरी मां को मनीआर्डर के ज़रिए भेज देते थे. हमारे पास हमेशा पैसों की कमी रहती थी.

एमबी : क्या यह सब आपको अच्छा लगता था? क्या आपको लगता था कि यही आपका भविष्य है?

जेवीपी : जिस इलाके में मैं रहता था, वहां आंबेडकरवाद का प्रभाव था और वहां सभाएं होती रहती थीं. मैं समता सैनिक दल से जुड़ गया. वह आंबेडकरवादी आन्दोलन की सैनिक शाखा की तरह था. मैं सबसे छोटा सैनिक था. मेरी लम्बाई बहुत कम थी. 

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एमबी : आपने बाबासाहेब आंबेडकर का नाम सबसे पहले कब सुना?

जेवीपी : मैं जब गाँव में रहता था तब मैं आंबेडकर के बारे में कुछ भी नहीं जानता था. मेरे पिता शायद उनके बारे में कुछ जानते रहे होंगे, क्योंकि वे बंबई आते-जाते रहते थे. आंबेडकर बैरिस्टर थे और लोग उन्हें ‘बेलिस्टर’ कहते थे. मैंने आंबेडकर के बारे में लोगों को बात करते सबसे पहले 6 दिसंबर 1956 को सुना. 

एमबी : उनके महापरिनिर्वाण के दिन?

जेवीपी : हाँ, उसी दिन. उस समय मैं पांचवीं कक्षा में था. मेरा स्कूल जनाभई माधवराव रोकड़े में मडावी के नज़दीक कारनैक बंदर इलाके में था. उस समय जो शब्द प्रयोग किया जाता था वह था ‘हड़ताल’. आज हम उसे बंद कहते हैं – मुंबई बंद, महाराष्ट्र बंद. उस दिन, स्कूल के बोर्ड पर लिखा था कि भारत के संविधान के जनक डॉ बी.आर. आंबेडकर की मृत्यु के कारण स्कूल आधे दिन बंद रहेगा. मैं बहुत खुश हुआ कि मुझे अपने दोस्तों के साथ खेलने का मौका मिलेगा. जब मैं घर लौटा तो मुझे मराठा  नाम का सांध्य अख़बार पढ़ने को कहा गया, क्योंकि वहां मैं ही पढ़ सकता था. 

एमबी : बाकी सब निरक्षर थे…

जेवीपी : हाँ. तो मैंने अख़बार पढ़ा, बिना किसी भावना के, क्योंकि उस समय मैं नहीं जानता था कि आंबेडकर कौन थे. परन्तु मैं जब अख़बार पढ़ रहा था, तब कई लोग रोने लगे, कुछ तो जोर-ज़ोर से रो रहे थे. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वे क्यों रो रहे हैं. फिर कोई सांध्यकाल नाम का एक दूसरा मराठी अख़बार लेकर आया. मैंने जब उसे जोर से पढ़ना शुरू किया तो कई लोग फिर रोने लगे. उस दिन आंबेडकर का नाम हमेशा-हमेशा के लिए मेरे दिल और दिमाग पर अंकित हो गया. उस दिन से मैंने अपने आंबेडकरवादी इलाके में लोगों के साथ काम करना शुरू कर दिया. मैंने लिखना भी शुरू कर दिया. मैं आपको बताना चाहता हूँ कि पिछले 50 सालों में, जब मैं कुछ भी लिखना शुरू करता हूँ, तब सबसे पहले मैं डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का नाम लिखता हूँ. चाहे विषय कुछ भी हो, सबसे ऊपर उनका ही नाम होता है. 

एमबी : आपने बहुत छोटी उम्र से काम करना शुरू कर दिया था. और आपने राजनैतिक आंदोलनों का संगठन करना भी शुरू कर दिया. क्या आप उन शुरूआती दिनों के बारे में कुछ बता सकते हैं?

जेवीपी : मेरे पिता ने एक बड़ा क़र्ज़ ले लिया था. उन्होंने सोचा कि उसे चुकाने के लिए बेहतर होगा कि वे बेस्ट की नौकरी छोड़ दें. उस समय मेरे भाई भी कोई काम नहीं करते थे, इसलिए मैंने चीज़ों को अपने हाथों में लेते हुए यह तय किया कि मैं काम के साथ-साथ पढ़ाई भी करूंगा. तब मैं नवमीं क्लास में था. उसी साल, मेरे स्कूल, मराठा मंदिर हाई स्कूल, ठाकुरद्वार ने नाईट हाई स्कूल शुरू किया और मैंने तुरंत उसमें दाखिला ले लिया. पढ़ते हुए मैंने चार काम भी करने शुरू कर दिए. इनमें से एक था बॉम्बे टेलीफोन्स में ‘बॉय पीयून’ का काम, क्योंकि उस पद पर 18 वर्ष से कम आयु के लड़के भी काम कर सकते थे. जब आप 18 वर्ष के हो जाते थे, तब आप ‘ऑफिस पीयून’ बन जाते थे. इस प्रकार मेरी पदोन्नति हो गयी – किसी योग्यता के कारण नहीं, वरन् केवल मेरी आयु के कारण. 

एमबी : आप और कौन-से काम करते थे?

जेवीपी : दिन में आठ घंटे मैं बर्तन चमकाने का काम करता था. मुझे इसके लिए एक आना मिलता था. यह दिहाड़ी का काम था. जिस दिन मैं काम पर नहीं जाता था, उस दिन मुझे पैसा नहीं मिलता था. मेरा मुख्य काम बॉम्बे टेलीफोन्स में था. बाकी कोई भी काम स्थायी नहीं था. इन कामों को करने से मुझे संतुष्टि नहीं मिल रही थी. मैं आंबेडकर के बाद के आंबेडकरवादी आन्दोलन के बारे में लिखना चाहता था – जिसका लेखा-जोखा तब तक किसी ने नहीं किया था. छंगदेव भावनराव खैरमोड़े ने आंबेडकरवादी आन्दोलन के बारे में लिखा था, परन्तु उन्होंने आंबेडकर के बाद क्या हुआ, उसका वर्णन नहीं किया था. लोग बाद में मुझे दूसरा खैरमोड़े कहने लगे. यहाँ तक कि आनंद तेलतुंबड़े (बाबासाहेब आंबेडकर के पुत्र के दामाद) भी कहते हैं कि ज. वि. पवार, आंबेडकर के बाद के दलित आन्दोलन के इनसाइक्लोपीडिया हैं.

एमबी : दलित कार्यकर्ता के रूप में काम करना आपने कैसे शुरू किया?

जेवीपी : सन् 1964 में हम धोबी तालाब से कमाठीपुरा रहने आ गए. वहां मैं इलाके के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे व्यक्ति के रूप में जाना जाने लगा. मैंने दसवीं कक्षा तक पढ़ाई कर ली थी और इसलिए मैं नवमी तक के विद्यार्थियों को पढ़ाने लगा. वह एक रेडलाईट इलाका था और वहां गुंडागर्दी भी होती थी, परंतु जो काम मैं करता था, उसके कारण वहां मेरा सम्मान था. उसी समय मैं रिपब्लिकन पार्टी से उप-महासचिव की हैसियत से जुड़ गया. इसलिए नहीं कि मुझे राजनीति की समझ थी, बल्कि इसलिए कि मुझे मुख्यमंत्री को संबोधित आवेदनपत्र लिखना आता था. उसी दौरान मैं कमाठीपुरा के युवाओं के संगठन का नेता भी बन गया. इस संगठन के नेता के बतौर पल्टन रोड इलाके में एक मोर्चे का नेतृत्व करते हुए मुझे गिरफ्तार कर जेल में भी डाला गया. 

एमबी : तो यह कहना सही होगा, ज.वि. पवार, कि इससे आपका परिचय सामाजिक न्याय आंदोलन और राजनैतिक सक्रियता से हुआ.

जेवीपी : हां.

एमबी : और यहीं से दलित पैंथर के गठन की नींव पड़ी. यह कैसे हुआ?

जेवीपी : सन् 1967 में जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं तब एक जबरदस्त राजनैतिक उथलपुथल हुई, जिसके नतीजे में उत्तर भारत के कई राज्यों जैसे उत्तरप्रदेश, बिहार और चंडीगढ़ में गैर-कांग्रेस सरकारें बन गईं. उस समय दलितों पर अत्याचार की घटनाएं भी अपने चरम पर थीं. दलितों को दिलासा देने के लिए इंदिरा गांधी ने इल्यापेरूमल समिति का गठन किया. समिति से कहा गया कि वह दलितों पर अत्याचार की घटनाओं के आंकड़े संकलित करे और इन घटनाओं को रोकने के उपाय सुझाए. इस समिति के एकमात्र मराठी-भाषी सदस्य सांसद दादासाहेब गायकवाड़ थे. समिति को अपनी रिपोर्ट तैयार करने में पांच साल का वक्त लगा परंतु उसके निष्कर्ष इतने चौंकाने वाले थे कि सरकार की रिपोर्ट को संसद में प्रस्तुत करने की हिम्मत ही नहीं पड़ी. अंततः सरकार को अप्रैल 1970 में रिपोर्ट को संसद में प्रस्तुत करना पड़ा. इसका कारण था एक मजबूत विपक्ष का दबाव और यह तथ्य कि लोग इस तरह की घटनाओं के बारे में जागरूक हो गए थे. तब तक हम लोग केवल लेखन कार्य करते थे. रपट के सार्वजनिक होने के बाद हमने तय किया कि हम जो लिखते हैं अब उसे जमीन पर उतारेंगे. हमने मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक को संबोधित एक ज्ञापन जारी किया. इसपर राजा ढ़ाले, नामदेव ढसाल और मेरे अलावा नौ अन्य लोगों के हस्ताक्षर भी थे. जब हम लोग मुख्यमंत्री से मिले तब उन्होंने हमसे ब्राम्हणगांव जाने को कहा जहां दो महिलाओं को नंगा कर गांव में घुमाया गया था. 

एमबी : दो महिलाओं को नंगा कर घुमाया गया था?

जेवीपी : नामदेव ढसाल और मैंने इसका विरोध किया और उनसे पूछा कि जब पूरी प्रशासनिक मशीनरी उनके नियंत्रण में है, तो वे स्वयं वहां क्यों नहीं गए…हम जानते थे कि ये महिलाएं अपनी प्यास बुझाने के लिए एक कुएं की तरफ जा रही थीं. उन्होंने पानी को छुआ तक नहीं था, परंतु लोगों ने उन्हें पकड़ लिया. नामदेव ढसाल और मैंने वहां जाने से इंकार कर दिया. इसके बाद वडाला होस्टल में एक और बैठक हुई. वहां रिपब्लिकन पार्टी से अलग हुए एक गुट युवक अघाड़ी ने कहा कि वे ब्राम्हणगांव जाकर उन महिलाओं को साड़ियां देना चाहते हैं. नामदेव और मैंने इसका भी विरोध किया. हमारा ख्याल था कि ऐसा करना ठीक नहीं होगा.

एमबी : नामदेव ढसाल से आपकी पहली मुलाकात कब हुई?

जेवीपी : हमारी पहली मुलाकात मुंबई के दादर स्थित मराठी ग्रंथ संग्रहालय में आयोजित एक राजनीतिक कार्यक्रम में हुई थी. जानेमाने लेखक अनंत कानेकर उसके अध्यक्ष थे. जब मैंने ढसाल को एक कविता के माध्यम से उनके अनुभवों को प्रस्तुत करते सुना, तो मैं अत्यंत रोमांचित हो गया. हम लोगों में बातचीत होने लगी…वे ढेर सारी कविताएं लिखते थे और उन्हें मुझसे साझा करते थे, क्योंकि मैं मराठी में एम.ए. था, जबकि वे केवल नवीं कक्षा तक पढ़े थे. मैं उनकी नई कविताओं का पहला श्रोता होता था. एक दिन जब हम पैदल कहीं जा रहे थे, तब हमने तय किया कि हमें दलितों पर हो रहे अत्याचारों से मुकाबला करने के लिए एक संगठन बनाना चाहिए. पहले हमने सोचा कि हम लोग भूमिगत होकर काम करेंगे. परंतु बाद में हमें लगा कि इसका कोई मतलब नहीं होगा. उसी दिन कमाठीपुरा से चरनी रोड की तरफ जाते हुए हम लोग इस नए संगठन के नाम पर विचार कर रहे थे. ढसाल ने कहा इसका नाम पैंथर होना चाहिए और मैंने इसमें दलित जोड़ दिया. इस प्रकार दलित पैंथर का जन्म हुआ. 

एमबी : सन् 1970 का दशक और 1980 के दशक के शुरूआती सालों में मुंबई में जबरदस्त राजनीतिक उथल-पुथल हुई. एक ओर शिवसेना और बाल ठाकरे उभर रहे थे तो दूसरी ओर दत्ता सामंत मिल मजदूरों के सर्वमान्य नेता बन गए थे. फिर दलित पैंथर था और जार्ज फर्नाडीस भी. क्या आप इन सब लोगों को जानते थे? 

जेवीपी : सन् 1970 के दशक में देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में मानों एक ज्वालामुखी फट पड़ा था. उस समय दत्ता सामंत, शिवसेना और जार्ज फर्नाडीस तीनों सड़कों पर उतर चुके थे. शिवसेना का गठन सन् 1967 में हुआ था… मैं ठाकरे और प्रमोद नवलकर को जानता था. ये दोनों मेरी तरह नवशक्ति  के लिए लिखते थे. ठाकरे भी दलाल स्ट्रीट में स्थित नवशक्ति  के ऑफिस में अपने काम प्रकाशन के लिए देने आते थे. पी.आर. बेहेरे नवशक्ति  के संपादक थे और फ्री प्रेस  के भी, जिसका ऑफिस उसी बिल्डिंग में था. ठाकरे व्यंग्यचित्र (कार्टून) बनाते थे…परंतु हमारी मुलाकात तब तक नहीं हुई, जब तक वे एक बड़े नेता नहीं बन गए. मैं प्रमोद नवलकर को ज्यादा अच्छे से जानता था, क्योंकि वे गिरगांव में रहते थे, जहां मेरा ऑफिस भी था. ठाकरे अत्यंत सज्जन व्यक्ति थे. वे अराजनीतिक और प्रगतिशील थे. वे कुछ नया करना चाहते थे और सामाजिक न्याय के लिए अपने ढंग से काम कर रहे थे. शुरूआत में उन्हें प्रबोधनकर ठाकरे के पुत्र के रूप में जाना जाता था. फिर 1966 में शिवाजी पार्क की उनकी एक सभा में हजारों लोगों की भीड़ उमड़ने के बाद उनकी एक अलग पहचान बन गई. पहले वे कहते थे कि वे 20 प्रतिशत राजनीति और 80 प्रतिशत सामाजिक कार्य करना चाहते हैं. परंतु जब उन्होंने अपनी रैलियों में भारी भीड़ देखी, तो उन्होंने अपनी राह बदल ली….

एमबी : जिस समय शिवसेना दलित पैंथर का जबरदस्त विरोध कर रही थी, उस समय क्या आप कभी बालासाहेब से मिले?

जेवीपी : नहीं. नामदेव उनकी आलोचना करते थे, परंतु बाद में वे भी बालासाहेब से जुड़ गए. मैं शिवसेना के मुखपत्र मार्मिक में लिखा करता था और उसके संपादक भाऊ तोरसकर यह जानते हुए भी कि मेरे विचार उनसे एकदम उलट हैं, मेरे लेख बिना एक भी शब्द बदले प्रकाशित करते थे. 

एमबी : उस दौर में जार्ज फर्नाडीस भी बंबई में एक सितारा थे. क्या आप इस करिश्माई ट्रेड यूनियन लीडर के बारे में कुछ बताना चाहेंगे?

जेवीपी : वे दलित पैंथर से सहानुभूति रखते थे, क्योंकि वे कांग्रेस के कटु विरोधी थे. जिन दिनों मैं बैंक ऑफ इंडिया में काम करता था, उन दिनों उनका ऑफिस मेरे ऑफिस के पास था. वे समाजवादी पार्टी के चरनी रोड ऑफिस में भी आया करते थे. हम वहां कई बैठकें करते थे. दलित पैंथर के हम सदस्यगण भी कई मौकों पर उनके ऑफिस में इकट्ठे होते थे. वे हमारे वक्ता हुआ करते थे. वे हमें उपदेश भी देते थे.

एमबी : वे आपको कैसे व्यक्ति लगते थे?

जेवीपी : वे एक जुझारू व्यक्ति थे. वे पी.डीमेलो के सच्चे शिष्य थे. डीमेलो भी जुझारू थे और ट्रेड यूनियन नेता भी. वे सब बाल ठाकरे के खिलाफ लड़ रहे थे, कांग्रेस के खिलाफ भी और मजदूरों की भलाई के लिए भी. जॉर्ज के साथ रेलवे कर्मचारियों की एक बड़ी यूनियन थी. पर बाद में वे बदल गए. 

एमबी :  मैं चाहती हूँ कि थोड़ा सोचें और मुझे बताएं – आप महाराष्ट्र के एक गाँव से तब बम्बई पहुंचे जब आप बच्चे थे. आप एक प्रसिद्ध व्यक्ति बन गए. पते की जगह केवल आपका नाम लिखे पत्र आप तक पहुँच जाते थे. आप शीर्ष नेताओं से घिरे हुए थे. पूरे शहर में उथल-पुथल मची थी. सामाजिक न्याय का आन्दोलन चल रहा था. श्रमिक आन्दोलन चल रहा था. क्या आप मुझे कुछ विस्तार से बता सकते हैं कि उस समय का बम्बई कैसा था?

जेवीपी : तब बम्बई गरीबों का शहर था. अमीर लोग थे, पर बहुत कम. उन्नीस मंजिल की उषा किरण सबसे ऊंची इमारत थी. अब तो यहाँ 60 मंजिलों की इमारतें भी हैं. इमारतें बदल गयीं हैं, शहर बदल गया है…मैं आपको अपने व्यक्तिगत जीवन की एक घटना सुनाना चाहता हूँ. सन् 1973 में भारत में दलित पैंथर था. अमेरिका में ब्लैक पैंथर आन्दोलन अपने शीर्ष पर था. उसकी नेता एंजेला डेविस थीं. वे उस समय जेल में थीं. 8 जनवरी, 1973 को मेरी पहली संतान – मेरी बेटी – का जन्म हुआ. मैं उस समय नासिक जिले के जेल में था. मैंने उसका नाम अंजेला रखना तय किया. पैंथर के लोग उसके नामकरण संस्कार में इकठ्ठे हुए. एंजेला डेविस को पता चला कि भारत में किसी व्यक्ति ने अपनी बेटी का नाम उनके नाम पर रखा है. अभी हाल में, 2017 में, एंजेला डेविस मुंबई आईं और मुझसे व मेरी बेटी से मिलीं. 

एमबी: वाह! अद्भुत. कितनी विलक्षण है यह कहानी!   

(अनुवाद : अमरीश हरदेनिया, कॉपी संपादन : नवल)

यह साक्षात्कार मूल रूप से अंग्रेजी में 30 सितंबर, 2019 को मुंबई मिरर द्वारा प्रकाशित किया गया।

 


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