आरएसएस और बहुजन चिंतन

इस किताब के लेखक कंवल भारती हैं। यह पुस्तक आरएसएस के विचारों और फुले-आंबेडकर के विचारों के बीच के अंतर को सामने लाती है। यह बताती है कि कैसे एक ओर आरएसएस समाज में वर्चस्ववादी जातिव्यवस्था और पितृसत्ता को स्थापित करना चाहता है तो दूसरी ओर फुले-आंबेडकर के विचार एक ऐसे समाज बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं जिसमें सभी को आत्मसम्मान के साथ बराबरी के स्तर पर जीने का अधिकार हो। यह पुस्तक विभिन्न पुस्तक विक्रेताओं और ई-कामर्स वेबसाइटों पर उपलब्ध। विशेष छूट! शीघ्र आर्डर करें

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कँवल भारती ने आरएसएस के झूठ का पर्दाफाश करने के लिए अपने तर्कों को कुशलतापूर्वक प्रस्तुत करते हुए साबित किया है कि आरएसएस कितना दलित-विरोधी और आंबेडकर-विरोधी है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह आमजन के साथ संवाद करती है। मुझे उम्मीद है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ऐसा कोई दलित नहीं होगा, जो आरएसएस और संघ परिवार की दलित-विरोधी और बड़े पैमाने पर जन-विरोधी छवि को पहचानने से इनकार करेगा। 

प्रस्तुत पुस्तक में मुख्य रूप से दलित-बहुजनों के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा वितरित आठ पुस्तकों पर उनके विचार शामिल हैं, जिनके अक्सर सीधे-सादे दलित शिकार हो जाते हैं। अब यह महज़ एक परिकल्पना नहीं रह गई है; यह पहले भी हुआ है और कुछ वर्षों से होता आ रहा है। 2014 के चुनाव से पहले दलितों को भरमाने की यह प्रक्रिया खतरनाक स्तर तक पहुंच गई थी। ज़्यादातर दलित नेता निर्लज्ज होकर भाजपा से जा मिले या आंबेडकर का नाम जपते हुए उस दल में शामिल हो गए।

आनंद तेलतुंबड़े, प्रोफेसर, गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट

यह आरएसएस के सच को बहुजन नजरिए से उजागर करने वाली पहली किताब है। 

मोहनदास नैमिशराय, पूर्व मुख्य संपादक, डॉ.. आंबेडकर प्रतिष्ठान, भारत सरकार

जाने-माने दलित-चिंतक तथा प्रगतिशील लेखक कंवल भारती की यह किताब आरएसएस की राजनीति और इतिहास बोध का बहुत ही तार्किक ढंग से पोस्टमार्टम करता है। 

ईश मिश्र, प्रोफेसर, राजनीति शास्त्र, हिंदू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

इस किताब के ‘हिंदुत्व एक मिथ्या दृष्टि और जीवन पद्धति’अध्याय में कॅंवल भारती ने ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं’ पुस्तिका की समीक्षा की है। इस पुस्तिका में भी आरएसएस के विद्वानों ने इतिहास के साथ धोखाधड़ी और फर्जी तरीके से इतिहास प्रस्तुत करने का अपना कार्यक्रम किस तरीके से बदस्तूर जारी किया हुआ है, इसकी समीक्षा मिलती है कि किस प्रकार भारतीय अपने आप को विश्व गुरु मानते आ रहे हैं। जबकि एक बड़ा सवाल यह है कि दुनिया के कितने देशों ने भारत को विश्व गुरु माना है? इस सवाल का आज तक कोई मुकम्मल जवाब नहीं मिल पाया है।

विकाश सिंह मौर्य, फारवर्ड प्रेस में प्रकाशित एक समीक्षा का अंश

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