आंबेडकर ने कैसे खड़ा किया अछूतों का आंदोलन, बताती है यह किताब

डॉ. आंबेडकर सुविख्यात लेखक और दूरदर्शी विचारक के अलावा एक कुशल संगठनकर्ता और नेतृत्वकर्ता भी थे। अपने जीवन में उन्होंने एक साथ कई मोर्चों पर संघर्ष किया। नवल किशोर कुमार के अनुसार, यह किताब उनके उन संघर्षों का आधिकारिक दस्तावेज़ है जो उन्होंने भारत में अछूतों के आंदोलन को खड़ा करने के लिए किया

पुस्तक समीक्षा

डॉ. भीमराव आंबेडकर(14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956) ने भारतीय राजनीति में दलितों-वंचितों को लेकर उस कालखंड में आंदोलन खड़ा किया जब यह कल्पना के भी परे था। चूंकि किसी भी आंदोलन को एक दिन में खड़ा नहीं किया जा सकता है, इसके लिए लंबे प्रयासों की आवश्यकता होती है, आंबेडकर ने भी बिना अपनी राह बदले प्रयास करते रहे। उनके इसी प्रयासों का आधिकारिक दस्तावेज है आनंद साहित्य सदन, अलीगढ़ द्वारा प्रकाशित पुस्तक “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अछूतों का आंदोलन : स्रोत सामग्री (1915-1956)”। 

इस किताब में संकलित सूचनाएं चूंकि या तो तत्कालीन अखबारों में प्रकाशित खबरें हैं या फिर पुलिस व अन्य सरकारी संस्थाओं द्वारा दर्ज सूचनाएं, इसलिए इन सूचनाओं को आधिकारिक कहा जा सकता है। कुल 575 पृष्ठों की यह किताब 1982 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रकाशित पुस्तक “सोर्स मैटेरियल ऑन डॉ. बाबासाहब आंबेडकर एंड दी मूवमेंट ऑफ अनटचेबुल्स” का अनुवाद है, जिसे आज के दौर में सबसे अधिक सक्रिय दलित चिंतक व लेखक कंवल भारती ने हिंदी में अनुवाद किया है। उनके अनुवाद में एक प्रवाह है। संभवत: इसकी एक वजह यह भी कि भारती मौजूदा दौर में उन लोगों में अग्रणी हैं जिन्होंने आंबेडकर के विचारों को वर्तमान के संदर्भ और सवालों के सापेक्ष लोगों के बीच प्रभावकारी तरीके से रखा है।

दरअसल, आंबेडकर ने भारतीय राजनीति में किस तरह का हस्तक्षेप किया और उसके प्रभाव कब और किस रूप में सामने आए, इसे समझे बगैर आंबेडकर को समग्रता में नहीं समझा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो आंबेडकर के लेखों, भाषणों और किताबों में उनकी वैचारिकी सामने आती है। लेकिन आंदोलन को खड़ा करना एक दूसरी बात है। इसके लिए कार्यक्रम तय करने महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में कार्यक्रम के एजेंडे तय करने से लेकर उसका मूल्यांकन तक लोगों की सहभागिता सुनिश्चित करना बहुत ही आवश्यक पहलु हैं। जाहिर तौर पर आंबेडकर इन सभी आयामों को बखूबी समझते थे।

समीक्षित पुस्तक “डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अछूतों का आंदोलन : स्रोत सामग्री (1915-1956)” का कवर पृष्ठ

मूल अंग्रजी किताब के उद्देश्य के बारे में संपादकीय बोर्ड (जिसमें एम. बी. चिटनिस, पी.टी. बोरले, एस. पी. भागवत और वसंत मून शामिल हैं) ने पुस्तक के परिचय में लिखा है – “हम डॉ. आंबेडकर का अध्ययन करें, जिनका जीवन उन तमाम लोगों के लिए प्रेरणास्पद है, जो विषमताओं से उपर उठना चाहते हैं। इसके सिवा एक नायक के रूप में, जिस अर्थ में काले ने इस शब्द का प्रयोग किया है, उन्होंने अपने जीवन और विचारों से करोड़ों के भाग्यों को बनाया है। संपादकीय बोर्ड को यह विश्वास है कि जितना ज्यादा लोग डॉ. आंबेडकर को पढ़ेंगे और समझेंगे, उतना ही ज्यादा यह देश एक लोकतंत्र के रूप में सुरक्षित होगा।”

पुस्तक में वर्ष 1915 से लेकर वर्ष  1956 तक की घटनाएं दर्ज हैं, जो एक तरह से यह आंबेडकर के द्वारा किए गए सभी महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं। मसलन, किताब में पहली संकलित सूचना 16 जनवरी, 1915 की है। यह सूचना बम्बई के स्पेशल ब्रांच ने दर्ज किया है। इसके मुताबिक, शिक्षा मंत्री, बड़ोदा का निम्नलिखित पत्र संख्या 509 दिनांक 8 जनवरी, 1915 बी. आर. आंबेडकर, स्क्वायर, बी.ए. 554, वेस्ट 144वां स्ट्रीट, न्यूयार्क को भेजा गया है – “उन्हें सूचित करें कि आपको छात्रवृत्ति जारी रखने के लिए हिज हाईनेस महाराजा साहब के समक्ष रखा जाएगा और परिणाम से अवगत करा दिया जाएगा” (पृष्ठ संख्या – 17)।

यह सूचना स्पष्ट करती है कि बड़ोदा स्टेट के महाराजा ने डॉ. आंबेडकर को पढ़ने के लिए अमेरिका भेजा और इसके लिए उन्होंने आधिकारिक तौर पर निर्णय लिया था। बहुत कम लोग इस तथ्य से परिचित होंगे कि बड़ोदा स्टेट के महाराजा ने उन्हें अपनी सैन्य सेवा में शामिल किया था। इसका पता बम्बई, स्पेशल ब्रांच के द्वारा दर्ज एक सूचना के जरिए मिलता है जो 30 जनवरी, 1915 को जारी हुआ। इसके मुताबिक – “भीमराव रामजी आंबेडकर बम्बई निवासी हैं, जिसे गायकवाड़ ने वित्त एवं समाजशास्त्र की पढ़ाई के लिए अमेरिका भेजा है। यद्यपि बड़ोदा सेवा सूची में उनका नाम मिलिट्री प्रोबेशनर के रूप में दर्ज है, किंतु उन्होंने कोई मिलिट्री ट्रेनिंग नहीं ली है और केवल वेतन निकालने के मकसद से उनकी नियुक्ति की गई लगती है। उन्हें जून 1913 में अमेरिका भेजा गया था, और माना जाता है कि वह अभी वहीं पर हैं। उन्हें एक पहचान-पत्र दिया गया था” (पृष्ठ संख्या – 17)।

20 मार्च, 1927 को महाड सत्याग्रह के दौरान प्रतिबंधित तालाब का पानी पीकर विरोध करते डॉ. आंबेडकर को प्रदर्शित करता एक शिल्प

आंबेडकर द्वारा किए गए आंदोलनों में सबसे अहम महाड सत्याग्रह है। यह आंदोलन कैसे शुरू हुआ, इसकी हर छोटी से छोटी जानकारी पुस्तक में है। उदाहरण के लिए बम्बई सिटी विशेष शाखा ने 31 अक्टूबर, 1927 को दर्ज किया। इसके मुताबिक, “विगत मार्च में कोलाबा जनपद के महाद में उन महारों, मांगों और भंगियों का एक सम्मेलन हुआ, जिनका सनातनी हिन्दुओं ने गांव के तालाब से पानी लेना प्रतिबंधित कर दिया है। बताया जाता है कि जिन लोगों ने कानून अपने हाथ में लेकर अछूतों के विरूद्ध प्रतिबंध लगाया है, उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करा दिया गया है। चूंकि इस घटना ने बम्बई के अछूतों को उत्तेजित कर दिया है, इसलिए डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर उसका नेतृत्व कर रहे हैं। 

इसी विषय को लेकर लगभग एक हजार अछूतों की एक सभा डॉ. आंबेडकर की अध्यक्षता में 30 अक्टूबर के अपराह्न में ‘सरकोवसजी जहांगीर हॉल’ में हुई, जिसमें अध्यक्ष ने महाड की घटना के बारे में तथ्यों से अवगत कराया और कहा कि इस घटना ने अछूतों को अपने अधिकारों की रक्षा हेतु उठ खड़ा होने के लिए बाध्य कर दिया है। एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसके द्वारा यह निश्चय किया गया कि आगामी 25 दिसंबर को महाड में सार्वजनिक तालाबा से पानी लेने के अपने अधिकार को प्राप्त करने के लिए सम्मेलन किया जाएगा और यदि रोका गया, तो सत्याग्रह किया जाएगा। इस सभा में लगभग 507 रुपए चंदा जमा हुआ।” (पृष्ठ संख्या – 31)

आंबेडकर न केवल एक उत्कृष्ट विचारक और लेखक थे, बल्कि वे एक कुशल संगठनकर्ता भी थे। महाड सत्याग्रह के लिए उन्होंने दिन-रात के अंतर को समाप्त कर दिया था। वे चाहते थे कि उनके इस आंदोलन में अधिक से अधिक लोग शामिल हों। इसकी वजह यह भी रही कि सनातनी हिन्दुओं के खिलाफ यह पहली सीधी मुठभेड़ थी। इससे बम्बई पुलिस अंजान नहीं थी। वह पल-पल की घटनाओं पर नजर रख रही थी। इसकी पुष्टि 22 दिसंबर, 1927 को विशेष शाखा के पुलिस उपायुक्त के द्वारा कोलाबा के एसपी को भेजी गयी सूचना में होती है। इसके अनुसार, “इसी 21 को मध्य रात्रि में हुई दलित वर्गों की सभा के संबंध में, 250 लोग उपस्थित थे, जिसकी अध्यक्षता डॉ. बी. आर. आंबेडकर, बार-एट-लॉ ने की। अध्यक्ष सम्भा जी सन्तो जी वाघमारे, निमनदरकार, रीवलवाडेकर और जुन्नारकर ने लोगों को अछूतों को तालाब से पानी लेने पर रोक लगाने के खिलाफ इसी 25 दिसंबर को महाड में होने वाले सत्याग्रह आंदोलन में भाग लेने के लिए भाषण दिए।” (पृष्ठ संख्या – 32)

आंबेडकर इसके बावजूद अपने विचारों के प्रति दृढ रहे कि उन दिनों उनसे विभिन्न मत रखने वालों में कोई और नहीं बल्कि महात्मा गांधी थे, जो कि देश भर में ब्रिटिश हुक्मरानों के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में सर्वमान्य नेता थे। आंबेडकर अपने अछूतों की मुक्ति के मिशन में लगे थे। 6 फरवरी, 1933 को टाइम्स ऑफ इंडिया, में एक खबर प्रकाशित हुई। इसके हिंदी अनुवाद का शीर्षक है – मंदिर प्रवेश पर्याप्त नहीं, जाति का उन्मूलन जरूरी : आंबेडकर। इस खबर में संवाददाता ने लिखा है – “डॉ. आंबेडकर ने अपने लोगों – सामान्यत: अछूतों और गांधी जी के शब्दों में हरिजनों की उन्नति के लिए एक नया बिल तैयार किया है। वे आज दोपहर इस स्थिति पर अपना बयान देने को इच्छुक नहीं थे, लेकिन यह अनुमान लगाया जाता है कि उनका यह नया बिल मंदिर प्रवेश के अभियान तंत्र के केंद्र में एक जिंदा बम है।

डॉ. आंबेडकर आज सुबह बम्बई से मि. गांधी से मिलने के लिए यरवडा जेल आए। गोलमेज सम्मेलन से लौटने के बाद यह उनकी पहली मुलाकात है। वे सीधे यरवडा गए और डेढ़ घंटे तक तक जेल की चाहरदीवारी में रहे।

संवाददाता ने आगे लिखा है – यह समझा जाता है कि डॉ. आंबेडकर ने मि. गांधी को स्पष्ट रूप से बता दिया है कि उनके समुदाय के लोग सिर्फ मंदिरों में प्रवेश करने से संतुष्ट नहीं होंगे। इसी खबर के एक हिस्से में संवाददाता ने गांधी का विचार भी रखा है। इसके मुताबिक, समझा जाता है कि मि. गांधी ने डॉ. आंबेडकर की बात को मानने से इनकार कर दिया है। गांधी ने कहा है कि वे अस्पृश्यता को एक पाप मानते हैं, जबकि जाति मात्र एक सामाजिक विशेषता है। दोनों के बीच पूरी तरह क्या सही बातचीत हुई, यह नहीं पता, पर डॉ. आंबेडकर इस बातचीत के परिणाम से पूरी तरह संतुष्ट नजर नहीं आए।” (पृष्ठ संख्या – 144)

इस किताब में खामियां भी हैं। इन खामियों में मुद्रण के कारण होने वाली खामियां तो हैं ही, कई शब्दों का अनुवाद हिन्दी के पाठकों के लिए समुचित प्रतीत नहीं होते। एक खामी किताब के आवरण व प्रस्तुति की है। बेहतर होता कि ऐतिहासिक रूप से अति महत्वपूर्ण इस किताब को बेहतर कलेवर के साथ प्रकाशित किया जाता। साथ ही यह भी मुनासिब होता कि आंबेडकर के 41 वर्षों के संघर्ष को अलग-अलग खंडों में वर्गीकृत कर दिया जाता तो यह मुमकिन था कि इसकी पठनीयता और अधिक होती।

बहरहाल, कुछ खामियों के बावजूद यह पूरी किताब इसी तरह की कई तरह की रोचक सूचनाओं से भरी है और आज के मौजूदा दौर में प्रासंगिक है। यह किताब अपने आपमें एक दैनन्दिनी के रूप में भी रोचक है क्योंकि सभी सूचनाएं तारीख के हिसाब से आरोह क्रम में व्यवस्थित हैं। इसलिए यह न केवल पठनीय हैं बल्कि सुविधाजनक भी हैं। किताब के माध्यम से आंबेडकर के जीवन के करीब 41 साल के संघर्ष को समझा जा सकता है। यह किताब आंबेडकरवादी, सामाजिक कार्यकर्ताओं, शोधार्थियों, अध्येताओं, नीति निर्धारकोें, राज्य और आम जनों के लिए भी जरूरी है। इसके जरिए वे नए भारत के निर्माण की उस प्रक्रिया को जान सकते हैं, जिसके सूत्रधार डॉ. आंबेडकर थे।

 समीक्षित पुस्तक : डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर और अछूतों का आंदोलन : स्रोत सामग्री (1915-1956)
अनुवादक : कंवल भारती
प्रकाशक : आनंद साहित्य सदन, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश)
मूल्य : 500 रुपए

(संपादन: गोल्डी)

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