इन कारणों से मध्यप्रदेश में फिर ओबीसी के हाथ में नेतृत्व

शिवराज सिंह चौहान किरार (ओबीसी) जाति के एक साधारण कृषक परिवार से आते हैं। एक बार फिर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया है। इसके पीछे राजनीतिक कारण क्या हैं, बता रहे हैं अमरीश हरदेनिया

करीब 61 साल के शिवराज सिंह चौहान ने 23 मार्च 2020 को चौथी बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। वे पहली बार सन 2005 में प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे और तब से लेकर 2018 तक इस पद बने रहे। चौहान अब तक 13 वर्ष से अधिक अवधि तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। सन 1956 में राज्य के गठन के बाद से कोई भी मुख्यमंत्री इतने समय तक पद पर नहीं रहा है।

राज्य की 15 माह पुरानी कमलनाथ सरकार का 21 मार्च को पतन हो गया था। इसके बाद भाजपा की सरकार बनना तय था परन्तु पार्टी ने अपना मुख्यमंत्री चुनने में तीन दिन लगा दिए। चौहान के अलावा, इस पद के दो अन्य दावेदार माने जा रहे थे – केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर और पिछली शिवराज सरकार में मंत्री रहे नरोत्तम मिश्रा। दोनों ने नाथ सरकार को धराशायी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। यह भी कहा जा रहा था कि उत्तरप्रदेश, गुजरात और हरियाणा की तर्ज पर भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व किसी नितांत अनापेक्षित व्यक्ति (जिसे अंग्रेजी में डार्क हॉर्स कहा जाता है) को मुख्यमंत्री पद से नवाज़ सकता है। 

यदि पार्टी ने अंततः चौहान पर दांव लगाया तो उसका सबसे महत्वपूर्ण कारण उनका ओबीसी होना था। वे किरार जाति के एक साधारण कृषक परिवार से आते हैं। उनके दोनों ही प्रतिद्वंदी – नरेन्द्र सिंह तोमर (ठाकुर) और नरोत्तम मिश्र (ब्राह्मण) – सवर्ण थे। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष और खजुराहो से सांसद वीडी शर्मा ब्राह्मण हैं। उन्हें राकेश सिंह, जो लोधी हैं, के स्थान पर नियुक्त किया गया था। जाहिर है कि भाजपा किसी सवर्ण को मुख्यमंत्री बनाकर प्रदेश की लगभग 52 प्रतिशत ओबीसी आबादी की नाराज़गी मोल लेना नहीं चाहती है।

चौथी बार मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेते शिवराज सिंह चौहान

सन 2003 में कांग्रेस से सत्ता छीनने के बाद से भाजपा राज्य में ओबीसी नेताओं को ही मुख्यमंत्री नियुक्त करती आ रही है। सबसे पहले उसने उमा भारती (लोधी) को नियुक्त किया, फिर बाबूलाल गौर (यादव) को और उनके बाद शिवराज सिंह को। केंद्रीय मंत्रिमंडल में राज्य से जो चार सांसद (पैराशूट से उतरे राज्यसभा सदस्यों को छोड़कर) मंत्री हैं, उनमें तोमर के अलावा, प्रह्लाद सिंह पटेल (लोधी), थावरचंद गहलोत (दलित) और फग्गन सिंह कुलस्ते (आदिवासी) शामिल हैं। 

मध्यप्रदेश की कुल आबादी में दलितों का प्रतिशत 15 और आदिवासियों का 20 है अगर इनमें 52 प्रतिशत ओबीसी को भी मिला दिया जाये तो प्रदेश में गैर-सवर्ण समुदायों का प्रतिशत लगभग 87 हो जाता है। इसके बाद भी, राज्य के अधिकांश मुख्यमंत्री सवर्ण ही रहे हैं। इनमें शामिल थे रविशंकर शुक्ला, द्वारका प्रसाद मिश्रा, कैलाश नाथ काटजू, कैलाश जोशी, श्यामाचरण शुक्ल, भगवंतराव मंडलोई और मोतीलाल वोरा (सभी ब्राह्मण) और अर्जुन सिंह, दिग्विजय सिंह, गोविन्द नारायण सिंह और नरेश चन्द्र सिंह (सभी ठाकुर)। सच तो यह है कि सन 2003 के पहले तक न तो कोई ओबीसी, न दलित और ना ही आदिवासी प्रदेश का मुख्यमंत्री बन सका। दलित और आदिवासी मुख्यमंत्री का तो प्रदेश को अब भी इंतज़ार है। हाँ, 2003 की बाद से, ओबीसी का दबदबा प्रदेश की राजनीति में अवश्य बढ़ा है। 

प्रदेश की ओबीसी आबादी को साधने के प्रयास में ही पिछले साल जुलाई में कमलनाथ सरकार ने प्रसेह में ओबीसी के लिए आरक्षण का प्रतिशत 14 प्रतिशत से बढ़ा कर 27 कर दिया था। हालांकि इस साल जनवरी में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने इस निर्णय को रद्द कर उसे यथावत 14 प्रतिशत कर दिया।

कांग्रेस के जिन 22 विधायकों ने पार्टी से त्यागपत्र देकर कमलनाथ सरकार को ज़मीन पर ला दिया, उनमें से कम से कम सात दलित और एक आदिवासी है। इनमें से छह विधायक मंत्री थे। इन सभी ने केवल ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति अपनी वफादारी के चलते पार्टी छोड़ी। उनके इस निर्णय में जातिगत समीकरणों की कोई भूमिका नहीं थी। उनमें से अधिकांश ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र से चुने गए थे। उत्तरप्रदेश से सटा यह इलाका स्वतंत्रता के बाद से ही सिंधिया राजघराने का गढ़ रहा है। सन 2019 के आम चुनाव में इस क्षेत्र के गुना निर्वाचन क्षेत्र से ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार के पहले तक कोई सिंधिया यहाँ से कभी चुनाव नहीं हारा था। विजयाराजे, माधवराव, यशोधराराजे और ज्योतिरादित्य इस क्षेत्र से हमेशा विजयी रहे – चाहे वे किसी भी पार्टी के उम्मीदवार रहे हों, उन्होंने प्रचार किया हो या नहीं और उनका प्रतिद्वंदी कोई भी रहा हो।

बहरहाल, सिंधिया की नाराजगी के संबंध में कहा जा रहा है कि उनकी अपेक्षाकृत कम आयु (वे लगभग 50 वर्ष के हैं), उनकी लोकप्रियता और उनकी  वक्तृत्व कौशल के चलते, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को यह आशंका थी कि वे भविष्य में उनके पुत्रों के राजनैतिक करियर में बाधक बन सकते हैं। इसलिए दोनों ने मिलकर सिंधिया को दरकिनार किया और अंततः उन्हें पार्टी छोड़ने पर मजबूर कर दिया। यह विश्लेषण किस हद तक सही है यह कहना मुश्किल है परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि राज्य की कांग्रेस सरकार और पार्टी संगठन में सिंधिया को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया था। 

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