आरक्षण को लेकर न हों दिग्भ्रमित, मौलिक अधिकारों के साथ है नाभिनाल का रिश्ता

सामाजिक न्याय, समानता, सम्मान के साथ जीवन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकार, धार्मिक अधिकार, व्यक्ति स्वातंत्र्य आदि ऐसे स्वयंसिद्ध मूल्य हैं, जिन्हें भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14, 16, 19 और 21 में मौलिक अधिकारों के रूप में सहेजा गया है। बता रहे हैं ओमप्रकाश कश्यप

“आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है” – यह टिप्पणी बीते 11 जून, 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के संबंध एक याचिका की सुनवाई के दौरान की। यह याचिका तमिलनाडु की अनेक राजनीतिक दलों द्वारा दायर की गयी थी। उनकी याचिका में कहा गया था कि केंद्र सरकार “नेशनल इलीजिबिल्टी एंट्रेंस टेस्ट” (नीट) के तहत ऑल इंडिया कोटे के तहत राज्य के अधीन मेडिकल संस्थानों व डेंटल संस्थानों में दाखिले के लिए अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 50 फीसदी आरक्षण दे।

गौरतलब है कि तमिलनाडु में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 50 फ़ीसदी तथा अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों दोनों को मिलाकर 19 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था है।, इस तरह यहां कुल 69 फ़ीसदी आरक्षण देने का प्रावधान है। लेकिन चूंकि ऑल इंडिया कोटे के तहत राज्याधीन मेडिकल संस्थाओं में ओबीसी को आरक्षण देने का नियम तय नहीं है, इसलिए यह वर्ग आरक्षण से वंचित है।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि जबतक सरकार ऑल इंडिया कोटे के तहत राज्याधीन संस्थाओं में ओबीसी के लिए नीति तय नहीं करती है तबतक प्रवेश-प्रक्रिया पर रोक लगाई जाए। मामला जस्टिस एल. नागेश्वर राव, जस्टिस कृष्ण मुरारी और जस्टिस एस. रविद्र भट्ट की बेंच के पास विचाराधीन था। 

अदालत में क्या हुआ?

सुनवाई के दौरान कोर्ट के यह पूछने पर कि उनकी याचिका क्यों स्वीकार्य होनी चाहिए? डीएमके की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी. विल्सन ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु में, “आरक्षण पहले से ही लागू है। हम अदालत से अलग से आरक्षण देने की मांग नहीं कर रहे हैं।” इस पर अदालत की प्रतिक्रिया थी, “आपने अनुच्छेद 32 में याचिका दायर की है। अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकारों से संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए है। यहां किसके मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है?” वरिष्ठ अधिवक्ता ने उत्तर दिया कि इससे अन्य पिछड़े वर्ग के शिक्षा तथा आरक्षण संबंधी अधिकारों का हनन हो रहा है। तब अदालत ने कहा, “हमें खुशी है कि इस मुद्दे (अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण) पर सभी दल एक साथ हैं … लेकिन हम कहना चाहते हैं कि आरक्षण का अधिकार, मौलिक अधिकार नहीं है।”2 सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को मद्रास हाई कोर्ट जाने की सलाह दी थी। जिसे कोई और विकल्प न होने के कारण याचिकाकर्ताओं ने मान लिया था।  

आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट के अलग अलग-अलग बेंचों की रही है अलग-अलग राय

शीर्षतम अदालत पहले भी यह कह चुकी है

आरक्षण को लेकर ऐसी टिप्पणी पहली बार नहीं थी। इसी वर्ष 7 फरवरी, 2020 को भी, प्रोन्नति में आरक्षण संबंधी एक अपील पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा था कि “आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है।” तब मामला उत्तराखंड हाई कोर्ट से जुड़ी अपील का था। उत्तराखंड सरकार ने 5 सितंबर, 2012 को आदेश दिया था कि राज्य में सार्वजनिक पदों से जुड़ी सभी भर्तियां अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को आरक्षण दिए बिना भरी जाएंगी। उस फैसले को उत्तराखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने ‘इंदिरा साहनी बनाम भारत गणसंघ तथा अन्य’ आदि फैसलों का आधार लेते हुए राज्य सरकार के 5 सितंबर, 2012 के आदेश को रद्द कर दिया था। कोर्ट का मानना था कि संविधान का अनुच्छेद 16(4-क), आरक्षण के समर्थन में सक्षमकारी प्रावधान है। हाई कोर्ट के फैसले के विरोध में उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। वहां उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया गया।  

इसी तरह का एक निर्णय छत्तीसगढ़ से भी जुड़ा है। बीते वर्ष सितंबर, 2019 में छत्तीसगढ़ सरकार ने “छत्तीसगढ़ लोक सेवा (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण) (संशोधन) अध्यादेश, 2019 के जरिये अन्य पिछड़े वर्गों को 27 फ़ीसदी आरक्षण देने की घोषणा की थी। प्रदेश में उनकी जनसंख्या, कुल आबादी का 45 फ़ीसदी है। इस दृष्टि से 27 फीसदी आरक्षण देना, न्यायसंगत माना जाएगा। मगर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 4 अक्टूबर 2019 को राज्य सरकार के अध्यादेश पर स्टे लगा दिया था। अगली सुनवाई, फरवरी 2020 में कोर्ट ने सरकार के फैसले को यह कहकर निरस्त कर दिया कि राज्य सरकार अध्यादेश को निर्धारित अवधि के भीतर विधानसभा से पारित कराने में नाकाम रही है, जबकि स्टे अवधि के दौरान सरकार या विधानसभा उसपर आगे विचार कर ही नहीं सकती थी।

मौलिक अधिकारों में ‘आरक्षण’ 

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का विवरण तीसरे अध्याय में किया गया है। इसमें नागरिक गरिमा को सुरक्षित करने वाले कुल 25 अनुच्छेद हैं। उनमें समानता (14), अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य (19), कानूनी संरक्षण (20), शिक्षा (21क) आदि अधिकारों की विवेचना की गई है। लोक नियोजन के समय अवसरों की समानता का अधिकार (अनुच्छेद 16) भी इसी का हिस्सा है। अनुच्छेद 16(1) में प्रावधान है कि राज्य के अधीन किसी पद पर नियोजन के संबंध में सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त होंगे। इसका अगला उपबंध (16-4) राज्यों को उन पिछड़े वर्गों के कल्याण हेतु, जिनका लोक-सेवाओं में कम प्रतिनिधित्व है – आरक्षण के लिए आवश्यक कानून बनाने की आजादी प्रदान करता है। यह कल्याण राज्य की उस भावना के अनुरूप है, जिसकी झलक हमें संविधान की प्रस्तावना में मिल जाती है। उसमें “समस्त नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक न्याय … और अवसरों की समानता” प्रदान करने का संकल्प लिया गया है।

आइए इसके वैचारिक पक्ष पर गौर करें। “राजनीतिक न्याय” अथवा “न्याय की राजनीतिक अवधारणा” को समझने के लिए हम जॉन रॉल्स की मदद ले सकते हैं। उसके अनुसार किसी भी समाज की वास्तविक उदारता का स्तर, उसके राजदर्शन में अंतर्निहित न्याय की राजनीतिक अवधारणा से समझा जा सकता है। जो समाज नवीनतम मूल्यों को आत्मसात करने के लिए जितना ज्यादा उत्सुक होगा, वह न्याय के उतना ही करीब होगा। रॉल्स के अनुसार किसी समाज की न्याय की राजनीतिक अवधारणा का स्तर, उसकी सार्वजनिक राजनीति में निहित मौलिक विचारों की व्याख्या द्वारा आंका जा सकता है। हम गर्व कर सकते हैं कि समाजार्थिक एवं राजनीतिक नैतिकता के पर्याय इन मौलिक विचारों; यथा व्यक्ति-स्वातंत्र्य, न्याय, समानता, धर्म, संस्कृति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आदि को भारतीय संविधान में यत्न-पूर्वक सहेजा गया है। इस संबंध में जस्टिस जे. कृष्ण अय्यर के अनुसार –  “भारतीय संविधान एक महान सामाजिक दस्तावेज है। मध्ययुगीन, पदानुक्रमित समाज को एक आधुनिक, समतावादी लोकतंत्र में बदलने के अपने उद्देश्य में लगभग क्रांतिकारी। इसके प्रावधानों को पारंपरिक और रूढ़िवादी कानूनों के माध्यम से नहीं, केवल विश्वसनीय, सामाजिक-विज्ञान के दृष्टिकोण द्वारा ही समझा जा सकता है।’4  

सामाजिक न्याय, समानता, सम्मान के साथ जीवन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकार, धार्मिकि अधिकार, व्यक्ति स्वातंत्र्य  आदि ऐसे स्वयंसिद्ध मूल्य हैं, जिन्हें भारतीय संविधान में अनुच्छेद 14, 16, 19 और 21 में मौलिक अधिकारों के रूप में सहेजा गया है। सामाजिक न्याय और समानता का संबंध रोज़गार से भी है। संविधान में इसे अनुच्छेद 16 के अंतर्गत मौलिक अधिकार के रूप में जगह दी गई है। नागरिक गरिमा की दृष्टि से ये सभी अनिवार्य तथा एक-दूसरे के पूरक हैं। अनुच्छेद 14, 15 और 16(1) और 16(2) के जरिए भारतीय संविधान, मौलिक अधिकारों के रूप में राज्य के जिस आदर्श को निरूपित करता है जैसे 16(4) तथा 16(4 क), उसकी पूर्ति हेतु आवश्यक दिशा-निर्देशक सिद्धांत हैं। इन्हें एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इनके बीच वही संबंध है जो विज्ञान तथा इंजीनियरिंग के बीच होता है। विज्ञान नए सिद्धांतों की खोज करता है, इंजीनियरिंग उनके आधार पर उपयोगी “तकनीक” विकसित करती है, ताकि विज्ञान के लाभ जरूरतमंदों तक पहुंच सकें। 

यह ठीक है कि अनुच्छेद 16(4) तथा 16(4 क) को राज्यों के विवेक पर छोड़ दिया गया है, परंतु इसके पीछे संविधान निर्माताओं या संसद का उद्देश्य इनके प्रभावों को हल्का करना न होकर, लोकतंत्र और राज्य को गरिमामयी पहचान देना था। इसके पीछे यह विश्वास भी अंतर्निहित है कि राज्य जरूरतमंद नागरिकों की न केवल आसानी से पहचान कर सकता है, अपितु उनके कल्याण हेतु बेहतर योजनाएं भी ला सकता है।

आरक्षण का सिद्धांत समानता के आदर्श का समपूरक है। यह उन लोगों को मुख्यधारा में लाने की अपरिहार्य व्यवस्था है, जिन्हें जाति, धर्म अथवा किसी अन्य कारण से, हाशिए से बाहर धकेल दिया गया था; और जिन्होंने भारतीय गणराज्य का सदस्य बनना समानता, स्वतंत्रता और न्याय के भरोसे के साथ स्वीकार किया था। 2020 में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी, “आरक्षण किसी का मौलिक अधिकार नहीं है” – आने से पहले भी यह मुद्दा, दर्जनों बार माननीय अदालतों में जा चुका था। वरिष्ठ न्यायाधीशों की कई पीठें इसपर, अलग-अलग दृष्टिकोण से विचार कर चुकी थीं। मगर जूरी के कुछ सदस्यों के मतभेदों को अपवाद-स्वरूप छोड़ दिया जाए तो, लगभग सभी अदालतों ने आरक्षण के औचित्य को स्वीकार किया था। कभी, किसी ने भी उसकी मौलिकता को चुनौती नहीं दी। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य, टी. देवादसन बनाम भारत सरकार तथा अन्य, केरल राज्य बनाम एन.एम. थॉमस; तथा एम. नागराज बनाम भारत सरकार आदि कुछ चर्चित मामले हैं जिनमें आरक्षण के औचित्य अथवा उसके स्वरूप पर अदालतों ने विस्तार से चर्चा की है।

सामाजिक न्याय के लिए जरूरी है आरक्षण

समानता और स्वतंत्रता भारतीय संविधान की आत्मा है। ऐसे समाज में जहां समाजार्थिक एवं राजनीतिक विभाजन बहुत ज्यादा हो, राज्य का कर्तव्य है कि वह विभेदों तथा उनके कारकों के समाहार हेतु निरंतर प्रयत्नरत रहे। संविधान निर्माताओं ने यदि अस्पृश्यता का कलंक झेल चुकी कुछ जातियों को संविधान में अनुसूचित के नाम से रेखांकित किया है, तो कुछ को पिछड़ी जाति माना है, तो इसके पीछे भी उनकी भारतीय समाज की गहरी समझ थी। उनका उद्देश्य राज्यों के लिए आवश्यक मार्गदर्शिका तैयार करना था, जो भारत को आदर्श गणतंत्र में ढलने में मदद कर सके। उनका यह अभिप्राय भी था कि इससे समता के आदर्श को प्राप्त करने के लिए देश-भर की कार्यकारी संस्थाएं, एकजुट होकर काम कर सकेंगी। केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में न्यायमूर्ति एस. एम. शेलत तथा के. एस. ग्रोवर ने लिखा है कि संविधान में – 

“जबकि बहु-अभिलाषित स्वतंत्रता और अधिकारों की गारंटी दी जा चुकी है, सरकारों का भी यह पुनीत कर्तव्य है कि वे निर्देशक सिद्धांतों को प्रभावशील बनाने के लिए काम करें” (पेराग्राफ 564)। 

इसी तरह “एन.एम. थॉमस” प्रकरण में जस्टिस मैथ्यू ने अपने निर्णय में बर्नाड विलियम का उद्धरण दिया है – 

“मान लीजिए, एक ऐसा समाज है जिसमें योद्धा वर्ग को बहुत ही प्रतिष्ठा प्राप्त है। योद्धा बनने के लिए शरीर को खूब शक्तिशाली होना चाहिए। अतीत में योद्धाओं की नियुक्ति चुनींदा धनवान परिवारों से हुआ करती थी। बाद में उदारवादी सुधारक इस नियम में सुधार कराने में कामयाब हो गए। नए नियम के अनुसार योद्धाओं की नियुक्ति समाज के सभी वर्गों से, प्रतिस्पर्धी परीक्षा के माध्यम से की जाने लगी। बावजूद इसके स्थिति ज्यों की त्यों रही। समस्त योद्धा धनाढ्य परिवारों से ही आते रहे। इसका विरोध करते हुए सुधारवादियों ने कहा कि ‘अवसरों की समानता’ के सिद्धांत का पालन ईमानदारी से नहीं हो रहा है।’’

इसपर धनाढ्य वर्ग की प्रतिक्रिया थी – “क्या सचमुच ऐसा है! नए नियमों में तो गरीबों को योद्धा बनने के पूरे-पूरे अवसर प्राप्त हैं। यह विडंबना ही है कि अपनी शारीरिक अक्षमता के कारण वे स्पर्धाओं में पिछड़ जाते हैं।” 

इस उदाहरण से साफ है कि कानून हों और सरकार की युक्तियुक्त ढंग से लागू करने की इच्छाशक्ति न हो तो अच्छे से अच्छा कानून वृथा सिद्ध हो सकता है। भारत में आरक्षण से साथ भी यही होता आया है। अधिकांश सरकारों के लिए आरक्षण उनकी लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा रहा है। वर्तमान सरकार, अलग-अलग मंचों से संविधान और आरक्षण की समीक्षा की मांग उठाकर जहां सवर्णों को साधती है, वहीं आरक्षण का जब-तब समर्थन करके, उसके नेता बहुजनों के तुष्टिकरण की राजनीति का खेल खेलते रहते हैं। इस बार “आरक्षण मूल अधिकार नहीं है” कहकर देश की शिखर अदालत ने भी वर्तमान सरकार की लोकप्रिय राजनीति का हिस्सा बनने  की कोशिश की है। न्यायालय ने उन तथ्यों की कदाचित जानबूझकर उपेक्षा की है, जिनपर पूर्ववर्ती अदालतें गंभीरतापूर्वक विचार कर चुकी हैं। 

जबकि संविधान के चौथे खंड (राज्य के नीति निदेशक तत्व), अनुच्छेद 46 में व्यवस्था है कि  “राज्य, जनता के दुर्बल वर्गों के, विशिष्टतया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शिक्षा एवं अर्थ-संबंधी हितों की विशेष सावधानी के साथ अभिवृद्धि करेगा; तथा सामाजिक अन्याय एवं सभी प्रकार के शोषण से उनकी संरक्षित करेगा।” पुन: केशवानंद भारती (पेराग्राफ 759) मामले में लिखा है कि “हमारे संविधान निर्माता मानते थे कि मौलिक अधिकारों तथा राज्य के नीति निदेशक तत्वों में कोई विपर्यय नहीं हैं।” वे असल में एक-दूसरे के पूरक और सहायक हैं। एक अन्य मामले, “केरल सरकार बनाम एन.एम. थॉमस” में मुख्य न्यायाधीश ए. एन. रे ने संविधान के अनुच्छेद 16(1) में आए पद “अवसरों की समानता” की विस्तृत व्याख्या की है – 

“अवसर की इस समानता को पूर्ण समानता के साथ भ्रमित करने की आवश्यकता नहीं है। अनुच्छेद 16(1) किसी भी कार्यालय में, किसी भी रोजगार या नियुक्ति के चयन के लिए निर्धारित न्यायसंगत नियमों की व्यवस्था का निषेध नहीं करता है” (पृष्ठ 27)। आगे वे स्थिति को और भी स्पष्ट कर देते हैं, “अनुच्छेद 16(1) में नियुक्ति के समय अवसर की समानता का अर्थ है, एक ही वर्ग के कर्मचारियों के बीच समानता, न कि भिन्न, स्वतंत्र वर्ग के सदस्यों के बीच समानता।” 

अगले पेराग्राफ में उन्होंने इसकी गहन विवेचना की है – 

“विभेदीकरण का नियम, विभिन्न परिस्थितियों में भिन्न व्यक्तियों या वस्तुओं के बीच अंतर करने वाले कानूनों के बीच अधिनियमित होता है। किसी एक व्यक्ति समूह अथवा वस्तुओं के समुच्चय को नियंत्रित करने वाली परिस्थितियां, आवश्यक नहीं है कि वे व्यक्तियों अथवा वस्तुओं के दूसरे समुच्चय को भी उसी तरह नियंत्रित करने वाली हों। इसलिए असमान व्यवहार का प्रश्न, भिन्न शर्तों एवं भिन्न परिस्थितियों के समुच्चयों द्वारा शासित व्यक्तियों के बीच वास्तव में उत्पन्न ही नहीं होता” (पृष्ठ 28)। 

न्यायमूर्ति ए. एन. रे के ही शब्दों में, “उन वर्गों जिनकी प्रशासन के स्तर पर कम उपस्थिति है, को न्यूनतम प्रशासनिक दक्षता की शर्त पर, सेवाओं में प्रतिनिधित्व देने से अनुच्छेद 14 तथा 16(1) द्वारा समर्थित समता के नियम का उल्लंघन न होगा” (पृष्ठ 28)।

 

सामाजिक न्याय : अपरिहार्य 

कल्पना कीजिए, एक बड़ा ग्लोब है। उसके ऊपर टार्च से रोशनी डाली जाती है। इस तरह कि ग्लोब का 20 फ़ीसदी हिस्सा रोशनी से नहा उठता है। शेष 80 फ़ीसदी अंधेरे में डूबा रहता है। यदि हम टार्च को वर्ण-व्यवस्था मान लें तो 20 फ़ीसदी रोशनी में नहाया हुआ हिस्सा ब्राह्मण सहित दूसरे सवर्णों के हिस्से आएगा। बाकी 80 फ़ीसदी  हिस्से में शूद्र और अतिशूद्र, जिन्हें आज अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग कहा जाता है, अंधेरे में डूबे हुए होगे। हजारों वर्षों से भारतीय समाज इसी तरह रोशनी और अंधेरे के बीच बंटता आया है। इस बीच देश में अनेक परिवर्तन हुए, सत्ताएं बदलीं, लेकिन अंधेरे में डूबे शूद्रों, अतिशूद्रों और पिछड़ों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ। 

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे बनी वर्तमान केंद्र सरकार को लगता है कि बहुजनों का बिखरा हुआ नेतृत्व उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बीते दो चुनावों में उसकी सफलता यही दिखाती है। उल्टे आरक्षण के कारण होने वाली आलोचनाओं से पार्टी का सवर्ण वोट एकजुट होने लगता है। यही कारण है कि ऐसे युवा जिन्हें आरक्षण के नाम से नफरत है और लगता है कि आरक्षण से उनके अवसर छीने जा रहे हैं – वर्तमान सरकार के अंधसमर्थक बने हुए हैं। ऐसे में अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों को प्राप्त करने का एकमात्र रास्ता यही है कि बहुजन शक्तियां एकजुट हों। इस संबंध में नेताओं से ज्यादा उम्मीद करना बेमानी होगा। आरक्षित सीटों से चुनकर संसद और विधायिकाओं में पहुंचे दलित प्रतिनिधि दलीय राजनीति का शिकार होते आए हैं। ऐसे में एकमात्र उपाय यही है कि दलित, पिछड़े और आदिवासी संगठित होकर, संविधान और सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत काम कर रहे आरक्षण विरोधियों के विरुद्ध संघर्ष का ऐलान करें। उन सभी नेताओं की सार्वजनिक आलोचना करें, जो दलितों और पिछड़ों के वोट पाकर भी उनके हितों के लिए कुछ नहीं कर पाते। जिस दिन बहुजनों में यह चेतना जागेगी, उसके हितों के साथ खिलवाड़ करने से पहले नेता हजार बार सोचेंगे। 

अधिकार भीख में नहीं मिलते

चलते-चलते किंचित संकोच के साथ उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह को उद्धृत करना चाहूंगा। उन्होंने हमेशा भाजपा के हितों की राजनीति की है। मगर दो वर्ष पहले आरक्षण को लेकर उन्होंने बड़ी कारगर टिप्पणी की थी। “वंचित महासंघ” द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की स्मृति में आयोजित “पिछड़ा वर्ग सम्मेलन” में बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए, 26 जून 2018 को उन्होंने कहा था –  

“अधिकार कभी भी भीख मांगने से नहीं मिलते। उनके लिए ‘थप्पड़ मारो और छीनो’ जैसा संघर्ष करना पड़ता है….आरक्षित वर्ग की इस देश में इतनी ज्यादा ताकत है कि शायद ही कोई मूर्ख होगा जो इतनी बड़ी गलती करेगा। इसलिए बेफिक्र रहिए। आरक्षण के प्रावधान को कोई छू भी नहीं पाएगा….फिर भी कभी ऐसा पल आए तो हो सकता है मैं जिंदा न होऊं, लेकिन आप सब मुट्ठी बांधकर उसके खिलाफ खड़े हो जाना। क्योंकि वह आरक्षित वर्ग के जीवन-मरण का सवाल होगा।”

संदर्भ 

  1. फर्स्ट पोस्ट, 11 जून, 2020 https://www.firstpost.com/india/reservation-not-fundamental-right-sc-refuses-to-hear-pleas-by-tn-parties-demanding-50-quota-for-obcs-in-medical-colleges-8473581.html
  2. इंडियन एक्सप्रेस, 12 जून, 2020 https://indianexpress.com/article/india/supreme-court-says-quota-not-fundamental-right-rejects-plea-6454699/
  3. सिविल अपील 1226 ऑफ़ 2020, एसएलपी (सिविल) नंबर 23701 ऑफ़ 2019, दिनांक 7 फरवरी, 2020
  4. स्टेट ऑफ़ केरल तथा अन्य बनाम एन.एम्. थॉमस तथा अन्य, दिनांक 19 सितंबर, 1975, पृष्ठ -10

(संपादन : गोल्डी/नवल)


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