क्या कोई सुनेगा बिहार के पसमांदा समाज की यह व्यथा गाथा?

दलित, पिछड़े और आदिवासी मुस्लिम समूह में आने वाले जुलाहे, धुनिया, कुंजड़े, इदरीसी, कसाई, अलवी, हज्जाम और हलालखोर आदि के सवाल न तो लालू प्रसाद के लिए महत्वपूर्ण हैं और ना ही नीतीश कुमार के लिए। बिहार में आसन्न विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सवाल उठा रहे हैं गुलजार हुसैन

बिहार विधानसभा चुनाव के नजदीक आते ही राजनीतिक पार्टियों ने जातीय समीकरण को टटोलना शुरू कर दिया है। ऐसे में बिहार को सजाने-संवारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते चले आ रहे पसमांदा मुस्लिमों को अपनी ओर लाने के लिए पार्टियों ने कमर कस ली है। इस बार की करवट लेती राजनीति में भी पसमांदा वोट अति महत्वपूर्ण माना जा रहा है लेकिन भाजपा-संघ के एजेंडे को देखते हुए सेक्युलर पार्टियों में भी एक तरह की असहजता नजर आ रही है।

सबकी निगाहें पसमांदा वोटरों पर

जमीनी हकीकत यह है कि मुख्य विपक्षी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) सहित अन्य पार्टियां पसमांदा के साथ-साथ  गैर-पसमांदा मुसलमानों के वोट भी चाहतीं हैं और ऐसे में पसमांदा गोलबंदी को नुकसान पहुंच सकता है। यह स्पष्ट है कि बिहार में भाजपा इस बार जदयू नेता और नीतीश कुमार का साथ लेकर नीतीश से भी आगे निकल जाने के फिराक में है इसलिए वह फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। भाजपा को ऐसा लग रहा है कि यदि उसने खुलकर अपने साम्प्रदायिक एजेंडे को आगे लाना शुरू किया तो नीतीश कुमार बिफर सकते हैं। वहीं नीतीश पिछड़ों और दलितों के साथ ही पसमांदा मुसलमानों को भी लेकर चलने के लिए बेचैन हैं ऐसे में भाजपा कोई रिस्क नहीं ले सकती।

वहीं दूसरी तरफ राजद नेता तेजस्वी यादव अपने पुराने और सफल ‘एमवाय’ (मुस्लिम-यादव) समीकरण को हरगिज नहीं छोड़ सकते। यहां यह उल्लेखनीय है कि तेजस्वी केवल पसमांदा पर ही नहीं बल्कि गैर-पसमांदा पर भी नजरें गड़ाए हुए हैं, ऐसे में पसमांदा मुस्लिमों के वोट पाना उनके लिए आसान नहीं है।

बिहार में 16 फीसदी आबादी मुसलमानों की है, जिनमें बड़ी संख्या में पसमांदा मुस्लिम हैं लेकिन सेक्युलर नेताओं को यह खुशफहमी रहती है कि मुस्लिम वोटर उनके पास नहीं आएंगे तो जाएंगे कहां। उनका यह मानना एक हद तक सही भी है क्योंकि भाजपा की साम्प्रदायिक नीतियां जितनी बढ़ेंगी, मुस्लिम वोटर उतने ही गोलबंद होकर सेक्युलर पार्टियों को वोट देंगे। लेकिन ऐसी स्थिति में गरीब पसमांदा मुस्लिमों की अपनी राजनीतिक-सामाजिक हैसियत मजबूत नहीं बन पाएगी क्योंकि ताकतवर मुस्लिम जातियां अपने विकास में लग जाएंगी और पसमांदा की स्थिति जस की तस रह जाएगी।

मोहरों के बूते होती रही है पसमांदा को साधने की कोशिश

पिछले एक-डेढ़ दशक में पसमांदा मुसलमानों को लेकर जो सामाजिक न्याय की बात की गई है उसका श्रेय निस्संदेह राजद सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव को जाता है। कहना गैर मुनासिब नहीं कि चाहे रहीम, गुलाम सरवर हों या डॉ. एजाज अली, इन सभी ने पसमांदाओं को नया स्वर दिया, लेकिन इनसे जो अपेक्षाएं थीं, वे पूरी नहीं हुईं। ये लालू के दौर के चमकते चेहरे जरूर बने, लेकिन इससे पसमांदा जनता का भला नहीं हुआ। हालांकि डॉ. एजाज अली सहित कुछ नेता बाद में लालू यादव से दूर होकर नीतीश के खेमे में गए लेकिन नीतीश की मोदी-समर्थित राजनीति से इन नेताओं का नीतीश से मोहभंग कर दिया। इनमें एक अली अनवर भी हैं जिन्हें नीतीश कुमार ने पसमांदा चेहरा बनाया था। दूसरी तरफ भाजपा ने अशरफ समुदाय के सैयद शाहनवाज हुसैन को आगे जरूर किया था लेकिन पसमांदा जनता ने उन्हें कबूल नहीं किया। अशराफों के बीच भी उन्हें स्वीकृति नहीं मिली।

अब्दुल कयूम अंसारी की स्मृति में भारत सरकार द्वारा जारी डाक टिकट

भाजपा ने इस चुनाव में मंदिर निर्माण की राजनीति के बहाने बिहार चुनाव को धर्म-केंद्रित बनाने का एक दांव जरूर खेला है लेकिन कोरोना संकट से त्रस्त बिहार के लोग जदयू और भाजपा को माफ करने के मूड में नहीं हैं। ऐसे में राजद के पास मौका जरूर है लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। तेजस्वी यादव मुस्लिमों के साथ अच्छे ढंग से जुड़ाव तो कर पा रहे हैं लेकिन अपने पिता लालू यादव की तरह वे पसमांदा नौजवानों को आकर्षित नहीं कर पा रहे हैं। दूसरी तरफ, नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ होते हुए भी पसमांदा वोटरों को खुश करने का अपना पुराना फार्मूला जिंदा रखा है। कोरोना संकट को लेकर नीतीश कुमार की फजीहत से भले मुस्लिमों और अन्य पिछड़ी-दलित जातियों में एकजुटता आ सकती है और वे नीतीश से दूर ही रह सकते हैं लेकिन इससे पसमांदा मुसलमानों की गोलबंदी होती स्पष्ट तौर पर नहीं दिखाई देती है।

मुसलमानों में 70 फीसदी पसमांदा, लेकिन वर्चस्व अशराफों का

सन 1931 में हुए जातिगत जनगणना के मुताबिक बिहार में ओबीसी समुदाय की अनुमानित आबादी 51 फीसदी है। इनमें से 14. 4 फीसदी यादव समुदाय मजबूत वोटर है। वहीं कोइरी 6.4 फीसदी और कुर्मी करीब 4.5 फीसदी हैं। वहीं दलित 16 फीसदी हैं। सवर्णों की आबादी 17 फीसदी है, जिनमें ब्राह्मण 5.7 फीसदी हैं, तो भूमिहार 4.7 फीसदी है। इनके अलावा यहां मुस्लिम समुदाय की आबादी 16.9 फीसदी है, जो किसी भी पार्टी को जिताने में बड़ी भूमिका अदा करती रही है। अब इस मुस्लिम आबादी में करीब 70 फीसदी आबादी पसमांदा है, जो मेहनतकश भी हैं। इन पसमांदा मुस्लिमों की सामाजिक न्याय के मुद्दे पर बिहार में गोलबंदी की जाती रही है। इनका एकमुश्त वोट पहले लालू यादव को जाता रहा है, और वे सियासी कामयाबी के शिखर पर पहुंचते रहे हैं। इसके बाद नीतीश कुमार की सफलता में भी पसमांदा समुदाय की बड़ी भूमिका रही है।

अब सवाल यह है कि इतनी बड़ी आबादी होते हुए भी राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर पसमांदा का विकास क्यों नहीं हुआ और उनकी राजनीतिक नुमाइंदगी भी ठीकठाक क्यों नहीं हो सकी? दलित, पिछड़े और आदिवासी मुस्लिम समूह में आने वाले जुलाहे (अंसारी), धुनिया (मंसूरी), कुंजड़े (राईन), दर्जी (इदरीसी), कसाई (कुरैशी), फकीर (अलवी), हज्जाम (सलमानी), मेहतर (हलालखोर), ग्वाला (घोसी), धोबी (हवारी), लोहार-बढ़ई (सैफ़ी), मनिहार (सिद्दीकी) सब मजबूत वोटर होते हुए भी अपनी भागीदारी क्यों नहीं बना पा रहे हैं, यह तो चिंता का विषय है ही। दरअसल वोट तो इनका ले लिया जाता है लेकिन सारी मलाई अगड़े मुस्लिम चाट जाते हैं। राजनीतिक नुमाइंदगी में भी अगड़े ही आगे हो जाते हैं और पसमांदा हाशिए पर कर दिए जाते हैं।

मूक नहीं रही है पसमांदा आवाज

ऐसा नहीं है कि बिहार में पसमांदा आंदोलन को गति नहीं मिली है। गौरतलब है कि 1990 के आसपास बिहार में डॉ. एजाज़ अली ने ‘ऑल इंडिया बैकवर्ड मुस्लिम मोर्चा’ और अली अनवर ने ‘ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज’ के सहारे गरीब मुस्लिमों के अधिकारों के लिए जोरदार आवाज उठाई थी। इन आंदोलनों के पीछे बाबासाहेब आंबेडकर, पेरियार और लोहिया की विचारधारा का संबल था लेकिन इसके बावजूद बिहार में ये आंदोलन फीके पड़ गए। अली अनवर ने ‘मसावात की जंग’ लिखकर मुस्लिम समाज में फैले जातिवाद को गहराई से महसूस कराया फिर भी बिहार के पसमांदा में अपने हक के लिए आवाज़ उठाने का वैसा जज्बा नहीं पैदा हो सका जैसा महाराष्ट्र के दलितों में हुआ।

सवाल यह भी है कि क्या बिहार के गिने-चुने पसमांदा नेता लापरवाह बने रहे या पसमांदा जनता ने नेताओं पर अपनी पकड़ ढीली कर दी? दरअसल, नेताओं को तो अपने उद्देश्य में ढील बरतते देखा ही गया लेकिन जनता भी जागरूक नहीं हो पाई। एक सच्चाई यह भी है कि पिछड़े-दलित मुस्लिमों को कभी राजनीतिक-सामाजिक दृष्टिकोण से उभरने ही नहीं दिया गया। गिने-चुने पसमांदा प्रतिनिधि भी ज़ोरदार ढंग से वंचित पसमांदा से जुड़े मुद्दे को उठा नहीं पाए।

कयूम अंसारी की विरासत और मौजूदा सियासी पेंच

पसमांदा आंदोलन के सबसे बड़े नेता कय्यूम अंसारी माने जाते हैं। वे 1940 में बिहार के राजनीतिक परिदृश्य पर छा गए थे। अंसारी की मौत के बहुत बाद पसमांदा आंदोलन का दूसरा गतिशील दौर शुरू हुआ था जिनमें डॉ. एज़ाज अली और अली अनवर जैसे मंजे हुए नेता चमके। ऐसे में सवाल उठता है कि इतने सलीके से शुरू हुए आंदोलन को इस बार के चुनाव का बड़ा हथियार क्यों नहीं माना जा रहा है? आखिर क्यों कय्यूम अंसारी के योगदान को लगभग भुला दिया गया है? पिछले लोकसभा चुनाव में जिस तरह वंचित जातियों के न्याय की राजनीति नहीं चल पाई, उसके पीछे भी नेताओं का ठंडापन ही माना जा रहा है।

रमजान के दौरान इफ्तार पार्टी के मौके पर वर्ष 2015 में गले मिलते लालू व नीतीश

सवाल यही है कि क्या मोदी के राजनैतिक परिदृश्य पर उभरने ने पसमांदा राजनीति की धार भोथरी कर दी है? इसे पूरी तरह सही तो नहीं माना जा सकता, लेकिन इतना तो सच है कि भाजपा की लगातार चल रही कम्युनल नीति ने जिस तरह धार्मिक ध्रुवीकरण को तेज किया है उससे बिहार भी अछूता नहीं है। इस साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण जातियों में बंटे मुस्लिमों को एक ही तराजू में रख दिया है। सांप्रदायिक राजनीति से जो एक डर फैला है, उससे अपनों में कैद मुस्लिमों में एक डर फैला और वंचित जातियों के सवाल हाशिए पर चले गए। संघ-भाजपा की यह नीति रही है कि जातीय पिच पर उनका सियासी खेल न चले और मामला सीधे धर्म की पिच पर आ जाए। इसलिए वे मुस्लिमों को एक ही धार्मिक फोकस में रखते हैं ताकि इसकी प्रतिध्वनि में हिंदू धर्म की वंचित जातियों के सवालों को भी भुलाकर केवल धर्म की राजनीति जारी रहे। हालांकि भाजपा को भी इसका एहसास है कि बिहार में वंचित जातियों की आवाज को एकदम से अनसुना नहीं किया जा सकता है, जिससे वंचित जातियों का स्वर अचानक एकजुट होकर उभर सकता है और धर्म की राजनीति की बैंड बजा सकता है, इसलिए उसने नीतीश को अपने आगे कर रखा है।

(संपादन : नवल/अमरीश)


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