पांचवीं अनुसूची के अनुपालन से सुधरेगी आदिवासी क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था

मध्य प्रदेश सरकार राज्य के आदिवासी बहुल एवं पिछड़े क्षेत्रों के 20 हजार से अधिक स्कूलों एवं कॉलेजों को बंद करने की तैयारी कर रही है। इसके विरोध में बीते 4 फरवरी को एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें सभी वक्ताओं ने कहा कि जब तक पांचवीं अनुसूची का अनुपालन नहीं होगा, आदिवासी बहुल इलाकों की हालत में सुधार नहीं होगा।

“जब मैं केंद्रीय मंत्री था, तब देशभर के आदिवासी विकासखंडों में एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय की स्थापना कराई थी, ताकि प्रतिभाशाली आदिवासी छात्र-छात्राओं को बेहतर शिक्षा प्राप्त हो सके। लेकिन मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आदिवासी क्षेत्रों के स्कूलों को बंद किया जा रहा है। ऐसा करना आदिवासी समाज को पीछे धकेलने जैसा है।” ये बातें पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं झाबुआ विधायक कांतिलाल भूरिया ने बीते 4 फरवरी, 2021 को भोपाल के गांधी भवन सभागार में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कही। कार्यक्रम का विषय “आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता पर जनसंवाद” था और इसका आयोजन स्थानीय बुद्धिजीवियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) संगठन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

अपने संबोधन में कांतिलाल भूरिया ने कहा कि आदिवासी समाज के लोगों में चेतना बढ़ी है और वह समझने लगे हैं कि कैसे उनके साथ हकमारी की जा रही है। आदिवासी स्कूलों को बंद करने के पीछे मध्य प्रदेश सरकार की जो मंशा है, उसे लोग समझ गए हैं तथा सरकार के आदिवासी विरोधी फैसले को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। कार्यक्रम में शामिल हुए सभी बुद्धिजीवियों ने एक स्वर में कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किए जाने की आवश्यकता है और इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास नाकाफी हैं। 

दरअसल, यह कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मध्य प्रदेश सरकार राज्य के आदिवासी बहुल एवं पिछड़े क्षेत्रों के 20 हजार से अधिक स्कूलों एवं कॉलेजों को बंद करने की तैयारी कर रही है। चूंकि यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से, विशेष रूप से आदिवासी समुदायों को पिछले सात दशकों में कार्यान्वित विकास परियोजनाओं का पूरा लाभ नहीं मिला है, बल्कि इस अवधि के दौरान कार्यान्वित विकास परियोजनाओं का उन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। ऐसे में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 20 हजार से अधिक स्कूलों और कॉलेजों को बंद करने के फैसले को प्रदेश के अनेक जनप्रतिनिधि, शिक्षाविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता आदिवासी समाज पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला बता रहे हैं। 

बीते दिनों मध्य प्रदेश सरकार को अनेक जनप्रतिनिधियों एवं शिक्षाविदों ने पत्र लिखकर उक्त फैसले को वापस लेने का अनुरोध किया था। साथ ही, अनेक आदिवासी संगठनों ने प्रदर्शन एवं आंदोलन के माध्यम से ज्ञापन देकर इस फैसले को वापस लेने की मांग की थी। 

कार्यक्रम के दौरान उपस्थित बुद्धिजीवी व सामाजिक कार्यकर्तागण

ध्यातव्य है कि अगस्त 2020 में राज्य शिक्षा केंद्र ने एक आदेश जारी कर जिलों के अधिकारियों से कहा था कि उन स्कूलों की समीक्षा की जाए जहां छात्रों की संख्या 0 से 20 है। ऐसे स्कूलों को समीप के स्कूलों में विलय कर शिक्षकों की सेवाएं कार्यालय या फिर अन्य स्कूलों में ली जाएं।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जयस के राष्ट्रीय संरक्षक एवं मनावर विधायक डॉ. हिरालाल अलावा ने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा जिला स्तर पर प्रभारी मंत्री नियुक्त नहीं किए जाने के कारण प्रदेश के 89 आदिवासी विकासखंडों में वित्त वर्ष 2020-21 का आदिवासी उपयोजना 275 (1) के तहत बस्ती विकास के लिए राशि जारी नहीं की जा सकी है, जिससे आदिवासी क्षेत्रों का विकास अवरुद्ध हो गया है। यदि बजट सत्र 2021-22 से पूर्व बस्ती विकास योजना की राशि जारी नहीं की गई तो यह राशि लैप्स हो जाएगी, जिससे प्रदेश के 89 ट्राईबल ब्लाॅकों के अंतर्गत निवास करने वाली आबादी शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई इत्यादि मूलभूत बुनियादी सुविधाओं से वंचित हो जाएंगे। 

डॉ. अलावा ने आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारने हेतु सुझाव भी दिए। उन्होंने कहा कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में शिक्षकों की भारी कमी है। शिक्षकों के रिक्त पदों पर भर्ती हेतु विशेष अभियान चलाने की आवश्यकता है। साथ ही, उन्होंने सभी छात्रावासों में गणित, विज्ञान, अंग्रेज़ी की कोचिंग की विशेष व्यवस्था करने, सभी हाई स्कूल एवं हायर सेकेन्ड्री स्कूलों में उच्च गुणवत्ता वाली लैब एवं लाइब्रेरी स्थापित करने, रोज़गारोन्मुखी शिक्षा प्रणाली विकसित करने, जिन विद्यालयों का परीक्षा परिणाम 30 प्रतिशत या उससे कम रहा है, वहां के शिक्षकों के लिए विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था करने, कक्षा 12 के पश्चात प्रतिभावान बच्चों के लिए ट्रैकिंग सिस्टम डेवलप करने हेतु भी नीतियां बनाए जाने की बात कही। 

दलित इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (डिक्की), मध्य प्रदेश के समन्वयक हृदयेश किरार ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में बिजनेस, तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी से संबंधित शिक्षा व्यवस्था को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि डिक्की आदिवासियों एवं दलितों को व्यवसाय के लिए ऋण दिलाने एवं बिजनेस से जोड़ने के लिए कार्य कर रहा है और आदिवासी समुदाय को वर्तमान समय के अनुसार बिजनेस से जुड़ने की जरुरत है।

आदिवासी महापंचायत गढ़ा-मंडला संरक्षक एवं निवास विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों के बारे में प्रदेश सरकार द्वारा मनमानी तरीके से फैसले लिया जाना गलत है। आदिवासियों से संबंधित किसी भी प्रकार के फैसले लेने से पूर्व राज्य सरकार को अपने प्रस्ताव आदिमजाति मंत्रणा परिषद में भेजना होता है। आदिमजाति मंत्रणा परिषद जो सुझाव देती है, उसी के अनुसार राज्यपाल की अनुमति से राज्य सरकार को आदिवासियों के बारे में फैसला लेना चाहिए। यह प्रदेश के आदिवासियों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रदेश में आदिमजाति मंत्रणा परिषद की बैठकें एक-दो वर्ष तक भी आयोजित नहीं की जातीं। 

जंगल-जमीन के मुद्दों के जानकार सामाजिक कार्यकर्ता अनिल गर्ग ने कहा कि चाहें शिक्षा, स्वास्थ्य हो या बस्ती विकास का मुद्दा, आदिवासियों के सभी मुद्दे संविधान की पांचवीं अनुसूची कानून के तहत सुलझाए जा सकते हैं। पांचवीं अनुसूची कानून मात्र दो पेज का है, लेकिन हमारे जनप्रतिनिधियों, राज्यों के राज्यपालों ने पांचवीं अनुसूची को पढ़ने की कभी भी जहमत नहीं उठाई और आदिवासियों के साथ आजादी के बाद से ही सरकारी अत्याचार करते आ रहे हैं। आज समाज को मुखर होकर पांचवीं अनुसूची को लागू करने की मांग करनी चाहिए।

आदिवासी महिलाओं के लिए काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता सारिका सिन्हा ने कहा कि आदिवासी बच्चे आरंभ से ही पढ़ने में कमजोर हो जाते हैं या पढ़ नहीं पाते हैं। इसका कारण है उनकी बोलचाल की भाषा में शिक्षा नहीं मिलना। यदि आरंभ से ही उनकी मातृ भाषा में उनको शिक्षा दी जाएगी तो उनमें पढ़ने की ललक जगेगी।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक भास्कर राव रोकड़े ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में शैक्षणिक गुणवत्ता का हर जगह अभाव है। उत्कृष्ट स्तर के शिक्षण संस्थानों की कमी है। क्रिश्चियन मिशनरी संस्थानों ने पिछड़े आदिवासी इलाकों में उत्कृष्ट स्तर के शिक्षण संस्थानों निर्माण कर लिया है, लेकिन सरकार इस कार्य में असफल रही है। इस दिशा में राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण कोई प्रयास नहीं किया गया। इस दिशा में प्रयास किए जाने की जरूरत है।

कार्यक्रम में धरमपुरी विधायक पांचीलाल मेड़ा, जोबट विधायक कलावती भूरिया, पानसेमल विधायक चंद्रभागा किराड़े, थांदला विधायक वीरसिंह भूरिया, पेटलावद विधायक वालसिंह मेड़ा, भगवानपुरा विधायक केदार डावर, म.प्र. कांग्रेस पार्टी के जनजाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अजय शाह मकड़ई, अखिल भारतीय गोंडवाना गणतंत्र पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्षा मोनिका बट्टी, म.प्र. आदिवासी महिला कांग्रेस अध्यक्ष चंद्रा सर्वट्टे, शिक्षाविद् अनवर जाफरी, सामाजिक कार्यकर्ता इरफान जाफरी, विमलेश आरबी, आरटीआई कार्यकर्ता सिद्धार्थ गुप्ता, अनुसूचित जनजाति एंपलाईज वेलफेयर एसोसिएशन भोपाल के अध्यक्ष यू.एस. सैयाम, रिटायर्ड आईएएस अधिकारी पी.एल. सोलंकी, कृष्णा कुमरे, श्यामसिंह कुमरे समेत अनेक वक्ताओं ने अपने विचार रखें। 

कार्यक्रम का संचालन जयस के राष्ट्रीय प्रवक्ता बाबूसिंह डामोर ने किया। जबकि धन्यवाद ज्ञापन मध्य प्रदेश जयस प्रदेश अध्यक्ष अंतिम मुझाल्दा ने किया। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद विधायकों एवं बुद्धिजीवियों के एक प्रतिनिधि मंडल ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव इकबालसिंह बैंस से मिलकर आदिवासी क्षेत्रों की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए मांग पत्र सौंपे।

(संपादन : नवल)


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