दलित-बहुजनों के सवाल पर क्यों नहीं जगता मुख्यधारा के पत्रकारों का जमीर?

जिस तरह कभी-कभार कुछ चुनिंदा मसलों पर रक्षित सिंह और शांताश्री सरकार जैसे पत्रकारों के इस्तीफ़े होते हैं, उस तरह दलित-आदिवासी और पिछड़ों के मसलों पर कोई पत्रकार इस्तीफ़ा क्यों नहीं देता? सवाल उठा रहे हैं सुमित चौहान

भारतीय मीडिया इस कदर अपनी साख खो चुका है कि जब कोई भी मीडिया के मनुवादी और बिकाऊ चरित्र के बारे में कुछ बोलता है तो आम लोग उस शख़्स की पीठ थपथपाने लगते हैं। ख़ासकर मीडिया घरानों के अंदर के किसी आदमी ने ही अपनी पेशेवर गंदगी को उजागर कर दिया हो तो वो रातों-रात सोशल मीडिया पर स्टार तक बन जाता है। कुछ ऐसा ही हुआ एबीपी न्यूज़ के सीनियर रिपोर्टर रक्षित सिंह के मामले में, 27 फ़रवरी को अचानक रक्षित सिंह मेरठ में हो रही किसान पंचायत के मंच पर चढ़े और उन्होंने 12 लाख की नौकरी को लात मारने का एलान कर दिया। उन्होंने मंच से कहा कि वो ऐसा अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुनकर कर रहे हैं क्योंकि चैनल उन्हें किसानों की खबर नहीं दिखाने दे रहा। वो ख़ुद किसान परिवार से आते हैं और अब ये सब नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हो चला है। 

रक्षित सिंह एबीपी न्यूज़ में मेरे सीनियर रहे हैं और मेरी पेशेवर बिरादरी से ताल्लुक़ रखते हैं, इसलिए सबसे पहले तो मैं उनकी तारीफ करुंगा कि उन्होंने एक बड़े चैनल की नौकरी छोड़ने जैसा साहसिक कदम उठाया। मौजूदा दौर में जब मीडिया घरानों में सत्ता की चाकरी में अव्वल आने के लिए सबसे निचले स्तर पर गिरने की प्रतिस्पर्धा हो रही है, उस वक़्त ऐसा फ़ैसला लेना ही अपने आप में बड़ा कदम माना जा सकता है। 

लेकिन रक्षित सिंह के इस्तीफ़े से यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या हमें सही और ग़लत के चुनाव में हमेशा ही सही का साथ नहीं देना चाहिए? क्या हमारी अंतरात्मा को उस वक़्त हमें नहीं झकझोरना चाहिए जब कोई ऐसा मसला हो, जिससे शायद हमारा कोई व्यक्तिगत ताल्लुक़ ना भी हो, लेकिन सच के लिहाज़ से वह ज़रूरी हो? क्या हमें उस वक़्त आवाज़ नहीं उठानी चाहिए जब देश के संवैधानिक मूल्यों पर हमला हो रहा हो? अगर नहीं तो क्या सेलेक्टिव मसलों पर अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को सुनना भी ग़लत नहीं है ? 

मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि जिस तरह कभी-कभार कुछ चुनिंदा मसलों पर रक्षित सिंह और शांताश्री सरकार जैसे पत्रकारों के इस्तीफ़े होते हैं, उस तरह दलित-आदिवासी और पिछड़ों के मसलों पर कोई पत्रकार इस्तीफ़ा क्यों नहीं देता? 

क्या दलित-बहुजनों के सवालों काे दबाना अभिव्यक्ति के अधिकार का हनन नहीं है?

किसानों की तरह ही मनुवादी मीडिया ने दलितों को हमेशा ख़बरों से बाहर किया है। पिछड़ों और आदिवासियों के मसलों को 100 फटाफट ख़बरों तक में जगह नहीं दी जाती। जिस तरह से मनुवादी मीडिया किसानों को देशद्रोही और ख़ालिस्तानी साबित करने का एजेंडा चला रहा है, उसी तरह दलितों-पिछड़ों, आदिवासियों के ख़िलाफ़ भी दिन-रात प्रोपेगेंडा किया जाता है। आरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर हमेशा नकारात्मक रिपोर्टिंग की जाती है। लेकिन क्या कभी किसी ने इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई? 

हाथरस गैंगरेप और मर्डर केस में ‘दैनिक जागरण’ जैसे अख़बार में इस शीर्षक से खबर प्रकाशित की जाती है– ‘युवती की माँ और भाई ने की थी हत्या’। लेकिन जागरण समूह के किसी कर्मचारी ने इसके ख़िलाफ़ इस्तीफ़े की पेशकश नहीं की। हाथरस केस को कई दिनों तक तथाकथित मीडिया ने ब्लैकआउट रखा, लेकिन तब किसी पत्रकार ने इस बारे में सोशल मीडिया तक पर कोई आपत्ति नहीं जताई। क्यों कभी कोई पत्रकार उना कांड में दलितों के साथ बर्बरता की ख़बर ना दिखाने से नाराज़ नहीं हुआ? क्यों किसी पत्रकार को तब ठेस नहीं पहुँची जब 2 अप्रैल, 2018 को एससी/एसटी एक्ट को लेकर हुए प्रदर्शन में गोली चलाने वाले बीजेपी कार्यकर्ता को ‘ज़ी न्यूज़’ दलित बताकर पेश कर रहा था? ‘ज़ी’ मीडिया समूह के किसी पत्रकार को तब क्यों कोई दिक्कत नहीं होती जब सुधीर चौधरी अपने प्रोपेगेंडा शो डीएनए में कहते हैं कि आरक्षण से नौकरी पाने वाले लोगों में आत्मविश्वास नहीं होता? 

इस कड़ी में अगर मुसलमानों पर मीडिया संस्थानों की कवरेज को जोड़ दिया जाए तो ये सवाल और भी मज़बूत हो जाता है कि आख़िर क्यों इन संस्थानों के कर्मचारी और पत्रकार अपने ही हमवतन लोगों के ख़िलाफ़ ज़हर उगले जाने के ख़िलाफ़ नहीं बोलते? क्यों किसी पत्रकार का ज़मीर तब नहीं जागा जब मनुवादी मीडिया कोरोना के लिए तब्लीगी जमात के बहाने सरकार की नाकामियों को छुपाने में लगा हुआ था? क्यों किसी प्रोड्यूसर की उंगलियां ऐसा पैकेज लिखते वक़्त नहीं कांपती, जिससे इस देश में दंगे भड़कते हैं? दलितों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ मॉब-लिंचिंग का माहौल बनता है और देशवासियों की आपसी एकता के टुकड़े-टुकड़े होते हैं? 

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मैं ख़ुद एक पत्रकार हूं और ‘एबीपी न्यूज़’, ‘ज़ी न्यूज़’, ‘इंडिया न्यूज़’ और ‘न्यूज़ नेशन’ आदि चैनलों में काम कर चुका हूं तथा पेशेवर मजबूरियां बखूबी जानता हूं। लेकिन यह समझ से परे है कि जिनकी अंतरात्मा तमाम जरूरी मसलों पर खर्राटे लेती रहती है, अचानक किसी विशेष मसले पर कैसे बांग देने लगती है? 

सवाल तो यह भी उठता है कि इन मीडिया संस्थानों में लाखों की सैलरी पाने वाले पत्रकारों-प्रोड्यूसरों को क्यों ये बात नहीं अखरती कि उनकी मेज़ के बग़ल में कोई भी दलित या आदिवासी पत्रकार नहीं बैठा है। ऑक्सफेम की रिपोर्ट कहती है कि भारतीय मीडिया संस्थानों के 121 में से 104 निर्णायक पद सिर्फ़ चुनिंदा जाति वालों के पास हैं, लेकिन इस भयंकर स्थिति ने भी कभी पत्रकारों को चिंतित नहीं किया। भारतीय न्यूज़रूम में दलित-पिछड़े और आदिवासी पत्रकार ढूंढने से भी नहीं मिलते। लेकिन इससे पत्रकार बिरादरी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। अपनी जाति के लोगों को ही नौकरी देने वाले संपादकों का जमीर तो वैसे भी दलितों-पिछड़ों-आदिवासियों और मुसलमानों के मसलों पर कभी जागने वाली नहीं है। लेकिन क्या इस पेशेवर गंदगी को दूर करना उन्हीं लोगों की ज़िम्मेदारी नहीं है जो इस पेशे के अंदर हैं? 

बाबा साहब डॉ. आंबेडकर ने भारत को एक बनता हुआ राष्ट्र कहा था, लेकिन क्या अभी तक भारत एक ऐसा राष्ट्र भी नहीं बन पाया है जो अपने देश की बहुजन आबादी के हक़ और इंसाफ़ के लिए आवाज़ उठा सके? उम्मीद है कभी ना कभी मुझे यह सुनने को ज़रूर मिलेगा कि किसी पत्रकार ने इसलिए इस्तीफ़ा दे दिया क्योंकि उसे दलितों-पिछड़ों और आदिवासियों की हक़मारी की ख़बर दिखाने से रोका जा रहा था। 

(संपादन : नवल)


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