कोरोना का कहर और आरएसएस का जनविरोधी चरित्र

आरएसएस के दूसरे नंबर के प्रमुख होसबोले के बयान के मद्देनजर देश के लोगों को उनसे यह जरुर पूछना चाहिए कि आखिर देश है क्या? देश बनता किनसे है? क्या महज जमीन, पर्वत और नदियां देश हैं? क्या नेता देश है या आला अफसर देश हैं या फिर लट्ठ हाथ में लेकर सुबह-शाम सरकारी पार्कों में उछल-कूद करने वाले लोग देश हैं? भंवर मेघवंशी का विश्लेषण

देश में सत्तासीन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के दूसरे नंबर के प्रमुख (मोहन भागवत के बाद) सह सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने कोरोना के कुप्रबंधन पर केंद्र सरकार पर सवाल करने के बजाय देश के जागरूक और चेतना संपन्न नागरिकों की जवाबदेह भूमिका पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। इससे यह साबित हो रहा है कि अब आरएसएस भी मोदी शाह की जुगल जोड़ी का एक पिछलग्गू समूह मात्र बन गया है। जो लोग यह मानते रहे हैं कि आरएसएस भाजपा का मार्गदर्शक और जन्मदाता है, उन्हें भी यह सोचने को विवश होना पड़ रहा है कि विगत सात साल के शासनकाल में आरएसएस ने भाजपा को देश हित की क्या सलाह दी या उसने सरकारी के अदूरदर्शी और आमजनों के विरोधी फैसलों का बचाव करने की शर्मनाक भूमिका ही निभाई है।

नोटबंदी जैसा निर्णय लेकर पूरे देश को कतार में खड़ा करने और सैकड़ों नागरिकों को अकाल काल कवलित कर देने का भयावह निर्णय हो अथवा देश की अर्थव्यवस्था के डगमगा जाने और जटिल जीएसटी में तमाम कम पूंजीवाले उद्यमियों को फंसा देने जैसे अदूरदर्शी फैसलों पर भी आरएसएस ने चूं तक नहीं की। आरएसएस का कैडर स्वदेशी पर बहुत गाल बजाता रहा है तथा भूमंडलीकरण के विरोध में प्रस्ताव पास करता रहा है। लेकिन रक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में भी सौ फीसदी विदेशी निवेश के निर्णयों का संघ ने विरोध नहीं किया। 

मातृभूमि के लिये कंटकाकीर्ण मार्ग चुनने की प्रार्थना गाने वाले स्वयमसेवक सत्ता का स्वाद चखने में इतने मशगुल हो गये कि उन्हें न राष्ट्र याद रहा और ना ही राष्ट्र भक्ति। एक व्यक्ति की अंधभक्ति में डूब कर सिर्फ चाटुकारिता की भाषा ही याद रह गई। देश से कोई लेना-देना ही नहीं बचा। कोविड की पहली लहर के वक़्त बिना सोचे-समझे अचानक तालाबंदी थोप दी गई, लाखों मजदूर हड़बड़ी में भूखे प्यासे चले, कोई भूख से मर गया तो किसी के उपर ट्रेन गुजर गई। देश की अर्थव्यवस्था रसातल में जा धंसी। लेकिन राष्ट्र के ठेकेदार संघ ने कुछ भी नहीं कहा। उसे इसमें कुछ भी अप्रत्याशित नहीं लगा।

आरएसएस के सह सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

अब जबकि कोरोना की दूसरी लहर, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने सुनामी की संज्ञा दी है, कहर बरपा रही है, लोग अस्पतालों में बेड और ऑक्सीजन के अभाव में सडकों पर दम तोड़ रहे हैं। लाखों लोग मौत के मुंह में समा गए हैं। जो कोरोना के कारण नहीं बल्कि किसी और बीमारी से ग्रस्त हैं, उन्हें कोई देखने वाला तक नहीं है। वहीं सरकार निर्लज्जता से अपने नागरिकों की प्राण रक्षा करने के बजाय कोरोना से मौतों के आंकड़े छुपाने में लगी है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति व अर्थशास्त्री प्रकल प्रभाकर तक लिख चुके हैं कि मोदी सरकार केवल अखबारों व न्यूज चैनलों के हेडलाइंस मैनेज करने में जुटी है।

निष्ठुर, अकर्मण्य और असंवेदनशील सरकार के गैर जिम्मेदाराना रवैये पर नागरिक बोध से भरे लोगों और समूहों ने तीखी टिप्पणियां की है। सोशल मीडिया पर धवस्त हो चुकी स्वास्थ्य सेवाओं और अस्पतालों की बदइंतजामात पर लिखा जा रहा है। ऑक्सीजन के अभाव में दम तोड़ते मरीजों की कहानियां और छिपाई जा रही संख्याएं सामने आने लगी हैं। अस्पतालों में मच रही चीख-पुकार और अंतिम संस्कार के लिये भी चौबीस घंटे की प्रतीक्षा के समाचार बाहर आने से सरकार बौखलाई हुई है। हेल्थ इमरजेंसी बता रहे ट्वीट्स को डिलीट करवाने तथा सरकार के रवैये के खिलाफ लिख रहे लोगों को सोशल मीडिया साइट्स पर बैन करवाने में सरकार जुटी हुई है। प्रधानमंत्री के अंध समर्थक और सत्तारूढ़ पार्टी की साइबर सेना के ट्रोल समूहों ने पूरी गंध मचा रखी है।

जबकि ज़िम्मेदार नागरिक हर दौर में अपनी जिम्मेदारी निभाते आए हैं। और वे सत्ता प्रतिष्ठान पर तीखे सवाल दागते रहे हैं। यह कोई पहली बार नहीं हो रहा है। सत्तारूढ़ लोगों को मुश्किल सवालों का सामना करना ही पड़ता है, लेकिन मुश्किल सवालों का पहले जवाब देने की शेखी बघारने वाले शेखचिल्लीनुमा सत्ताधीश सामान्य सहज रोजमर्रा के सवालों के भी जवाब नहीं दे पा रहे हैं। देश में धार्मिक आयोजन बदस्तूर जारी है। अयोध्या में मंदिर निर्माण के नाम पर हजारों करोड़ की राशि एकत्रित की जा चुकी है। हरिद्वार में कुंभ जारी है। पश्चिम बंगाल में चुनाव जारी है और देश में त्राहिमाम के बावजूद आरएसएस रत्नों की जोड़ी रैलियों में जुटे रहे। लेकिन स्कूल, कालेज, यूनिवर्सिटीज, कोचिंग संस्थानों पर ताला लगा दिया गया है। करोड़ों करोड़ युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था ध्वस्त की जा चुकी है। 

स्वास्थ्य सेवाओं का हाल तो इस कदर बदहाल है कि, पूरी दुनिया भारत के स्वास्थ्य आपातकाल जैसी स्थिति पर चिंता जता रही है। चहुंओर, त्राहिमाम-त्राहिमाम का आर्तनाद है। सत्ताधीश सिस्टम के फेल हो जाने का रोना रो रहे हैं। सवाल उठता है कि सत्ता से अलहदा कौन सा सिस्टम होता है, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सवाल उठा रहे हैं?

हर मोर्चे पर बुरी तरह से विफल हो चुकी सरकार पर नागरिक सवाल नहीं उठाए, इसके लिये भाजपा, आरएसएस और उनके साइबर लड़ाके सामने आ चुके हैं। आरएसएस के सह सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले का बयान इसी रणनीति का हिस्सा है, जिसमें उन्होंने कहा है कि देश विरोधी ताकतें कोरोना महामारी की स्थिति का लाभ उठाकर नकारात्मकता व अविश्वास का माहौल बना सकती हैं। लोगों को विनाशकारी ताकतों की साजिशों से सावधान रहना चाहिए।

होसबोले का बयान लोगों द्वारा उठाये जा रहे सवालों को हतोत्साहित करने वाला तो है ही, इस वक़्त प्रश्न करने वालों को देश विरोधी ताकतों में शुमार करना भी है। ऐसी विकट स्थिति में भी सकारात्मकता और इस अक्षम सरकार में विश्वास बनाये रखने का संदेश भी है। अन्यथा विनाशकारी और देश विरोधी का टैग लगाकर यह सरकार कभी भी अपने विरोधियों को जेल में ठूंस सकती है, जैसा कि वह बहुत सारे नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ कर ही चुकी है।

होसबोले के बयान के मद्देनजर देश के लोगों को उनसे यह जरुर पूछना चाहिए कि आखिर देश है क्या? देश बनता किनसे है? क्या महज जमीन, पर्वत और नदियां देश हैं? क्या नेता देश हैं या आला अफसर देश हैं या फिर लट्ठ हाथ में लेकर सुबह-शाम सरकारी पार्कों में उछल-कूद करने वाले लोग देश हैं? केवल वंदे मातरम और भारत माता की जय जोर-जोर से बोलना और बाकी तमाम कुकृत्य करते रहना देशभक्त होना है या देश की स्थिति परिस्थिति में बदलाव के लिये काम करना और सत्ता के अनुचित आचरण के विरुद्ध सवाल उठाना देश की बात नही है?

सच तो यह है कि रुढ़िवादी पोंगापंथी हिंदूवादी लोगों ने अपने दकियानूसी सोच से इस देश का जितना बेड़ा गर्क किया है, उतना तो शायद ही किसीने किया होगा। वे कौन लोग थे, जिन्होंने कहा कि गोबर शरीर पर रगड़ लेने तथा गोमूत्र पीते रहने से कोरोना नहीं होगा? कौन लोग थे जो गोबर खाने की सलाह दे रहे थे? 

देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह फ्रांस से खरीदे गये राफेल लड़ाकू विमानों की पूजा नींबू-मिर्ची लटका कर करते हैं और कोरोना से बचाव के लिये रामचरित मानस का पाठ करने की बात कहते हैं। एक केन्द्रीय मंत्री “गो कोरोना गो” का गाना गाता है तो दूसरा “भाभीजी पापड़” खाने की सलाह देता है। एक राज्य का मुखिया गंगा जल से कोरोना नहीं होने की बात करता है तो बहुत सारे छुटभैय्ये भांति-भांति के मंत्र और यज्ञ हवन का धुआं निकाल कर कोरोना नियंत्रण की बात करते हैं। प्रधानमंत्री तक ताली और थाली बजाने का आह्वान करते हैं। ऐसे में स्थितियां बिगड़ेंगी नहीं तो क्या सुधरेंगीं? फिर कोई नागरिक इन बिगड़ते हालात पर सवाल उठाये तो संघी होसबोले बोलते हैं कि कोरोना की आड़ में देश विरोधी ताकतें नकारात्मकता और अविश्वास का माहौल बना सकती हैं!

असल में देश विरोधी वे नहीं हैं, जो अपने प्रियजनों व परिजनों को खोकर सवाल उठा रहे हैं या अस्पतालों में बेड, दवाइयां और ऑक्सीजन मांग रहे हैं। देश विरोधी वे हैं जिन्होंने देश की स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार नहीं किया, कोई ढांचागत सुविधा नहीं बढाई और निरंतर अवैज्ञानिक और दकियानूसी बातें समाज में फैलाते रहे हैं। सरकारें जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं। जनता को सत्ता से सवाल पूछने का नैसर्गिक और वैधानिक अधिकार प्राप्त है। प्रश्न करने, पारदर्शिता चाहने और जवाबदेही मांगने से कोई नकारात्मकता और अविश्वास नहीं निर्मित होता है। लेकिन देश के नाम पर देशभक्ति की आड़ में छिपे सांप्रदायिक और पूंजीवादी तथा मनुवादी तत्व अपने वर्चस्व को स्थापित रखने के लिये जागरूक लोगों के प्रश्न पूछने के और जानने के अधिकार को नियंत्रित करने में लगे रहते हैं।

बहरहाल, न तो आरएसएस की भारत के निर्माण में कोई भूमिका नजर है और ना ही लोकतंत्र में उसकी आस्था है। वह किसी संवैधानिक प्रक्रिया की उपज भी नहीं है। वह दकियानूसी दक्षिणपंथ और धार्मिक रूढ़ीवाद का संरक्षक अलोकतांत्रिक समूह है, जिसमें प्रश्न पूछना कभी अच्छा नहीं माना जाता है, जहां संदेह के लिये कोई जगह नहीं है, जहां सिर्फ श्रद्धालु और अंध भक्तों की निर्मिती होती है। वे खुद को ही देश समझने के मनोविकार से ग्रस्त हो जाते है और शेष सभी को देश विरोधी करार देते हैं। यही इनका काम है और यही इनकी प्रवृत्ति। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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