दिल्ली कैंट गुड़िया हत्याकांड : कटघरे में पुलिस, सेना से सवाल

श्मशान घाट के पास रहनेवाली एक नौ साल की दलित मासूम बच्ची के साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसकी लाश को ठिकाने लगाने का मामला प्रकाश में आया है। मृतका के परिजनों के बयान को आधार मानें तो पूरे मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही है। उसने इस मामले की प्राथमिकी दर्ज करने में भी आनाकानी की। फारवर्ड प्रेस की खबर

पिछले साल उत्तर प्रदेश के हाथरस के बुलगढ़ी गांव में एक दलित युवती के साथ जो क्रूरता की गयी थी और फिर उसकी लाश को जला दिया गया था, कुछ ऐसा ही बीते 1 अगस्त, 2021 को देश की राजधानी दिल्ली में किया गया। घटना दिल्ली कैंट के पुरानी नांगल स्थित श्मशान घाट की है। श्मशान घाट के पास रहनेवाली एक नौ साल की दलित मासूम बच्ची के साथ सामूहिक दुष्कर्म के बाद उसकी लाश को ठिकाने लगाने का मामला प्रकाश में आया है। वहीं दिल्ली पुलिस इस मामले में अभियुक्तों को बचाने की कोशिशों में जुटी है। इस पूरे मामले में सेना खामोश नजर आ रही है जबकि श्मशान घाट की व्यवस्था की जिम्मेदारी सेना की है। 

कैसे हुई गुड़िया की मौत?

फारवर्ड प्रेस 4 अगस्त, 2021 को पुरानी नांगल गांव गया, जहां मुख्य रूप से दो जातियों के लोग रहते हैं। गांव में दो मुहल्ले भी हैं। एक मुहल्ला वाल्मीकि समाज के लोगों का और दूसरा मुहल्ला कुम्हारों का है। मृतका गुड़िया (बदला हुआ नाम) का परिवार कुम्हारों के मुहल्ले में एक वाल्मीकि समाज के घर में किराए पर रहता है। राजस्थान के भरतपुर के मूल निवासी उसके माता-पिता सैन्य छावनी में ही बने सर्वधर्म मजार के पास भीख मांगते रहे हैं। 

गुड़िया की मौत कैसे हुई इस संबंध में उसकी मां ने बताया कि बीते 1 अगस्त, 2021 शाम साढ़े पांच बजे उनकी बेटी शमशान घाट में लगे वाटर कूलर से ठंडा पानी लेने गई थी। साढ़े छह बजे वहां के पंडित राधेश्याम ने परिजनों को घाट पर बुलाया और उन्हें बताया कि बच्ची की करंट लगने से मौत हो गई है। वे भागे-भागे श्मशान घाट पहुंचे जो कि मजार से एकदम नजदीक है। बच्ची को चिता पर उलटा रखा गया था। उसके शरीर पर नीचे के हिस्से में कपड़ा नहीं था। उसके उपर कफन जैसा एक कपड़ा डाला हुआ था। फिर जब उन्होंने पुलिस को फोन करने की कोशिश की तो पुजारी ने पोस्टमॉर्टेम के दौरान अंगों की चोरी होने की संभावना की बात कहकर उन्हें डराया और जबरन बच्ची का अंतिम संस्कार करने लगे। तब मृतका की मां के रोने की आवाज सुनकर गांव के लोग जुट गए और चिता को बुझाने लगे। तबतक पुलिस आ चुकी थी और वह लोगों को चिता बुझाने से रोक रही थी। लेकिन तबतक बच्ची के पैर को छोड़ शरीर का पूरा हिस्सा खाक हो चुका था।

दिल्ली कैंट के पुरानी नांगल गांव के पास प्रदर्शन करतीं महिलाएं

महीने भर पहले दो और बच्चियों के साथ हुआ गलत

अपनी बच्ची के कपड़े दिखाते हुए मृतका की मां ने बताया कि मृतका उनकी एकमात्र संतान थी। उनके मुताबिक चार लोगों ने उनकी बेटी के साथ दरिंदगी की है, जिसमें पंडित राधेश्याम के अलावा श्मशान का सिक्यूरिटी गार्ड भी शामिल है। उसने बताया कि एक महीना पहले ही श्मशान के पास ही दो और बच्चियों के साथ गलत किया गया। लेकिन बच्चियों की जान नहीं ली गयी। पुलिस में मामला भी दर्ज कराया गया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। मृतका की मां ने बताया कि गुड़िया अक्सर ही श्मशान घाट में जाया करती थी। वहां ठंडे पानी का नल था। कुछ दिन पहले ही उसने छेड़खानी की शिकायत की थी, जिसके बारे में एक स्थानीय पुलिसकर्मी को जानकारी दी गयी थी। 

हुआ विरोध तो सक्रिय हुई पुलिस

मिली जानकारी के अनुसार आरोपियों ने मृतका को जब जलाया तब उसके पांवों का निचला हिस्सा अधजला रह गया। उसके अधजले पावों की तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी। मृतका के परिजनों ने बताया कि पहले पुलिस आरोपियों से पीड़िता के पिता को 20 हजार रुपया दिलवाकर मामले को रफा-दफा कर देना चाहती थी। परिजनों के मुताबिक पुलिस ने डराया-धमकाया भी था और जेल में डालने की धमकी दी। यहां तक कि मृतका की मां और उसके पिता को थाने में बंद करके रखा गया। मृतका के पिता ने अपने शरीर पर चोटों के निशान दिखाते हुए कहा कि उन्हें श्मशान घाट पर ही पुलिस ने तब पीटा जब वह अपनी बच्ची की चिता को बुझाने का प्रयास कर रहे थे।

श्मशान घाट के अंदर वह जगह जहां इलेक्ट्रिक बोर्ड को उखाड़ दिया गया है

मृतका के परिजनों के बयान को आधार मानें तो पूरे मामले में पुलिस की भूमिका संदिग्ध रही है। उसने इस मामले की प्राथमिकी दर्ज करने में भी आनाकानी की। लेकिन जब यह मामला तुल पकड़ने लगा और बिरजू पहलवान, मुहर सिंह पहलवान, भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद और कौशल पंवार आदि ने 3 अगस्त को घटनास्थल पर जाकर मृतका के परिजनों से बातचीत की तथा घटना के विरोध में प्रदर्शन किया, तब पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की। इन लोगों के द्वारा मांग की गयी कि मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक स्वतंत्र उच्चस्तरीय समिति का गठन हो। साथ ही मामले की फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई हो तथा मृतका के परिजनों को समुचित मुआवजा दी जाय। 

दिल्ली पुलिस को वह नहीं दिखा जो हमने देखा

फारवर्ड प्रेस ने जब श्मशान का दौरा किया तो पाया कि वहां श्मशान के बाहर एक दर्जन से अधिक पुलिसकर्मी तैनात थे। श्मशान के अंदर कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था। वहां दो जगहों पर पुलिस ने “डू नॉट क्रॉस, दिल्ली पुलिस” लिखे हुए प्लास्टिक के टेप से बैरिकेडिंग की हुई थी। एक वहां जहां गुड़िया को जलाया गया था। वहां अधजली लकड़ियां थीं। कुछ लकड़ियां साबूत थीं और एक बालटी थी। बालटी का उपयोग संभवत: चिता पर पानी डालने के लिए किया गया। 

चिता स्थल की तस्वीर जहां दिल्ली पुलिस ने घेराबंदी कर रखी है

वहीं दूसरी बैरिकेडिंग उस जगह पर की गयी जहां पानी को ठंडा करने वाली मशीन लगी थी। पुलिस के मुताबिक इसी जगह पर गुड़िया को बिजली का करंट लगा और उसकी मौत हो गयी। जबकि फारवर्ड प्रेस ने पाया कि वहां इलेक्ट्रिक बोर्ड को उखाड़ दिया गया है और मशीन को भी हटा दिया गया है। अब वहां कुछ तार पानी के नल के पास फैला दिए गए हैं। वहीं बैरिकेडिंग के अंदर एक स्कूटर गिरा पड़ा था। सवाल है कि यह स्कूटर किसका है और श्मशान घाट के अंदर कैसे आया? एक सवाल यह भी कि सबूतों के साथ छेड़छाड़ किसने की? एक प्रबल संभावना यह कि सबूत मिटाने का प्रयास आरोपियों द्वारा किया गया होगा। मशीन हटाने और तारों को फैलाने के पीछे भी यही सोच रही होगी।

दूसरी बैरिकेडिंग के पास पड़ी देसी शराब की बोतलें व अन्य वस्तुएं जो महत्वपूर्ण सुराग हो सकती हैं

फारवर्ड प्रेस ने पाया कि दूसरी बैरिकेडिंग के ठीक सटे एक कचरा का डब्बा था और उसमें देसी दारू की बोतलें थीं। कुछ बोतल कचरे के डिब्बे के बाहर पिलर के पास भी पड़ी थीं। साथ ही, वहां कागज के प्लेटें थीं, जिनमें लाल चटनी थी। ऐसी चटनी का उपयोग मोमोज के साथ किया जाता है। इन सबसे एक बात साफ होती है कि श्मशान के अंदर शराब पी गयी और चखने खाए गए। चूंकि अवशेष बहुत ताजे हैं तो इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जिस वक्त गुड़िया की हत्या (जिसे पुलिस ने प्रारंभ में बिजली का करंट लगने से मौत कहा था) की गयी हो, उस वक्त वहां कुछ लोगों ने जश्न मनाया। दारू पी और चखने खाए। 

बड़ा सवाल यही कि आखिर पुलिस ने इन संदेहास्पद वस्तुओं को अपने नियंत्रण में क्यों नहीं लिया? क्या पुलिस को दारू की खाली बोतलें नहीं दिखीं? या फिर वह कुछ देखना ही नहीं चाहती?

सेना से सवाल – किसकी अनुमति से रह रहा था पुजारी?

श्मशान घाट परिसर के अंदर कई शिलालेख हैं। इनमें से एक शिलालेख परिसर के बीचोंबीच एक मूर्ति के पास है। शिलालेख के अनुसार मूर्ति ब्राह्मणों के देवता शंकर की है, जिसे 3 जुलाई, 2007 को इंद्रजीत मेहता द्वारा स्थापित करायी गयी। परिसर में ही एक और सूचना पट्ट लगाया गया है। इसमें दर्ज है – “सूचना। दिल्ली छावनी परिषद श्मशान घाट पुरानी नांगल। सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि श्मशान घाट में विभिन्न कार्यों के लिए निम्नलिखित मूल्य निर्धारित किये हैं। लकड़ी -700 रुपए प्रति 100 केजी, श्मशान सेवा – 600 रुपए, अस्थि संचयन – 500 रुपए, जमादार – 200 रुपए। शव-वाहन का प्रबंध है। किसी भी प्रकार की असुविधा के लिए दिल्ली छावनी परिषद में संपर्क करें। चिता में से राख फेंकने के लिए – 200 रुपए। आदेशानुसार मु. छा.अ.अ.”

दिल्ली सैन्य छावनी परिषद द्वारा श्मशान घाट के परिसर में लगायी गयी सूचना

इस सूचना पट्ट से पता चलता है कि यह श्मशान घाट दिल्ली सैन्य छावनी के अंदर है और इसकी पूरी व्यवस्था की जिम्मेदारी दिल्ली छावनी परिषद की है। 

दिल्ली छावनी परिषद के आधिकारिक वेबसाइट पर जो सूचनाएं दर्ज हैं, उसके मुताबिक दिल्ली छावनी परिषद एक स्वायत्त संगठन है जो भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के अधीन कैंटोनमेंट एक्ट, 2006 के प्रावधानों के तहत काम करता है। छावनी परिषद के एक अधिकारी से फारवर्ड प्रेस ने जब यह जानने का प्रयास किया कि चूंकि घटना स्थल छावनी परिषद की सीमा में आता है, तो वहां की विधि-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है, तो बताया गया कि छावनी परिषद केवल नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने का काम करती है। विधि व्यवस्था के लिए दिल्ली पुलिस जिम्मेदार है। वहीं यह पूछने पर कि जब श्मशान घाट छावनी परिषद का है और इसकी देख-रेख छावनी परिषद करती है तो क्या उसने वहां पुजारी को नियुक्त किया था, उक्त अधिकारी ने बताया कि छावनी परिषद के द्वारा किसी पुजारी को प्रतिनियुक्त नहीं किया गया है।

अब सवाल उठता है कि क्या मुख्य अभियुक्त पंडित राधेश्याम किसकी अनुमति से वहां रह रहा था? इस बारे में भले ही छावनी परिषद के उक्त अधिकारी ने कोई जानकारी नहीं दी, लेकिन स्थानीय नागरिकों से मिली जानकारी के अनुसार वह पिछले 6-7 वर्षों से रह रहा था। तो क्या यह संभव है कि सैन्य छावनी परिसर और इसके आसपास के इलाके में कोई भी बिना किसी की अनुमति के रह सकता है?

बहरहाल, इस भयावह और बर्बर घटना को जिस बेरहमी से अंजाम दिया गया उसने कई सवाल खड़े होते हैं। क्या दलित महिलाएं और बच्चियां ही क्यों शिकार होती हैं? कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि पुलिस इस तरह के मामलों में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाती है? इसी मामले में पुलिस ने आरोपी पंडित राधेश्याम और उसके तीन साथियों को पुलिस ने तब गिरफ्तार किया जब दलित संगठनों ने इसके लिए एकजुटता दिखायी और आवाज उठायी।

(संपादन : अनिल)


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